गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation
महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा
पृष्ठ 57, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ें-१.२४ ] १. संज्ञाधिकारः [ ३
नारकाणां च सर्वेषां श्रेणीबन्धेन्द्रकोत्कराः । प्रकीर्णकप्रमाणाद्या बुध्यन्ते गणितेन ते ॥१४॥
प्राणिनां तत्र संस्थानमायुरष्टगुणादयः । यात्राद्याः संहिताद्याश्च सर्वे ते गणिताश्रयाः ॥१५॥
बहुभिर्विप्रलापैः किं त्रैलोक्ये सचराचरे । यत्किंचिद्वस्तु तत्सर्वं गणितेन विना न हि ॥१६॥
तीर्थकृद्भ्यः कृतार्थेभ्यः पूज्येभ्यो जगदीश्वरैः । तेषां शिष्यप्रशिष्येभ्यः प्रसिद्धाद्गुरुपर्वतः ॥१७॥
जलधेरिव रत्नानि पाषाणादिव काञ्चनम् । शुक्तेर्मुक्ताफलानीव संख्याज्ञानमहोदधेः ॥१८॥
किंचिदुद्धृत्य तत्सारं वक्ष्येऽहं मतिशक्तितः । अल्पं ग्रन्थमनेकार्थं गणितं सारसंग्रहम् ॥१९॥
संज्ञाम्भोभिरथो पूर्णे परिकर्मोर्व्वेदिके । कलासवर्णसंरूढलुठत्पाठीनसंकुले ॥२०॥
प्रकीर्णकमहाग्राहे त्रैराशिकतरङ्गिणि । मिश्रकव्यवहारोद्यत्सूक्तिरत्नांशुपिञ्जरे ॥२१॥
क्षेत्रविस्तीर्णपाताले खाताख्यसिकताकुले । करणस्कन्धसंबन्धच्छायावेलाविराजिते ॥२२॥
गुणकैर्गुणसंपूर्णैस्तदर्थमणयोऽमलाः । गृह्यन्ते करणोपायैः सारसंग्रहवारिधौ ॥२३॥
अथ संज्ञा
न शक्यतेऽर्थो बोद्धुं यत्सर्वस्मिन् संज्ञया विना । आदावतोऽस्य शास्त्रस्य परिभाषाभिधास्यते ॥२४॥
१ KMB बद्धे° । २ M वसु । ३ KP ज्ञान के स्थान में नव । ४ MB अल्प° । ५ K संज्ञायतोयसमा° ।
६ M द्व ( सम्भवतः त्य को लिखने में भूल हुई है । ) ७ MB संकटे । ८ P द्य ।
( श्रेणिरहित ) निवास-स्थानों के माप और अन्य सब प्रकार के विभिन्न माप—सभी गणित के द्वारा
जाने जाते हैं ॥१३-१४॥ उन स्थानों में रहने वाले जीवों के संस्थान, आयु, उनके आठ गुण आदि,
उनकी गति ( यात्रा ) आदि, उनका साथ रहना आदि, इन सबका आधार गणित है ॥१५॥ और व्यर्थ के
प्रलापों से क्या लाभ है ? जो कुछ इन तीनों लोकों में चराचर ( गतिशील और स्थिर ) वस्तुएँ हैं उनका
अस्तित्व गणित से विलग नहीं ॥१६॥ मैं, तीर्थ को उत्पन्न करने वाले, कृतार्थ और जगदीश्वरों से पूजित
( तीर्थङ्करों ) की शिष्य प्रशिष्यात्मक प्रसिद्ध गुरु परम्परा से आये हुए संख्याज्ञान महासागर से उसका
कुछ सार एकत्रित कर, उसी तरह, जैसे कि समुद्र से रत्न, पाषाणमय चट्टान से स्वर्ण और शुक्ति
( oyster shell ) से मुक्ताफल प्राप्त करते हैं, अल्प होते हुए भी अनल्प अर्थ को धारण करने वाले
सारसंग्रह नामक गणित ग्रंथ को अपनी बुद्धि की शक्ति के अनुसार प्रकाशित करता हूँ ॥१७-१८-१९॥
तदनुसार, इस सारसंग्रह के सागर से, जो पारिभाषिक शब्दावलि रूपी जल से परिपूर्ण है और
जिसकी आठ गणित की क्रियायें किनारे रूप हैं; पुनः जो भिन्न की क्रियाओं रूपी निर्भय गतिशील
मछलियों से युक्त है और विविध प्रश्नों के अध्यायरूपी महाग्राह ( मगर ) से व्याप्त है; पुनः जो त्रैराशिक
की अध्यायरूपी लहरों से आंदोलित है और मिश्र प्रश्नों के अध्याय-सम्बन्धी उत्कृष्ट भाषारूपी मोतियों
की आभा से रंजित है, और पुनः जो क्षेत्रफल-सम्बन्धी प्रश्नों के अध्याय द्वारा पाताल तक विस्तृत है
तथा घनफल के अध्याय रूपी रेत से पूर्ण है; और जो ज्योतिलोंकीय व्यावहारिक गणना से सम्बन्धित
छाया-सम्बन्धी अध्याय रूपी बढ़ते हुए ज्वार से चमकता है—( ऐसे ज्ञानसागर से ) सम्पूर्ण गुण सम्पन्न
गणितज्ञ गणित की सहायता से अपनी इच्छानुसार निर्मल मोती प्राप्त कर सकेंगे ॥२०-२३॥ इस विज्ञान
के आरम्भ में आवश्यक पारिभाषिक शब्दावलि दी जाती है क्योंकि बिना शुद्ध परिभाषाओं के विषय
तक पहुँच सम्भव नहीं है ॥२४॥