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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

पृष्ठ 97, कुल 275 में से

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पृष्ठ 97

६२ • • हित चौरासी
आसावरी
मूल-खेलत रास रसिक ब्रजमंडन।
जुवतिन अंस दियें भुज दंडन॥
सरद विमल नभ चंद विराजै।
मधुर मधुर मुरली कल बाजै॥
अति राजत घन स्याम तमाला।
कंचन वेलि बनीं ब्रज बाला॥
बाजत ताल मृदंग उपंगा।
गान मथत मन कोटि अनंगा॥
भूषन बहुत विविध रँग सारी।
अंग सुधंग दिखावतिं नारी॥
बरषत कुसुम मुदित सुर जोषा।
सुनियत दिवि दुंदुभि कल घोषा॥
(जै श्री) हित हरिवंश मगन मन स्यामा।
राधा रमन सकल सुख धामा॥
भावार्थ – युवतियों के स्कन्ध पर भुज दण्ड दिये (अर्पित किये) रसिक
ब्रज भूषण (श्रीलालजी) रास क्रीड़ा कर रहे हैं। आकाश में शरद् (ऋतु) का
चन्द्रमा शोभित है और (श्रीलालजी की) मधुर मधुर मुरली बज रही है। जैसे
घनश्याम तमाल (श्रीलालजी) शोभा पा रहे हैं, वैसी ही व्रज बालाएँ भी स्वर्ण
लता सी हैं। ताल वाद्यों में मृदङ्ग और उपङ्ग (रास नृत्य के समय) बज रहे हैं
और (सखियों का मधुर) गान कोटि कोटि कामदेवों का भी मन मथे दे रहा है।
(सखियों के) भूषण भी बहुत हैं और वे (सब) अनेकों रङ्ग की सारियाँ पहने हैं।
(ऐसी शोभा के साथ वे अपने) अङ्गों से सुधङ्ग नृत्य दिखा रही हैं किंवा सुधङ्ग
नृत्य के अङ्गों का प्रकाश कर रही हैं। (जिसे देखकरआकाश स्थित) देव
पत्नियाँ प्रसन्न हो हो कर फूलों की वर्षा करती हैं और आकाश से दुंदुभियों के
मधुर मधुर शब्द भी (वहाँ) सुने जाते हैं।
श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु कहते हैं कि (इस रास में) सकल सुख धाम
श्रीराधा और उनके रमण (श्रीलालजी) मग्न मन हैं– अत्यन्त आनन्दित हैं।