हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)
Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary
गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा
पृष्ठ 92, कुल 275 में से
संदर्भ में पढ़ेंहित चौरासी • • ८७
तूँ वृषभानु गोप की बेटी।
मोहनलाल रसिक हँसि भेंटी॥
जाहि विरंचि उमापति नाये।
तापै तैं वन फूल बिनाये॥
जौ रस नेति नेति श्रुति भाख्यौ।
ताकौ तैं अधर सुधा रस चाख्यौ॥
तेरौ रूप कहत नहिं आवै।
(जै श्री) हित हरिवंश कछुक जस गावै॥१८॥
भावार्थ- "हे छविमयी राधे ! तू मेरी बात सुन ! तूने रस का गम्भीर
समुद्र पाया है। यद्यपि तू वृषभानु गोप की ही बेटी है, फिर भी तूने प्रसन्नता
पूर्वक रसिक मोहन लाल का आलिङ्गन किया है, जिन श्रीकृष्ण का नमन ब्रह्मा
और उमापति शङ्कर भी करते हैं, तूने उन्हीं से फूल बिनाये (चुनवाये) हैं। अरी !
जिस श्रीकृष्ण (परम पुरुष भगवान्) के रस (लीला, प्रभाव, गुण माहात्म्य
आदि) के लिये श्रुतियों ने भी (असमर्थता पूर्वक) नेति नेति कह दिया तूने तो
उसका भी अधर रस पान किया है। राधे! तेरा रूप तो कुछ कहने में ही नहीं
आता, हित हरिवंश तो तेरा कुछ थोड़ा सा सुयश मात्र ही गा रहा है)"
टिप्पणी-
तैं, तूँ, तेरौ-
'हित चौरासी' के प्रायः अधिकांश पदों में देखा जाता है कि ग्रन्थकार
अपनी इष्टाराध्या, महामहिम स्वामिनि सर्वेश्वरी श्रीराधा के लिये भी यत्र तत्र
तैं, तूँ तेरौ, तोसौँ आदि सामान्यता सूचक एक वचन शब्दों का ही प्रयोग करते
हैं। किन्तु जब परमार्थ दृष्टि से उपास्य उपासक सम्बन्ध में ऐसा व्यवहार कुछ
उचित नहीं माना जाता तब आचार्य्य वर्य श्रीहित हरिवंश चन्द्र के द्वारा ऐसा
होना अवश्य एक रहस्य होगा, अतः विचारणीय है।
भक्ति क्षेत्र में भगवत् सम्बन्ध पाँच भावों के द्वारा स्थापित है ऐसा शास्त्रों
का मत है। वे पाँच भाव क्रमशः शान्त, दास्य, सख्य वात्सल्य एवं मधुर के नाम
से कहे जाते हैं। इनमें प्रत्येक क्रमशः उत्तरोत्तर एक दूसरे से श्रेष्ठ है क्योंकि