इच्छानुसार संतान
Ichhanusar Santan
बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा
स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)
ब्रह्मचर्य साधन
साम्यता का देने वाला कहा जाता था। वह भारतवर्ष ब्रह्मचर्य से हीन होकर कैसी निकुष्ट दशा को प्राप्त हुआ है। जहाँ हमारा नेतृत्व करने वालों की कमी नहीं थी, उस देश में अब नेतृत्व करने वालों की कमी ही नहीं वरन् अभाव है क्या आप बता सकते हैं कि हमारे बीच से जो नेता, सुधारक पथप्रदर्शक चला गया उसके स्थान पर दूसरा आया? नहीं। जैसे ऋषि दयानन्द सरस्वती का स्थान रिक्त हुआ उसकी पूर्ति नहीं हुई। इसी प्रकार स्वामी श्रद्धानन्द जी, पं.लेखराम, पंजाब केसरी लाला लाजपतराय महात्मा गांधी, सरदार पटेल, श्यामा प्रसाद मुखर्जी और पं. जवाहर लाल नेहरू, इन सब के जाने के पश्चात् इनके स्थानों की पूर्ति नहीं हुई नाही भविष्य में दीखता है कि पूर्ति हो।
ब्रह्मचर्य के नियमोल्लंघन ने आज भारतवर्ष का नाश कर डाला है आज भी यह समझा जाय कि जिस वीर्य के पतन से हमारे क्षति हुई। इसके रक्षण से जो लाभ होगा उससे हमारी सन्तान भयानक दुःखों और क्लेशों से मुक्त होगी और उनका पुरुषत्व पुनः संसार के इतिहास में आकाश के दिवाकर सद्गुण दैदीप्यमान होने लगेगा।
अतएव आपको चाहिए कि अपनी सन्तानों को और स्वयं भी ब्रह्मचर्य के नियमों का पालन करते कराते हुए विद्या पढ़ें पढ़ाएँ और बच्चों को वीर पुरुषों के चित्र तथा कहानियाँ सुनाकर उनके हृदय-पट पर सच्चरित्रता चित्र को अंकित कर दें ताकि उन बच्चों को यश, कीर्ति, बुद्धि और तेज से यथा समय लाभ पहुंच सके।
तरुणावस्था भी कैसी मनमोहक अवस्था है। शैशवावस्था को पार कर तरुणावस्था में पदार्पण करते ही यौवन कुसुम खिलने लगता है, मुखमण्डल पर गुलाबी रंगत लहराने लगती है। इसी अवस्था में शरीर के गठन का सौन्दर्य प्रत्येक दृष्टिगोची को अपनी ओर आकर्षित करता है। यही काल मदन की तरंगों में लहराया करता है। द्वादश वर्षारम्भ में ही तरुणावस्था के चिन्ह प्रदर्शित होने
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वीरेन्द्र गुप्तः
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लगते हैं। युवक पच्चीसवें वर्ष में पूर्ण यौवन को प्राप्त होते हैं और युवतियाँ सोहलवें वर्ष में पूर्ण यौवन को प्राप्त होती हैं। क्योंकि शरीर में समस्त धातुओं, वीर्य आदि की उत्पत्ति होती है। ज्यों-ज्यों वीर्य परिपक्व होता जाता है त्यों-त्यों शरीर सर्वांग सुन्दर और सुदृढ़ होता जाता है, मुख पर लालिमा प्रकट होने लगती है, यहाँ तक कि पूर्ण युवाकाल पर पहुँच कर तेज, बल और सौन्दर्य बस देखने योग्य होता है।
ऋषि दयानन्द सरस्वती ने अपने सत्यार्थ प्रकाश के तीसरे समुल्लास में ब्रह्मचर्य के तीन प्रकार बताये हैं।
१. निकुष्टतम- २५ वर्ष का युवक और १६ वर्ष की युवती।
२. मध्यम- ३६ या ४० वर्ष का युवक और १८ या बीस वर्ष की युवती।
३. श्रेष्ठतम- ४८ वर्ष का युवक और २४ वर्ष की युवती।
स्मरण रहे कि यह विशेषता अविवाहित होने से नहीं मिलती, वरन् वीर्य रक्षा करने से (अक्षत् वीर्य और अक्षत् योनि) होने से ही मिलती है।
यह समय बड़ा ही विकट और चंचल है। इसी में युवक और युवतियों को अपने ब्रह्मचर्य व्रत की परीक्षा देनी पड़ती है मदन की तरंगों को हटाना बड़ा कठिन कार्य है। यदि इस कठिन परीक्षा में उत्तीर्ण हो गये और वीर्य के उबलते हुए वेग को पूर्ण रक्षा यथावत् कर सके तो फिर मनुष्य नहीं वरन् देवता है। ऐसे युवक और युवतियाँ हर कहीं आदरणीय और पूज्य होते हैं।
परन्तु शोक है कि भारतवर्ष के ऐसे भाग्य कहीं! दुःखाचारी जनों की गोष्ठियाँ दुष्ट प्रभावों और निशिदिन बढ़ने वाले कूटवों ने हमारे देश का सर्वनाश कर दिया। जैसे युवाकाल से पूर्व ही विवाह का हो जाना, खोटी संगत में पड़ कर हस्त मैथुन तथा गुदा मैथुनादि करना कराना। इन्हीं कूटवों के कारण आज भारत रसातल को जा रहा है। हे भारत के युवकों! युवतियों, आप ही के
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वारेन्द्र गुप्तः
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