हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६८ • • हित चौरासी
नित प्रति बढ़िबोई करै, पूरन कला अशेष।
पै पूनौँ यामें नहीं यातें प्रेम विशेष॥
और श्री नारद भक्ति सूत्र में-
प्रति क्षण वर्द्धमानं सूम्मतर सूक्ष्ममनुभव रूपम।
अर्थात् "(यह प्रेम) प्रतिक्षण बढ़ने वाला सूक्ष्मम से सूक्ष्म तथा अनुभव
गम्य है।"
अतएव उक्त पद में 'प्रथम नेह' इस अनादि अनन्त नित्य विहार की एक
अनोखी बात है–विशेषता है।
– २१ –
इस पद में भी उपरोक्त बीसवें पद के ही अनुसार प्रातः कालीन सुरतान्त
छवि का वर्णन है। सुरत छवि पूर्ण श्रीराधा का दर्शन करके श्रीहित सखि उनसे
कुछ परिहास सा कर रही हैं क्योंकि उन्हें युगल किशोर के एकान्तिक विहार के
लक्षण श्रीप्रियाजी के श्रीअङ्गों में दीख पड़े हैं। यद्यपि लज्जा भरित कामिनि
किशोरी उन्हें छिपाना चाहती हैं पर हित सखी से छिपा लेना भी तो कठिन है।
इसी दशा का वर्णन करते हुए श्रीहित सखी अपनी स्वामिनि श्रीराधा से कहती हैं–
धनाश्री
मूल– तेरे नैन करत दोऊ चारी।
अति कुलकात समात नहीं कहुँ मिले हैं कुंज विहारी।।
विथुरी माँग कुसुम गिरि गिरि परैं, लटकि रही लट न्यारी।
उर नख रेख प्रकट देखियत हैं, कहा दुरावति प्यारी।।
परी है पीक सुभग गंडनि पर, अधर निरँग सुकुमारी।
(जै श्री) हित हरिवंश रसिकनी भामिनि, आलस अँग अँग भारी।।२१।।
भावार्थ– [हे राधे !] तेरी दोनों आँखें ही तो चारी (चुगल खोरी) कर
रही हैं–बता रही हैं ! कितनी प्रसन्न हैं ये ? इनकी प्रसन्नता मानो कहीं समाती
नहीं [इसी से विदित होता है कि तुझे कहीं न कहीं कुञ्ज बिहारी ] (श्रीलालजी)
[अवश्य ] मिले हैं। अरी ! तेरी माँग भी तो विखर गयी है और उसमें से फूल