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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

पृष्ठ 94, कुल 275 में से

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पृष्ठ 94

हित चौरासी • • ८६
गोपियाँ उद्धव के मन की बात जान गयीं और उन्होंने एक भ्रमर को बीच
में लेकर श्रीकृष्ण एवं उद्धव के प्रति जो कुछ कहा उससे उनके ऐश्वर्य ज्ञान
रहित शुद्ध प्रेम का अच्छा परिचय मिलता है। उन्होंने कहा-
मधुप कितव वन्धो मा स्पृशाङ्गिं सपत्न्या,
कुच विलुलित माला कुङ्कुमश्मश्रुभिर्नः।
वहतु मधुपतिस्तन्मानिनीनां प्रसादं;
यदु सदसि विडम्व्यं यस्य दूतस्त्वमीदृक।।
श्रीमद्भागवत १०।४७।१२
अर्थात् "हे मधुकर ! हे छलिया के मित्र ! तू हमारे चरणों का स्पर्श मत
कर, क्योंकि तेरी मूंछें हमारी सौतों के कुचों पर विलुलित माला के कुङ्कुम से
सनी हुई है। ऐसे क्षणिक प्रेम करने वाले तुम्हारे जैसे जिनके दूत हैं, जो
यदुवंशियों की सभा में विडम्बनीय है एवं उन मानिनियों का जो कृपा प्रसाद है
उस प्रेम को मधुपति श्रीकृष्ण ही वहन करें।"
इसके आगे वे और भी बहुत कुछ कह गयीं। उनकी बातें उद्धव को कुछ
जँची नहीं। उद्धव ने युक्ति उपस्थित की, "गोपियों ! तुम जिसकी इतनी
छीछालेदर कर रही हो जानती हो वह कौन हैं ? ब्रह्म, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ।
और तुम कौन हो ? जीव कितना अनुचित है तुम्हारा प्रयास ?
गोपियों ने इसका भी खासा जवाब दिया
कौन ब्रह्म की जोति ज्ञान कासौ कहौ ऊधौ ?
हमरे सुन्दर स्याम प्रेम कौ मारग सूधौ ।।
उद्धव अवाक् रह गये। उन्हें अब सूझा 'प्रेम कौ मारग सूधौ' है। उसमें
ऐश्वर्य नहीं है, ज्ञान नहीं है माहात्म्य नहीं है और वह सब कुछ भी नहीं है जो प्रेम
से अतिरिक्त है।
अस्तु; प्रेम में पूज्य पूजक भाव का अभाव होकर निरन्तर निकट साहचर्य
पूर्ण सम भाव रहता है। क्योंकि इस साम्य-साहचर्य के बिना सहज रस विलास
सम्भव नहीं। इस प्रेम में सङ्कोच, लज्जा एवं भय भी प्रेम रूप होकर शोभा पाते
हैं, और अन्य रूपों में इनका भी अभाव रहता है, क्योंकि यह भी निः सङ्कोच प्रेम