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इच्छानुसार संतान

Ichhanusar Santan

बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta) द्वारा

स्रोत: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (उद्गम)

Devanagarihipublished250 पृष्ठ

गर्भावस्था में मैथुन

विश्राम- गर्भावस्था में उचित विश्राम की उतनी हो आवश्यकता है जितनी नियमित भोजन की। प्रतिदिन तीसरे पहर कम से कम १ घण्टा पूर्ण विश्राम करना चाहिए। लेटते समय पैर नीचे न हों। पैरों के नीचे तकिया लगा लेना उचित है। इसके अतिरिक्त यदि किसी समय थकान अनुभव हो और विश्राम की इच्छा हो तो उस समय विश्राम अवश्य करना चाहिए।

रात्रि होने पर अधिक समय तक नहीं जागना चाहिए। और ८ घण्टे का पूर्ण निद्रा लेनी उचित है। मासिक धर्म को तिथियों में तो पूर्ण विश्राम करना चाहिए।

जो स्त्रियाँ गर्भधारण के पश्चात् आराम ही करती हैं उनके बच्चे निर्बल होते हैं और जो बराबर परिश्रम करती रहती हैं उनके भी बच्चे निर्बल होते हैं। इसलिए आरम्भ में हल्का परिश्रम अर्थात् घर का काम-काज करना परन्तु भारी वजनदार वस्तु को उठाना ऊँचे पर रखी हुई वस्तु को उचक कर उतारना, लम्बी यात्रा करना, जीने पर अधिक चढ़ना-उतरना उखरू बैठना आदि कार्य नहीं करना चाहिए और अन्त के तीन महीनों में जितना अधिक से अधिक हो सके उतना विश्राम करना चाहिए। इस प्रकार से सन्तान पुष्ट होगी। सायं समय वायु सेवन के लिए जाना चाहिए।

स्नान- नित्य ताजे जल से स्नान करना चाहिए तथा रुचि न होने पर स्नान नहीं करना चाहिए। यह आवश्यक नहीं कि ठण्डे ही जल से स्नान किया जाय यदि रुचि हो तो किंचित गर्म जल से भी स्नान किया जा सकता है। ध्यान रहे गर्म जल में ठण्डा जल मिलाकर स्नान नहीं करना चाहिए।

स्तन- गर्भ स्थित होने के पश्चात् स्तनों में वृद्धि होने लगती है इस कारण चोली ढीली रखनी चाहिए और स्नान समय स्तनों को भी भली प्रकार जल से स्वच्छ करके अच्छी प्रकार पोछ लेना आवश्यक है।

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वीरेन्द्र गुप्तः

CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

गर्भिणी स्त्री को प्रति दिन पलास (ढाक) का एक पत्ता गाँदुघं के साथ पिलाओ तो उसके अति पराक्रमी पुत्र होगा और गर्भपात होने से रोक्ता है।

जिन स्त्रियों का गर्भपात हो जाता हो या बच्चा जन्मते ही या २,३ वर्ष का होकर जाता रहता हो तो ऐसी अवस्था में गर्भ स्थित होने के दूसरे मास से अन्त तक स्त्री को पुत्र जीवक के २ फलों की माँग प्रातः निहार मुँह ताजे जल से दें।

अथवा

कस्तुरी १ माशा, वंशलोचन ३ माशा, केशर ४ माशा, गुलाब पुष्प का जीरा ४ माशा, जीरा सफेद ४ माशा, तुलसी पत्र दो तोला, जाँबुत्री २ तोला, धतुरे का बीज १ नग, सहदेई पत्र ४ तोला। समस्त औषधियों को बारीक पीसकर १,१ रत्ती की गोलियों बनाकर छाया में सुखा लें।

प्रयोग विधि- जब निश्चय हो जाय कि गर्भ स्थित हो गया है तब से स्त्री को ४० दिन पर्यन्त २-२ गोली प्रातःकाल जल से दें और बालक उत्पन्न होने तक १-१ गोली खिलाते रहें। तत्पश्चात् बालक को आधी गोली प्रति दिन जल में घिसकर उस समय तक देते रहें जब तक बालक माता का दूध पीना न छोड़े।

लाभ- गर्भपात नहीं होता, बाल्यकाल में बच्चा मृत्यु के भय से बचा रहता है, बालक स्वस्थ और प्रसन्न रहता है।

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वीरेन्द्र गुप्तः

CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri