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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

पृष्ठ 98, कुल 275 में से

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पृष्ठ 98

हित चौरासी • • ६३
किन्हीं एक टीकाकारों ने इस पद.की टीका करते समय पद को निकुअ
परक बनाने के लिये इसके शब्दार्थों को ही बदल दिया है। वे 'व्रज' शब्द का
अर्थ समूह करते हैं चूँकि यह ठीक है पर समय और स्थल से असङ्गत भी। इस
'समूह' अर्थ से ब्रजमण्डल का अर्थ मण्डन और ब्रज बाला समुदाय बाला
होना चाहिये किन्तु ऐसा न करके येन केन कान पकड़ कर व्रज बाला का अर्थ
श्रीराधा कर लिया गया है। ऐसे ही सुर जोषा का सरलार्थ देवपत्नी न करके
कुछ और ही किया गया है। वह यह सुर-वृन्दावन के वृक्ष और योषा उनकी
पत्नियाँ अर्थात् लताएँ इस प्रकार सुरयोषावृन्दावन की लताएँ। वे पुष्प बरसाती
हैं अर्थात् उनसे फूल झरते हैं ....इत्यादि।
ये सभी अर्थ किसी सङ्कुचित क्षेत्र में कुछ भाव प्रवण व्यक्तियों के लिये ही
मान्य हो सकते हैं भाषा साहित्य एवं विद्वत समाज के विशाल प्राङ्गण में कदापि नहीं।
अस्तु ऐसे अर्थ जिस लिये किये गये हैं वह भावना अवश्य वन्दनीय है
पर मान्य नहीं, ऐसा मेरा अपना आग्रह है।
टीकाकार महोदय की वह भावना है-आचार्य्य श्रीहित हरिवंश चन्द्र के
द्वारा प्रकटित रस विलास को ब्रज लीला से परे-नित्य विहार के रूप में बताने
की, जो स्वयं सिद्ध हैं और जिसका सूत्र कुछ और है। ब्रज रस और निकुअ
रस से तारतम्य भेद ओर ऐक्य की शैली सिद्ध रसिक महानुभावों के शब्दों में
जैसी कुछ झलकती है यहाँ केवल उसका दिग्दर्शन मात्र कराये जाने की चेष्टा
की जा रही है-
'सुधर्म-बोधिनी' में रसिक श्रीलाड़िली दास जी निकुअ भावना और
रस क्या है ? इस प्रकार प्रकट करते हैं-
चिदानंद हित सिंधु रस, सेवक भाव गँभीर।
अमित कोटि लीला लहरि, मीन रसिक मन धीर।।
चित् स्वरूप सौं भोक्ता, आनँद तासु कौ भोग।
हित स्वरूप सौं साक्षी, होत न कबहुँ वियोग।।
सर्व देह मय विपिन है, सर्व मनोमय लाल।
सर्वसु इंद्री सखीगन, सर्व आतमा बाल।।