हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
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(अहो ! तेरे) बिम्बाफल जैसे अधर खण्डित हैं-क्षत विक्षत हैं, कपोल भी
कज्जल से रँगे हुए है और तू चलती भी कुछ उलझती सी लटपटाती सी
(अर्थात् गति भी शिथिल है) सखि ! तेरे अरुण नयन आलस्य से भरे होने के
कारण घूम घूम-झँप झँप जाते हैं, फूलों की मालाएँ मसल गयी हैं और केश
लटें भी बिखर चुकी हैं।"
श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु (सखी रूप से) कहते हैं- ("राधे ! अतः
बहुत स्पष्ट है कि) आज मोहन (श्रीलालजी) ने एकान्त में अपनी सारी विविध
प्रकार की धरोहरें लूट लीं।"
इस प्रकार श्रीहरिवंश के वचनों को सुन कर भामिनि (श्रीराधा) मुसकाती
(निकुअ) भवन की ओर चली गयीं।
टिप्पणी- 'प्रथम नेह'
महाप्रभु श्रीहित हरिवंश चन्द्र ने जिस तत्व का उपदेश किया है वह नित्य
विहार है। नित्य शब्द का अर्थ ही है कि जो अनादि हो, अनन्त हो। फिर भी इस
नित्य विहार की यह विशेषता है कि अनादि अनन्त होकर भी प्रतिक्षण नवीन
है। इसके प्रत्येक अङ्ग नवीन हैं। यहाँ प्रिया नयी हैं और प्रियतम भी नये।
सखियाँ नयी हैं और वृन्दावन भी नया ही। यहाँ तक नये कि अभी पूर्णतया
परिचय भी नहीं हो पाया,। भले ही अनादिकाल से विहार परायण हैं। कैसा
आश्चर्य है?
न आदि न अंत विहार करैं दोऊ,
लाल प्रिया में भई न चिन्हारी।
नई नई भाँति नई नई काँति,
नई नवला नव नेह विहारी।।
ऐसी दशा में जबकि 'चिन्हारी' ही नहीं हो पायी है तो प्रतिदिन और
प्रतिक्षण का मिलन स्नेह प्रणय, रस, सुख और विलास सभी कुछ नवीन है
और जब नवीन है तो प्रथम है ही इसमें क्या सन्देह ? इस नवीनता का
विलक्षण रूप श्रीस्वामी हरिदासजी महाराज बताते हैं-