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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

पृष्ठ 108, कुल 275 में से

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पृष्ठ 108

हित चौरासी • • १०३
कुच जुग पर नख रेख प्रकट मानौं,
संकर सिर ससि टोल।
(जै श्री) हित हरिवंश कहत कछु भामिनि,
अति आलस सौं बोल।।
भावार्थ - (हित सखी ने कहा-) “हे प्यारी राधे ! तेरी आखें आज बड़ी
ही चञ्चल हैं ! तूने अपने भजन, महान् प्रेम और स्वर्ण जैसे सुन्दर गौर वपु से
मनोहर (श्रीलालजी) को (तो मानो) मोल (सा) ले रखा है (अर्थात् पूर्णतया
स्ववश कर लिया है।) अरी ! तेरे अधर फीके पड़ गये हैं, (उनकी ललामी जाने
कहाँ चली गई है,) अलक लटें बिखरी (छूटी) हुई हैं और कपोल भी पीक से रँगे
हुए हैं; तू इतनी रस मग्न हो गई है तुझे यह भी तो नहीं जान पड़ता कि तेरे
ऊपर (नीलाम्बर की जगह) पीत निचोल (छबि पा रहा) है !”
श्रीहित हरिवंश चन्द्र कहते हैं-“हे भामिनि ! तेरे युगल कुचों पर नख
रेखाएँ ऐसी मालूम दे रही हैं जैसे भगवान शङ्कर के ललाट पर बहुत से
(द्वितीया के) चन्द्र। और तू अत्यन्त आलस्य से भर कर थोड़े थोड़े (स्फुट)
शब्द भी तो बोलती है !”
टिप्पणी- 'निजु भजन'
निजु का सरलार्थ अपना, स्वयं और स्वरूप से है। यहाँ 'निजु' जीव ब्रह्म
किंवा प्रेम के सर्वोपाधि रहित शुद्ध रूप के अर्थ में प्रयुक्त है। यह निज जीव
निर्जीव चराचर जगत् का बोधक है। जीव ही ब्रह्म है और जीव ही प्रेम है किन्तु
यह बात पृथकत्व और नानात्व की भ्रान्ति मिटने पर ही जानी जा सकती है
और अनुभव में आ सकती है। जिस प्रकार भगवती श्रुति ब्रह्म के ब्रह्म भाव की
व्यापकता 'सर्व खल्विदं ब्रह्म, अर्थात् यह सम्पूर्ण चराचर ब्रह्म ही है' इस वाक्य
से प्रकट करती है उसी प्रकार प्रेम ब्रह्म के तत्व वेत्ता रसिकाचार्य्य गण प्रेम तत्व
की सर्वत्र सत्ता और सर्व रूपता इस वाक्य से प्रकट करते हैं-
सर्वं हितमयं विदुः।
'अर्थात् सब कुछ हित मय-प्रेम मय ही जानो।" यह चराचर व्यापी हित
निर्गुण भी है सगुण भी। यह सगुण होकर भी निर्गुण है और निर्गुण होकर भी