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इच्छानुसार संतान

Ichhanusar Santan

बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा

स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)

Devanagarihipublished250 पृष्ठ

भूमिका

भूमिका

धर्म-प्रधान एवं कर्म-प्रवीण भारत में समय-समय पर अनेक ऋषि, मुनि, कवि, विद्वान् तथा विदुषियों ने जन्म ग्रहण कर इस भूमि को अलंकृत किया है। हमारे पूर्वजों ने अपनी सतत साधना, अखण्ड निष्ठा एवं शुद्ध आस्तिकता के फलस्वरूप जिन लोक मंगलकारी अनुभवों का संचय किया उन्हें 'सर्वजन हिताय' प्रस्तुत कर न केवल भारत का, अपितु समस्त विश्व का कल्याण सम्पादित किया है। मनु को इस देश की आचार परम्परा की मान्यता एवं प्रामाणिकता पर गर्व है। उनका कहना है-

एतद्वदेशप्रसृतस्य सकाशादप्य जन्मनः।

स्वं स्वं चरित्रं शिखेरन् पृथिव्यां सर्वं मानवाः॥

'इस देश में उत्पन्न हुए ब्राह्मण से, पृथ्वी के समस्त मानव अपना चरित्र सीखें।'

भयवान् मनु की यह गर्वोक्ति मिथ्या नहीं सर्वथा सत्य है भारत ने एक सुदीर्घ समय तक आचार के सम्बन्ध में जगत् का नेतृत्व किया है। परन्तु कालक्रमेण वही भारत अवनीति के ऐसे गहरे गर्त में गिरता चला गया कि उसका वह सनातन और पुरातन स्वरूप अविश्वसनीय बनकर कल्पना प्रसृत मात्र प्रतीत होने लगा। ऐसा क्यों? कारण स्पष्ट है। हमारी वैदिक पद्धति में जिस आश्रम व्यवस्था को ऐहलौकिक सुखसिद्धि तथा पारलौकिक कल्याण का प्रभुख हेतु माना है उस आश्रम-व्यवस्था की अवहेलना ही अधोगति का कारण बनी। यद्यपि चारों आश्रमों में प्रथम आश्रम को मानव जीवन की नींव कहा है, जिसकी दृढ़ता एवं पुष्टता पर ही इस

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वीरेन्द्र गुप्तः

CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

जीवन भवन का सुदृढ़ एवं सुपुष्ट होना सम्भव है तथापि गृहस्थ आश्रम को सब आश्रमों में गुरु माना है। मनु महाराज का कहना है—

यथा नदी नदाः सर्वे सागरे यान्ति संस्थितिम्।
तथैवाश्रमिणः सर्वे गृहस्थे यान्ति संस्थितिम्॥

‘जिस प्रकार सब नदी और नद समुद्र में स्थिति को प्राप्त होते हैं उसी प्रकार सभी आश्रम वाले गृहस्थ से भरण-पोषण पाने के कारण उसी पर स्थित हैं।’

जिस गृहस्थ पर अपने भरण-पोषण के साथ-साथ अन्य आश्रमियों के भरण-पोषण का भी दायित्व है उसे कितना शक्ति सम्पन्न होना चाहिये यह किसी भी मतिमान से अगोचर नहीं। वस्तुतः दुर्बल इन्द्रिय वालों को इस आश्रम में प्रवेश का अधिकार ही नहीं। जब एक गृहस्थ पर इस प्रकार भार है तो उसे अपनी शक्ति को संचित करने एवं सुरक्षित रखने का सदा ध्यान होना चाहिये। शारीरिक शक्ति मानसिक विकास तथा आत्मिक उन्नति को लिये नियत दिनचर्या एवं समुचित आहार-विहार ही एकमात्र कारण है। इस पर हमारे प्राचीन आर्य ग्रन्थों ने बड़ा बल दिया है। महर्षि दयानन्द सरस्वती ने चिरप्रस्तुत आश्रम व्यवस्था को पुनः जागृत करने के लिये प्राचीन गुरुकुल प्रणाली का शुभ-सन्देश देश को दिया। प्रथम आश्रम में ब्रह्मचर्य व्रत पालन पूर्वक नियत दिनचर्या का सतत अभ्यासी बालक जब गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करेगा तो वह सद्गृहस्थ सिद्ध होगा। अन्यथा गृहस्थ के पुनीत कर्तव्य से विमुख या वंचित ही बना रहेगा। इन्हीं सब बातों को दृष्टिगत रखते हुए श्री वीरेन्द्र गुप्त ने प्रस्तुत पुस्तक का प्रणयन किया है।

सुयोग्य लेखक ने अनेक ग्रन्थों का स्वाध्याय कर तथा अनुभव विद्वज्जनों का सम्पर्क ग्रहण कर जिस कठिन परिश्रम के साथ इस पुस्तक को लिखा है वह सतशः स्तुत्य है। सादी भाषा में जिन जीवनोपयोगी अनुभवों को अंकित किया है वे वस्तुतः

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वीरेन्द्र गुप्तः

CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

गाहस्थ जीवन को सुखमय एवं सम्पन्न बनाने वाले हैं। प्रत्येक विषय को पूर्ण रूप से स्पष्ट करने में लेखक ने अपने अनुपम कौशल का परिचय दिया है।

यद्यपि प्रस्तुत पुस्तक में अधिकतर प्राचीन विचारधारा एवं आचार पद्धति का ही विशेष रूप से उल्लेख किया है परन्तु नवीनतम विचारधारा पर भी यथास्थान उचित प्रकाश डाला है। सन्तति निरोध का प्रश्न आज की उत्तरोत्तर बढ़ती हुई जनसंख्या को रोकने के लिये महत्वपूर्ण बन गया है। इसके अनेकानेका आधुनिकतम उपाय प्रचलित हैं जिनसे संयम की भावना तो उपेक्षित हो जाती है। प्रत्युत विलासिता की भावना और बढ़ जाती है जिसके कारण हमारे बुद्धि, बल और स्वास्थ्य को अत्यन्त हानि पहुँचाती है। परन्तु इस पुस्तक के कुशल लेखक ने सन्तति निरोध के विषय पर जो शिष्ट सम्मत अपना विचार प्रस्तुत किया है वह भूरि-भूरि प्रशंसनीय है।

परमपिता परमात्मा से प्रार्थना है कि लेखक ने जिस हित भावना से इस पुस्तक को प्रकाशित किया है वह इसके अधिकाधिक प्रचार से सफल सिद्ध हो तथा नवयुवकों से निवेदन है कि वे इस पुस्तक के अध्ययन एवं मनन से अपने जीवन को तदनुरूप बनाने की सफल चेष्टा करें।

विदुषां वशवंद—

भगवत् सहाय शर्मा

(आचार्य)

पुरादाबाद

१५-५-५८

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वीरेन्द्र गुप्तः

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द्वितीय संस्करण के प्रकाशन पर

आचार्य जी का चिर आशीर्वाद

प्रत्येक देश की अपनी एक मौलिक संस्कृति होती है जिसके आधार पर ही उस देश की उन्नति एवं अवन्ति निर्भर रहती है। धर्मप्राण भारतवर्ष ने जहाँ सुसंस्कृत एवं सुव्यवस्थित वर्णश्रम पद्धति द्वारा अपना ऐहलीकिक एवं पारलौकिक जीवन समुन्नत तथा उत्कृष्ट बनाया, वही उसने प्राणी मात्र में सर्वथा श्रेष्ठ मानव के हितार्थ पुरुषार्थ चतुष्टय का विधान कर उसके अनुष्ठान पर पूरा-पूरा बल दिया। धर्मार्थ, काम, मोक्ष, रूप पुरुषार्थ चतुष्टय में धर्म को सर्व प्रथम स्थान दे उससे अनुशासित अर्थ-काम की यथावत् उपलब्धि एवं उपभुक्ति के अनन्तर मोक्ष तक पहुँचने का सरल पथ प्रशस्त बना दिया। पर इसके साथ-साथ भारत के प्राचीन मनीषियों ने यह स्पष्ट घोषणा कर दी-

ऋणानि त्रीण्यपाकृत्य मनो मोक्षे निवेशयेत्॥

अर्थात् ऋषि ऋण, देव ऋण तथा पितृ ऋण, इन तीनों ऋणों को चुकाकर ही मोक्ष की ओर प्रवृत्त होना चाहिए। इन तीनों ऋणों में पितृ-ऋण से मुक्ति सुसन्तति के द्वारा ही मिलती है। कवि कुलगुरु कालिदास ने अपने प्रसिद्ध महाकाव्य रघुवंश में लिखा है-
न संयतस्तस्य बभूव ऋषितुर्विसर्जयेदयं सुत-जन्म-हर्षितः।
ऋणभिधानात् स्वयमेव केवलम् तदा पितृणां मुमुक्षु सन्धननात्॥

अर्थात्- प्रजा रक्षक राजा दिल्लीप के रघु-जन्म के समय कोई बन्दी न था, जिसे पुत्रोत्पत्ति के हर्ष में बन्धन मुक्त कर देता, आँपतू वह स्वयं ही पितृ-ऋण नाम के बन्धन से मुक्त हो गया, शुद्ध वंशज-सन्तति दोनों कुलों का उद्धार कर देती है, और वंश की शुद्ध उत्तम सन्तति पर आश्रित है। अतः वैयक्तिक एवं

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वीरेन्द्र गुप्तः

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सामाजिक उन्नति के लिए सन्तति का सुसंस्कृत होना परम आवश्यक है।

गृहस्थ आश्रम, जो सब आश्रमों का भरण-पोषण आदि के द्वारा गुरु माना गया है, उसकी सफलता सन्तानोपलब्धि होने पर ही मानी जाती है अतः सभी सदगृहस्थ सन्तान प्राप्ति के लिए परम उत्सुक रहते हैं और उसकी प्राप्ति होने पर अपने आपको धन्य एवं कृतार्थ समझते हैं। यद्यपि यह भावना गृहस्थ मात्र में पायी जाती है, पर तदर्थ उत्तम आचार-विचार की क्षमता सबमें नहीं होती और बिना उत्तम आचार-विचार के सन्तति का उत्तम बनना नितान्त असम्भव है। मानव समाज में कुछ ऐसे व्यक्ति पाये जाते हैं जो अपने सत्संस्कार-प्रेरित स्वाध्याय जन्म अनुभवों से सभी को लाभान्वित बनाने की तन-मन से सदा चेष्टा करते हैं।

हमारे परम प्रिय श्री वीरेन्द्र गुप्तः जी इसी प्रवृत्ति के व्यक्ति हैं। आपको आर्य परिवार में जन्म के कारण स्वाध्याय प्रवृत्ति दाय रूप में समुपगत हुई है और आपने अपने स्वाध्याय-जन्म अनुभवों को पुस्तक रूप देकर सभी का हित सम्पादित किया है। अतः आप इस प्रयास के लिए सर्वथा स्तुय्य हैं। आज पाठकों के समक्ष 'इच्छानुसार-सन्तानोत्पत्ति' का द्वितीय संस्करण 'इच्छानुसार सन्तान' के रूप में प्रस्तुत है। प्रथम संस्करण को सहृदय विज्ञ-वर्ग ने सादर ग्रहण करते हुए, उसकी उपादेयता प्रमाणित कर, अपने सदाशय एवं उदाराशय का जो परिचय दिया वह भूरि-भूरि सराहना के योग्य है, क्योंकि उन्हीं के उदाराशय के कारण हमारे गुप्तःजी उस पुस्तक का द्वितीय संस्करण प्रकाशित करने के लिये त्वतः बाध्य हुए, जिसके फलस्वरूप यह संस्करण पूर्व संस्करण की अपेक्षा अनेक परिष्करण एवं संवर्धन के साथ पाठकों की सेवा में उपस्थित है।

इस संस्करण में कतिपय नवीन उपयोगी परिवर्धन दृष्टिगत गते हैं। नक्षत्रों, ऋतुओं एवं अयनों का गर्भस्थिति पर जो प्रभाव पड़ता है उसका अत्यन्त मार्मिकता के साथ शास्त्र सम्मत विवेचन इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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किया गया है। सम रत्नि और विषम रत्नि के गर्भाधान से पुत्र एवं पुत्री का जन्म, सर्व सम्मत होते हुए भी कभी-कभी रजोवीर्य के न्यूनोधिक्य के कारण पूर्वोक्त सिद्धान्त को अपवाद रूप में दृष्ट होता रहता है, इस पर भी कुशल लेखक ने पर्याप्त प्रकाश डाला है। पर अपवाद पर ही केवल दृष्टि न रखकर शास्त्रीय सिद्धान्त का ही पालन करना सर्वथा श्रेयकर है।

प्रस्तुत पुस्तक के अतिरिक्त हमारे प्रिय गुप्तः जी ने और भी अनेक पुस्तकें लिखकर प्रकाशित की हैं जो आर्य सिद्धान्तों से सर्वात्मना ओत-प्रोत तथा एक दूसरे की पूरक हैं। जीवन के आरम्भिक काल में इस प्रकार की पुस्तक-रचना वास्तव में लेखक की पुनीत संस्कृति की ही परिणति है, क्योंकि—

‘प्रथमे वयसि यः शान्तः स शान्त इति मेमतिः

शुद्धात् जीवन के आरम्भ में जो शान्ति की चर्चा चलावे वही वस्तुतः सच्चा शान्ति मार्गी है।

परम पिता परमात्मा से प्रार्थना है कि हमारे उदीयमान युवक लेखक को ऐसी शक्ति, धृति और सत्प्रतिभा प्राप्त हो जिससे आप अपनी इस दिशा में सर्व हित सम्पादनार्थ उत्तरोत्तर अग्र बनते रहें तथा अपने कार्य में सदा कृत कार्य होते रहें।

इत्योभशम्

विदुषां त्रिधेमः—

भगवत् सहाय शर्मा

(आचार्य)

पुरादाबाद

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वीरेन्द्र गुप्तः

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