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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

हित चौरासी • • ८५
टोड़ी
मूल- आजु मेरे कहैं चलौ मृगनैनी।
गावत सरस जुबति मंडल में,
पिय सौं मिलैं भलैं पिक बैनी।।
परम प्रवीन कोक विद्या में,
अभिनय निपुन लाग गति लैनी।
रूप रासि सुनि नवल किसोरी,
पलु पलु घटति चाँदनी रैनी।।
(जै श्री) हित हरिवंश चली अति आतुर,
राधा रमन सुरत सुख दैनी।
रहसि रभसि आलिंगन चुबंन,
मदन कोटि कुल भई कुचैनी।।१६।।
भावार्थ-(दूती ने कहा-) “हे मृग लोचनि राधे ! आज मेरे कहने पर
चलो तो सही ! हे पिक वचनि वहाँ युवति मण्डल में सरस गान परायण प्रियतम
से मिलन ही श्रेष्ठ है-भला है। आप तो कोक विद्या में परम प्रवीण हैं, अभिनय
(क्रीड़ाओं) में निपुण हैं और नृत्य की अलग लाग आदि गतियों के लेने में भी
कुशल हैं। हे रूप राशि नवल किशोरी, सुनिये ! (विलम्ब उचित नहीं है।)
अरी ! क्रमशः पल पल करके चाँदनी रात घट ही तो रही है !”
श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु कहते हैं (कि सखी के वचनों को सुनकर)
रमण (प्रियतम) को सुरत सुख प्रदान करने वाली श्रीराधा अत्यन्त आतुर भाव
से चल पड़ीं और उन्होंने एकान्त के रस भरे आलिङ्गन चुम्बन आदि से कोटि
कोटि मदन कुल को भी बेचैन कर दिया, (अर्थात कोटि कोटि काम को भी
सन्तप्त कर दिया!)
– १७ –
अवतरण-आज वृन्दावन के मञ्जुल निकुञ्ज भवन में ब्रज सुन्दरी श्रीराधा
और श्रीमोहन लाल हिल मिल कर किसी अनिर्वचनीय प्रेम सुख का आस्वादन
कर रहे हैं। श्रीहित सखी उस अनिर्वचनीय सुख का दर्शन रस पान कर रही हैं

२. पद २६-५०: युगल-स्वरूप, वन-विहार एवं रास-विलास

८६ • • हित चौरासी
और उस दर्शन सुखानुभव का वर्णन अपनी सहेलियों से इस प्रकार कर
रही हैं-
टोड़ी
मूल- आजु देखि ब्रज सुन्दरी मोहन बनी केलि।
अंस अंस बाहु दै किसोर जोर रूप रासि,
मनौं तमाल अरुझि रही सरस कनक बेलि॥
नव निकुंज भ्रमर गुंज, मंजु घोष प्रेम पुंज,
गान करत मोर पिकनि अपने सुर सौं मेलि।
मदन मुदित अंग अंग, बीच बीच सुरत रंग,
पलु पलु हरिवंश पिवत नैन चषक झेलि॥१७॥
भावार्थ - (श्रीहित सजनी कहती हैं-)" सखियों! देखो आज ब्रज सुन्दरि
श्रीराधा और मोहन की क्रीड़ा (कैसी भली) बनी है ! रूप की राशि युगल किशोर
परस्पर एक के स्कन्ध पर दूसरे की बाहुलता लपेट कर ऐसे शोभित हैं मानो
तमाल (द्रुम) से सरस स्वर्ण बेलि लिपट रही हो। नव निकुञ्ज में भ्रमर समूह का
सुन्दर और मधुर गुञ्जार हो रहा है। गुञ्जार क्या है प्रेमपुञ्ज है उस गुञ्जन से
अपना-अपना स्वर मिलाकर मयूर और कोयल भी गान कर रहे हैं। इधर
युगल किशोर भी अङ्ग-अङ्ग से प्रेम मुदित होकर बीच बीच में सुरत आनन्द ले
रहे हैं और हरिवंश चन्द्र (सजनी रूप से) इस आनन्द रस को अपने नयन
पात्रों में झेल कर प्रति पल पान कर रहे हैं (अर्थात् दर्शन का रस पी रहे हैं।)

  • १८ -
    अवतरण - इस पद में श्रीहिताचार्य्य चरण ने अपनी स्वामिनी
    वृन्दावनेश्वरी श्रीराधा के रूप प्रभाव एवं महत्व का वर्णन स्तुति व्याज से किया
    है। वे कहते हैं-
    आसावरी
    मूल-सुनि मेरो वचन छबीली राधा।
    तैं पायौ रस सिंधु अगाधा॥

हित चौरासी • • ८७
तूँ वृषभानु गोप की बेटी।
मोहनलाल रसिक हँसि भेंटी॥
जाहि विरंचि उमापति नाये।
तापै तैं वन फूल बिनाये॥
जौ रस नेति नेति श्रुति भाख्यौ।
ताकौ तैं अधर सुधा रस चाख्यौ॥
तेरौ रूप कहत नहिं आवै।
(जै श्री) हित हरिवंश कछुक जस गावै॥१८॥
भावार्थ- "हे छविमयी राधे ! तू मेरी बात सुन ! तूने रस का गम्भीर
समुद्र पाया है। यद्यपि तू वृषभानु गोप की ही बेटी है, फिर भी तूने प्रसन्नता
पूर्वक रसिक मोहन लाल का आलिङ्गन किया है, जिन श्रीकृष्ण का नमन ब्रह्मा
और उमापति शङ्कर भी करते हैं, तूने उन्हीं से फूल बिनाये (चुनवाये) हैं। अरी !
जिस श्रीकृष्ण (परम पुरुष भगवान्) के रस (लीला, प्रभाव, गुण माहात्म्य
आदि) के लिये श्रुतियों ने भी (असमर्थता पूर्वक) नेति नेति कह दिया तूने तो
उसका भी अधर रस पान किया है। राधे! तेरा रूप तो कुछ कहने में ही नहीं
आता, हित हरिवंश तो तेरा कुछ थोड़ा सा सुयश मात्र ही गा रहा है)"
टिप्पणी-
तैं, तूँ, तेरौ-
'हित चौरासी' के प्रायः अधिकांश पदों में देखा जाता है कि ग्रन्थकार
अपनी इष्टाराध्या, महामहिम स्वामिनि सर्वेश्वरी श्रीराधा के लिये भी यत्र तत्र
तैं, तूँ तेरौ, तोसौँ आदि सामान्यता सूचक एक वचन शब्दों का ही प्रयोग करते
हैं। किन्तु जब परमार्थ दृष्टि से उपास्य उपासक सम्बन्ध में ऐसा व्यवहार कुछ
उचित नहीं माना जाता तब आचार्य्य वर्य श्रीहित हरिवंश चन्द्र के द्वारा ऐसा
होना अवश्य एक रहस्य होगा, अतः विचारणीय है।
भक्ति क्षेत्र में भगवत् सम्बन्ध पाँच भावों के द्वारा स्थापित है ऐसा शास्त्रों
का मत है। वे पाँच भाव क्रमशः शान्त, दास्य, सख्य वात्सल्य एवं मधुर के नाम
से कहे जाते हैं। इनमें प्रत्येक क्रमशः उत्तरोत्तर एक दूसरे से श्रेष्ठ है क्योंकि

८८ • • हित चौरासी
उनमें क्रमशः भगवदीय, ज्ञान, ऐश्वर्य, माहात्म्य, प्रभुता आदि का लोप हो
जाता है। और अन्तिम मधुर भाव में सर्व दोष वर्जित विशुद्ध प्रेम ही प्रेम रह
जाता है। यहाँ तक कि भक्ति का लोप कह दें तो अत्युक्ति न होगी। शान्त भाव
से दास्य इसलिये श्रेष्ठ है कि दास्य के चित्त में ज्ञान और मुक्ति की स्पृहा
मिटकर अनुराग का बीज पाया जाता है। दास भक्त का सर्वस्व अपने प्रभु का
होता- प्रभु के लिये होता है।
दास से सखा भाव श्रेष्ठ है क्योंकि सखा में दास की अपेक्षा भगवदैश्वर्य
ज्ञान का भी अभाव होकर प्रेम का प्राबल्य है।
सख्य से वात्सल्य इसलिये श्रेष्ठ है कि माता और पिता को अपना पुत्र
जितना प्यारा होता है, सम्भव है मित्र को मित्र, उतना न हो, क्योंकि पुत्र ही
पिता या माता की आत्मा है। भगवती श्रुति कहती है-
आत्मावै जायते पुत्रः।
अर्थात् ("पिता की) आत्मा ही पुत्र रूप में प्रकट होती है।"
किन्तु इस वात्सल्य रस में भी सर्व भावेन द्वैत का अभाव नहीं है। पूर्णतया
वह उत्सर्ग नहीं जो दाम्पत्य सम्बन्ध में है, जिसे कान्त भाव भी कहते हैं। यही
मधुर रस है। इसीमें प्रेम आनन्द, तन्मयता और सर्व दोष वर्जित एकात्मता है।
यहाँ ऐश्वर्य नहीं, ज्ञान नहीं, माहात्म्य नहीं, मुक्ति की वासना तक नहीं। है तो
केवल प्रेम-सङ्कोच रहित प्रेम ही। इसे देखिये श्रीमद्भागवत दशम स्कन्ध में-
मथुरा से उद्धव आये हैं गोपियों के पास श्रीकृष्ण का सन्देश लेकर।
चाहते हैं अपनी बात उनसे एकान्त में कहूँ क्योंकि वे सोच रहें हैं कि हैं तो
आखिर ये बातें श्रीकृष्ण और गोपियों के प्रणय सम्बन्ध की ही न ! फिर कैसे
कही जाय सबके बीच? उनको क्या पता था कि गोपियों ने श्रीकृष्ण के लिये
अपनी लोक लाज कुल मर्यादा, मान प्रतिष्ठा, स्वर्ग अपवर्ग, भोग मोक्ष सब
छोड़ दिया है। वे श्रीकृष्ण भगवान की भक्त नहीं है। वे हैं नन्द किशोर की
प्रणयिनि। वे श्रीकृष्ण के मथुरा पुरी के ऐश्वर्य से कुण्ठित नहीं, वे आज भी उन्हें
ब्रज का ग्वाला समझ रही है। अभी भी पूर्व की भाँति वे उन्हें गालियाँ सुना
सकती हैं, ताने दे सकती हैं, जो एक प्रेमी के लिये योग्य है।

हित चौरासी • • ८६
गोपियाँ उद्धव के मन की बात जान गयीं और उन्होंने एक भ्रमर को बीच
में लेकर श्रीकृष्ण एवं उद्धव के प्रति जो कुछ कहा उससे उनके ऐश्वर्य ज्ञान
रहित शुद्ध प्रेम का अच्छा परिचय मिलता है। उन्होंने कहा-
मधुप कितव वन्धो मा स्पृशाङ्गिं सपत्न्या,
कुच विलुलित माला कुङ्कुमश्मश्रुभिर्नः।
वहतु मधुपतिस्तन्मानिनीनां प्रसादं;
यदु सदसि विडम्व्यं यस्य दूतस्त्वमीदृक।।
श्रीमद्भागवत १०।४७।१२
अर्थात् "हे मधुकर ! हे छलिया के मित्र ! तू हमारे चरणों का स्पर्श मत
कर, क्योंकि तेरी मूंछें हमारी सौतों के कुचों पर विलुलित माला के कुङ्कुम से
सनी हुई है। ऐसे क्षणिक प्रेम करने वाले तुम्हारे जैसे जिनके दूत हैं, जो
यदुवंशियों की सभा में विडम्बनीय है एवं उन मानिनियों का जो कृपा प्रसाद है
उस प्रेम को मधुपति श्रीकृष्ण ही वहन करें।"
इसके आगे वे और भी बहुत कुछ कह गयीं। उनकी बातें उद्धव को कुछ
जँची नहीं। उद्धव ने युक्ति उपस्थित की, "गोपियों ! तुम जिसकी इतनी
छीछालेदर कर रही हो जानती हो वह कौन हैं ? ब्रह्म, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ।
और तुम कौन हो ? जीव कितना अनुचित है तुम्हारा प्रयास ?
गोपियों ने इसका भी खासा जवाब दिया
कौन ब्रह्म की जोति ज्ञान कासौ कहौ ऊधौ ?
हमरे सुन्दर स्याम प्रेम कौ मारग सूधौ ।।
उद्धव अवाक् रह गये। उन्हें अब सूझा 'प्रेम कौ मारग सूधौ' है। उसमें
ऐश्वर्य नहीं है, ज्ञान नहीं है माहात्म्य नहीं है और वह सब कुछ भी नहीं है जो प्रेम
से अतिरिक्त है।
अस्तु; प्रेम में पूज्य पूजक भाव का अभाव होकर निरन्तर निकट साहचर्य
पूर्ण सम भाव रहता है। क्योंकि इस साम्य-साहचर्य के बिना सहज रस विलास
सम्भव नहीं। इस प्रेम में सङ्कोच, लज्जा एवं भय भी प्रेम रूप होकर शोभा पाते
हैं, और अन्य रूपों में इनका भी अभाव रहता है, क्योंकि यह भी निः सङ्कोच प्रेम

६० • • हित चौरासी
के व्यवधान हैं। प्रेम में सङ्कोच लज्जा एवं भय के अभाव की स्पष्ट झाँकी
आचार्य्य चरण श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु ने बड़े ही अनोखे ढंग से करायी
है। सखियाँ श्रीलालजी से कहती हैं-
किं रे धूर्त्त प्रवर निकटं यासि नः प्राणसख्या,
नूनं बाला कुच तट कर स्पर्श मात्राद्विमुह्येत।

  • श्रीराधा सुधानिधि।
    अर्थात् "क्यों रे धूर्त्त श्रेष्ठ ! तू हमारी प्राण प्यारी सखि (श्रीराधा) के
    निकट आ रहा है ? निश्चय है कि तू इस बाला के कुच तट स्पर्श मात्र से ही
    विमोहित हो जायगा।"
    अस्तु, उपरोक्त उदाहरणों से स्पष्ट हो जाता है कि प्रेम में ऐश्वर्य, ज्ञान,
    माहात्म्य, लज्जा, घृणा सङ्कोच, भय और ऐसी ऐसी अन्यान्य अनेक बातों का
    सर्वथा त्याग है- अभाव है। आचार्य्य श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु ने उसी
    दिव्यतम रस का गान किया है जो प्रेम का सार और विशुद्ध रूप है। जिसका
    लक्ष्य श्रीहित ध्रुवदासजी ने इस प्रकार कराया है-
    औरौ भजन आहिं बहुतेरे।
    ते सब प्रेम भजन के चेरे।।
    नारदादि सनकादि 'ध्रुव; उद्धव अरु ब्रह्मादि।
    गोपिनु कौ सुख देखि किय, भजन आपुनौ बादि।।
    तिन गोपिनु तें दुर्लभ माई।
    नित्य विहार सहज सुखदाई।।
    सिव श्रीपति जद्यपि ललचाहीं।
    मन प्रवेस तिनहूँ कौ नाहीं।।
    ऐसे रसिक किसोर विहारी।
    उज्ज्वल प्रेम-विहार अहारी।।
    अति आसक्त परसपर प्यारे।
    एक सुभाव दुहुँनि मन हारे।।
    रस मय बढ़ी नेह की बेली।
    तेहि अवलंबे नवल नवेली।।

हित चौरासी • • ६१
'हित ध्रुव' दुर्लभ सबनि तें, नित्य विहार स्वरूप।
ललितादिक निजु सहचरी, सो सुख लहतिं अनूप॥
दुर्लभ कौ अति दुर्लभ माई।
वृंदा विपिन सहज सुख दाई॥
इहि विधि विलसत प्रेमहिं सजनी।
जानत नहिं कित वासर रजनी॥
प्रेम धाम वृंदा विपिन, मध्य मधुर वर जोर।
सरिता रस सिंगार की, जगमगात चहुँ ओर॥
वैभव सब ऐश्वर्यता, ठाढ़ी सेवत दूरि।
परसन पावत कबहुँ नहिं, श्री वृन्दावन धूरि॥
ब्रह्म जोति कौ तेज जहाँ, जोगेश्वर धरैं ध्यान।
ताही कौ आवरन तहाँ, नहिं पावै कोउ आन॥
अतएव श्रीहिताचार्य्य पाद ने श्रीकृष्ण आह्लादिनी निकुञ्जेश्वरी रस प्रतिमा
श्रीराधा अपनी आराध्या के लिये एक वचन समता सूचक, ऐश्वर्य भाव रहित
"तूँ, तैं, तेरौ, तोसों आदि शब्दों का प्रयोग किया है क्योंकि प्रेम नगर की यही
रीति है-
यत्राधर्म एव धर्मः स्थापितः।
अर्थात् "जहाँ अधर्म ही धर्म रूप में स्थापित है।"

  • १९ -
    अवतरण - सर्वश्री सम्पन्न वृन्दावन नाना दिव्य तरु लता गुल्मों से
    अलङ्कृत हैं। शरद की शोभन ऋतु है। विमल चन्द्रिका पूर्ण रजनी है। आकाश
    से भूतल तक चन्द्र देव की शीतल रश्मियों का वितान तन रहा है।
    ऐसे सुन्दर अवसर में श्याम सुन्दर ने अपनी महामधुर वंशी बजायी
    और अनेकों ब्रज बालाएँ रास क्रीड़ा के लिये एकत्र हो गयी हैं। रास नृत्य में
    युगल किशोर सबके मध्य में शोभित है। इस झाँकी का वर्णन श्रीहित हरिवंश
    चन्द्र महाप्रभु इस प्रकार करते हैं-

६२ • • हित चौरासी
आसावरी
मूल-खेलत रास रसिक ब्रजमंडन।
जुवतिन अंस दियें भुज दंडन॥
सरद विमल नभ चंद विराजै।
मधुर मधुर मुरली कल बाजै॥
अति राजत घन स्याम तमाला।
कंचन वेलि बनीं ब्रज बाला॥
बाजत ताल मृदंग उपंगा।
गान मथत मन कोटि अनंगा॥
भूषन बहुत विविध रँग सारी।
अंग सुधंग दिखावतिं नारी॥
बरषत कुसुम मुदित सुर जोषा।
सुनियत दिवि दुंदुभि कल घोषा॥
(जै श्री) हित हरिवंश मगन मन स्यामा।
राधा रमन सकल सुख धामा॥
भावार्थ – युवतियों के स्कन्ध पर भुज दण्ड दिये (अर्पित किये) रसिक
ब्रज भूषण (श्रीलालजी) रास क्रीड़ा कर रहे हैं। आकाश में शरद् (ऋतु) का
चन्द्रमा शोभित है और (श्रीलालजी की) मधुर मधुर मुरली बज रही है। जैसे
घनश्याम तमाल (श्रीलालजी) शोभा पा रहे हैं, वैसी ही व्रज बालाएँ भी स्वर्ण
लता सी हैं। ताल वाद्यों में मृदङ्ग और उपङ्ग (रास नृत्य के समय) बज रहे हैं
और (सखियों का मधुर) गान कोटि कोटि कामदेवों का भी मन मथे दे रहा है।
(सखियों के) भूषण भी बहुत हैं और वे (सब) अनेकों रङ्ग की सारियाँ पहने हैं।
(ऐसी शोभा के साथ वे अपने) अङ्गों से सुधङ्ग नृत्य दिखा रही हैं किंवा सुधङ्ग
नृत्य के अङ्गों का प्रकाश कर रही हैं। (जिसे देखकरआकाश स्थित) देव
पत्नियाँ प्रसन्न हो हो कर फूलों की वर्षा करती हैं और आकाश से दुंदुभियों के
मधुर मधुर शब्द भी (वहाँ) सुने जाते हैं।
श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु कहते हैं कि (इस रास में) सकल सुख धाम
श्रीराधा और उनके रमण (श्रीलालजी) मग्न मन हैं– अत्यन्त आनन्दित हैं।

हित चौरासी • • ६३
किन्हीं एक टीकाकारों ने इस पद.की टीका करते समय पद को निकुअ
परक बनाने के लिये इसके शब्दार्थों को ही बदल दिया है। वे 'व्रज' शब्द का
अर्थ समूह करते हैं चूँकि यह ठीक है पर समय और स्थल से असङ्गत भी। इस
'समूह' अर्थ से ब्रजमण्डल का अर्थ मण्डन और ब्रज बाला समुदाय बाला
होना चाहिये किन्तु ऐसा न करके येन केन कान पकड़ कर व्रज बाला का अर्थ
श्रीराधा कर लिया गया है। ऐसे ही सुर जोषा का सरलार्थ देवपत्नी न करके
कुछ और ही किया गया है। वह यह सुर-वृन्दावन के वृक्ष और योषा उनकी
पत्नियाँ अर्थात् लताएँ इस प्रकार सुरयोषावृन्दावन की लताएँ। वे पुष्प बरसाती
हैं अर्थात् उनसे फूल झरते हैं ....इत्यादि।
ये सभी अर्थ किसी सङ्कुचित क्षेत्र में कुछ भाव प्रवण व्यक्तियों के लिये ही
मान्य हो सकते हैं भाषा साहित्य एवं विद्वत समाज के विशाल प्राङ्गण में कदापि नहीं।
अस्तु ऐसे अर्थ जिस लिये किये गये हैं वह भावना अवश्य वन्दनीय है
पर मान्य नहीं, ऐसा मेरा अपना आग्रह है।
टीकाकार महोदय की वह भावना है-आचार्य्य श्रीहित हरिवंश चन्द्र के
द्वारा प्रकटित रस विलास को ब्रज लीला से परे-नित्य विहार के रूप में बताने
की, जो स्वयं सिद्ध हैं और जिसका सूत्र कुछ और है। ब्रज रस और निकुअ
रस से तारतम्य भेद ओर ऐक्य की शैली सिद्ध रसिक महानुभावों के शब्दों में
जैसी कुछ झलकती है यहाँ केवल उसका दिग्दर्शन मात्र कराये जाने की चेष्टा
की जा रही है-
'सुधर्म-बोधिनी' में रसिक श्रीलाड़िली दास जी निकुअ भावना और
रस क्या है ? इस प्रकार प्रकट करते हैं-
चिदानंद हित सिंधु रस, सेवक भाव गँभीर।
अमित कोटि लीला लहरि, मीन रसिक मन धीर।।
चित् स्वरूप सौं भोक्ता, आनँद तासु कौ भोग।
हित स्वरूप सौं साक्षी, होत न कबहुँ वियोग।।
सर्व देह मय विपिन है, सर्व मनोमय लाल।
सर्वसु इंद्री सखीगन, सर्व आतमा बाल।।

६४ • • हित चौरासी
भोग रूप सब प्रियाकौ, भोगी मोहन लाल।
संधि सखी हित दुहुँनि कौ मिलवत हैं सब काल॥
इस सर्व व्यापी हित निकुञ विलास का सूत्र है-
जो रस रीति सबनि तें दूरि।
सो सब विश्व रही भरपूरी॥
मूरि सजीवन कहि दई॥
-सेवक श्रीदामोदर जी।
इसी महान् दृष्टि को पाकर श्री भगवत रसिक जी ने अपने उर में ही उस
अनिर्वचनीय निकुञ रस का दर्शन और पान किया और एक अजीब मस्ती में
वे बोल गये-
हमारौ वृन्दावन उर और।
माया काल तहाँ नहिं व्यापै, जहाँ रसिक सिर मौर॥
. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .
भगवत रसिक बताई सतगुरु अमल अलौकिक ठौर॥
इस 'अमल अलौकिक ठौर' और उसके रस को पाकर उनकी दृष्टि ही
'पलट' गयी। उन्होंने दुई-द्वैत का परदा फाड़ फेंका फिर देखा-
जहँ देखें तहँ आपनौ इष्ट धर्म, गुरु धाम।
कारज कारन जगत में परि पूरन रति काम॥
परिपूरन रति काम समुझि समता जिन लीनीं।
निंदा स्तुति सुपरि विषमता बुधि तजि दीनीं॥
शत्रु मित्र नहिं कोइ ऊँच नहिं नीच कोऊ तहँ।
सो घट भगवत रसिक स्याम स्यामा संतत जहँ॥
किन्तु यह दर्शन भाव ऐनक के सहारे किंवा दृष्टि बदल जाने पर ही
सम्भव है जिन्होंने इसे पाया वे दलीलों से ऊपर उठकर कह गये-
चसमा नित्य विहार कौ दियौ विहारिनि मोहिं।
भई प्रीति परतीति उर अंतर लीनौ जोहि॥
अंतर लीनौ जोहि निरंतर निजु धन पायौ।
सुक नारद सनकादि नेति निगमागम गायौ॥

हित चौरासी • • ६५
भगवत यह रस रीति प्रकट परिपूरन ससमा।
प्रेम पियूष न स्रवै भाव रूपी बिनु चसमा॥
इस तरह भाव चश्मे के द्वारा निकुञ्ज की ओर ताकने की दृष्टि ही कुछ
और है जो शब्दों के अर्थ बदलने से कदापि सिद्ध नहीं है।
— २० —
अवतरण — आज निभृत निकुञ्ज में रस मूर्त्ति श्रीराधा अपने प्रियतम
रसिक शेखर श्रीलालजी से मिली हैं। उनके श्रीअङ्गों में मिलन रति रस की
सूचना देने वाले अनेकों चिह्न प्रकट हैं। चतुर श्रीराधा अपनी अन्तरङ्गा हित
सजनी पर भी आज अपने विहार का प्रकाश नहीं होने देना चाहतीं अतः रति
चिह्नों को छिपाती हैं। यह सङ्कोपन क्यों है ? प्रथम स्नेह है न ! जो कि स्वाभाविक
भी है। श्रीराधा के इस दुराव को लखकर हित सखि को कुछ परिहास सा सूझ
पड़ा। वे हँसती मुसकाती सी रति विमर्दिता श्रीराधा से बोलीं—
धनाश्री
मूल— मोहन लाल के रस माती।
बधू गुपति गोवति कत मोसों, प्रथम नेह सकुचाती॥
देखि सँभार पीत पट ऊपर कहाँ चूनरी राती।
टूटी लर लटकति मोतिनु की नख विधु अंकित छाती॥
अधर बिंब खंडित, मषि मंडित गंड, चलति अरुझाती।
अरुन नैन घूमत आलस जुत कुसुम गलित लट पाती॥
आजु रहसि मोंहन सब लूटी विविध . आपनी थाती।
(जै श्री) हित हरिवंश वचन सुनि भामिनि भवन चली मुसकाती॥२०॥
भावार्थ— [“हे राधे ! तू] मोहन लाल के रस में उन्मत्त है। हे बधू ! उस
(एकान्त मिलन की) गोप्य बात को क्यों मुझसे छिपा रही है? इसीलिये न कि
प्रथम स्नेह के कारण सङ्कोच है ! अरी ! जरा सम्हाल कर देख तेरे शरीर पर
तो पीताम्बर है और (जाने) रँगदार चूनरी कहाँ गयी ? हृदय पर (एक तो)
मोतियों की टूटी लड़ लटक रही है, (दूसरे) वक्षस्थल नख चन्द्रों से अङ्कित है।

६६ • • हित चौरासी
(अहो ! तेरे) बिम्बाफल जैसे अधर खण्डित हैं-क्षत विक्षत हैं, कपोल भी
कज्जल से रँगे हुए है और तू चलती भी कुछ उलझती सी लटपटाती सी
(अर्थात् गति भी शिथिल है) सखि ! तेरे अरुण नयन आलस्य से भरे होने के
कारण घूम घूम-झँप झँप जाते हैं, फूलों की मालाएँ मसल गयी हैं और केश
लटें भी बिखर चुकी हैं।"
श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु (सखी रूप से) कहते हैं- ("राधे ! अतः
बहुत स्पष्ट है कि) आज मोहन (श्रीलालजी) ने एकान्त में अपनी सारी विविध
प्रकार की धरोहरें लूट लीं।"
इस प्रकार श्रीहरिवंश के वचनों को सुन कर भामिनि (श्रीराधा) मुसकाती
(निकुअ) भवन की ओर चली गयीं।
टिप्पणी- 'प्रथम नेह'
महाप्रभु श्रीहित हरिवंश चन्द्र ने जिस तत्व का उपदेश किया है वह नित्य
विहार है। नित्य शब्द का अर्थ ही है कि जो अनादि हो, अनन्त हो। फिर भी इस
नित्य विहार की यह विशेषता है कि अनादि अनन्त होकर भी प्रतिक्षण नवीन
है। इसके प्रत्येक अङ्ग नवीन हैं। यहाँ प्रिया नयी हैं और प्रियतम भी नये।
सखियाँ नयी हैं और वृन्दावन भी नया ही। यहाँ तक नये कि अभी पूर्णतया
परिचय भी नहीं हो पाया,। भले ही अनादिकाल से विहार परायण हैं। कैसा
आश्चर्य है?
न आदि न अंत विहार करैं दोऊ,
लाल प्रिया में भई न चिन्हारी।
नई नई भाँति नई नई काँति,
नई नवला नव नेह विहारी।।
ऐसी दशा में जबकि 'चिन्हारी' ही नहीं हो पायी है तो प्रतिदिन और
प्रतिक्षण का मिलन स्नेह प्रणय, रस, सुख और विलास सभी कुछ नवीन है
और जब नवीन है तो प्रथम है ही इसमें क्या सन्देह ? इस नवीनता का
विलक्षण रूप श्रीस्वामी हरिदासजी महाराज बताते हैं-

हित चौरासी • • ६७
श्रीलालजी कहते हैं-
प्यारी जू जब जब देखौं तेरौ मुख,
तब तब नयौ नयौ लागत।
ऐसी जिय होत कबहुँ मैं न देखी री,
दुति कौं दोति न लेखनी न कागत।।
अनादि काल से जिस प्रियतमा का मुख दर्शन किया जा रहा है, आज
भी वह श्रीलालजी के लिये नया ही है ! और ऐसे दर्शनानन्द में कोटि कोटि
कल्प बीतने पर भी तृप्ति नहीं क्योंकि प्रतिक्षण नूतनता है न ! इसी बात को
चाचा श्रीहित वृन्दावन दास जी कहते हैं-
देखत देखत ओट कोट से होत अनमिले मानैं।
ऐसौ प्रेम बली उर खेलै को कवि रीति बखानैं।।
कानन कथा अगोचर सबतें प्रेमी ही पहिचानैं।
वृंदावन हित रूप न परच्यौ सो अचिरज सो मानैं।।
वास्तव में यह बात उसके लिये आश्चर्य पूर्ण ही है जिसने 'हित रूप'
का-प्रेम तत्व का किञ्चित् भी परिचय नहीं प्राप्त किया है। इस पुरातन तम प्रेम
राज्य की नित्य नवीनता का परिचय आचार्य्य श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु
पाद क्या दे रहे हैं, पाठक देखें-
नयौ नेह नव रंग, नयौ रस, नवल श्याम वृषभानु किसोरी।
नव पीतांबर, नवल चूनरी, नई नई बूँदनि भींजति गोरी।।
नव वृंदावन हरित मनोहर नव चातक बोलत मोर मोरी।
नव मुरली जु मलार नई गति श्रवन सुनत आये घन घोरी।।
नव भूषन नव मुकुट विराजत नई नई उरप लेत थोरी थोरी।
(जै श्री) हित हरिवंश असीस देत मुख चिर जीवौ भूतल यह जोरी।।
इस पद में बहुत स्पष्ट है कि इस वृन्दावन की प्रत्येक वस्तु नवीन है।
यहाँ नेह नया है अतः प्रथम भी है। युगल किशोर सदा सर्वदा अपने प्रेम में
नवीनता का अनुभव करते रहते हैं और यही प्रेम का स्वभाव है जैसा कि
रसखान जी ने कहा है-

६८ • • हित चौरासी
नित प्रति बढ़िबोई करै, पूरन कला अशेष।
पै पूनौँ यामें नहीं यातें प्रेम विशेष॥
और श्री नारद भक्ति सूत्र में-
प्रति क्षण वर्द्धमानं सूम्मतर सूक्ष्ममनुभव रूपम।
अर्थात् "(यह प्रेम) प्रतिक्षण बढ़ने वाला सूक्ष्मम से सूक्ष्म तथा अनुभव
गम्य है।"
अतएव उक्त पद में 'प्रथम नेह' इस अनादि अनन्त नित्य विहार की एक
अनोखी बात है–विशेषता है।
– २१ –
इस पद में भी उपरोक्त बीसवें पद के ही अनुसार प्रातः कालीन सुरतान्त
छवि का वर्णन है। सुरत छवि पूर्ण श्रीराधा का दर्शन करके श्रीहित सखि उनसे
कुछ परिहास सा कर रही हैं क्योंकि उन्हें युगल किशोर के एकान्तिक विहार के
लक्षण श्रीप्रियाजी के श्रीअङ्गों में दीख पड़े हैं। यद्यपि लज्जा भरित कामिनि
किशोरी उन्हें छिपाना चाहती हैं पर हित सखी से छिपा लेना भी तो कठिन है।
इसी दशा का वर्णन करते हुए श्रीहित सखी अपनी स्वामिनि श्रीराधा से कहती हैं–
धनाश्री
मूल– तेरे नैन करत दोऊ चारी।
अति कुलकात समात नहीं कहुँ मिले हैं कुंज विहारी।।
विथुरी माँग कुसुम गिरि गिरि परैं, लटकि रही लट न्यारी।
उर नख रेख प्रकट देखियत हैं, कहा दुरावति प्यारी।।
परी है पीक सुभग गंडनि पर, अधर निरँग सुकुमारी।
(जै श्री) हित हरिवंश रसिकनी भामिनि, आलस अँग अँग भारी।।२१।।
भावार्थ– [हे राधे !] तेरी दोनों आँखें ही तो चारी (चुगल खोरी) कर
रही हैं–बता रही हैं ! कितनी प्रसन्न हैं ये ? इनकी प्रसन्नता मानो कहीं समाती
नहीं [इसी से विदित होता है कि तुझे कहीं न कहीं कुञ्ज बिहारी ] (श्रीलालजी)
[अवश्य ] मिले हैं। अरी ! तेरी माँग भी तो विखर गयी है और उसमें से फूल

हित चौरासी • • ६६
झर झर कर गिर पड़ते हैं साथ ही केश लट भी (कबरी से) अलग ही लटक
रही है। हे प्यारी ! छिपाती क्यों हो ? वक्ष स्थल पर चिह्नित नख रेखा कितनी
स्पष्ट देख रही हूँ मैं और सुकुमारी के अधर फीके हो चुके हैं एवं सुन्दर
कपोलों पर पीक भी अङ्कित है।"
श्रीहित हरिवंश चन्द्र [सखी भाव से] कहते हैं "अहो रसिक मणि भामिनि !
तेरे अङ्ग-अङ्ग में कितना भारी आलस्य है, [जो रात्रि के जागरण एवं रति श्रम
का द्योतक हैं।"]
– २२ –
अवतरण—स्वामिनि श्रीराधा नित्य परम सौन्दर्य मयी हैं। उनके एक
एक अङ्ग सौन्दर्य एवं माधुर्य के निधान हैं किन्तु इस पद में केवल उनके
स्वाभाविक अभिराम नयनों के सरस लावण्य, माधुर्य और चाञ्चल्यादि गुणों
का वर्णन है जो सुख समुद्र और मन रञ्जन हैं। स्तुति व्याज से आचार्य्य चरण
कहते हैं-
मूल- नैननिं पर वारौं कोटिक खंजन।
चंचल चपल अरुन अनियारे,
अग्र भाग बन्यौ अंजन॥
रुचिर मनोहर बंक बिलोकनि,
सुरत समर दल गंजन।
(जै श्री) हित हरिवंश कहत न बनै छबि,
सुख समुद्र मन रंजन॥२२॥
भावार्थ – (हे राधे ! तुम्हारे) नयनों पर मैं कोटि कोटि खञ्जनों को भी
न्यौछावर कर दूँ। (कितने सुन्दर हैं तुम्हारे नयन ?) चञ्चल हैं, चपल हैं-
अत्यन्त चपल हैं, अरुण है और अनियारे-कोर दार भी। तिस पर उनके अग्र
भाग में और अञ्जन भी लग रहा है। इन नयनों का रुचिर, मनोहर एवं कटाक्ष
पूर्ण बक्र (तिरछा) (नयन नोकों से) अवलोकन तो सुरत युद्ध में (विपक्षी) दल
का मथन ही करने वाला है।"
श्रीहित हरिवंश चन्द्र कहते हैं-"सखी! इनकी छवि तो कुछ कहते ही नहीं
बनती। अरी ! ये तो सुख समुद्र हैं और मन का रञ्जन करने वाले भी।"

१०० • • हित चौरासी
टिप्पणी- 'चंचल चपल'
इस पद में स्वाभाविक ही एक आशङ्का का विषय है कि श्रीहिताचार्य्य
पाद ने 'चंचल चपल' इन दो समानार्थी शब्दों का एक ही स्थल पर केवल एक
विशेष्य नयन के लिये विशेषण रूप में कैसे और क्यों प्रयोग किया ?
बहुत थोड़े में इसका उत्तर है। इसे सब जानते हैं कि शास्त्र, सन्त,
महापुरुष कवि या विद्वान् जन कवि भी भाषा साहित्य के शब्दों और उनके
अर्थों को तौल तौल कर अपना आशय नहीं प्रकट किया करते। वे अपनी खुद
मस्ती में जो कुछ कह जाते हैं वह उचित, योग्य और पत्थर की लकीर हो रहता
है उनकी वाणी मानवीय व्यक्तित्व से बहुत ऊपर उठी हुई रहती है और रहती है
नित्य निरतिशय सत्य। उनकी वाणियों के पीछे अर्थ और भावों की अनेकों
सृष्टियाँ बनती रहती हैं अर्थात् उनके पीछे अर्थ चलता है। वे वाणियाँ अर्थ के
पीछे कदापि नहीं चलतीं। देखिये, महात्मा कबीर जाने किस मस्ती में एक
पहेली सी बूझ गये-
एक अचम्भा हमने देखा कुएँ में लग गई आग।
पानी पानी जल गया और मछली खेलें फाग।।
कितना अचम्भा है कुए में आग लग गयी, पानी पानी सब जल गया और
मछली बच गयीं, पानी से विछुड़कर अपने प्राण जीवन से अलग रह कर भी
फाग खेल रही हैं आनन्दित हैं ?
यह हैं महात्माओं की खुद मस्ती के वाक्य, जो गलत नहीं, निरे पागल
पन के नहीं। भले ही कोई इन्हें प्रलाप कह दे पर ये वाक्य पूर्ण सार्थक हैं। हाँ
संसार-शब्द संसार की प्रवचन शैली से अवश्य ही ये विलक्षण हैं। उन्होंने
स्वयं ही अचम्भे की पहेली बूझी है अब लोग उसके अर्थ लगाया करें।
अस्तु; ऐसे ही श्रीहिताचार्य्य चरण ने एक पहेली रख दी-
अधर अरुन तेरे कैसे कैं दुराऊँ ?
रवि ससि संक भजन किये अपबस,
अद्भुत रंगनि कुसुम बनाऊँ।।

हित चौरासी • • १०१
सुभ कौसेय कसिब कौस्तुभ मनि
पंकज सुतनि लै अंगनि लुपाऊँ।
हरषित इंदु तजत जैसें जलधर,
सो भ्रम ढूँढ़ि कहाँ हौं पाऊँ ??
अंबु न दंभ कछू नहिं व्यापत
हिमकर तपै ताहि कैसे कैं बुझाऊँ ?
(जै श्री) हित हरिवंश रसिक नवरँग पिय
भृकुटि भौंह तेरे खंजन लराऊँ।।
देखिये, इस पद के शब्द कितने सरल हैं किन्तु अर्थ और भाव शृङ्खला
की समस्या कितनी जटिल है? बड़े बड़े दिग्गज साहित्यिक यहाँ पानी भरते हैं।
अस्तु, श्रीहिताचार्य्य महाप्रभु के सम्पूर्ण काव्य में स्थान स्थान पर ऐसे ही
विचित्र प्रयोग देखे जाते हैं, जो पाठकों को आश्चर्य में डाल देते हैं। यहाँ ऐसे
प्रसङ्गों के कुछ उदाहरण दिये जाते हैं-
(१) <u>चंचल</u> <u>चपल</u> अरुन अनियारे,
अग्र भाग बन्यौ अंजन।
(२) (जै श्री) हित हरिवंश हंस कल गामिनि,
संभ्रम देत <u>भ्रमरनि</u> <u>अलिन</u> री।
(३) <u>परिरंभन</u> चुंबन <u>आलिंगन</u>
उचित जुवति जन पायौ।
(४) अंग राग <u>परिधान</u> <u>वसन</u>
लागत ताते जु पीत पट।
इन उदाहरणों में रेखाङ्कित शब्द दृष्टव्य हैं। और भी ऐसे अनेकों प्रयोग
हैं, जिनमें दो समानार्थी शब्द एक ही प्रयोग में सङ्कलित हैं, परन्तु वे निरर्थक
नहीं वरं सार्थक और साभिप्राय हैं।
एक तो यही कि प्रत्येक शब्द अपना स्वतंत्र अर्थ जो कुछ और जैसा
कुछ रखता है वह उसका अपना है और दूसरे समानार्थी से विशेष कुछ भाव
अवश्य रखता है चाहे भले दूसरे के समान हो। अतः ऐसे दो समानार्थी शब्दों

१०२ • • हित चौरासी
में भी अलग अलग और विशेष भावों की ध्वनियाँ रहती हैं। दूसरे इस प्रकार
की आचार्य्यपाद की शैली भी हो सकती है कि जब वे किसी विशेष बात पर
जोर देना चाहते हैं या उसका स्पष्टीकरण करना चाहते किंवा पृथकत्व प्रकट
करना चाहते हैं तब कुछ ऐसे ही प्रयोग करते हैं। उक्त उदाहरणों में 'चंचल
चपल, "भ्रमरनि अलिनु, 'परिरंभन आलिंगन' और 'परिधान वसन पीत पट;
कुछ ऐसे ही प्रयोग हैं।
इत्यलं ; इस मूल पद में 'चंचल चपल प्रयोग श्रीप्रियाजी के नेत्रों की
विशेष चञ्चलता को ही प्रकट करने के लिये है जो एक 'चंचल' या चपल' शब्द
से पूर्णता को प्राप्त न हो सकती थी, ऐसा जान पड़ता है।

  • २३ -
    अवतरण-अनेकों बार श्रीप्रियाजी ने अपने एकान्तिक प्रियतम मिलन
    को हित सखी से छिपाना चाहा जैसा कि पूर्व पदों में वर्णित है किन्तु वह
    संगोपन हित सखी के समक्ष सर्वत्र विडम्बना ही बन कर रहा-चतुर राधा छिपा
    न सकी क्योंकि परम चतुरा 'हित' वह छिपतीं भी कैसे ? बात खुल ही जाती
    रही। आज भी वही अवसर पुनः प्राप्त है। श्रीराधा प्यारी सुरत सङ्गम में विजयी
    हुई हैं। उनके श्रीअङ्गों में रति श्रम के समस्त लक्षण प्रकट हैं। जिन्हें देखकर
    हित सखी ने रति विहार की सारी बातें जान ली हैं। वे अन्तर में आनन्द पूरित
    होकर श्रीराधा से कह रही हैं-
    धनाश्री
    मूल- राधा प्यारी तेरे नैन सलोल।
    तैं निजु भजन कनक तन जोवन,
    लियौ मनोहर मोल।।
    अधर निरंग अलक लट छूटी,
    रंजित पीक कपोल।
    तूँ रस मगन भई नहिं जानत,
    ऊपर पीत निचोल।।

हित चौरासी • • १०३
कुच जुग पर नख रेख प्रकट मानौं,
संकर सिर ससि टोल।
(जै श्री) हित हरिवंश कहत कछु भामिनि,
अति आलस सौं बोल।।
भावार्थ - (हित सखी ने कहा-) “हे प्यारी राधे ! तेरी आखें आज बड़ी
ही चञ्चल हैं ! तूने अपने भजन, महान् प्रेम और स्वर्ण जैसे सुन्दर गौर वपु से
मनोहर (श्रीलालजी) को (तो मानो) मोल (सा) ले रखा है (अर्थात् पूर्णतया
स्ववश कर लिया है।) अरी ! तेरे अधर फीके पड़ गये हैं, (उनकी ललामी जाने
कहाँ चली गई है,) अलक लटें बिखरी (छूटी) हुई हैं और कपोल भी पीक से रँगे
हुए हैं; तू इतनी रस मग्न हो गई है तुझे यह भी तो नहीं जान पड़ता कि तेरे
ऊपर (नीलाम्बर की जगह) पीत निचोल (छबि पा रहा) है !”
श्रीहित हरिवंश चन्द्र कहते हैं-“हे भामिनि ! तेरे युगल कुचों पर नख
रेखाएँ ऐसी मालूम दे रही हैं जैसे भगवान शङ्कर के ललाट पर बहुत से
(द्वितीया के) चन्द्र। और तू अत्यन्त आलस्य से भर कर थोड़े थोड़े (स्फुट)
शब्द भी तो बोलती है !”
टिप्पणी- 'निजु भजन'
निजु का सरलार्थ अपना, स्वयं और स्वरूप से है। यहाँ 'निजु' जीव ब्रह्म
किंवा प्रेम के सर्वोपाधि रहित शुद्ध रूप के अर्थ में प्रयुक्त है। यह निज जीव
निर्जीव चराचर जगत् का बोधक है। जीव ही ब्रह्म है और जीव ही प्रेम है किन्तु
यह बात पृथकत्व और नानात्व की भ्रान्ति मिटने पर ही जानी जा सकती है
और अनुभव में आ सकती है। जिस प्रकार भगवती श्रुति ब्रह्म के ब्रह्म भाव की
व्यापकता 'सर्व खल्विदं ब्रह्म, अर्थात् यह सम्पूर्ण चराचर ब्रह्म ही है' इस वाक्य
से प्रकट करती है उसी प्रकार प्रेम ब्रह्म के तत्व वेत्ता रसिकाचार्य्य गण प्रेम तत्व
की सर्वत्र सत्ता और सर्व रूपता इस वाक्य से प्रकट करते हैं-
सर्वं हितमयं विदुः।
'अर्थात् सब कुछ हित मय-प्रेम मय ही जानो।" यह चराचर व्यापी हित
निर्गुण भी है सगुण भी। यह सगुण होकर भी निर्गुण है और निर्गुण होकर भी

१०४ • • हित चौरासी
सगुण और निर्गुण सगुण से परे भी है। सर्वत्र सब रूपों में केवल वही है।
वृन्दावन विहार के विविध रूप मय परिकर का भी एक ही रूप है, हित। या यों
कह दें कि एक ही खाँड़ के अनन्त खिलौने हैं, एक ही स्वर्ण के नाना आभूषण
हैं। इसी बात को रसिकाचार्य्य कहते हैं-
श्रीराधा हित रूपा हि श्रीकृष्णो हित रूपकः।
ललिताद्या हित रूपा श्रीमद्धामं च हितमयम्॥
यमुना च हित रूपा च निकुञ्ज हित रूपकम्।
शय्या च हित रूपा वै विहारं हित मयं विदुः॥
हितेन प्राप्यते राधा हितेव सखि यूथपा।
हितेन प्राप्यते धाम हितेनैव रसज्ञता॥
यत्किञ्चित दृश्यते सृष्टौ हितमयं सर्वमेव हि।
तस्मात् विवेक निपुणैरूपास्यो हित चन्द्रमा॥
अर्थात् “निश्चय है कि श्रीराधा हित रूपा हैं और श्रीकृष्ण भी हित रूप
हैं। इसीप्रकार श्रीयमुना हित रूपा है, निकुञ्ज भवन भी हित रूप है और शय्या
हित रूपा है, उनका विहार भी हित रूप ही है ऐसा जानना चाहिये इस हित के
द्वारा ही श्रीराधा की प्राप्ति होती है और इसी हितोपासना से सखियों की
यूथेश्वरी (ललिता) की। हित से ही श्रीधाम वृन्दावन मिलता है एवं हित के द्वारा
ही हित की रसज्ञता, (हित विलास के रसास्वादन की पात्रता।) कहाँ तक कहा
जाय यावन्मात्र जो कुछ दृश्य अदृश्य सृष्टि देखी, सुनी कही जाती है निश्चयेन
सभी हित है-केवल प्रेम। इसलिये विवेक निपुण व्यक्ति के लिये उपास्य तत्व
केवल हित रूप चन्द्रमा ही है, अन्य कोई नहीं।”
इस प्रकार निज-हित रूपा श्रीराधा अपने निज रूप हित श्रीकृष्ण को
निजु भजन हित आराधना (प्रेम भजन) से ही वशवर्त्ती किये हुए हैं।
– २४ –
अवतरण – शरत्काल की शीतल एवं उज्ज्वल रात्रि में युगल किशोर
प्रिया प्रियतम ने अपनी समस्त सखियों के साथ रास नृत्य की योजना की है।
वे सभी नृत्य में संलग्न हैं। आज श्रीवृन्दावन भी नवीन शोभा को धारण किये