गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation
महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा
30 गणितसारसंग्रह
सर्पिलों ( spirals ) में परिभ्रमण को आँख पर आपतित तिर्यक् शंकु रूप में परिलक्षित ( प्रेक्षित ) करने
के फलस्वरूप प्राप्त हुई हो। इतना अवश्य है तिलोय पण्णत्ती जैसे ग्रंथ में ग्रहों के गमन का विवरण कालवश
विनष्ट होना ही बतलाया है, परन्तु अपोलोनियस ( Apollonius, circa 262–190 B. C. )
और टालेमी की कृतियों से संकलन का प्रयास नहीं किया गया है ।
अब हम देखेंगे कि क्या गणित इतिहास की श्रृंखला की भग्न कड़ियों में से वर्द्धमान महावीर के
तीर्थ में प्रतिपादित अलौकिक गणित का विकास भी एक कड़ी है । भग्नकड़ियों के विषय में उल्लिखित
वाएर्डेन की अभ्युक्ति यह है :
“We have no real proofs for the existence of such an uninter-
rupted tradition; too many connecting links are missing for this.
It is rather a general impression of relatedness which makes itself
felt when one knows the cuneiform texts and then looks through
Heron or Diophantus, or the Chinese “classic of the maritime isle”,
or the Aryabhayṭa* of Aryabhaṭa or the Algebra of Alkhwarizmi.
According to all Arabic sources, Alkhwarizmi was the first writer
on algebra, but his algebra is so mature that we cannot assume that
he discovered everything himself. The algebra of Alkhwarizmi can
hardly be accounted for on the basis of the Greek and Indian
sources which we know; one gets more and more the impression
that he has drawn on older sources which in some way or other are
connected with Babylonian algebra.” †
बेबिलन से चीन तक अन्य सामग्री पहुँचने अथवा बेबिलन और चीन के प्रयुक्त अनुपात सिद्धान्त
से सहसम्बन्धित भग्न कड़ी का अनुरेखण करने में भी इतिहासज्ञों ने अपनी असमर्थता प्रकट की है :
“The oldest Chinese collection of problems on applied pro-
portions¹ looks like an ancient Babylonian text, but it is next to
impossible to prove their dependence or to trace the road along
which they were transmitted.”‡
इसमें सन्देह नहीं है कि चीनियों ने हजारों वर्षों से ज्ञान का आदान प्रदान करते हुए भी अपने
लक्षण (character) और मौलिकता (originality) को अक्षुण्ण रखा है। हम यहाँ केवल थोड़े से
उद्धरणों द्वारा वर्द्धमान महावीर के तीर्थ से सहसम्बन्धित सत्य, अहिंसा और गणित के प्रांगण में चीन और
भारत के समान्तर रूप से विकसित तथ्यों पर प्रकाश डालना चाहते हैं। ईस्वी पश्चात् ६५ के लगभग
चीन में सर्वप्रथम बौद्ध धर्म प्रकट होता प्रतीत होता है। हम इसके कुछ शताब्दियों पूर्व उमड़ी विश्व-
बन्धुत्व की लहरों से प्रभावित क्षेत्र, काल, भाव का अवलोकन करना उपयोगी समझते हैं :
⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯
- शुद्ध रूप “Arybhatiya” है ।
† Science Awakening, p. 280.
‡ Ibid. p. 278.
प्रस्तावना 31
( १ ) एक ओर जहाँ यूनान में पौधों में जीव का अस्तित्व माना गया है, वहाँ चीन में भी इससे
सम्बन्धित सिद्धान्त पर जोज़ेफ़ नीडेम द्वारा प्रकाश डाल गया है :
"Another case which seems to me comparable is the Aristotelian
doctrine of the 'ladder of souls' in which plants were regarded
as possessing a vegetative soul, animals a vegetative and a sensitive
soul, and man a vegetative, a sensitive and a rational soulᶜ. I shall
later show (sect. 9 e) that a very similar doctrine was taught by
Hsun Tzu (Hsun Chhing).² Aristotle lived from —384 to —322,
Hsün Chhing from — 298 to —238."*
उपर्युक्त का सम्बन्ध प्राकृत ग्रंथों में वर्णित जीवों के गुणस्थान और मार्गणास्थानों से अनुरेखित
करना उपयोगी प्रतीत होता है । इस ओर आकृष्ट करने वाले तथ्य निम्नलिखित हैं :—
"In the realm of philosophical theory and practice, determined
efforts have been made to show that early Taoism owed much both
to the Indian Upanishad literature for its theoryᵃ, and to Indian
yogism for some of its practices;ᵇ further, that Chinese Chhan
Buddhism was an importation from Indiaᶜ. These views, however,
as Creel says,ᵈ have never been really convincing. The Upanishadsᵉ
are metaphysical commentaries on the Vedas, and date from the
—8th to the —4th centuries,ᶠ so that they are little earlier than the
first period of elaboration of Taoist doctrine. Their strongly marked
metaphysical idealism, with its conception of the unity of the
brahman and the atman, the absolute and the self, is not at all
characteristic of the Taoists; though the latter, as we shall see,
greatly emphasised the unity of nature, and the incorporation of the
individual within it. For the influence of Yoga practices,ᵍ especially
the breathing exercises, which are certainly very ancient in India,
upon early Taoism, a better case can be made out (Filliozat, 3).
Some Taoist schools, at any rate, practised self-hypnosis by
concentration on the inhaling and exhaling processes (Waleyʰ),
butit was not universal as Chuang Tzu has a passage condemning
it. In any case the aims of this samādhi or dhyāna among the Taoists
were entirely different from those of the Indian rishis. Both wished
to master organic life and to attain 'supernatural' powers, but while
- J. Needham, Science and Civilization in China, p. 155, vol. I,
Cambridge (1954).
32 गणितसारसंग्रह
the Indians sought for an ascetic virtue which would enable them
to dominate the gods themselves (cf. Wilkinsⁱ), the Taoists sought
a material immortality in a universe in which there were no gods
to overcome, and asceticism was only one of the methods which
they were prepared to use to attain their end.’’*
उपर्युक्त तुलना में हम शुभचंद्राचार्य के 'ज्ञानार्णव' की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित करेंगे,
जहाँ आत्मा के व्यक्तित्व के चरम विकास के लिये (अंततः मुक्ति के लिए) प्राणायाम को विघ्न का कारण
निरूपित किया है—
सम्यक् समाधि सिद्ध्यर्थे प्रत्याहारः प्रशस्यते ।
प्राणायामेन विक्षिप्तं मनः स्वास्थ्यं न विन्दति ॥ ४ ॥
वायोः संचार चातुर्यं मणि मातङ्ग साधनम् ।
प्रायः प्रत्यूह बीजं स्यान्मुनेर्मुक्तिमभीप्सतः ॥ ६ ॥
प्राणस्यायमने पीडा तस्यां स्यादार्त्त सम्भवः ।
तेन प्रच्याव्यते नूनं ज्ञात तत्वोऽपि लक्ष्यतः ॥ ९ ॥
नातिरिक्तं फलं सूत्रे प्राणायामात्प्रकीर्तितम् ।
अतस्तदर्थ मस्माभिर्नातिरिक्तः कृतः श्रमः ॥११॥
( प्रकरण संख्या ३० )
साथ ही वर्द्धमान महावीर के तीर्थ में सिद्ध पद प्राप्त करने हेतु सम्यक् तप को जो प्रधानता
दी गई थी वह परम्परा से प्रचलित प्रतिक्रमण में इस प्रकार दृष्टिगत होती है ।
“तवसिद्धे णयसिद्धे संजमसिद्धे चरित्तसिद्धे य ।
णाणम्मि दंसणम्मि य सिद्धे सिरसा णमंसामि ॥”
( २ ) चीन और भारत के बीच सम्बन्ध जोड़ने वाला एक तथ्य और है, “परिमित क्षेत्र की
अनन्त विभाज्यता का खंडन ।” इसके साथ ही सम्बन्धित युगपतत्व ( simultaneity ) और
परमाणु सम्बन्धी तथ्य हैं जिनके लिये वर्द्धमान महावीर के तीर्थ में संकलित सामग्री आदि का तुलनात्मक
अध्ययन कितना उपयोगी होगा यह निम्नलिखित उद्धरण से स्पष्ट हो जावेगा,
“Finally, he discusses the relation between the paradoxes of
Hui Shih² and the Eleatic paradoxes,ᵈ without attaining any definite
conclusion – the correspondence is, indeed, another example of that
extraordinary simultaneity between phenomena which we some-times
find at the two ends of the Old World. For the date of Hui
Shih² is late –5th century, and Eleatic Zeno's floruit is placed
about –460.’’†
- Ibid. p. 153.
† Ibid. p. 154.
प्रस्तावना 33
आगे,
“One might take the theories of atomism as an example. Its
story in our own classical civilization, beginning with such men as
Leucippus and Democritus of Abdera, of the -5th century, and
culminating in Epicurus and Lucretius of the late -3rd and early
-1st, is well known to us.ʰ Indian atomism seems to be later in date,
the Jaina System of Umāsvāti showing its greatest strength about
- 50, and the Vaiśeshika darśana (theory) of Kaṇāda flourishing
in the second half of the + 2nd Centuryⁱ. But there are reasons, as
Reyʲ urges, for believing that the roots of the theory of paramānu
(atoms) go much further back in the history of Indian thought.
Thirdly, in Chinese physics atomism never arose, as we shall seeᵃ,
but the geometry of the Mo Ching¹ (the Mohist Canon, which must
have been put together somewhere in the neighbourhood of - 370)
seems to define a point as a line which has been cut so short that it
cannot be cut any furtherᵇ.”*
(३) आगे यह जानते हुए कि चीन और भारत में बौद्ध धर्म सम्बन्धी आदान प्रदान
का प्रारम्भ ईसा की चौथी सदी से हुआ, हम इससे पूर्व का एक ऐसा उल्लेख भी पाते हैं जो सम्भवतः
भारत से सम्बन्धित हो,
“The Huai Nan Tzu book (c. - 200) containsᶜ a remark that
Yü the Great ‘when he went to the country of the Nacked People,
left his clothes before entering it and put them on when he came
out, thus showing that wisdom adapts itself to circumstances.’”‡
(४) इसमें सन्देह नहीं कि चीनी गणित का प्रत्यक्ष सम्बन्ध भारतीय गणित के साथ दिखाई
देता है, पर यह काल वर्द्धमान महावीर के शताब्दियों पश्चात् का है :
“The proof of the Pythagoras Theorem used by Chao
Chün-Chhing² in his + 2nd-century commentary on the Chou Pei³
(the oldest mathematical classic) appears again in the work of Bhāskar
(+ 1150). The rule for the area of the segment of a circle given in
the Chiu Chang Suan Shu⁴ (Nine Chapters on the Mathematical Art)
of the + 1st-century appears again in the + 9th-century work of
Mahāvīra. Indeterminate problems of the Sun Tzu Suan Ching⁵
(Master Sun’s Mathematical Manual) of the + 3rd century are found
in Brahmagupta (+ 7th century). Āryabhaṭa (+ 5th century) has
- Ibid. p. 155.
‡ Ibid. p. 206.
34 गणितसारसंग्रह
geometrical survey material very like that of Liu Hui of the
- 3rd .'*
जहाँ तैत्तिरीय संहिता में केवल २७ नक्षत्रों को मान्यता दी है, वहाँ चीन में २८ नक्षत्र माने गये
हैं। तिलोय पण्णत्ती में भी १ चंद्र के २८ नक्षत्र माने गये हैं (७-४६५), तथा चंद्र के कारणभूत
शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष में पातालों के पवन का बढ़ना और घटना बतलाया गया है (४-२४०३)। यहाँ
इस तथ्य से समानता रखता हुआ यूनान और चीन से सम्बन्धित उल्लेख ध्यान देने योग्य है। जहाँ ईसा
पूर्व सातवीं सदी के चीनी ताओ सिद्धान्त के ग्रन्थ कुआन त्जु ( Kuan Tzu ) में चंद्रमा के शुक्ल और
कृष्ण पक्ष में समुद्री जीवों का बढ़ना और घटना बतलाया है, वहाँ यूनान में एरिस्टाटिल ( Aristotle )
ने भी यही उल्लिखित किया है।† गणित सम्बन्धी अन्य तुलनाएं तिलोय पण्णत्ती के गणित तथा टोडरमल
की गोम्मटसार टीका आदि से की जा सकती हैं। इस सम्बन्ध में उल्लिखित ग्रन्थ के अन्य भाग ( १-७ )
भी द्रष्टव्य हैं।‡ यहाँ इतना कहना आवश्यक है कि वर्द्धमान महावीर के तीर्थ में अनन्तात्मक राशियों
का अल्पबहुत्व अन्यत्र कहीं देखने में नहीं आया है। दर्शन में गणित के प्रयुक्त करने की अनुपम प्रणाली
“अल्प बहुत्व” में परिलक्षित होती है। केशववर्णी की गोम्मटसार टीका में इस तथा अन्य विषयक
प्ररूपणा में प्रयुक्त प्रतीकों में शून्य, धन और ऋणादि के लिये एक से अधिक चिह्न उपयोग में लाये
गये हैं, जो ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं।
उपर्युक्त अवलोकन से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि पिथोगोरस कालीन अखिल विश्व में जो
गणित युक्त दर्शन का पुनर्जागरण हुआ, उसके इतिहास की भग्न श्रृंखला की एक कड़ी वर्द्धमान महावीर
का तीर्थ कालीन लोकोत्तर गणित ( अर्थेमितिकी ) भी है।
- Ibid. p. 213.
† Ibid. p. 150.
‡ चीनी π के मान ३, √१०, ३५५/११३ तथा दाशमिक पद्धति सहित शलाका गणन
द्रष्टव्य हैं।
कृतज्ञता प्रकाशन
प्रस्तुत ग्रंथ के हिंदी अनुवाद की प्रेरणा मुझे डा० हीरालाल जैन ने प्रायः ग्यारह वर्ष पूर्व नागपुर
में दी थी । इस सम्बन्ध में समय समय पर दिये गये उनके सुझावों के लिए मैं उनका आभारी हूँ । संस्कृत
के विद्यार्थी होने का सौभाग्य मुझे प्राप्त नहीं हुआ, इसलिये प्रस्तुत अनुवाद मुख्यतः प्रोफेसर एम. रंगाचार्य
के सटीक आङ्गल भाषानुवाद पर आधारित है । इस अनुवाद में शासन द्वारा प्रकाशित पारिभाषिक
शब्दावलि का उपयोग किया गया है । संस्कृत के प्रूफ देखने का श्रेय डा. ए. एन. उपाध्ये को है ।
इस कार्य में प्रयुक्त कतिपय ग्रंथों की पूर्ति पूज्य श्री १०५ क्षु० मनोहरलाल जी वर्णी "सहजानन्द"
ने की, जिसके लिये मैं उनका चिर कृतज्ञ हूँ ।
महाकौशल महाविद्यालय (राबर्टसन कालिज), जबलपुर के भूतपूर्व प्राचार्य स्वर्गीय श्री उमादास
मुखर्जी का मैं आभारी हूँ, जिन्होंने मुझे अपनी सहज दया का पात्र बनाकर प्रस्तुत अनुवाद के कार्य
को भली भाँति सम्पन्न करने हेतु संरक्षण प्रदान किया । इसी महाविद्यालय के गणित विभाग के भूतपूर्व
अध्यक्ष प्रोफेसर श्री सी. एस. राघवन द्वारा प्रदत्त सुविधाओं.के लिये भी मैं उनका आभारी हूँ ।
मैं श्री वी. एस. पंडित, एडवोकेट, जबलपुर, तथा श्री प्रबोधचंद्र जैन, एडवोकेट, छिंदवाड़ा का
आभारी हूँ जिनकी अप्रत्यक्ष सहायता के बिना यह कार्य न हो सका होता । अप्रकट रूप से सहायक
विद्यार्थी वर्ग भी धन्यवाद का पात्र है ।
अंत में, मैं उन ग्रंथकारों के प्रति कृतज्ञ हूँ, जिनके ग्रंथों की सहायता लेकर यह कार्य निष्पन्न
हुआ है ।
३० जनवरी, १९६३
गवर्नमेंट साइंस कालिज, { लक्ष्मीचंद्र जैन
जबलपुर ।
ॐ
महावीराचार्यप्रणीतः
गणितसारसंग्रहः
१. संज्ञाधिकारः
मङ्गलाचरणम्
अलङ्घ्यं त्रिजगत्सारं यस्यानन्तचतुष्टयम् । नमस्तस्मै जिनेन्द्राय महावीराय तायिने ॥ १ ॥
संख्याज्ञानप्रदीपेन जैनेन्द्रेण महौ१त्विषा । प्रकाशितं जगत्सर्वं येन तं प्रणमाम्यहम् ॥ २ ॥
२प्रीणितः प्राणिसस्यौघो३ निरीतिर्निरवग्रहः । श्रीमतामोघवर्षेण येन स्वेष्टहितैषिणा ॥ ३ ॥
पापरूपाः परा यस्य चित्तवृत्तिहविर्भुजि । भस्मसाद्४भावमीयुस्तेऽवन्ध्यकोपोऽभवै५त्ततः ॥ ४ ॥
वशीकुर्वन् जगत्सर्वं स्वयं नानुवशः परैः । नाभिभूतः प्रभुरतस्मादपूर्वमकरध्वजः ॥ ५ ॥
६यो विक्रमक्रमाक्रान्तचं७क्रिचक्रंकृतक्रियः । चक्रिकाभञ्जनो नाम्ना चक्रिकाभञ्जनोऽ८ञ्जसा ॥ ६ ॥
१ MB मह्° । २ M प्रणीतः । ३ M सर्गौ° । ४ MK सद्धां । ५ KPB भवेत् । ६ B योऽयं ।
७ M क्री° । ८ MB ज्ञ° ।
१. संज्ञा ( पारिभाषिक शब्द ) अधिकार
मङ्गलाचरण
जिन्होंने तीनों लोकों में सारभूत एवं मिथ्या दृष्टियों द्वारा अलंघ्य अनन्त दर्शन, अनन्त ज्ञान,
अनन्त वीर्य और अनन्त सुख नामक अनन्त चतुष्टय को प्राप्त किया, ऐसे रक्षक जिनेन्द्र भगवान् महावीर
को मैं नमस्कार करता हूँ ॥ १ ॥ मैं महान् विभूति को प्राप्त जिनेन्द्र को नमन करता हूँ जिन्होंने संख्या-
ज्ञान के प्रदीप से समस्त विश्व को प्रकाशवान किया है ॥ २ ॥ धन्य हैं वे अमोघवर्ष (अर्थात् वे जो
वास्तव में उपयोगी वृष्टि की वर्षा करते हैं, ) जो हमेशा अपने प्रियपात्रों के हितचिन्तन में रहते हैं और
जिनके द्वारा प्राणी तथा वनस्पति, महामारी और दुर्भिक्ष आदि से मुक्त होकर सुखी हुए हैं ॥ ३ ॥
जिन ( अमोघवर्ष ) के चित्त की क्रियायें अग्निपुंज सदृश होकर समस्त पापरूपी वैरियों को भस्म में
परिणत करने में सफल हैं, और जिनका क्रोध व्यर्थ नहीं जाता ॥ ४ ॥ जिन्होंने समस्त संसार को अपने
वश में कर लिया है और जो किसी के वश में न रहकर शत्रुओं द्वारा पराजित नहीं हो सके हैं, अपूर्व
मकरध्वज की तरह शोभायमान हैं ॥ ५ ॥ जिनका कार्य, अपने पराक्रम द्वारा पराभूत राजाओं के चक्र
( समूह ) द्वारा होता है, और जो न केवल नाम से चक्रिका भंजन हैं वरन् वास्तव में भी चक्रिका
भंजन ( अर्थात् जन्म और मरण के चक्र के नाशक १ ) हैं ॥ ६ ॥ जो अनेक ज्ञान सरिताओं के अधिष्ठाता
१ भविष्य की अपेक्षा से ।
२ ] गणितसारसंग्रहः [ १. ७-
यो विद्यानद्यधिष्ठानो मर्यादावज्रवेदिकः । रत्नगर्भो यथाख्यातचारित्रजलधिर्महान् ॥ ७ ॥
विध्वस्तैकान्तपक्षस्य स्याद्वादन्यायवादिनः । देवस्य नृपतुङ्गस्य वर्धतां तस्य शासनम् ॥ ८ ॥
गणितशास्त्रप्रशंसा
लौकिके वैदिके वापि² तथा सामायिकेऽपि³ यः । व्यापारस्तत्र सर्वत्र संख्यानमुपयुज्यते ॥ ९ ॥
कामतन्त्रेऽर्थशास्त्रे च गान्धर्वे नाटकेऽपि वा । सूपशास्त्रे तथौ⁴ वैद्ये वास्तुविद्यादिवस्तुषु ॥१०॥
छन्दोऽलङ्कारकाव्येषु तर्कव्याकरणादिषु । कलागुणेषु सर्वेषु प्रस्तुतं गणितं परम् ॥११॥
सूर्यादिग्रहचारेषु ग्रहणे ग्रहसंयुतौ । त्रिप्रश्ने चन्द्रवृत्तौ च सर्वत्राङ्गीकृतं हि तत् ॥१२॥
द्वीपसागरशैलानां संख्याव्यासपरिक्षिपैः । भवनव्यन्तरज्योतिर्लोककल्पाधिवासिनाम् ॥१३॥
————————————————————————————————————————————————
१ P वेदिनः । २ M स्यात् ; B चापि । ३ B च । ४ KM महा⁰ । ५ MB दण्डा⁰ । ६ MB पुरा ।
७ MM⁰ क्षिपाः ।
होकर सच्चरित्रता की वज्रमयी मर्यादा वाले हैं और जो जैन-धर्म रूपी रत्न को हृदय में रखते हैं,
इसलिये वे यथाख्यात चारित्र के महान् सागर के समान सुप्रसिद्ध हुए हैं ॥ ७ ॥ एकान्त पक्ष को
नष्ट कर जो स्याद्वादरूपी न्यायशास्त्र के वादी हुए हैं ऐसे महाराज नृपतुंग का शासन फले-फूले ॥ ८ ॥
गणितशास्त्रप्रशंसा
सांसारिक, वैदिक तथा धार्मिक आदि सब कार्यों में गणित उपयोगी है ॥ ९ ॥ कामशास्त्र में,
अर्थशास्त्र में, संगीत व नाट्यशास्त्र में, पाकशास्त्र ( सूपशास्त्र ) में और इसी तरह औषधि-शास्त्र में तथा
वास्तु-विद्या ( निर्माण-कला ) में, छन्द, अलंकार, काव्य, तर्क, व्याकरण आदि इन सभी कलाओं में
गणना का विज्ञान श्रेष्ठ माना जाता है ॥१०-११॥ सूर्य तथा अन्य ग्रह-नक्षत्रों की गति के संबंध में
ग्रहण और ग्रह-संयुति ( संयोग ) के सम्बन्ध में, त्रिप्रश्न के विषय में और चन्द्रमा की गति के विषय
में—सर्वत्र इसे उपयोग में लाते हैं ॥१२॥ द्वीपों, समुद्रों और पर्वतों की संख्या, व्यास और परिमिति;
भवनवासी, व्यन्तर, ज्योतिर्लोकवासी, कल्पवासी देवों के तथा नारकी जीवों के श्रेणिबद्ध और इंद्रक
————————————————————————————————————————————————
(८) 'स्यात्' शब्द निपात है जो एकान्त का निराकरण करके अनेकान्त का प्रतिपादन करता है ।
यह शब्द 'कथंचित्' का पर्यायवाची है और एक निश्चित अपेक्षा को निरूपित करता है । इस प्रकार,
वैज्ञानिक एवं युक्तियुक्त स्याद्वाद जो जैन-दर्शन एवं तत्त्वज्ञान की नींव है, वस्तु के यथार्थ स्वरूप को
प्रकट करने के हेतु उसके अनन्त धर्मों में से एक समय में एक धर्म का प्रतिपादन करता है । प्रत्येक
धर्म का वर्णन उसके प्रतिपक्षी विरोधी धर्म की अपेक्षा से सप्तभंगी में किया जाता है । उदाहरणार्थ—
अस्तित्व एक धर्म है, और नास्तित्व उसका प्रतिपक्षी धर्म है । अपने प्रतिपक्षी सापेक्ष अस्तित्व धर्म की
अपेक्षा से सप्तभंगी इस प्रकार बनेगी—(१) घट कथंचित् है, (२) घट कथंचित् नहीं है, (३) घट
कथंचित् है और नहीं है, (४) घट कथंचित् अवक्तव्य है, (५) घट कथंचित् है और अवक्तव्य है,
(६) घट कथंचित् नहीं है और अवक्तव्य है, (७) घट कथंचित् है, नहीं है, और अवक्तव्य है ।
(१२) त्रिप्रश्न संस्कृत के ज्योतिर्लोक विज्ञान विषयक ग्रन्थों में वर्णित एक अध्याय का नाम
है जो तीन प्रश्नों के विषय में प्रतिपादन करने के कारण इस नाम से प्रसिद्ध है ।
ये प्रश्न ग्रहादि ज्योतिष बिम्बों के सम्बन्ध में दिक् ( दिशा ), दशा ( स्थिति ) एवं काल ( समय )
विषयक होते हैं ।
-१.२४ ] १. संज्ञाधिकारः [ ३
नारकाणां च सर्वेषां श्रेणीबन्धेन्द्रकोत्कराः । प्रकीर्णकप्रमाणाद्या बुध्यन्ते गणितेन ते ॥१४॥
प्राणिनां तत्र संस्थानमायुरष्टगुणादयः । यात्राद्याः संहिताद्याश्च सर्वे ते गणिताश्रयाः ॥१५॥
बहुभिर्विप्रलापैः किं त्रैलोक्ये सचराचरे । यत्किंचिद्वस्तु तत्सर्वं गणितेन विना न हि ॥१६॥
तीर्थकृद्भ्यः कृतार्थेभ्यः पूज्येभ्यो जगदीश्वरैः । तेषां शिष्यप्रशिष्येभ्यः प्रसिद्धाद्गुरुपर्वतः ॥१७॥
जलधेरिव रत्नानि पाषाणादिव काञ्चनम् । शुक्तेर्मुक्ताफलानीव संख्याज्ञानमहोदधेः ॥१८॥
किंचिदुद्धृत्य तत्सारं वक्ष्येऽहं मतिशक्तितः । अल्पं ग्रन्थमनेकार्थं गणितं सारसंग्रहम् ॥१९॥
संज्ञाम्भोभिरथो पूर्णे परिकर्मोर्व्वेदिके । कलासवर्णसंरूढलुठत्पाठीनसंकुले ॥२०॥
प्रकीर्णकमहाग्राहे त्रैराशिकतरङ्गिणि । मिश्रकव्यवहारोद्यत्सूक्तिरत्नांशुपिञ्जरे ॥२१॥
क्षेत्रविस्तीर्णपाताले खाताख्यसिकताकुले । करणस्कन्धसंबन्धच्छायावेलाविराजिते ॥२२॥
गुणकैर्गुणसंपूर्णैस्तदर्थमणयोऽमलाः । गृह्यन्ते करणोपायैः सारसंग्रहवारिधौ ॥२३॥
अथ संज्ञा
न शक्यतेऽर्थो बोद्धुं यत्सर्वस्मिन् संज्ञया विना । आदावतोऽस्य शास्त्रस्य परिभाषाभिधास्यते ॥२४॥
१ KMB बद्धे° । २ M वसु । ३ KP ज्ञान के स्थान में नव । ४ MB अल्प° । ५ K संज्ञायतोयसमा° ।
६ M द्व ( सम्भवतः त्य को लिखने में भूल हुई है । ) ७ MB संकटे । ८ P द्य ।
( श्रेणिरहित ) निवास-स्थानों के माप और अन्य सब प्रकार के विभिन्न माप—सभी गणित के द्वारा
जाने जाते हैं ॥१३-१४॥ उन स्थानों में रहने वाले जीवों के संस्थान, आयु, उनके आठ गुण आदि,
उनकी गति ( यात्रा ) आदि, उनका साथ रहना आदि, इन सबका आधार गणित है ॥१५॥ और व्यर्थ के
प्रलापों से क्या लाभ है ? जो कुछ इन तीनों लोकों में चराचर ( गतिशील और स्थिर ) वस्तुएँ हैं उनका
अस्तित्व गणित से विलग नहीं ॥१६॥ मैं, तीर्थ को उत्पन्न करने वाले, कृतार्थ और जगदीश्वरों से पूजित
( तीर्थङ्करों ) की शिष्य प्रशिष्यात्मक प्रसिद्ध गुरु परम्परा से आये हुए संख्याज्ञान महासागर से उसका
कुछ सार एकत्रित कर, उसी तरह, जैसे कि समुद्र से रत्न, पाषाणमय चट्टान से स्वर्ण और शुक्ति
( oyster shell ) से मुक्ताफल प्राप्त करते हैं, अल्प होते हुए भी अनल्प अर्थ को धारण करने वाले
सारसंग्रह नामक गणित ग्रंथ को अपनी बुद्धि की शक्ति के अनुसार प्रकाशित करता हूँ ॥१७-१८-१९॥
तदनुसार, इस सारसंग्रह के सागर से, जो पारिभाषिक शब्दावलि रूपी जल से परिपूर्ण है और
जिसकी आठ गणित की क्रियायें किनारे रूप हैं; पुनः जो भिन्न की क्रियाओं रूपी निर्भय गतिशील
मछलियों से युक्त है और विविध प्रश्नों के अध्यायरूपी महाग्राह ( मगर ) से व्याप्त है; पुनः जो त्रैराशिक
की अध्यायरूपी लहरों से आंदोलित है और मिश्र प्रश्नों के अध्याय-सम्बन्धी उत्कृष्ट भाषारूपी मोतियों
की आभा से रंजित है, और पुनः जो क्षेत्रफल-सम्बन्धी प्रश्नों के अध्याय द्वारा पाताल तक विस्तृत है
तथा घनफल के अध्याय रूपी रेत से पूर्ण है; और जो ज्योतिलोंकीय व्यावहारिक गणना से सम्बन्धित
छाया-सम्बन्धी अध्याय रूपी बढ़ते हुए ज्वार से चमकता है—( ऐसे ज्ञानसागर से ) सम्पूर्ण गुण सम्पन्न
गणितज्ञ गणित की सहायता से अपनी इच्छानुसार निर्मल मोती प्राप्त कर सकेंगे ॥२०-२३॥ इस विज्ञान
के आरम्भ में आवश्यक पारिभाषिक शब्दावलि दी जाती है क्योंकि बिना शुद्ध परिभाषाओं के विषय
तक पहुँच सम्भव नहीं है ॥२४॥
४ ] गणितसारसंग्रहः [ १. २५-
तत्र तावत् क्षेत्रपरिभाषा
जलानलादिभिर्नाशं यो न याति स पुद्गलः । परमाणुरनन्तैस्तैरणुः सोऽत्रादिरुच्यते ॥२५॥
त्रसरेणुरतस्तस्माद्रथरेणुः शिरोरुहः । परंमध्यजघन्याख्यौ भोगभूकर्मभूसुवाम् ॥२६॥
लीक्षा तिलस्स एवेह सर्षपोऽथ यवोऽङ्गुलम् । क्रमेणाष्टगुणान्येतद्व्यवहाराङ्गुलं मतम् ॥२७॥
तत्पञ्चकशतं प्रोक्तं प्रमाणं मानवेदिभिः । वर्तमाननराणामङ्गुलमात्माङ्गुलं भवेत् ॥२८॥
व्यवहारप्रमाणे द्वे^५ राद्धान्ते लौकिके विदुः । आत्माङ्गुलमिति त्रेधा तिर्यक्पादः षडङ्गुलैः ॥२९॥
पादद्वयं वितस्तिः स्यात्ततो हस्तो द्विसङ्गुणः । दण्डो हस्तचतुष्केण क्रोशस्तद्द्विसहस्रकम् ॥३०॥
योजनं चतुरः क्रोशान्प्राहुः क्षेत्रविचक्षणाः । वक्ष्यतेऽतः परं कालपरिभाषा यथाक्रमम् ॥३१॥
अथ कालपरिभाषा
अणुरण्वन्तरं काले व्यतिक्रामति यावति । स कालः समयोऽसंख्येः समयैरावलिर्भवेत् ॥३२॥
१ KP णु । २ MB वो । ३ PB ख्य । ४ P ध्रि । ५ M ऽन्ये ।
क्षेत्र परिभाषा [ क्षेत्रमाप सम्बन्धी पारिभाषिक शब्दावलि ]
पुद्गल का अनन्तवाँ सूक्ष्म वह भाग जो न तो पानी द्वारा, न अग्नि द्वारा और न अन्य किन्हीं
ऐसी वस्तुओं द्वारा नाशको प्राप्त है, परमाणु कहलाता है । ऐसे अनन्त परमाणुओं द्वारा उत्पन्न एक-एक
अणु क्षेत्रमाप में प्रथम माप है । इससे उत्पन्न क्रमशः आठ-आठ गुणे त्रसरेणु, रथरेणु, बालमाप, जूं
माप, तिल या सरसों माप, यव माप तथा अंगुल माप हैं । अंगुल माप आदि उनके लिये हैं जो भोग-
भूमि और कर्मभूमि में उत्पन्न होते हैं । ये उत्कृष्ट, मध्यम, जघन्य प्रकार के होते हैं । यह अंगुल
व्यवहारांगुल भी कहलाता है ॥२५-२७॥ जो माप की विधियों से परिचित हैं, कथन करते हैं कि इस
व्यवहार-अंगुल का ५०० गुणा प्रमाणांगुल होता है । वर्तमान काल के मनुष्यों की अंगुली का माप
आत्मांगुल कहा जाता है ॥२८॥ वे कहते हैं कि संसार के स्थापित व्यवहारों में अंगुल तीन प्रकार का
होता है, प्रथम व्यवहारांगुल, द्वितीय प्रमाणांगुल और तृतीय उनका आत्मांगुल । छः अंगुल मिलकर
पाद-माप बनता है जो आरपार रूप से नापा जाता है ॥२९॥ दो ऐसे पाद मिलकर वितस्ति बनाते हैं
और दो वितस्ति मिल कर एक हस्त बनता है । चार हस्त से एक दण्ड बनता है और दो हजार दंड
मिलकर एक क्रोश बनता है ॥३०॥ जो क्षेत्रफल के मापज्ञान में सिद्धहस्त हैं, कहते हैं कि चार क्रोश
मिलकर एक योजन होता है ॥३१॥ इसके पश्चात्, मैं समय के माप के सम्बन्ध में क्रमवार पारिभाषिक
शब्दावलि का उल्लेख करता हूँ ।
काल-परिभाषा [ काल-सम्बन्धी पारिभाषिक शब्दावलि ]
वह काल जिसमें एक ( गतिशील ) अणु^१ किसी प्रदेशबिन्दु से दूसरे निकटतम प्रदेशबिन्दु तक
जाता है समय कहलाता है । असंख्य समय मिलकर एक आवलि बनती है ॥३२॥
( २५-२७ ) क्षेत्रमाप-सम्बन्धी पारिभाषिक शब्दावलि को स्पष्ट रूप से समझने के लिये परिशिष्ट
३ देखिये ।
अणु से आठ गुना त्रसरेणु, त्रसरेणु से आठगुना रथरेणु, रथरेणु से आठगुना बालमाप इत्यादि
जो माप वर्णित किये गये हैं । वे क्रमवार ऐसे हैं कि प्रत्येक पूर्वानुगामी माप से आठगुना है; तथा प्रत्येक
उत्कृष्ट, मध्यम और जघन्य प्रकार का है ।
१ यहाँ अणु का आशय परमाणु से है ।
-१, ४० ] १. संज्ञाधिकारः [ ५
संख्या तावलिरुच्छ्वासः स्तोकस्तूच्छ्वाससप्तकः । स्तोकाः सप्त लवस्तेषां सार्धाष्टात्रिंशता घटी ॥३३॥
घटीद्वयं मुहूर्तोऽत्र मुहूर्तेस्त्रिंशता दिनम् । पञ्चघ्नैस्त्रिभिर्दिनैः पक्षः पक्षौ द्वौ मास इष्यते ॥३४॥
ऋतुर्मासद्वयेन स्यात्त्रिभिस्तैरयनं मतम् । तद्द्वयं वत्सरो वक्ष्ये धान्यमानमतः परम् ॥३५॥
अथ धान्यपरिभाषा
विद्धि षोडशिकास्तत्र चतस्रः कुडहो भवेत् । कुडहाँश्चतुरः प्रस्थश्चतुः प्रस्थानथाढकम् ॥३६॥
चतुर्भिराढकैर्द्रोणो मानी द्रोणैश्चतुर्गुणैः । खारी मानी चतुष्केन खार्यः पञ्च प्रवर्तिकाः ॥३७॥
सेयं चतुर्गुणा वाहः कुम्भः पञ्च प्रवर्तिकाः । इतः परं सुवर्णस्य परिभाषा विभाव्यते ॥३८॥
अथ सुवर्णपरिभाषा
चतुर्भिर्गण्डकैर्गुञ्जा गुञ्जाः पञ्च पणोऽष्ट ते । धरणं धरणे कर्षः पलं कर्षचतुष्टयम् ॥३९॥
अथ रजतपरिभाषा
धान्यद्वयेन गुञ्जैका गुञ्जायुग्मेन माषकः । माषषोडशकेनात्र धरणं परिभाष्यते ॥४०॥
१ KB वो । २ K वां । ३ सम्पूर्ण धान्य परिभाषा के लिए, P और B में निम्नलिखित रूप
में विशेष उल्लेख है । M का पाठान्तर, कोष्ठकों में अंकित किया गया है । आद्य षोडशिका तत्र कुड
( डु ) बः प्रस्थ आढकः । द्रोणो मानी ततः खारी क्रमेण ( मशः ) चतुराहताः ॥ ( सहस्रैश्च त्रिभिष्षड्-
भिश्शतैश्च ब्रीहिभिरसमम् । यत्सम्पूर्णोऽभवत्सोयं कुडुबः परिभाष्यते ॥ ) प्रवर्तिकात्र ताः पञ्च वाहस्तस्या-
श्चतुर्गुणः । कुम्भस्सपादवाहस्स्यात् ( पञ्च प्रवर्तकाः कुम्भः ) स्वर्णसंज्ञाथ वर्ण्यते ॥
संख्यात आवलियों से उच्छ्वास बनता है, सात उच्छ्वासका एक स्तोक और सात स्तोक का
एक लव होता है तथा साढ़े अड़तीस लव मिलकर एक घटी बनती है ॥३३॥ दो घटी का एक मुहूर्त,
तीस मुहूर्त का एक दिन, पंद्रह दिन का एक पक्ष और दो पक्ष का एक मास होता है ॥३४॥
दो मास मिलकर एक ऋतु, तीन ऋतुयें मिलकर एक अयन और दो अयन मिलकर एक वर्ष बनता
है । इसके पश्चात् मैं धान्य के माप के विषय में उल्लेख करता हूँ ॥३५॥
धान्य-परिभाषा [ धान्यमाप सम्बन्धी पारिभाषिक शब्दावलि ]
चार षोडशिका मिलकर एक कुडहा बनता है, चार कुडहा मिलकर एक प्रस्थ बनता है और चार
प्रस्थ का एक आढक होता है ॥३६॥ चार आढक का द्रोण, चार द्रोण की एक मानी, चार मानी की
एक खारी और पाँच खारी की प्रवर्तिका होती है ॥३७॥ चार प्रवर्तिका का एक वाह और पाँच प्रवर्तिका
का एक कुम्भ होता है । इसके पश्चात् स्वर्णमाप-सम्बन्धी पारिभाषिक शब्दावलि दी जाती है ॥३८॥
सुवर्ण-परिभाषा [ स्वर्णमाप सम्बन्धी पारिभाषिक शब्दावलि ]
चार गंडक मिलकर एक गुंजा बनती है; पाँच गुंजा मिलकर एक पण बनता है और इसका
आठगुणा एक धरण होता है । दो धरण मिलकर एक कर्ष बनता है और चार कर्ष मिलकर एक पल
बनता है ॥३९॥
रजत-परिभाषा [ रजतमाप सम्बन्धी पारिभाषिक शब्दावलि ]
दो धान्य मिलकर एक गुंजा बनती है, दो गुंजा मिलकर एक माशा और सोलह माशा मिलकर
एक धरण बनता है ॥४०॥ ढाई धरण का एक कर्ष एवं चार पुराण ( या कर्ष ) का एक दल होता है ।
६ ] गणितसारसंग्रहः [ १. ४१-
तद्द्वयं सार्धकं कर्षः पुराणांश्चतुरः पलम् । रूप्ये मागधमानेन प्राहुः संख्यानकोविदाः ॥४१॥
अथ लोहपरिभाषा
कला नाम चतुष्पादाः सपादाः षट्कला यवः । यवैश्चतुर्भिरंशः स्याद्भागोऽंशानां चतुष्टयम् ॥४२॥
द्रक्षणो भागषट्केन दीनारोऽस्माद्द्विसङ्गुणः । द्वौ दीनारौ सतेरं स्यात्प्राहुर्लोहेऽत्र सूरयः ॥४३॥
पलैर्द्वादशभिः सार्धैः प्रस्थः पलशतद्वयम् । तुलादशतुलाभारैः संख्यादक्षाः प्रचक्षते ॥४४॥
वस्त्राभरणवेत्राणां युग्लान्यत्र विंशतिः । कोटिकौनन्तरं भाष्ये परिकर्मणि नामतः ॥४५॥
अथ परिकर्मनामानि
आदिमं गुणकारोऽत्र प्रत्युत्पन्नोऽपि तद्भवेत् । द्वितीयं भागहाराख्यं तृतीयं कृतिरुच्यते ॥४६॥
चतुर्थ वर्गमूलं हि भाष्यते पञ्चमं घनः । घनमूलं ततः षष्ठं सप्तमं च चितिः स्मृतम् ॥४७॥
तत्संकलितमप्युक्तं व्युत्कलितमतोऽष्टमम् । तच्च शेषमिति प्रोक्तं भिन्नान्यष्टावमून्यपि ॥४८॥
अथ धनर्णशून्यविषयकसामान्यनियमाः
ताडितः खेन राशिः खं सोऽविकारी हृतो युतः । हीनोऽपि खवधादिः खं योगे खं योज्यरूपकम्।४९।
१ M सतेराख्यम् । २ M रं । ३ M डि । ४ M विद्यात्कला सवर्णस्य । यहाँ चौथी संयुक्ति और
कर्तृवाच्य है ।
गणना में कुशल व्यक्ति कहते हैं कि मगध माप के अनुसार उपर्युक्त रजत-माप हैं ॥४१॥
लोह-परिभाषा [ लोह धातुमाप-सम्बन्धी पारिभाषिक शब्दावलि ]
एक कला में चार पाद होते हैं; सवा छः कला का एक यव होता है; चार यव का एक अंश तथा
चार अंश का एक भाग होता है ॥४२॥ छः भाग का एक द्रक्षण, दो द्रक्षण का एक दीनार और दो दीनार
का एक सतेर होता है । लोह धातु के माप के सम्बन्ध में विद्वान् ऐसा कहते हैं ॥४३॥ साढ़े बारह पल
मिलकर एक प्रस्थ होता है; दो सौ पल मिलकर एक तुला और दस तुला मिलकर एक भार होता है । ऐसा
गणना में दक्ष विद्वान् कहते हैं ॥४४॥ इस माप में, बेंत अथवा आभरण अथवा वस्त्रों के बीस युग्मों
(जोड़ियों) की एक कोटिका होती है। इसके पश्चात् मैं गणित की मुख्य क्रियाओं के नाम देता हूँ ॥४५॥
परिकर्म नामावलि [ गणित की मुख्य क्रियाओं के नाम ]
इन क्रियाओं में प्रथम गुणकार ( गुणा ) है, और वह प्रत्युत्पन्न भी कहलाता है । दूसरी
भागहार ( भाग या भाजन ) कहलाती है; और कृति ( वर्ग करना ) तीसरी क्रिया का नाम है ॥४६॥
चौथी, सामान्यतः वर्गमूल है और पाँचवी घन कहलाती है; छठवीं घनमूल और सातवीं चिति (योग )
कहलाती है ॥४७॥ इसे संकलित भी कहते हैं । आठवीं व्युत्कलित ( पूरी श्रेढि में से आरम्भ से ली
गई उसी श्रेढि का कुछ भाग घटा देना ) है जो शेष भी कहलाती है ॥४८॥
ये सब आठ क्रियायें भिन्न में भी प्रयुक्त होती हैं ।
शून्य तथा धनात्मक एवं ऋणात्मक राशियों सम्बन्धी सामान्य नियम
कोई भी संख्या शून्य से गुणित होने पर शून्य हो जाती है और वह चाहे शून्य के द्वारा
विभाजित अथवा शून्य द्वारा घटाई जावे या शून्य में जोड़ी जावे, बदलती नहीं है ।
गुणा तथा अन्य क्रियाएँ शून्य के सम्बन्ध में शून्य की उत्पत्ति करती है और योग की क्रिया में
शून्य वही संख्या हो जाता है जिसमें वह जोड़ा जाता है ॥४९॥
(४९) यह सरलतापूर्वक देखा जा सकता है कि कोई संख्या जब शून्य द्वारा भाजित की जाती है,
-. .. -. 〕 १. संज्ञाधिकारः [ ७
ऋणयोर्धनयोर्घाते भजने च फलं धनम् । ऋणं धनर्णयोस्तु स्यात्स्वर्णयोर्विवरं युतौ ॥५०॥
ऋणयोर्धनयोर्योगो यथासंख्यमृणं धनम् । शोध्यं धनमृणं राशेः ऋणं शोध्यं धनं भवेत् ॥५१॥
धनं धनर्णयोर्वर्गो मूले स्वर्णे तयोः क्रमात् । ऋणं स्वरूपतोऽवर्गो यतस्तस्मान्न तत्पदम् ॥५२॥
अथ संख्यासंज्ञा
शशी सोमश्च चन्द्रेन्दू प्रालेयांशु रजनीकरः । श्वेतं हिमगु रूपं च मृगाङ्कश्च कलाधरः ॥५३॥
द्वि द्वे द्वावुभौ युगलयुग्मं च लोचनं द्वयम् । दृष्टिनेत्राम्बकं द्वन्द्वमक्षिचक्षुर्नयं दृशौ ॥५४॥
हरनेत्रं पुरं लोकं त्रै (त्रि) रत्नं भुवनत्रयम् । गुणो वह्निः शिखी ज्वलनः पावकश्च हुताशनः ॥५५॥
अम्बुधिर्विंधिर्वारिधिः पयोधिः सागरो गतिः । जलधिर्बन्धुश्रुतर्वेदः कषायः सलिलाकरः ॥५६॥
इषुर्व्वाणं शरं शस्त्रं भूतमिन्द्रियसायकम् । पञ्च व्रतानि विषयः करणीयस्कन्तुसायकः ॥५७॥
ऋतुर्जीवो रसो लेख्या द्रव्यं च षट्कं खरम् । कुमारवदनं वर्णं शिलीमुखपदानि च ॥५८॥
शैलमद्रिर्भयं भूभ्रो नगाचलमुनिर्गिरिः । अश्वाश्विपन्नगा द्वीपं धातुर्व्यसनमातृका ॥५९॥
अष्टौ तनूगेजः कर्म वसुवारणपुष्करम् । द्विरदं दन्ती दिग्दुरितं नागानीकं करी यथा ॥६०॥
१ केवल M में ५३ से ६८ तक गाथाएँ प्राप्त हुई हैं । ये मूल में यत्र तत्र अशुद्ध हैं ।
दो ऋणात्मक या दो धनात्मक राशियाँ एक दूसरे से गुणित करने पर या भाजित होने पर
धनात्मक राशि उत्पन्न करती हैं । परन्तु, दो राशियाँ जिनमें एक धनात्मक तथा दूसरी ऋणात्मक एक
दूसरे से गुणित अथवा भाजित होने पर ऋणात्मक राशि उत्पन्न करती हैं । धनात्मक और ऋणात्मक
राशि जोड़ने पर प्राप्त फल उनका अन्तर होता है ॥५०॥ दो ऋणात्मक राशियों या दो धनात्मक राशियों
का योग क्रमशः ऋणात्मक और धनात्मक राशि होता है । किसी दी हुई संख्या में से धनात्मक राशि
घटाने के लिये उसे ऋणात्मक कर देते हैं और ऋणात्मक राशि घटाने के लिये उसे धनात्मक कर
देते हैं ( ताकि दोनों क्रियाओं में केवल योग से इष्ट फल की प्राप्ति हो जावे । ) ॥५१॥
धनात्मक तथा ऋणात्मक राशि का वर्ग धनात्मक होता है; और उस वर्ग राशि के वर्गमूल क्रमशः
धनात्मक और ऋणात्मक होते हैं । चूँकि वस्तुओं के स्वभाव ( प्रकृति ) में ऋणात्मक राशि, वर्गराशि
नहीं होती इसलिये उसका कोई वर्गमूल नहीं होता ॥५२॥ अगले दस सूत्रों में कुछ वस्तुओं के नाम
दिये गये हैं जो वारंवार अंकों और संख्याओं को प्रदर्शित करने के लिये अंकगणित संकेतना में प्रयुक्त किये
तब वह वास्तव में अपरिवर्तित नहीं रहती है । भास्कर ने ऐसे शून्य भागों को खहर कहा है और
उसका मान अयथार्थ अनन्त दिया है । महावीराचार्य स्पष्टतः सोचते हैं कि शून्य द्वारा भाजन, भाजन
ही नहीं । डाक्टर हीरालाल जैन ने इस पर यह सुझाव दिया है कि सम्भवतः ग्रंथकार का ऐसे भाजन से
निम्नलिखित अभिप्राय हो—
मानलो २० वस्तुएँ ५ व्यक्तियों में बाँटना है, तब प्रत्येक व्यक्ति को ४ वस्तुएँ उपलब्ध होंगी ।
यदि इन २० वस्तुओं का विभाजन ० ( शून्य ) व्यक्तियों में करना हो तब कोई व्यक्ति ही न रहने से
वह संख्या अपरिवर्तित रहेगी ।
(५२) यह सूत्र महावीराचार्य की सूक्ष्म अंतर्दृष्टि का प्ररूपक है । इसके विषय में हम प्रस्तावना में ही
संकेत कर चुके हैं । साधारणतः किसी धनात्मक राशि का वर्गमूल निकालने पर (धनात्मक एवं ऋणात्मक)
दो राशियाँ उत्पन्न होती हैं, उनमें से इष्ट फल प्राप्ति के लिये धनात्मक या ऋणात्मक वर्गमूल ग्रहण करना
उपयुक्त होता है । इस प्रकार ग्रंथकार द्वारा निर्दिष्ट यह नियम भी उनकी प्रतिभा का निरूपक है ।
८ ] गणितसारसंग्रहः [ १. ६१-
नव नन्दं च रन्ध्रं च पदार्थं लब्धकेशवौ । निधिंरत्नं ग्रहाणं च दुर्गानाम च संख्यया ॥६१॥
आकाशं गगनं शून्यमम्बरं खं नभो वियत् । अनन्तमन्तरिक्षं च विष्णुपदं दिवि स्मरेत् ॥६२॥
अथ स्थाननामानि
एकं तु प्रथमस्थानं द्वितीयं दशसंज्ञिकम् । तृतीयं शतमित्याहुः चतुर्थं तु सहस्रकम् ॥६३॥
पञ्चमं दशसाहस्रं षष्ठं स्याल्लक्षमेव च । सप्तमं दशलक्षं तु अष्टमं कोटिरुच्यते ॥६४॥
नवमं दशकोट्यस्तु दशमं शतकोटयः । अर्बुदं रुद्रसंयुक्तं न्यर्बुदं द्वादशं भवेत् ॥६५॥
खर्वं त्रयोदशस्थानं महाखर्वं चतुर्दशम् । पद्मं पञ्चदशं चैव महापद्मं तु षोडशम् ॥६६॥
क्षोणी सप्तदशं चैव महाक्षोणी दशाष्टकम् । शङ्खं नवदशं स्थानं महाशङ्खं तु विंशकम् ॥६७॥
क्षित्यैकविंशतिस्थानं महाक्षित्या द्विविंशकम् । त्रिविंशकमथ क्षोभं महाक्षोभं चतुर्नयम् ॥६८॥
अथ गणकगुणनिरूपणम्
लघुकरणोहापोहानालस्यग्रहणधारणोपायैः । व्यक्तिकराङ्कविशिष्टैर्गणकोऽष्टाभिर्गुणैर्ज्ञेयः ॥६९॥
इति संज्ञा समासेन भाषिता मुनिपुङ्गवैः । विस्तरेणागमाद्ध्येयं वक्तव्यं यदितः परम् ॥७०॥
इति सारसंग्रहे गणितशास्त्रे महावीराचार्यस्य कृतौ संज्ञाधिकार समाप्तः ॥
गये हैं । वे यहाँ अनुवादित नहीं किये गये हैं ॥५३-६२॥
स्थान-नामावलि [ संकेतनात्मक स्थानों के नाम ]
प्रथम स्थान वह है जो एक ( इकाई ) कहलाता है, दूसरा स्थान दश ( दहाई ), तीसरा स्थान
शत ( सैकडा ) और चौथा सहस्र ( हजार ) कहलाता है ॥६३॥ पाँचवा दस सहस्र ( दस हजार ),
छठवाँ लक्ष ( लाख ), सातवाँ दशलक्ष ( दस लाख ) और आठवाँ कोटि ( करोड़ ) कहलाता है ॥६४॥
नौवाँ दशकोटि ( दस करोड़ ) और दसवाँ शतकोटि ( सौ करोड़ ) कहलाता है। ग्यारहवाँ स्थान अर्बुद
( अरब ) और बारहवाँ न्यर्बुद ( दस अरब ) कहलाता है ॥६५॥ तेरहवाँ स्थान खर्व ( खरब ) और
चौदहवाँ महाखर्व ( दस खरब ) कहलाता है । इसी तरह, पंद्रहवाँ पद्म और सोलहवाँ महापद्म
कहलाता है ॥६६॥ पुनः सत्रहवाँ क्षोणी, अठारहवाँ महाक्षोणी कहलाता है । उन्नीसवाँ स्थान शङ्ख और
बीसवाँ महाशङ्ख कहलाता है ॥६७॥ इक्कीसवाँ स्थान क्षित्या, बाईसवाँ महाक्षित्या कहलाता है।
तेईसवाँ क्षोभ और चौबीसवाँ महाक्षोभ कहलाता है ॥६८॥
गणकगुणनिरूपण
निम्नलिखित आठ गुणों से गणितज्ञ की पहिचान होती है—
(१) लघुकरण—हल करने में शीघ्र गति, (२) ऊह—अग्रविकल्प, कि इच्छित फल प्राप्त हो सकेगा,
(३) अपोह—अग्रविकल्प, कि इच्छित फल प्राप्त नहीं होगा, (४) अनालस्य—प्रमाद न होना, (५) ग्रहण—
समझने की शक्ति, (६) धारण—स्मरण रखने की शक्ति, (७) उपाय—साधन करने की नई रीतियाँ
खोजना, एवं (८) व्यक्तिकराङ्क—उन संख्याओं तक पहुँचने का सामर्थ्य रखना जो अज्ञात राशियों को
ज्ञात बना सकें ॥६९॥ इस प्रकार, मुनि पुङ्गवों ने संक्षेप में परिभाषाओं का कथन किया है । जो कुछ
इसके विषय में आगे विस्तार रूप से कहा जाना चाहिए उसे आगम¹ के अध्ययन से ज्ञात करना चाहिये ।
इस प्रकार, महावीराचार्य की कृति सारसंग्रह नामक गणित-शास्त्र में, संज्ञा अधिकार समाप्त हुआ ॥७०॥
१ यहाँ आगम का आशय, सम्भवतः जिनागम प्रणीत अलौकिक गणित से हो जिसके विषय में
ग्रंथकार द्वारा मात्र यहीं संकेत किया गया प्रतीत होता है ।
-२. १ ] परिकर्मव्यवहारः [ ९
२. परिकर्मव्यवहारः
इतः परं परिकर्माभिधानं प्रथमव्यवहारमुदाहरिष्यामः ।
प्रत्युत्पन्नः
तत्रे प्रथमे प्रत्युत्पन्नपरिकर्मणि करणसूत्रं यथा—
गुणयेद्गुणेन गुण्यं कवाटसंधिक्रमेणै संस्थाप्य । राश्यर्धखण्डतस्तथैरनुलोमविलोममार्गाभ्याम् ॥१॥
१ K तत्र च । २ K और B विन्यस्योभौ राशी । ३ K और B सङ्गुणयेत् ।
२. परिकर्म व्यवहार [ अङ्कगणित सम्बन्धी क्रियाएँ ]
इसके पश्चात्, हम परिकर्म नामक प्रथम व्यवहार प्रकट करते हैं ।
प्रत्युत्पन्न ( गुणन )
परिकर्म क्रियाओं में प्रथम गुणन के क्रिया-सम्बन्धी नियम निम्नलिखित हैं—
जिस तरह दरवाजे की कोरें रहती हैं, उसी प्रकार गुण्य और गुणक को एक-दूसरे के नीचे
रखकर, गुण्य को गुणक से दो रीतियों ( अनुलोम अथवा विलोम क्रम से हल करने की विधियों )
में से किसी एक द्वारा गुणित करना चाहिये । प्रथम विधि में गुण्य के खंड द्वारा गुण्य को विभा-
जित और गुणक को गुणित करते हैं । द्वितीय विधि में, गुणक के खंड द्वारा गुणक को विभाजित तथा
गुण्य को गुणित करते हैं । तृतीय विधि में उन्हें उसी रूप में लेकर गुणन करते हैं ॥ १ ॥
( १ ) प्रतीक रूप से यह नियम इस प्रकार है—
'अब' को 'सद' से गुणा करने पर गुणनफल ( i ) अब/अ × (अ × सद); या (ii) (अब × स) ×
सद/स या (iii) अब × सद होता है । यह स्पष्ट है कि प्रथम दो विधियों को उपर्युक्त गुणनखण्डों के
चुनाव द्वारा क्रिया को सरल करने के उपयोग में लाते हैं ।
अनुलोम, अथवा हल करने की सामान्य विधि वह है जो व्यापक रूपसे उपयोग में लाई जाती
है । विलोम विधि निम्नलिखित है— १९९८
१९९८ में २७ का गुणा करने के लिये— २७
प्रत्येक स्तंभ का योग करने पर २ × १ | २ | | | | |
२ × ९ | १ | ८ | | | |
उत्तर ५३९४६ प्राप्त होता है २ × ९ | | १ | ८ | | |
२ × ८ | | | १ | ६ | |
७ × १ | | ७ | | | |
७ × ९ | | ६ | ३ | | |
७ × ९ | | | ६ | ३ | |
७ × ८ | | | | ५ | ६ |
| ५ | ३ | ९ | ४ | ६ |
ग० सा० सं०-२
१० ] गणितसारसंग्रहः [ २. २-
अत्रोद्देशकः
दत्तान्येकैकस्मै¹ जिनभवनेऽम्बुजानि तान्यष्टौ । वसतीनां चतुरुत्तरचत्वारिंशच्छतायै कति ॥२॥
नव पद्मरागमणयः समर्चिता एकजिनगृहे दृष्टाः । साष्टाशीतिद्विशतीमितवसतिषु ते कियन्तः स्युः ॥३॥
चत्वारिंशच्चैकोनशताधिकपुष्यरागमणयोऽर्च्याः⁵ ।
एकस्मिन् जिनभवने सनवशते ब्रूहि क॑ति मणयः ॥ ४ ॥
पद्मानि सप्तविंशतिरेकस्मिन् जिनगृहे प्रदत्तानि ।
साष्टानवतिसहस्रे सनवशते तानि कति कथय ॥ ५ ॥
⁷एकैकस्यां वसातावष्टोत्तरशतसुवर्णपद्मानि । एकाष्टचतुः सप्तकनवषट्पञ्चाष्टकानां किम् ॥ ६ ॥
शशिवसुखरजलनिधिनवपदार्थभयनयसमूहमास्थाप्य ।
हिमकरविषनिधिगतिभिर्गुणिते किं ¹⁰राशिपरिमाणम् ॥ ७ ॥
हिमगुपयोनिधिगतिशशिवह्नित्रतनिचयमत्र संस्थाप्य¹⁴ ।
सैकाशीत्या त्वं¹² मे गुणयित्वाचक्ष्व¹³ तत्संख्याम् ॥ ८ ॥
अग्निवसुखरभयेन्द्रियशशलाञ्छनराशिमत्र संस्थाप्यै¹¹ ।
रन्ध्रैर्गुणंयित्वा मे कथय सखे राशिपरिमाणम् ॥ ९ ॥
१ B स्य हिं । २ B नस्या । ३ B शतस्य कति भवनानाम् । ४ M B चत्वारिंशद्वयका
शताधिका । ५ M ऽच्छाः । ६ M ते कियन्तस्स्युः । ७ M एकैकजिनालयाय दत्तानि । ८ M प्रयुक्त-
नवशतगृहाणां किम् । ९ ( यह श्लोक केवल M और B में प्राप्य है) । १० M और B किन्तस्य ।
११ M प्यम् । १२ M अहो । १३ M मे शीघ्रम् । १४ B विन्यस्य ।
उदाहरणार्थ प्रश्न
प्रत्येक जिनमन्दिर में आठ-आठ कमल पुष्प चढ़ाये गये । बतलाओ कि १४४ मंदिरों को कितने
दिये गये ? ॥ २ ॥ नौ पद्मराग मणि केवल एक जिनमन्दिर में पूजन में अर्पित किये हुए देखे जाते हैं ।
२८८ मंदिरों में (उसी दर से) कितने अर्पित किये गये ? ॥ ३ ॥ एक जिनमंदिर में १३९ पुष्यरागमणि
पूजन में भेंट किये जाते हैं । बतलाओ, १०९ मंदिरों में कितने मणि भेंट किये गये ? [ मूल गाथा
में १३९ को १०० + ४० - १ रूप में लिखा हुआ है ] ॥ ४ ॥ २७ कमल के फूल एक जिनमंदिर में
भेंट किये गये । बतलाओ कि इस दर से १९९८ मंदिरों में कितने कमल भेंट किये गये ? [ मूल गाथा
में १९९८ को १०९८ + ९०० लिखा है ] ॥ ५ ॥ प्रत्येक मंदिर को १०८ स्वर्ण कमल भेंट की दर
से, ८५६९७४८१ मंदिरों में कितने दिये जायेंगे ? ॥ ६ ॥ १, ८, ६, ४, ९, ९, ७ और २ अंकों को
इकाई के स्थान से लेकर ऊपर के स्थानों तक रखने से बनाई गई संख्या को ४४१ से गुणित करने पर
क्या फल प्राप्त होगा ? ॥ ७ ॥ इस प्रश्न में, १, ४, ४, १, ३ और ५ अंकों को इकाई के स्थान से
लेकर ऊपर के स्थानों तक रखकर, प्राप्त की हुई संख्या को ८१ से गुणित करो और बतलाओ कि कौन
सी संख्या प्राप्त होगी ? ॥ ८ ॥ इस प्रश्न में १५७६८३ संख्या लिखकर उसे ९ से गुणित करो और तब,
हे मित्र ! मुझे बतलाओ कि गुणनफल राशि क्या होगी ? ॥ ९ ॥ इस प्रश्न में १२३४५६७९ संख्या को
९ से गुणित करते हैं । यह गुणनफल राशि आचार्य महावीर के कथनानुसार, नरपाल के कण्ठ आभरण
-२. १७ ] परिकर्मव्यवहारः [ ११
नेन्दाद्र्यृतुशरचतुस्त्रिद्वन्द्वैकं स्थाप्य²मत्र नवगुणितम् ।
आचार्यमहावीरैः कथितं नरपालकण्ठिकाभरणम् ॥१०॥
षट्त्रिकं पञ्चषट्कं च सप्त चादौ प्रतिष्ठितम् । त्रयस्त्रिंशत्संगुणितं कण्ठाभरणमादिशेत्³ ॥११॥
हुतवहगतिशशिमुनिभिर्वसुनयगतिचन्द्रमत्र संस्थाप्य ।
शैलेन तु गुणयित्वा कथयेदं रत्नकण्ठिकाभरणम् ॥१२॥
अनलाब्धिहिमगुमुनिशरदुरिताक्षिपयोधिसोममास्थाप्य ।
शैलेन तु गुणयित्वा कथय त्वं राजकण्ठिकाभरणम् ॥१३॥
गिरिगुणदिविगिरिगुणदिविगिरिगुणनिकरं तथैव गुणगुणितम् ।
पुनरेवं गुणगुणितम् एकादिनवोत्तरं विद्धि ॥१४॥
सप्त शून्यं द्वयं द्वन्द्वं पञ्चैकं च प्रतिष्ठितम् । त्रयःसप्ततिसंगुण्यं⁴ कण्ठाभरणमादिशेत् ॥१५॥
जलनिधिपयोधिशशधरनयनद्रव्याक्षिनिकरमास्थाप्य ।
गुणिते तु चतुःषष्ट्या का संख्या गणितविद्ब्रूहि ॥१६॥
शशाङ्केन्दुखैकेन्दुशून्यैकरूपं निधाय क्रमेणात्र राशिप्रमाणम् ।
हिमांश्रवग्नरन्ध्रैः प्रसंतोदितेऽस्मिन् भवेत्कण्ठिका राजपुत्रस्य योग्या ॥१७॥
इति परिकर्मविधौ प्रथमः प्रत्युत्पन्नः समाप्तः ।
१ श्लोक १० से १५ तक केवल M और B में प्राप्य हैं । २ सभी हस्तलिपियों में 'स्थाप्य तत्र' पाठ
है । ३ B शे । ४ B नयं १० सभी हस्तलिपियों में छंद रूपेण अशुद्ध पाठ “कण्ठाभरणं विनिर्दिशेत्” है ।
की रचना करती है ॥१०॥ ३ को छः बार, ६ को पाँच बार, और ७ को एक बार अवरोही क्रम से
(इकाई के स्थान की ओर) लिखकर, इस संख्या का ३३ से गुणन करने पर एक प्रकार के हार की संख्या
प्राप्त होती है ॥११॥ इस प्रश्न में, ३, ४, १, ७, ८, २, ४ और १ अंकों को इकाई के स्थान से ऊपर
की ओर के क्रम में लिखने पर संख्या का ७ से गुणन करो; और तब कहो कि वह रत्न कंठिका नामक
आभरण है ॥ १२ ॥ १४२८५७१४३ संख्या को लिखकर उसे ७ से गुणित करो; और तब कहो कि वह
राजकण्ठिका आभरण है ॥१३॥ इसी तरह, ३७०३७०३७ को ३ से गुणित करो । इस गुणनफल को फिर
गुणित करो ताकि गुणक क्रमशः एक से लेकर ९ तक हों ॥१४॥ ७, ०, २, २, ५ और १ अंकों को
( इकाई के स्थान से ऊपर की ओर के क्रम में ) रखते हैं । और इस संख्या को ७३ से गुणित करते हैं ।
प्राप्त संख्या को कण्ठ आभरण कहते हैं ॥१५॥ इकाई के स्थान से ऊपर की ओर अंक ४, ४, १, २, ६
और २ क्रमानुसार लिखकर, प्ररूपित संख्या को ६४ से गुणित करने पर हे गणित विद्ब्रूहि, बतलाओ कि
कौन सी संख्या प्राप्त होगी ? ॥१६॥ इस प्रश्न में, इकाई के स्थान से ऊपर की ओर १, १, ०, १, १, ०, १
और १ अंकों को क्रमानुसार रखने से एक विशेष संख्या का मान होता है; और तब इस संख्या में
९१ का गुणा करने पर राजपुत्र के योग्य कण्ठहार प्राप्त होता है ॥१७॥
इस प्रकार, परिकर्म व्यवहार में, प्रत्युत्पन्न नामक परिच्छेद समाप्त हुआ ।
(१०) इसमें तथा अन्य गाथाओं में कुछ संख्याएँ विभिन्न प्रकार के हारों की रचना करती हुईं
मानी गई हैं; क्योंकि उनमें एक से अंकों का शीघ्र ही दृष्टिगोचर होनेवाला सम्मितीय विन्यास रहता है ।
(११) यहाँ गुण्य ३३३३३३६६६६६७ है ।
(१४) यह प्रश्न, स्वतः, इस रूपमें अवतरित हो जाता है : ३७०३७०३७ x ३ को १, २, ३, ४,
५, ६, ७, ८ और ९ द्वारा क्रमानुसार गुणित करो ।
१२ ] गणितसारसंग्रहः [ २. १८-
भागहारः
द्वितीये भागहारकर्मणि करणसूत्रं यथा-
¹विन्यस्य भाज्यमानं तस्याधःस्थेन भागहारेण । सदृशापवर्तनविधिना भागं कृत्वा फलं प्रवदेत् ॥१८॥
अथवा-
प्रतिलोमपथेन भजेद्भाज्यमधःस्थेन भागहारेण । सदृशापवर्तनविधिर्यद्यस्ति विधाय तमपि तयोः।१९॥
अत्रोद्देशकः
दीनाराष्टसहस्रं द्वानवतियुतं शतेन संयुक्तम् । चतुरुत्तरषष्टिनरैर्भक्तं कोंऽशो नुरेकस्य ॥२०॥
रूपाग्रसप्तविंशतिशतानि कनकानि यत्र भाज्यन्ते । सप्तत्रिंशत्पुरुषैरेकस्यांशं² समाचक्ष्व ॥२१॥
दीनारदशसहस्रं त्रिंशतयुतं सप्तवर्गसंमिश्रम् । नवसप्तत्या पुरुषैर्भक्तं³ किं लब्धमेकस्य ॥२२॥
अयुतं चत्वारिंशच्चतुस्सहस्रैकशतयुतं हेम्नाम्⁴। नवसप्ततिवसतीनां दत्तं वित्तं किमेकस्याः ॥२३॥
सप्तदशत्रिंशतयुतान्येकत्रिंशत्सहस्रजम्बूनि । भक्तानि नवत्रिंशन्नरैर्वदैकस्य भागं त्वम् ॥२४॥
१ यह श्लोक P में प्राप्य नहीं है । २ K स । ३ M कोंऽशो नुरेकस्य । ४ यह श्लोक P में प्राप्य
नहीं है । ५ B और K हेमम् । ६ इस श्लोक में दिये गये प्रश्न का पाठ M में निम्न प्रकार है-
त्रिंशतयुतैकत्रिंशत्सहस्रयुक्ता दशाधिकाः सप्त ।
भक्ताश्चत्वारिंशत्पुरुषैरेकोनैस्तत्र दीनारम् ॥
भागहार [ भाग ]
परिकर्म क्रियाओं में द्वितीय, भागहार क्रिया का नियम निम्नलिखित है-
भाज्य को लिखकर उसे उभयनिष्ठ ( साधारण ) गुणनखंडों को अलग करने के रीति के अनुसार
भाजक द्वारा भाजित करो । भाजक को भाज्य के नीचे रखो और तब, परिणामी भजनफल को प्राप्त
करो ॥१८॥ अथवा-यदि सम्भव हो, तो उभयनिष्ठ गुणनखंड को निरसित करने की विधि से, भाज्य के
नीचे भाजक को रखकर, भाज्य को प्रतिलोम विधि से अर्थात् बायें से दायें भाजित करना चाहिये ॥१९॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
६४ व्यक्तियों में ८१९२ दीनार बाँटे गये हैं । प्रत्येक व्यक्ति के हिस्से में कितने आये हैं? ॥२०॥
मुझे एक व्यक्ति का हिस्सा बतलाओ जब कि २७०१ स्वर्ण के टुकड़े ३७ व्यक्तियों में बाँटे जाते हैं । ॥२१॥
१०३४९ दीनार ७९ व्यक्तियों में बाँटे जाते हैं । बतलाओ एक व्यक्ति को क्या प्राप्त होगा ? ॥२२॥
१४१४१ स्वर्ण के टुकड़े ७९ मंदिरों में दिये जाते हैं । बतलाओ प्रत्येक मंदिर में कितना धन दिया
जाता है ? ॥२३॥ ३१३१७ जम्बू फल ( गुलाबी सेव ) ३९ व्यक्तियों में बाँटे गये हैं । प्रत्येक का अंश
( हिस्सा ) बतलाओ ? ॥२४॥ ३१३१३ जम्बू फल १८१ व्यक्तियों में बाँटे गये हैं । प्रत्येक का अंश
(२०) मूल गाथा में ८१९२ को ८००० + ९२ + १०० द्वारा लिखित किया गया है ।
(२२) मूल गाथा में १०३४९ को १०००० + ३०० + (७)² द्वारा निदर्शित किया गया है ।
(२३) यहाँ १४१४१ को १०००० + (४० + ४००० + १ + १००) द्वारा कथित किया गया है ।
(२४) यहाँ ३१३१७ को १७ + ३०० + ३१००० द्वारा दर्शाया गया है ।
-२. २९ ] परिकर्मव्यवहारः [ १३
त्र्योधिकदशत्रिशतयुतान्येकत्रिंशत्सहस्रजम्बू॑नि । सैकाशीतिशतेन प्रहृतानि नरैर्वदैकांशम् ॥२५॥
त्रिदशसहस्री सैकाषष्टिद्विशतीसहस्रषट्कयुता । रत्नानां नवपुंसां दत्तैकनरोऽत्र किं लभते ॥२६॥
ऐकादिषडन्तानि क्रमेण हीनानि हाटकानि सखे । विद्युज्जलधिबन्धुसंख्यैर्नरैर्हृतान्येकभागः कः॥२७॥
त्र्यशीतिमिश्राणि चतुःशतानि चतुस्सहस्रघ्ननगान्वितानि ।
रत्नानि दत्तानि जिनालयानां त्रयोदशानां कथयैकभागम् ॥२८॥
इति परिकर्मविधौ द्वितीयो भागहारः समाप्तः ॥
वर्गः
तृतीये वर्गपरिकर्मणि करणसूत्रं यथा—
द्विसमवधो घातो वा स्वेष्टोनयुतद्वयस्य सेष्टकृतिः । एकाद्विचयेच्छागच्छद्युतिर्वा भवेद्वर्गः ॥२९॥
१ यह श्लोक केवल M में प्राप्य है ।
२ M एकद्वित्रिचतुःपञ्चषट्कैर्हीनाः क्रमेण संभक्ताः ।
सैकचतुःशतसंयुतचत्वारिंशज्जिनालयानां किम् ॥
बतलाओ ? ॥२५॥ ३६२६१ मणि ९ व्यक्तियों को बराबर-बराबर दिये जाते हैं । एक व्यक्ति कितने मणि
प्राप्त करता है ? ॥२६॥ हे मित्र, एक से आरम्भ कर ६ तक के अंकों को इकाई के स्थान से ऊपर की
ओर के क्रम में रखकर और फिर क्रमानुसार हासित अंकों द्वारा संरचित संख्या की सुवर्ण-मुद्राएँ ४४१
व्यक्तियों में वितरित की जाती हैं । प्रत्येक को कितनी मिलती हैं ? ॥२७॥ २८४८३ मणि १३ जिन
मंदिरों में भेंट स्वरूप दिये जाते हैं । प्रत्येक मंदिर को कितना अंश प्राप्त होता है ? ॥२८॥
इस प्रकार, परिकर्म व्यवहार में, भागहार [ भाग ] नामक परिच्छेद समाप्त हुआ ।
वर्ग
परिकर्म क्रियाओं में तृतीय [ वर्ग करने की क्रिया ] के नियम निम्नलिखित हैं—
दो सम राशियों का गुणनफल; अथवा दो सम राशियों में से किसी एक चुनी संख्या को प्रथम
राशि में से घटाकर प्राप्त फल तथा दूसरी राशि में उस चुनी हुई संख्या को जोड़ने से प्राप्त फल, इन
दोनों फलों के गुणनफल में उस चुनी हुई संख्या का वर्गफल जोड़ने पर प्राप्तफल, अथवा, गुणोत्तर
श्रेढि ( जिसमें प्रथमपद १ है और प्रचय २ है ) का अ पदों तक का योगफल, उस इच्छित राशि का
वर्ग होता है ॥२९॥ दो या तीन या इससे अधिक संख्याओं का वर्ग, उन सब संख्याओं के वर्ग के योग
(२५) यहाँ ३१३१३ को १३ + ३०० + ३१००० द्वारा दर्शाया गया है ।
(२६) यहाँ ३६२६१ को ३०००० + १ + (६० + २०० + ६०००) द्वारा दर्शाया गया है ।
(२७) यहाँ दिया गया भाज्य, स्पष्ट रूप से, १२३४५६५४३२१ है ।
(२८) यहाँ २८४८३ को ८३ + ४०० + (४००० x ७) द्वारा निरूपित किया गया है ।
(२९) बीजगणित द्वारा बतलाये जाने पर यह नियम इस तरह का रूप लेता है—
(i) अ x अ = अ² (iii) (अ + क) (अ - क) + क² = अ² (iii) १ + ३ + ५ + ७ + ...
अ पदों तक = अ²
१४ ] गणितसारसंग्रहः [ २. ३०-
द्विस्थानप्रभृतीनां राशीनां सर्ववर्गसंयोगः । तेषां क्रमघातेन द्विगुणेन विमिश्रितो वर्गः ॥३०॥
कृत्वान्त्यकृतिं हन्याच्छेषपदैर्द्विगुणमन्त्यमुत्सार्य । शेषानुत्सार्यैवं करणीयो विधिरयं वर्गे ॥३१॥
अत्रोद्देशकः
एकादिनवान्तानां पञ्चदशानां द्विसंगुणाष्टानाम् । व्रतयुगयोश्च रसाग्न्योः शरनगयोर्वर्गमाचक्ष्व ॥३२॥
साष्टात्रिंशत्त्रिशती चतुःसहस्त्रैकषष्टिषट्छतिका । द्विशती षट्पञ्चाशन्मिश्रा वर्गीकृता किं स्यात् ॥३३॥
लेख्यागुणेपुबाणद्रव्याणां शरगतिन्त्रिसूर्याणाम् । गुणरत्नाग्निपुराणां वर्गं भण गणक यदि वेत्सि ॥३४॥
तथा उन संख्याओं को एक बार में दो लेकर उनके दुगुने गुणनफल के योग को मिलाने के बराबर होता
है ॥३०॥ दाहिनी ओर से बाईं ओर को अङ्क गिनने के क्रम में संख्या के अन्तिम अङ्क का वर्ग प्राप्त
करो, और तब इस अङ्क को द्विगुणित कर तथा एक संकेतना के स्थान तक दाहिनी ओर हटा देने के
पश्चात्, इस अन्तिम अङ्क को शेष स्थानों के अङ्कों द्वारा गुणित करो । इस तरह संख्या के शेष अङ्कों में
प्रत्येक को एक-एक स्थान तक इसी विधि से हटाते जाओ । यह वर्ग करने की विधि है ॥३१॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
१ से लेकर ९ तक तथा १५, १६, २५, ३६ और ७५— इन संख्याओं के वर्ग का मान
निकालो ॥३२॥ ३३८, ४६६१ और २५६ का वर्ग करने पर क्या-क्या प्राप्त होगा ? ॥३३॥ हे गणितज्ञ !
यदि तुम जानते हो तो बतलाओ कि ६५५३६, १२३४५ और ३३३३ के वर्ग क्या होंगे ? ॥३४॥
(३०) यहाँ स्थान शब्द का स्पष्ट अर्थ संकेतना स्थान होता है । यहाँ एक टीका के निर्वचन
के अनुसार वह योग के विघटकों का भी द्योतक है, क्योंकि योग में प्रत्येक ऐसे भाग का स्थान होता
है । इन दोनों निर्वचनों के अनुसार नियम ठीक उतरता है ।
जैसे : (१२३४)² = (१०००² + २००² + ३०² + ४²) + २ × १००० × २०० + २ × १००० × ३०
- २ × १००० × ४ + २ × २०० × ३० + २ × २०० × ४ + २ × ३० × ४
इसी तरह, (१ + २ + ३ + ४)² = (१² + २² + ३² + ४²) + २ (१ × २ + १ × ३ + १ × ४ - २ × ३ + २ × ४ + ३ × ४)
(३१) निम्नलिखित साधित उदाहरणों द्वारा दाहिने ओर हटाने का उल्लिखित नियम स्पष्ट हो
जावेगा । यह महावीर की मौलिक विधि है । इन गणनाओं में स्तम्भों का योग इस प्रकार किया जावे
कि किसी भी स्तम्भ के दहाई के अंक बांई ओर के स्तम्भ में जोड़े जावें ।
| १३१ का वर्ग निकालना | १३२ का वर्ग करना | ५५५ का वर्ग करना । |
|---|---|---|
| १² = १ <br> २ × १ × ३ = ६ <br> २ × १ × १ = २ <br> ३² = ९ <br> २ × ३ × १ = ६ <br> १² = १ <br> ----------------------- <br> १ ७ १ ६ १ | १² = १ <br> २ × १ × ३ = ६ <br> २ × १ × २ = ४ <br> ३² = ९ <br> २ × ३ × २ = १२ <br> २² = ४ <br> ----------------------- <br> १ ७ ४ २ ४ | ५² = २५ <br> २ × ५ × ५ = ५० <br> २ × ५ × ५ = ५० <br> ५² = २५ <br> २ × ५ × ५ = ५० <br> ५² = २५ <br> ----------------------- <br> ३० ८ ० २ ५ |
(३३) मूल गाथा में ४६६१ को ४००० + ६१ + ६०० द्वारा निरूपित किया गया है ।