इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा
स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)
स्वप्न दोष नाशक चमत्कारी बूटियाँ
कन्यों पर भारत का भविष्य है। युवाकाल में खोटी संगत में न पड़कर इन कुट्टेओं से बचकर अपने शरीर को पुष्ट बनाकर विद्या प्राप्त करो। जिससे भारत का भविष्य उज्ज्वल होकर समस्त विश्व को सभ्यता और साम्यता का पाठ दे सके।
हमारा इतिहास बताता है कि द्वारपर में वीर अर्जुन ने अमरीका के राजा की कन्या उलूपी से विवाह किया था। धर्मराज युधिष्ठिर की राजसूय यज्ञ में समस्त विश्व के राजाओं ने अपना-अपना कर देकर महाराजा युधिष्ठिर को चक्रवर्ती राजा माना था। हे भारतवासियों! हांशा मत हो ब्रह्मचर्य का पालन करो और फिर से अपने पूर्वजों के समान चक्रवर्ती राजा बनो।
ब्रह्मचर्य साधन
प्रातः सूर्योदय से कुछ समय पूर्व शौच, संध्यापासनादि से निवृत्त होकर सिद्धासन पर बैठे। आसन लगाते समय ध्यान रहे कि पहले बायें पैर को एड़ी गुदा और अण्डकोषों के मध्य सीमन पर लगायें, पश्चात् दाहिने पैर की एड़ी लिंग के मूल पर रखनी चाहिए, दोनों पैरों के गट्टे आपस में ऊपर नीचे मिले रहें। कुछ ही दिनों में आसन पर बैठने का सही अभ्यास हो जायगा। आसन पर सीधे बैठकर देखें कौन-सा स्वर चल रहा है, जिस नथने से श्वास आ जा रही हो उससे दूसरे नथने को अंगुली या अंगुठे से दबाकर बन्द करें, फिर चलते हुए नथने से धीरे-धीरे श्वास अन्दर खींचें, उसी समय गुदा को ऊपर खींचकर संकोचन करते हुए मूल बन्ध लगायें। पूर्ण श्वास भर जाने पर नथने से हाथ हटाकर श्वास को भीतर ही रोकें रहें, ध्यान रहे गुदा, द्वार बराबर ऊपर को खिंचा रहे, ढीला न होने पावे। श्वास रोक कर पेट के निचले भाग को गति दें अर्थात् पेट को अन्दर सिकोड़ें और बाहर को फेकें, निरन्तर पेट को गति देते रहें, मानों लिंग द्वारा कोई चीज
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ऊपर को खींची जा रही है, परन्तु मूलबन्ध बराबर लगा रहे, सरलता से जितनी देर श्वास रुक सकें उतनी देर तक पेट की गति का अभ्यास करते रहें, तत्पश्चात् पेट की गति को रोक कर जिस नथने से श्वास खींची है उसे अंगुली या अंगूठे से बन्द करके दूसरे नथने से धीरे धीरे श्वास को बाहर निकाल दो, नाक से हाथ हटाकर जितनी देर हो सकें श्वास को बाहर ही रोको। मूलबन्ध लगा रहे और पेट को भी गति नहीं देनी। यह एक प्राणायाम हुआ। इसी प्रकार चलते नथने से पुनः श्वास-खींचकर पूर्ववत् क्रिया करें, इस प्रकार तीन प्राणायाम करें। जब भली प्रकार गुदा का संकोचन होने लगे तो प्राणायाम की संख्या बढ़ाते जायें। गुदा संकोचन से ही वीर्य का स्तम्भन होता है और गुदा के ढीले रहने से ही स्वप्नदोष एवं वीर्यपातादि होते हैं। अतः जब गुदा संकोचन द्वारा वश में होगी तो वीर्य में पूर्ण स्तम्भन होगा। इस साधन में जितना मनसा, वाचा, कर्मणा, स्त्री प्रसंग से दूर रहेंगे उतना ही शीघ्र लाभ होगा। जब एक बार इस साधन को सिद्ध कर चुके हैं तो आयु पर्यन्त स्वप्नदोष, शीघ्रपतन, शुक्रमेह आदि सारे वीर्य सम्बन्धी दोषों से आपको मुक्ति मिल जायगी और दिन प्रतिदिन आपका स्वास्थ्य, आयु, बल और बुद्धि में विकास होता रहेगा। यदि साधन समय में पेट के नलों में पीड़ा होने लगे तो शुद्ध देशी घी गर्म करके मलें या पिसी हल्दी की कपड़े में पोटली बीचकर गर्म करके उसकी टकोरें दें। ध्यान रहे साधन काल में सुपाच भोजन लें, मिर्च, खटाई और तेज पदार्थों का त्याग करें।
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स्वप्नदोष नाशक चमत्कारिक बूँटी
जिन नवयुवकों को स्वप्नदोष होता ही रहता है, उन्हें चाहिए कि वह प्रातःकाल शौच, स्नानादि से निवृत्त होकर निराहार मुँह 'अपामार्ग' जिसे 'औंगा' भी कहते हैं, लम्बी शाख वाली जिस पर चावल से लगे रहते हैं, उसकी ताजा जड़ उखाड़ कर जल से मिट्टी साफ करके तीन अंगुल अर्थात् २ इंच अनुपात में लेकर मुख में रखकर धीरे-धीरे चबाकर रस चूसते जायें, बाद में फोकस को थूक दें। इसे आठ दिन निरन्तर सेवन करें। इसके सेवन से स्वप्नदोष जैसे भयंकर रोग से शीघ्र छुटकारा मिल जायगा। बाद में भी सप्ताह में एक दो बार बूँटी का सेवन करते रहा करें। अभूतपूर्व लाभ होगा। जड़ नित्य ताजा लेनी चाहिए।
विवाह
विवाह जीवन में बड़े महत्त्व का संस्कार है। इसी पर आगामी सन्तानोत्पत्ति तथा देशोन्मति निर्भर है। विवाह ही सृष्टि वृद्धि का साधन है तथा पारिवारिक सुख का एक मात्र द्वार है।
विवाह प्रेम तथा नवजीवन का आरम्भ है। इसके द्वारा पति और पत्नि दो शब्दों की उत्पत्ति होती है। विवाह के नाम से बच्चों के मुख पर हँसी आ जाती है। युवकों का हृदय विवाह के नाम से नव-प्रेम संचार की आशा तथा पूर्णसुख का अनुभव के लिए लालायित हो जाता है। युवतियों का मदन-कुमुद खिलने लगता है तथा लज्जा से नेत्र नीचे हो जाते हैं। यह विवाह सुख और आनन्द के आमोद-प्रमोद से भरा होता है। इसी कारण यह समारोह के साथ सम्पन्न होता है।
विवाह का उद्देश्य सुख के साथ पारिवारिक जीवन
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व्यतीत करना है। परन्तु आजकल इसके सर्वथा विपरीत देखने में आता है। विरले ही पुरुष विवाह करके यथार्थ सुख को पाते हैं। विवाह का मुख्य उद्देश्य बलिष्ठ सन्तान उत्पन्न करके अपने परिवार देश तथा जाति को उन्नति की ओर अग्रसर करना है। बाल-विवाह से इस हेतु की पूर्ति नहीं हो सकती। बाल-विवाह के कारण ही विविध रोगों को उत्पत्ति हो गई है। सहस्रों बालक अकाल मृत्यु से पंचतत्व में विलीन हो जाते हैं। जिस देश में बच्चे बाल्यकाल में ही मृत्यु को प्राप्त हो जायें, वह देश आगे को कैसे उन्नति कर सकता है। बाल-विवाह ही के कारण सहस्रों बाल-विधवा स्त्रियाँ भारत को कर्त्तविकर रहती हैं। जो देश में वेश्याओं के रूप में पुरुषों से अपना प्रतिशोध लेती हैं। वह कहती हैं कि तुमने हमारा विवाह बाल्यकाल में ही कर दिया और जब हमारी आयु तरुणावस्था को प्राप्त हुई उस समय से पूर्व ही विधवा हो जाने पर घर से निकाल दिया। क्या पुरुष अपने अनेक विवाह नहीं करते हैं? तो हमें द्वितीय विवाह करने का अधिकार क्यों नहीं? हम वेश्या वृत्ति करके तुम्हारे पुरुषत्व को समय से पूर्व ही अपने हाव-भाव दिखाकर नष्ट कर देंगी।
मित्रों, आपको योग्य है कि आप अपने बच्चों का विवाह पूर्ण तरुणता प्राप्त होने पर ही करें अर्थात् युवकों का २५ वर्ष और युवतियों का १६ वर्ष से पूर्व विवाह न करें।
ऊन षोडश वर्षा याम प्राप्तः पंचविंशतिम्।
यद्याधत्ते पुमान गर्भं कृक्षिस्थः सविपद्यते॥
जातो वा न चिरं जीवेत् जीवेद्वा दुर्बलेन्द्रियः।
तस्मादत्यन्त बालायां गर्भाधानं न कारयेत्॥
सुश्रुत शरीर स्थान अ- १०
अर्थ- यदि २५ वर्ष से कम आयु का युवक १६ वर्ष से कम आयु की युवती के साथ समागम करता है तो गर्भ की स्थिति नहीं हो पाती। यदि गर्भ रह भी जाता है तो वह नष्ट हो
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जाता है। यदि गर्भ नष्ट न हो और बच्चा उत्पन्न हो जाय तो वह अधिक समय तक जीवित नहीं रहता। यदि अधिक समय तक जीवित रह जाय तो वह दुर्बलीन्द्रिय होता है। अतः अपरिपक्व आयु की युवती से बच्चा उत्पन्न करने का प्रयत्न न होना चाहिए।
जब आम के नये वृक्ष पर मौल आता है तो माली ३ वर्ष तक उस मौल को तोड़ते रहते हैं। एक माली से मालमू किया कि आम के नये वृक्ष का मौल ३ साल तक क्यों तोड़ देते हैं? उसने कहा कि पुरखों से ऐसा ही चला आता है। पर जो वनस्पति विद्या के जानकार हैं वह कहते हैं कि यदि तीन वर्ष तक आम का मौल तोड़ दिया जायगा तो उस पर लगे फलों में कीड़े नहीं पड़ते और फल भी मीठा और बड़ा आवेगा। यह एक प्रत्यक्ष चमकता हुआ सर्वदेशीय नियम है, इसी नियम के ज्ञाता मनु भगवान ने लिखा है—
श्रीणि वषाण्युदीक्षेत कुर्मार्मृतुमती सती।
ऊर्ध्वं तु काला देतस्माहिन्देत सदृशं पतिम्॥
मनु १/१०
अर्थ— जब तीन वर्ष तक (अर्थात् छत्तीस बार) कन्या पिता के यहाँ रजस्वला हो ले तब अपने सदृश गुण वाले पति को प्राप्त होवे।
परो देहिं शामुल्यं ब्रह्मभ्यो वि भजा वसु।
कृत्येषा पद्मती भूत्वा जाया विशते पतिम्॥
ऋग्वेद १०/८५/२९
भावार्थ— जब स्त्री का विषाक्त शरीरस्थ मल का अंश दूर हो जाय तभी पुरुष के समीप जाना उचित है। अन्यथा स्त्री का विषाक्त पुरुष के शरीर में प्रविष्ट होकर पुरुष को रोग युक्त बना देता है। अर्थात् जब तक ३६ बार रजोदर्शन द्वारा स्त्री का शरीर शुद्ध न हो जाय तब तक स्त्री से कभी समागम न करे। यदि इससे पूर्व समागम करेगा तो वीर्य सम्बन्धी अनेक रोग उत्पन्न हो
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जनक और जननी
जावंगे तथा रजस्वला स्त्री से भी समागम न करे।
जब इन नियमों पर मनुष्य चलते थे तब बच्चे आजकल की भाँति निर्बल, रोगी, अल्पायु नहीं होते थे और अब भी यदि सन्तानोत्पत्ति में नियमों का पालन होने लग तो पुनः वहाँ समय आ जाने की सम्भावना है और फिर से अर्जुन, द्रोणाचार्य और भीष्म जैसी वज्रगंभी सन्तानों उत्पन्न होने लगेंगे।
मनु जी ने विवाह आठ प्रकार के लिखे हैं—
ब्राह्मो दैवतर्थेवार्षः प्राजापत्यस्यसासुरः।
गान्धर्वोराक्षसश्चैव पेशाचश्चाष्टमोघमः॥
मनु ३/२१
अर्थ— १. ब्राह्म २. दैव ३. आर्य ४. प्रजापत्य ५. आसुर ६. गान्धर्व ७. राक्षस ८. पेशाच, यह आठ प्रकार के विवाह हैं।
ब्राह्मदिषु विवाहेषु चतुर्विजानुपूर्वशः।
ब्रह्मवर्चस्विनः पुत्रा जायन्ते शिष्टसम्पत्ता॥
मनु ३/२९
अर्थ— ब्रह्मादि चार प्रकार के विवाहों में ही क्रम से ऐसे पुत्र होते हैं जो ब्रह्म, तेजस्वी और श्रेष्ठ मनुष्यों के प्यारे।
रूप सत्त्वगुणोपेता धनवन्तो यशस्विनः।
पर्याप्तभोगा धर्मिष्ठा जीवन्ति च शतं समाः॥
मनु ३/४०
अर्थ— रूपवान्, पराक्रमी, गुणवान्, धनवान्, यश वाले, पुष्कल भोग वाले, धर्मात्मा और सौ वर्ष की आयु वाले होते हैं।
इतरे तु शिष्टेषु नृशंसानृतवादिनः।
जायन्ते दुर्विवाहेषु ब्रह्मधर्म द्विषः सुता॥
मनु ३/४१
अर्थ— शेष दुष्ट विवाह से सन्तान निर्लज्ज, झूठ बोलने वाली, ब्रह्म, धर्म द्वेषी (ब्राह्मणों व धर्मों के शत्रु) उत्पन्न होते हैं।
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अनिन्दतैः स्त्री विवहैरनिन्द्या भवति प्रजा ।
निन्दन्तनिन्दिता नृणां तस्मान्निन्द्यानिवर्जयेत् ॥
मनु ३/८२
अर्थ- अच्छे विवाहों से अच्छी और बुरे विवाहों से बुरी सन्तान मनुष्यों के होती है। इस कारण निन्दित विवाहों का त्याग करें।
इसका अभिप्राय यह है कि व्यभिचार, अपहरण, दुराचार और बिना लक्ष के द्वारा जो सन्तान होती है वह दुष्ट प्रकृति का, धन तथा कर्म से होन, देश जाति को कलंकित करने वाली होती है, और जो विचार पूर्वक नियमानुसार संस्कारमय सन्तान होती है वह देश जाति के गौरव को द्विगुणित, चौगुणित करती है इसीलिए सुसन्तति के निर्माण हेतु ही संस्कारित विवाह के लिए वेद तथा मनु जी ने उपदेश किया है।
आजकल जिस प्रकार की पद्धति विवाह में चल रही है उसका एक उदाहरण यहाँ देते हैं, विद्वान् जन उसके दोषों को समझकर अपनी परिपाटी में परिवर्तन करें।
लाला श्यामलाल की एक पुत्री थी। जिसका नाम लक्ष्मी देवी था। उन्होंने उसे पश्चिमी पद्धति से शिक्षा दिलाई, लक्ष्मी बड़ी ही विचारशील, सभ्य और साथ ही भारतीय संस्कृति सभ्यता को भी भली प्रकार जानती थी। अपनी तीव्र बुद्धि के कारण गायनादि कला में भी पूर्ण पारंगत थी। लाला श्यामलाल ने अपने एक मित्र के लड़के के साथ उसका विवाह कर देना तय कर दिया। उस समय वह महोदय इंग्लैंड में आईन्सीएस० की तैयारी कर रहे थे। लक्ष्मी को घर के माता-पिता एवं सभी पारिवारिक जनों ने देखकर पसन्द कर लिया था।
लाला श्यामलाल के यहाँ बारात आ गई। रात्रि के तीन बजे वह महोदय कन्या के पिता के द्वार पर आ खड़े हुए। लाला श्यामलाल के पास अपना विजिटिंग कार्ड भेजा। लाला श्यामलाल
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आश्चर्य चकित हो द्वार पर आये। देखा, भावी दामाद खड़े हैं। लाला श्यामलाल ने चकित होकर रात्रि के समय उपस्थित होने का कारण मालूम किया। उत्तर में वर ने कहा मैं लड़की देखने आया हूँ, मैंने वैसे तो लड़की की बहुत प्रशंसा सुनी है। माता-पिता प्रशंसा करते नहीं थकते। परन्तु फिर भी आप जानते हैं, अपनी-अपनी आँखें हैं और अपनी-अपनी पसन्द। इसमें कोई हर्ज भी नहीं। हर्ज तो तब था जब पर्दे की प्रथा थी। क्योंकि कल को यदि न बने तो दोनों का जीवन नष्ट होने से बचा रहे। लाला श्यामलाल पुराने विचारों के पुरुष थे। उनके लिए प्रथा अटल नियम थी। उन्हें समाज का भय था। इसलिए उन्होंने पहले तो मना कर दिया और कहा मान लो मैंने तुम्हें लड़की दिखा दी और तुमने उसे पसन्द न किया तो क्या विवाह रुक जायगा? तुम कहोगे इसमें हनि ही क्या है। तुम्हारे लिए न होगी हमारी तो नाक कट जायगी। इन बातों का वर पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। वर ने कहा बिना देखे मैं विवाह न करूँगा, अब तो लाला श्यामलाल बड़ी विपत्ति में पड़ गए। बारत घर पर आ गई थी प्रातः ब्राह्ममुहूर्त में विवाह होना था, चार घण्टे का अन्तर। आखिर पिता ने लक्ष्मी को कमरे में बुला लिया। वर ने देखा वह वास्तव में वैसी ही सुन्दर है जैसी उसकी प्रशंसा सुनी थी। वर ने प्रश्न किया 'आप इग्लिश पढ़ी हैं?' लक्ष्मी ने संकोच से उत्तर दिया 'पढ़ी हैं'। लक्ष्मी के हाथ में अंग्रेजी का समाचार-पत्र देकर पढ़वाया। वह लक्ष्मी के उच्चारण और मधुर कण्ठ पर मुग्ध हो गए। लक्ष्मी ने संगीत में भी परीक्षा दी और उसमें भी उत्तीर्ण हो गई।
वर ने कहा- 'मुझे लड़की पसन्द है।' लक्ष्मी ने निश्चयात्मक रूप से कहा- 'परन्तु आप मुझे पसन्द नहीं।'
लक्ष्मी ने अपने उक्त शब्दों के समर्थन में जो कहा, वह एक सुशील भारतीय महिला के लिए उपयुक्त है।
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