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धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)

धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)

Dhanurveda Samhita of Maharshi Vasishtha with Commentary

महर्षि वसिष्ठ (टीकाकार: स्वामी हरिदयालु जी महाराज) द्वारा

DevanagariHindipublished76 पृष्ठ

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पृष्ठ 51

.हिन्दीटीकासमेता ४५
रुद्राणी तमोयुक्ताऽऽग्नेय्यामीक्ष्यते ॥८॥ इति राहुयुक्ता
योगिनी उपग्राह्या द्वितीयेऽर्द्धयामे सैंहिकेययुता ॥९॥
पड़वा (प्रतिपदा) और नवमी को पहिले आधे प्रहर में राहु सहिता
योगिनी पूर्वदिशा में स्थित होती है॥१॥ द्वितीया और दशमी पाँचवें
आधे प्रहर में राहु के साथ योगिनी पश्चिम में उदय होती है॥२॥
तृतीया और एकादशी को तीसरे आधे याम में राहु के साथ योगिनी
दक्षिण में घूमती है॥३॥ चौथ और द्वादशी के सातवें आधे याम में राहु
के साथ योगिनी उत्तर में जाननी॥४॥ पञ्चमी और त्रयोदशी के आठवें
आधे प्रहर में राहु के साथ योगिनी दूसरे नैर्ऋत्य कोण में रहती है॥५॥
षष्ठी और चौदश को राहु के साथ योगिनी दूसरे आधे याम में वायु
कोण में चलती है॥६॥ सप्तमी और पूर्णिमा में चौथे आधे प्रहर में राहु
के साथ योगिनी ईशान कोण में जाननी॥७॥ अष्टमी और अमावस को
छठे आधे याम में योगिनी राहु के साथ अग्निकोण में दिखाई देती
है॥८॥ ऐसे राहु के साथ योगिनी ग्रहण करनी चाहिये॥९॥
अथ व्यूहादिभिर्युद्धकथनम्
ये राजपुत्राः सामन्ता आप्ताः सेवकजातयः ॥ तान्सर्वा-
नात्मनः पार्श्वे रक्षायै स्थापयेन्नृपः॥३८॥परस्परानुरक्ता
ये योधाः शार्ङ्गधनुर्धराः । युद्धज्ञास्तु रथाारूढास्ते जयन्ति
रणे रिपून् ॥३९॥ एकः कापुरुषो दीर्णो दारयेन्महती
चमूम् ॥ तद्दीर्णमनुदीर्यन्ते योधाः शूरतमा अपि॥४०॥
अतो वै कातरं राजा बले नैव नियोजयेत् । द्वाविमौ
पुरुषौ लोके सूर्यमंडलभेदिनौ॥४१॥परिव्राड्योगयुक्तश्च
रणे चाभिमुखो हतः ॥ यत्र यत्र हतः शूरः शत्रुभिः
परिवेष्टितः ॥४२॥ अक्षयं लभते लोकं यदि क्लीबं न
भाषते । मूच्छितं नैव विकलं नाशस्त्रं नान्ययोधिनम्
॥४३॥ पलायमानं शरणं गतं चैव न हिंसयेत् ॥ भीरुः
पलायमानोपि नान्वेष्टव्यो बलीयसा ॥४४॥ कदाचि-
च्छूरतां याति शरणे कृतनिश्चयः ॥ संभृत्य महतीं सेनां