धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)
Dhanurveda Samhita of Maharshi Vasishtha with Commentary
महर्षि वसिष्ठ (टीकाकार: स्वामी हरिदयालु जी महाराज) द्वारा
३४ धनुर्वेदसंहिता
जाते वाऽऽश्वयुजे मासे नवमीदेवतादिने ।
पूजयेदीश्वरीं चण्डीं गुरुं शस्त्राणि वाजिनः ॥७३॥
विप्रेभ्यो दक्षिणां दत्वा कुमारीर्भोजयेत्ततः ।
देव्यै पशुबलिं दद्याद्वृतो वादित्रमंगलैः ॥७४॥
ततस्तु साधयेन्मंत्रान्वेदोक्तान्वागमोदितान् ।
अस्त्राणां कर्मसिद्ध्यर्थं जपहोमविधानतः ॥७५॥
ऐसे श्रमविधि करे, जब तक सिद्धि हो श्रमसिद्धि हुए पीछे वर्षा में धनुष
को कर में धारण न करे पूर्व अभ्यास किये हुए शस्त्रों के न भूलने के
कारण दो महीना परिश्रम करे, प्रत्येक वर्ष के शरदृतु में अथवा आश्विन
महीने में शुक्ल पक्ष की ९ नवमी देवी के दिन चण्डी ईश्वरी और गुरु
तथा हथियार और घोड़ों की राजा वा अभ्यासी पूजा करे, ब्राह्मणों को
दक्षिणा देकर पीछे कुंवारी कन्याओं को जिमावे, देवी के लिये बाजों
और मंगलों के साथ पशु की बलि दे। पीछे वेदोक्त हों वा शास्त्रोक्त हों
अस्त्रों की कर्मसिद्धि के लिये जप और होम की विधि से मंत्रों का साधन
करे॥७१-७५॥
ब्राह्मं नारायणं शैवमैन्द्रं वायव्यवारुणे ।
आग्नेयं चापरास्त्राणि गुरुदत्तानि साधयेत् ॥७६॥
मनोवाक्कर्मभिर्भाव्यं लब्धास्त्रेण शुचिष्मता ।
अपात्रमसमर्थं च दहन्त्यस्त्राणि पूरुषम् ॥७७॥
प्रयोगं चोपसंहारं यो वेत्ति स धनुर्द्धरः ।
सामान्ये कर्मणि प्राज्ञो नैवास्त्राणि प्रयोजयेत् ॥७८॥
ब्राह्म, नारायण, शैव, ऐन्द्र, वायव्य, वारुण, आग्नेय और गुरु के दिये हुए
अस्त्रों का साधन करे, पवित्र पुरुष मन, वाणी, कर्म से अनुभव करे
अस्त्रों को पाकर, अस्त्रों का प्रयोग और संहार जो जाने वह धनुर्धर है,
सामान्य काम के लिये बुद्धिमान् अस्त्रों का प्रयोग न करे॥७६-७८॥
अथास्त्राणि प्रवक्ष्यामि सावधानोऽवधारय ।
ब्रह्मास्त्रं प्रथमं प्रोक्तं द्वितीयं ब्रह्मदंडकम् ॥७९॥
ब्रह्मशिरस्तृतीयं च तुर्यं पाशुपतं मतम् ।
हिन्दीटीकासमेता ३५
वायव्यं पञ्चमं प्रोक्तमाग्नेयं षष्ठकं स्मृतम् ॥८०॥
नारसिंहं सप्तमञ्च तेषां भेदा ह्यनन्तकाः ।
ससंहारं सुविज्ञेयं शृणु गाधे यथातथम् ॥८१॥
वेदमात्रा सर्वशस्त्रं गृह्यते दीप्यतेऽथवा ।
तत्प्रयोगं शृणु प्राज्ञ ब्रह्मास्त्रं प्रथमं शृणु ॥८२॥
हे विश्वामित्र! अब तुम सावधान होकर धारण करो, मैं अस्त्रों को
कहूंगा, पहिला ब्रह्मास्त्र कहा, दूसरा ब्रह्मदण्ड, तीसरा ब्रह्मशिर, चौथा
पाशुपतास्त्र, पांचवाँ वायव्यास्त्र, छठवां आग्नेयास्त्र, सातवाँ नारसिंह
इनके अनंत भेद हैं, इनको संहार के साथ जानना योग्य है। हे
गाधिवंशज! जैसा है वैसा सुनो, ये सब वेदमाता गायत्रीमंत्र से ग्रहण
करना अथवा दीप्यमान करना। हे प्राज्ञ! इनका प्रयोग सुनो, इनमें से
पहिला ब्रह्मास्त्र सुनो॥७९-८२॥
अथास्त्राणि
दादिदन्ताञ्च सावित्रीं विपरीतां जपेत्सुधीः ।
जप्त्वापूर्वं निखर्वञ्चाभिमंत्र्य विधिवच्छरम् ॥८३॥
क्षिपेच्छत्रुषु सहसा नश्यंति सर्वजातयः ।
बाला वृद्धाश्च गर्भस्था ये च योद्धुं समागताः॥८४॥
सर्वे ते नाशमायान्ति मम चैव प्रसादतः ।
यथातथं दादिदन्तं जपेत्संहारसिद्धये ॥८५॥
अब अस्त्रविद्या कहते हैं, 'द' को आदि ले 'द' के अन्त तक सावित्री को
विपरीत जपे, पहिले एक निखर्व विधि से जपकर पुनः बाण को
मंत्रितकर शीघ्र शत्रुओं पर फेंके, सब जाति नष्ट हों, बालक वृद्ध
गर्भस्थ और जो कोई युद्ध करने को आये हों वे सब नाश को प्राप्त हों,
मेरी कृपा से और संहार की सिद्धि को 'द' से आदि ले 'द' के अन्त तक
जपे॥८३-८५॥
ब्रह्मदण्ड प्रवक्ष्यामि प्रणवं पूर्वमुच्चरेत् ।
ततः प्रचोदयाज्ज्ञेयं ततो नोयो धियः क्रमात् ॥८६॥
३६ धनुर्वेदसंहिता
ततो धीमहि देवस्य ततो भर्गो वरेण्यम् ।
सवितुस्तच्च योक्तव्यममुकशत्रुं तथैव च ॥८७॥
ततो हन हन हुंफट् जप्त्वा पूर्वं द्विलक्षकम् ।
अभिमंत्र्य शरं तद्वत्प्रक्षिपेच्छत्रुषु स्फुटम् ॥८८॥
नश्यन्ति शत्रवः सर्वे यमतुल्या अपि ध्रुवम् ।
एतदेव विपर्यस्तं जपेत्संहारसिद्धये ॥८९॥
ब्रह्मदण्ड कहते हैं, पहिले प्रणव उच्चारण कर पीछे प्रचोदयात् पीछे नो
यो धियो क्रम से पीछे धीमहि देवस्य, पीछे भर्गो वरेण्यम्, पीछे सवितुः
जोड़कर अमुक शत्रु को वैसेहि जोड़े पीछे हन हन हुंफट् जपकर दो लाख
बाण का मंत्रितकर शत्रुओं पर फेंके, सारे शत्रु यदि यमराज के तुल्य हों
तो भी नाश हो इसी को संहार की सिद्ध के लिये उलटा
जपे॥८६-८९॥
ब्रह्मशिरः प्रवक्ष्यामि प्रणवं पूर्वमुच्चरेत् ।
धियो यो नः प्रचोदयात् भर्गोदेवस्य धीमहि ॥९०॥
तत्सवितुर्वरेण्यं शत्रून्मे हनहनेति च ।
हुंफट् चैव प्रयोक्तव्यं क्षिपेद्ब्रह्मशिरस्ततः ॥९१॥
पुरश्चर्यां पुरः कृत्वा त्रिलक्ष्यं नियतः शुचिः ।
नश्यन्ति सर्वे रिपवः सर्वे देवाः सुरा अपि ॥९२॥
इदमेव प्रयोक्तव्यं विपर्यस्तं विकर्षणे ॥९३॥
ब्रह्मशिर अस्त्र को कहते हैं, पहिले प्रणव उच्चारण करे पीछे
तत्सवितुर्वरेण्यं शत्रून्मे हन २ हुं फट् जोड़ना चाहिये पीछे ब्रह्म शिर को
फेंके, तीन लाख का पुरश्चरण करके पवित्र होके देवता वा असुर कोई
शत्रु हो सब नाश को प्राप्त हों और इसी को संहार के निमित्त उलटा
जपे॥९०-९३॥
अतः परं प्रवक्ष्यामि चास्त्रं पाशुपतं तव ।
यस्य विज्ञातमात्रेण नश्यन्ति सर्वशत्रवः ॥९४॥
दादिदन्तां च सावित्रीं प्रोच्य प्रणवमेव च ।
श्लीं पशुं हुंफट् अमुकशत्रून् हन हन हुंफट् ॥९५॥
जप्त्वा पूर्वं द्विलक्षं च ततः पाशुपतं क्षिपेत् ॥
' or 'श्लीं'? It's 'श्लीं'. 'पशुं हुंफट्'.)
Line 5:
अमुक शत्रूको (हुंफट्) ऐसा दो लाख मंत्र जपकर पीछे पाशुपतास्त्र फेंके
(Note: 'शत्रूको' with 'ू'.)
Line 6:
फिर संहार के लिये (व्यस्त) उलटा जपे, यह पाशुपतास्त्र सब शत्रुओं
Line 7:
का निवारण करने वाला है॥९४-९६॥
Line 8:
वच्मि वायव्यमस्त्रं ते येन नश्यन्ति शत्रवः ।
Line 9:
ॐवायव्यया वायव्यान्थोर्वा यया वा तथा ।
Wait, let's look at 'वायव्यान्थोर्वा' vs 'वायव्यान्त्योर्वा' vs 'वायव्यान्योर्वा':
Look at the character:
'वा' 'य' 'व्या'
Then: 'न्' (half na), then 'थ' with 'ो' and 'र्' on next letter?
Wait, look at the letter:
It has a loop at top left, curving down and up to the right stem: that is a 'थ'!
Wait, does it have a 'य'?
Look at 'र्थ्यां' in 'पुरश्चर्यां' (L22): 'श्च' has loop, 'र्यां' has 'र्'.
Look at 'न्थो': 'न्
३८ धनुर्वेदसंहिता
ॐ वज्रनखवज्रदंष्ट्रायुधाय महासिंहाय हुंफट् ।
पूर्वं जप्त्वा च लक्षं हि नरसिंहं च योजयेत् ।
सिंहरूपास्ततो बाणाः पतंति शात्रवे वने ॥१॥
पूर्वोक्तेन प्रकारेण संहारं च प्रकल्पयेत् ।
संक्षेपतो महाभाग तवोक्तानि महामते ॥२॥
भेदास्त्वेषां शिवेनैव ह्यनन्ताः परिकीर्तिताः ।
इत्यस्त्रप्रकरणम्
पूर्वोक्त मंत्र को एक लाख जपकर श्रीनृसिंहजी महाराज का ध्यान कर
योजना करे, पीछे बाण सिंहरूप हो शत्रुरूपी वन में पड़कर उनको खा
जाते हैं पूर्वोक्त प्रकार से संहार करे , हे महाभाग! मैंने तेरे आगे संक्षेप
से अस्त्र कहे, इनके भेद तो श्रीशिवजी महाराज ने परशुरामजी के प्रति
अनंत कहे हैं॥१-२॥
इत्यस्त्रप्रकरणं समाप्तम्
हस्तर्के लांगलीकन्दो गृहीतस्तस्य लेपतः ।
शूरस्यापि रणे पुंसो दर्पं हरति कातरः ॥३॥
हस्त नक्षत्र में रविवारको जलपीपल का कन्द लेकर लेप करने से कायर
पुरुष भी शूरवीर के अभिमान को दूर कर देता है॥३॥
गृहीत्वा योगनक्षत्रैरपामार्गस्य मूलकम् ।
लेपमात्रेण वीराणां सर्वशस्त्रनिवारणम् ॥४॥
पुष्य रविवार सिद्धयोग में ऊँगा, जिसे चिरचिटा द्यौ तारा भी कहते हैं
उसकी जड़ लेकर रखे जिस दिन किसी से युद्ध का काम पड़े, उस दिन
शरीर के लेप करे तो वीरों के सर्व शस्त्र न लगें॥४॥
अधःपुष्पी शंखपुष्पी लज्जालुर्गिरिकर्णिका ।
नलिनी सहदेवी च पत्रमौंजार्कयोस्तथा ॥५॥
विष्णुक्रान्ता च सर्वासां जटा ग्राह्या रवेर्दिने ।
बद्धवा भुजे विलेपाद्वा काये शस्त्रापवारकः ॥६॥
सर्पव्याघ्रादिसत्वानां भूतादीनां न जायते ।
भीतिस्तस्य स्थिता यस्य मातरोऽष्टौ शरीरके ॥७॥
हिन्दीटीकासमेता ३९
अधःपुष्पी जिसको औंधाहूली कहते हैं, शंखाहूली, छुईमुई, वनमोगरा,
कमोदिनी, सहदेई, मूंज का और आक का पत्र, विष्णुक्रांता इन सबों की
जड़ रविवार को ग्रहण करके हाथों से बाँधे, वा शरीर पर लेपन करे तो
सब शस्त्र दूर हों, साँप बाघ आदि हिंस्रजीवों की बाधा न हो और आठ
मातृदेवियों से भी रक्षा हो॥५-७॥
गृहीतं हस्तनक्षत्रे चूर्णं छुच्छुन्दरीभवम् ।
तत्प्रभावाद्गजः पुंसः सम्मुखं नैति निश्चितम् ॥८॥
हरिमांसं गृहीत्वा च मार्गेऽश्वानां क्षिपेद्भुवि ।
तेन मार्गेण ते चाश्वा नायांति ताडनेन वै ॥९॥
हस्त नक्षत्र में छुच्छुंदरी अर्थात् सुणसुणियां का चूरा ले, उसके प्रभाव से
पुरुष के सामने हाथी नहीं आवे, यह निश्चय किया हुआ है, शेर का मांस
लेकर जहाँ घोड़ों का मार्ग हो, वहाँ पृथ्वीपर पटक दे तो उस मार्ग से वे
घोड़े कोड़े मारने से भी नहीं आते हैं॥८-९॥
छुच्छुन्दरीश्रीफलपुष्पचूर्णैरालिप्तगात्रस्य नरस्य दूरात्
॥ आघ्राय गन्धद्विरदोऽतिमत्तो मदं त्यजेत्केसरिणो
यथोग्रम् ॥११०॥
छुच्छुंदर और नारियल के पुष्प का चूरा शरीर को लपेटे हुए मनुष्य के
शरीर की गंध को सूंघकर मतवाला हाथी भी मद को छोड़ देता है जैसे
शेर के शरीर के गंध को सूँघ कर छोड़ता है॥११०॥
श्वेताद्रिकर्णिकामूलं पाणिस्थं वारयेद्गजम् ।
श्वेतकंटारिकामूलं व्याघ्रादीनां भयं हरेत् ॥१११॥
पुष्यार्कोत्पाटिते मूले पाठाया मुखसंस्थिते ।
देहं स्फुटति नो तीक्ष्णमंडलाग्रै रणे नृणाम् ॥११२॥
गंधार्या उत्तरं मूलं मुखस्थं सन्मुखागतम् ।
शस्त्रौघं वारयेत्तत्र पुष्यार्के विधिनोद्धृतम् ॥११३॥
विधिरुपवासः
शुभ्रायाः शरपुङ्खाया जटा नीलीजटाथवा ।
भुजे शिरसि वक्त्रे वा स्थिता शस्त्रनिवारिका ॥११४॥
४० धनुर्वेदसंहिता
भूपाहिचोरभीतिघ्नी गृहीता पुष्यभास्करे ।
सफेद विष्णुकान्ता की जड़ हाथ में रखने से हाथी को दूर कर देती है,
सफेद कटहली की जड़ व्याघ्रादिकों के भय को हरती है, पुष्यरविवार
को पाढ़र की जड़ उखाड़कर मुख में रखे तो देह नहीं फटे, तीव्र तलवार
वा चक्रधारा से, गांधारी के उपार की जड़ मुख में होय तो सन्मुख आये
हुए शस्त्रों के समूह को हटा देती है। विधि से उपजी हुई हो, उसको
उपवास करके लावे, सफेद झोझुरू की जड़ हो अथवा नीली की जटा
को, हाथ शिर मुख में रखने से सब शस्त्रों का निवारण करती है। राजा,
चोर, साँप के डर का नाश करती है पुष्यार्क में ग्रहण की हुई
हो।।११-१४।।
अथ संग्रामविधिः
आदौ तु क्रियते मुद्रा पश्चाद्युद्धं समाचरेत् ।
सर्पमुद्रा कृता येन तस्य सिद्धिर्न संशयः ।।१५।।
अब संग्राम करने की विधि लिखते हैं, आदि में शत्रु की सेना के सन्मुख
खड़ा होकर मुद्रा करे, पीछे युद्ध का आरम्भ करे, जिसने पहिले सर्पमुद्रा
करी हो उसकी सिद्धि हो इसमें संदेह नहीं।।१५।।
रुद्रं ध्यात्वा मन्त्रं जपेत्
ॐ नमः परमात्मने सर्वशक्तिमते विरूपाक्षाय भालनेत्राय
रं हुं फट् स्वाहा । ततो हैमवतीं ध्यात्वा प्रणम्य
युद्धमारभेत् ॥ ॐ ह्रीं श्रीं हैमवतीश्वरीं ह्रीं स्वाहा ॥ ॐ
ह्रीं वज्रयोगिन्यै स्वाहा । सिंहासनस्थां रुद्राणीं
ध्यायेत् ।।१६।।
रुद्र का ध्यान करके मंत्र जपे, जो पहिले लिख आये हैं। पीछे हैमवती
भगवती का ध्यानकर प्रणामकर युद्ध का आरम्भ करे, हैमवती मंत्र
उच्चारण करके, फिर वज्र योगिनी का ध्यान करके सिंह पर चढ़ी हुई
रुद्राणी को ध्यावे।।१६।।
अपूर्णे शत्रुसामग्री पूर्णे वैश्यबलं तथा ।
कुरुते पूर्णसत्त्वस्यो जयत्येको वसुंधराम् ।।१७।।
हिन्दीटीकासमेता ४१
‘ अपूर्ण स्वर में शत्रु की सामग्री हो और पूर्ण में अपनी सेना तत्व से पूर्ण
करे, स्थित हो, ऐसा एक भी योद्धा सारी वसुधा को जीते॥१७॥
पृष्ठे दक्षे योगिनी राहुयुक्ता यस्यैकोयं शत्रुलक्षं निहन्ति
॥ अर्कः पृष्ठे दक्षिणे यस्य गाधे चन्द्रो वामे सन्मुखे वै
निशायाम् ॥१८॥ वायुं पृष्ठे दक्षिणे यो विदध्याद्योधा
शत्रून्नाशयत्तत्क्षणेन ॥१९॥
जिसके पीछे और दाहिने राहु सहित योगिनी हो वह अकेला लाख
शत्रुओं को मारता है, हे विश्वामित्र! और ऐसे ही सूर्य पीछे वा दाहिने
हो और रात में चन्द्रमा सामने अथवा बाँये हो और वायु को पीछे वा
दाहिने जो करे, वह योद्धा तत्काल शत्रुओं का नाश करे॥१८-१९॥
या नाडी बहते चाङ्गे तस्यामेवाधिदेवता ।
सम्मुखेपि दिशा तेषां सर्वकार्यफलप्रदा ॥१२०॥
जो नाड़ी अंग में बहती हो, उसका अधिदेवता सामने हो, उसकी दिशा
के सामने मुख करे तो सब कार्यों की फल देने वाली हो॥१२०॥
यां दिशं बहते वायुर्युद्धं तद्दिशि दापयेत् ।
जयत्येव न सन्देहः शक्रोपि यदि चाग्रतः ॥२१॥
जिस दिशा का वायु देह में चलता हो, उसी दिशा में युद्ध दे तो यदि
इन्द्र भी आगे होवे तो भी जीत होय॥२१॥
सूर्ये पूर्वे चोत्तरे च चन्द्रे पश्चिमदक्षिणे ।
सेनापतिबलं त्वेवं प्रेषयेन्नित्यमादरात् ॥२२॥
सूर्य स्वर चलता हो तो पूर्व और उत्तर में यदि चन्द्रमा होय तो पश्चिम
दक्षिण में, सेनापति आदर के साथ सेना को युद्ध के लिये
भेजे॥२२॥
यत्र नाडयां वहेद्वायुस्तदंग प्राणमेव च ।
आकृष्य गच्छेत्कर्णान्ते जयत्येव पुरंदरम् ॥२३॥
जिस नाडी में वायु बहता हो, उसी अंग में प्राण होता है उसको कानों
तक खींचकर चले तो इन्द्र को भी जीत ले॥२३॥
प्रतिपक्षप्रहारेभ्यः पूर्णांगे योभिरक्षति ।
४२ धनुर्वेदसंहिता
न तस्य रिपुभिः शक्तिर्बलिष्ठैरपि हन्यते ॥२४॥
शत्रुओं के प्रहारों से जो पूर्ण अंगों की रक्षा करते हैं उनकी शक्ति को
बलवान् शत्रु भी नहीं हनन कर सकते हैं॥२४॥
अगुष्ठतर्जनीवंशे पादाङ्गुष्ठे तथा ध्वनिः ।
युद्धकाले प्रकर्तव्या लक्षयोधजयी भवेत् ॥२५॥
अँगूठा तर्जनी के बाँस में और पैर के अँगूठे में वैसे ही ध्वनि करनी
चाहिये ऐसा करने से लाख योद्धाओं को जीतने वाला हो॥२५॥
भूतत्वे ह्युदरं रक्षेत्पादौ रक्षेज्जलेन च ।
ऊरू च वह्नितत्वेन करौ रक्षेच्च वायुना ॥
व्योमतत्वे शिरो रक्षेदेवं योधो जयी भवेत् ॥२६॥
जब पृथ्वी का तत्व हो, तब उदर में चोट लगती है इससे चाहिये कि,
जब पृथ्वीतत्व हो तब पेट की रक्षा ढाल आदि से करे, जल के बहने में
पादों की रक्षा करे, अग्नितत्व के समय ऊरुओं को बचावे, वायु से हाथों
को बचावे, आकाश हो जब शिर की रक्षा करे तो ऐसा योद्धा जीतने
वाला होता है॥२६॥
सूर्ये पूर्वे चोत्तरे च मुखं कृत्वा जयेन्नरः ।
चन्द्रे मुखं सदा कुर्याद्दक्षिणे पश्चिमे सुधीः ॥२७॥
चिरयुद्धे शुभश्चन्द्रः शीघ्रयुद्धे रविस्तथा ॥
दूरयुद्धे जयी चन्द्रः समीपस्थे दिवाकरः ॥२८॥
सूर्य में पूर्व और उत्तर दिशा में मुख करके जीते, चन्द्रमा में सदा दक्षिण
और पश्चिम में मुख करे तो जीते, बहुत देर तक युद्ध करना हो तो
चन्द्रमा का स्वर अच्छा है, और जल्दी करना हो तो सूर्य का और दूर के
युद्ध में चन्द्र और समीप के युद्ध में सूर्य जीतने वाला होता
है॥२७-२८॥
आकृष्य प्राणपवनं समारोहेत्तु वाहनम् ।
समुत्तरेत्पदं दद्यात्सर्वकार्याणि साधयेत् ॥२९॥
प्राण पवन को खैंचकर सवारी पर चढ़े, अर्थात् कुम्भक करके चढ़े, रेचक
करता हुआ उतरे तो सब कामों की सिद्धि करे॥२९॥
हिन्दीटीकासमेता ४३
न कालो विविधं घोरं न शस्त्रं न च पन्नगाः ।
न शत्रुव्याधिचौराद्याःशून्यस्था नाशितुं क्षमाः ॥१३०॥
न तो काल, न विविध प्रकार के शस्त्र, न साँप, न शत्रु, न शरीर का
रोग, न चोर आदि क्रूर स्वभाव वाले शून्य स्वर में स्थित हुए नाश
करने को समर्थ हो सकते हैं॥१३०॥
अयनतिथिदिनेशैः स्वीयतत्वेश्चयुक्तो यदि वहति कदा-
चिद्दैवयोगेन पुंसाम् ॥ स जयति रिपुसैन्यं स्तम्भमात्र-
स्वरेण प्रभवति न च विघ्नं केशवस्यापि लोके ॥१३१॥
उत्तरायण सूर्य की तिथि और सूर्यस्वर अग्नि तत्व वा वायु तत्व से युक्त
होकर कदाचित् दाहिना स्वर अपने आप चले जिस किसी का वह स्वर
के स्तम्भ मात्र से ही शत्रु की सेना को जीते और केशव के लोक में भी
विघ्न न हो॥१३१॥
जीवेन शस्त्रं बध्नीयाज्जीवेनैव विकाशयेत् ।
जीवेन प्रक्षिपेच्छस्त्रं युद्धे जयति सर्वदा ॥१३२॥
स्वर से ही शस्त्र बाँधे और स्वर से ही निकाले तथा स्वर से ही फेंके तो
युद्ध में सदा जीते॥१३२॥
वामनाड्युदये चन्द्रः कर्तव्यो वामसम्मुखः ।
सूर्यचारे तथा सूर्यः पृष्ठे दक्षिणगो जयेत् ॥१३३॥
जब बायाँ स्वर चलता हो तब चन्द्रमा बायें वा सम्मुख करना चाहिये,
सूर्य के चलते समय सूर्य को वैसे ही पीठ पीछे अथवा दाहिने
करे॥१३३॥
दीप्ते कार्ये नाडी परदिशि जीविता सदा कुर्यात् ।
शान्ते च जीवसहिता त्वेवं सिद्ध्यन्ति कार्याणि ॥१३४॥
क्रूर काम में दूसरे की ओर सदा निर्जीव नाड़ी करे और शान्तकर्म में
चलती हुई नाड़ी करे तो कार्य सिद्ध हो॥१३४॥
तत्त्वबलान्नाडीबलमधिकं प्रोक्तं कपर्दिना नियतम् ।
ज्ञात्वैनं स्वरचारं नरो भवेत्कार्यनिपुणमतिः ॥१३५॥
अब इस शंका को दूर करते हैं, कि तत्वज्ञान तो बड़ा कठिन है, किसी
४४ धनुर्वेदसंहिता
किसी को होता है तो वशिष्ठजी विश्वामित्र से कहते हैं, कि तत्वबल से
नाड़ी बल अधिक है, यह बात श्रीजटाधारी महादेवजी महाराज ने
परशुरामजी से निश्चय ही कह दी है, इस स्वर की गति को जानकर
मनुष्य अपने कार्य करने में निश्चय ही चतुर बुद्धि होता है॥३५॥
इति स्वरबलयुद्धम्
अथ राहुयुक्तयोगिनीबलयुद्धं
व्याख्यास्यामः
न देयमिदं क्रूराय कुबुद्धयेऽशांताय गुरुद्रोह्यभक्तायेति ।
देयमिदं ब्रह्मचारिणे धर्मतः प्रजापालदुष्टदण्डविधारिणे
साधुरक्षकाय इत्येव प्रवचनमिति ॥३६-३७॥
अब राहुयुक्त योगिनी बल युद्ध को कहते हैं यह (बुद्धि) युद्ध प्रकार
क्रूरबुद्धि शांति रहित गुरुद्रोही अभक्त को न देना और ब्रह्मचारी जो हो
और धर्म से प्रजा का पालन जो करे (दुष्ट) खोटे पुरुषों को जो दण्ड दे
(साधु) अच्छे पुरुषों की जो रक्षा करे ऐसे को दे, इतना ही वचन
है॥३६-३७॥
राहुयुक्त योगिनीबल
प्रतिपन्नवम्यां प्रथमेर्धयामे राहुयुक्ता योगिनी पूर्वस्यां
दिशि स्थिता भवति ॥१॥ द्वितीया दशम्यां पञ्चमेर्धयामे
राहुसहिता शिवा प्रतीच्यामुदेति ॥२॥ तृतीयैकादश्यां
तृतीये अर्धयामे तमःसंमिलिता पार्वती याम्यां परिभ्रमति
॥३॥ चतुर्थ्यां द्वादश्यां तु सप्तमेऽर्धयामे राहुणा सहनगजा
चोत्तरे ज्ञेया ॥४॥ पञ्चम्यामथ त्रयोदश्यामष्टमेऽर्धयाम
स्वर्भानुयुता गौरी नैर्ऋत्यामटति ॥५॥ गुहतिथौ
चतुर्दश्यां च कात्यायनी पवनालये चायाति ॥६॥
सप्तमीपूर्णिमायां चतुर्थेऽर्धप्रहरे विधुंतुदेन साकं योगिनी
मैशान्यां जानीयात् ॥७॥ अष्टम्यमायां षष्ठेऽर्द्धयामे
.हिन्दीटीकासमेता ४५
रुद्राणी तमोयुक्ताऽऽग्नेय्यामीक्ष्यते ॥८॥ इति राहुयुक्ता
योगिनी उपग्राह्या द्वितीयेऽर्द्धयामे सैंहिकेययुता ॥९॥
पड़वा (प्रतिपदा) और नवमी को पहिले आधे प्रहर में राहु सहिता
योगिनी पूर्वदिशा में स्थित होती है॥१॥ द्वितीया और दशमी पाँचवें
आधे प्रहर में राहु के साथ योगिनी पश्चिम में उदय होती है॥२॥
तृतीया और एकादशी को तीसरे आधे याम में राहु के साथ योगिनी
दक्षिण में घूमती है॥३॥ चौथ और द्वादशी के सातवें आधे याम में राहु
के साथ योगिनी उत्तर में जाननी॥४॥ पञ्चमी और त्रयोदशी के आठवें
आधे प्रहर में राहु के साथ योगिनी दूसरे नैर्ऋत्य कोण में रहती है॥५॥
षष्ठी और चौदश को राहु के साथ योगिनी दूसरे आधे याम में वायु
कोण में चलती है॥६॥ सप्तमी और पूर्णिमा में चौथे आधे प्रहर में राहु
के साथ योगिनी ईशान कोण में जाननी॥७॥ अष्टमी और अमावस को
छठे आधे याम में योगिनी राहु के साथ अग्निकोण में दिखाई देती
है॥८॥ ऐसे राहु के साथ योगिनी ग्रहण करनी चाहिये॥९॥
अथ व्यूहादिभिर्युद्धकथनम्
ये राजपुत्राः सामन्ता आप्ताः सेवकजातयः ॥ तान्सर्वा-
नात्मनः पार्श्वे रक्षायै स्थापयेन्नृपः॥३८॥परस्परानुरक्ता
ये योधाः शार्ङ्गधनुर्धराः । युद्धज्ञास्तु रथाारूढास्ते जयन्ति
रणे रिपून् ॥३९॥ एकः कापुरुषो दीर्णो दारयेन्महती
चमूम् ॥ तद्दीर्णमनुदीर्यन्ते योधाः शूरतमा अपि॥४०॥
अतो वै कातरं राजा बले नैव नियोजयेत् । द्वाविमौ
पुरुषौ लोके सूर्यमंडलभेदिनौ॥४१॥परिव्राड्योगयुक्तश्च
रणे चाभिमुखो हतः ॥ यत्र यत्र हतः शूरः शत्रुभिः
परिवेष्टितः ॥४२॥ अक्षयं लभते लोकं यदि क्लीबं न
भाषते । मूच्छितं नैव विकलं नाशस्त्रं नान्ययोधिनम्
॥४३॥ पलायमानं शरणं गतं चैव न हिंसयेत् ॥ भीरुः
पलायमानोपि नान्वेष्टव्यो बलीयसा ॥४४॥ कदाचि-
च्छूरतां याति शरणे कृतनिश्चयः ॥ संभृत्य महतीं सेनां
४६ धनुर्वेदसंहिता
चतुरंगं महीपतिः ॥४५॥ व्यूहयित्वाऽग्रतः शूरान्स्थाप-
येज्जयलिप्सया । पृष्ठेन वायवो वांति पृष्ठे भानुर्वयांसि
च ॥४६॥ अनुप्लवन्ते मेघाश्च यस्य तस्य रणे जयः ॥
अपूर्णेनैव मर्तव्यं संपूर्णेनैव जीवनम् ॥४७॥ तस्माद्धैर्यं
विधायैव हन्तव्या परवाहिनी ॥ जिते लक्ष्मीर्मृते स्वर्गः
कीर्तिश्च धरणीतले ॥ तस्माद्धैर्यं विधायैव हन्तव्या
परवाहिनी ॥४८॥
अब व्यूहादि उपायों से युद्ध कथन करते हैं, जो राजपुत्र (सामन्त)
अर्थात् जो अपने भाई बेटे हों, तथा अपने अधीन हों यथार्थ बात कहने
वाले नौकर उन सभी को राजा अपने पास चारों ओर रखे और जो
योद्धा आपस में प्रेम रखते हों, शार्ङ्ग (धनुष) धारण करने वाले,
युद्धरीति जानने वाले घोड़ों के सवार, वे संग्राम में शत्रुओं को जीतते हैं
एक भी कायर भगेड़ा सेना में हो तो बड़ी भारी सेना को हरवा देता है,
उस डराये हुए शूरवीर के योद्धा भी पीछे भाग जाते हैं, इस कारण
राजा डरपोक सेनापति वा पदचरादि नौकर सेना में भरती न करे, दो
पुरुष सूर्य के लोक से ऊपर जाते हैं, योगयुक्त संन्यासी और जो संग्राम में
सम्मुख होकर मरे, जहाँ २ शूरवीर शत्रुओं से घिरा हुआ मारा जाय।
वह (अक्षय) स्वर्गलोक को पाता है, यदि चेत् क्लीब वचन अर्थात् हीन
वचन न बोले तो जिस शत्रु को मूर्च्छा आ गई हो और घबरा रहा हो,
हथियार पास न हो, वा दूसरे से लड़ाई कर रहा हो, भाग निकला हो,
शरण में आ गया हो ऐसे को न मारे, डरपोक शत्रु भाग चला हो तो
बलवान् उसको ढूँढ़े नहीं, क्योंकि कभी वह शूरता को प्राप्त हो जाय तो
संग्राम का निश्चयकर अर्थात् अपना मरना ठानकर वह मार देता है,
इस हेतु भागे हुए शत्रु को ढूँढ़ना योग्य नहीं है॥ बहुत सी सेना इकट्ठी
करके चतुरंगिणी अर्थात् हाथी, रथी, घोड़ों के सवार और पैदल एकत्र
करके इनका व्यूह बनाकर सबसे आगे शूरवीरों को रखे जीतने की
इच्छा से जिसकी सेना की पीठ पीछे, सतर ३ का वायु चलता हो और
पीठ पीछे सूर्य हो, तथा पक्षी पीछे उड़ते हों पीठ पीछे की वर्षा हो
३. खड्ग, चक्र, गदा, शक्ति, पाश, रथ-युद्ध एवं धनुर्वेद संहिता उपसंहार
हिन्दीटीकासमेता ४७
उसकी ही रण में जीत होती है। यदि शत्रुओं को बन्धस्वर में रखे तो न
मरे और चलते स्वर को रखे तो मारा जाय, इस हेतु धैर्य करके ही शत्रु
की सेना मारनी चाहिये, जीत जाय तो धन मिले,और रण में मारा
जाय तो स्वर्ग मिले,पृथिवी पर कीर्ति हो इससे धैर्य करके ही शत्रु की
सेना मारनी चाहिये॥३८-४५॥
अधर्मः क्षत्रियस्यैष यद्व्याधिमरणं गृहे ।
यदाजौ निधनं याति साऽस्य धर्मः सनातनः ॥४९॥
वसिष्ठजी कहते हैं हे विश्वामित्र! रोगी होकर घर में मरना क्षत्रियों के
लिये अधर्म से मरना है जो कि, संग्राम में मरना है वह इसका सनातन
धर्म है॥४९॥
अथ व्यूहानाह
युवास्वरे मध्यसेना युद्धं कुर्यादतंद्रिता ।
द्वे सेने पार्श्वयोश्चैका पृष्ठतो रक्षयेत्सदा ॥
एकां विकटसेनां तु दूरस्थां भ्रामयेद्युधि ॥५०॥
युवा स्वरवाली मध्य सेना घूमती हुई, सामने के
४८ धनुर्वेदसंहिता
प्रथमारम्भव्यूह
यौद्धीसेना
युवास्वर
राजा
पृष्ठसेना
पार्श्वस्था. पार्श्वस्था.
विकट सेना
हिन्दीटीकासमेता ४९
जानने, इतने तथा और और व्यूह बनाकर सेनापति सदा चले,
बलाध्यक्षादिकों को सब दिशाओं में नियुक्त करे॥५१॥५२॥
दण्डव्यूह
सर्वतो भये दण्डव्यूहरचना कार्या ।
चारों ओर से जब घिर जावे तब दण्डव्यूह रचकर युद्ध करे।
इनका चित्र आगे देखिये
५० धनुर्वेदसंहिता
पतिकव्यूह
राजा
पृष्ठतो भये शकटव्यूहः ।
पीछे से भय हो तब शकटव्यूह रचै ॥
वराहव्यूह
पार्श्वभये वराहव्यूहो वा
गरुडव्यूहो विधेयः ॥५३॥
दाहिनी ओर से और बाईं ओर
भय उपस्थित होने पर वराहव्यूह
वा गरुडव्यूह करना चाहिये॥५३॥
हिन्दीटीकासमेता ५१
च क्षु गरुडव्यूह
ग्रीवा
राजा
पुच्छ
मकरव्यूह
राजा
५२ धनुर्वेदसंहिता
अग्रतो भये पिपीलिकाव्यूहः ।
आगे से भय हो तब पिपीलिका व्यूह रचै ॥
पिपीलिकाव्यूह
सूचिव्यूह
राजा
राजा
पद्मव्यूह
पैदल
घोडा
पैदल
घोडा
पैदल
घोडा
पैदल
घोडा
राजा
घोडा
पैदल
घोडा
पैदल
घोडा
पैदल
घोडा
पैदल
हिन्दीटीकासमेता ५३
दिग्व्यूह
अर्द्धचन्द्र
राजा
चतुष्पथव्यूह
राजा