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चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary

मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा

DevanagariAwadhipublished520 पृष्ठ

३८१
२८७
(सदा १४४८)

    • न दिलन का पौटा
      (विरहका और के रूप क्रम)
      पिरख नारि भा समुझाइ । गोद जीउ पेन पँहुचि सिरिआइ ॥१
      चन्दन अमिर पिम मन मारा । परसि गपा भरि भीम गुँभारा ॥२
      सिन्धु माँग नग साउर टीको। पग पान मुख पीग दीको ॥३
      अछन पहिरि भउ गिय हार । हाथहि मेहँदी हिंया सिंगारु ॥४
      अपर रूपे मदन भइ । भए लागि मानिन पर गइ ॥
      उमगह नहगह निसि पायी, गरुह जा भाउ निहग ॥६
      पउज मय पान फूलउ, भयी दुरँग दुरग ॥७
      [टि०-] (१) म०नि० पृ० ६५१ ।
      २८८
      (संवत् १४४९)
    • न लउतन्ह दिलन को प०८ ख
      (दिल्हन के भँवर के रूप क्रम के ० ख०)
      दिन का विरह भा तुयानी । भा उधारा पँचौ गनी ॥१
      भए तेवँइ सिखा परा। गए सोइ मानिन घर आए ॥
      सेंधुरा भा कंचु सुधार । विरख करै। गुयन निहार ॥३
      विरहन दून भए पर भार । आग भइ पनि साही मार ॥४
      आग्य बरइ न बुझावइ । तँह अगन भए अंगल जरइ॥
      भए घरा सउर पुनि मँदा । सब जन पाइ रह खंदा ॥६
      भए दिलन विरह उन सुखभन्ह कइ ।७

१४२
२८९
( रोहीन्गुस १२३ : मनेर ३४५क )
रफ्तने लोरक दर खानये झुन्नारदार व पुरसीदने बख्ती खांद
( बाह्मणके घर जाकर लोरकका यात्राकी साइत पूछना )
रैन खेलानों भा भिनसारा । पंडितकें १ घर लोर सिधारा ॥१
पैंभरी साइके आपु बनावा २ । पाटा पान बीर कइँ ३ आवा ॥२
पाट पँसारै ४ दीन्हि असीसा । चँदर पातं ५ सूरुज मुख द[ीसा*] ६ ॥
फिरूँ चेत परमां ७ परफासू । पैंपरि पूजे कीन्हि ८ इम पासू ॥४
काइ मया हमफहिं चित घरी । मई अजोर अइस हमरी भरी ॥५
कहु जजमान सो कारन, किंह इहवाँ तुम आयहु १० ।६
चँदर जोत मुख अदबल, किंह लग चित उचायहु ॥७
पाठान्तर—मनेर प्रति—
शीर्षक—दस्तान रफ्तने लोरक बरे नक्शूथे पुरसीदन ख श (लोरकका
ज्योतिषीके पास जाकर पूछना) ।
१—रैन गोलि के । २—ते । ३—सांथों पडित जाइ अगवावा । ४—पे ।
५—पैसार पुनि । ६—चँदर भाव सुरज पैंह दीक्षा । ७—काइ फेरु
चित म्वा । ८—सुरप ओ (?) कोन्हा । ९—भाई उजियार फीर के मन्वी ।
१०—किह सग ईहवाँ आयहु ।
२९०
( रोहीन्गुस ५३ मनेर ३४५व )
गुफ्तने झुम्नारदार बख्‍ती नीक व साभती नूह
( ब्राह्मणका शुभ घड़ी बताना )
सुरुज कड़ा में चाँद पुराउप । सगुन पाँच दै पुरुष चलाउप ॥१
परी माँड के राहि गुनाये । सबही निभिर्य पण्डित पाये ॥२
गोर गुनित तुम तोरफ आनहु । कहउँ बोल सो सच कर मानहु १ ॥३
दिन दस तुम्ह कहँ पाट चलावहुँ । पुन इहँ पन्थ भला निधि पावहुँ ॥४
एक दोइ गाइ मैं कुछ देखेउँ । आग होइ पै नाहीं सेखेउँ ॥५

२४१
आधी रात जो आइँ, तब उठ चालहु बीर ।६
घर उपत तुम्ह उतरहु, पौरि गाँग फर तीर' ॥७
पाठान्तर—मनेर प्रति—
शीर्षक—मुकाम कर्दने लोरक सरे नजूमी व कैफियते बग (लोरकका
जोतिषीके पास रुकना और ज्योतिषीका संकटकी बात कहना)
१—चाँदा । २—माँग । ३—लोक सबै तुम्ह मानहु । ४—फन्द
फड़ावइ । ५—पुरुष फन्द भल सिधि पावइ । ६—एक दोइ काक जैत
मैं बेलउँ । ७—औगुन । ८—देखउँ । ९—जब आवहि । १—बूड़ि
गाँगके तीर ।
टिप्पणी—(६) पाड़—संकट ।
(७) पौरि—तैर कर ।
२९१
( टीकेण्ड्स २१४ : मनेर १४६ अ )
फुस्म आवर्दने लोरक चाँदा रा व बाखुद बुर्दन
( लोरकका चाँदाको नीचे लाकर अपने साथ ले जाना)
रात परी' तो लोरक आवा । मेलि धरह कै आपु जनावा ॥१
बाट जुहत फुनि' चाँदा होती । लेतसि अभरन मानिक मोती ॥२
अँगुरी लाइ लोर तस ताँनसि' । आवत घर चाँद न जानसि' ॥३
प्रथम मेलि अरघ सब देतसि । औ पाछे चाँदा धनि लेतसि' ॥४
चाँद सुरुज कै पाँयन' परीं । सुरुज चाँद लै माथे धरी ॥५
निसि अँधियार मेघ' धन परसे, चाँद सर" लुकाइ । ६
बेगि बेगि कै चाले दोउ, जानउँ जाइ उड़ाइ' ॥७
पाठान्तर—मनेर प्रति—
शीर्षक—दास्तान आमदने लोरक दर जायगे चाँदा बर लोरक (लोरक
का चाँदके घर आर (चाँदका) लोरकक पास आना)
इस प्रतिमें पंक्ति ३ और ४ क्रमशः ४ और ३ हैं ।
१—भयी । २—बाट गहत तो । ३—तानों । ४—आवत बाद पुरुख
नै जाना । ५—पाछे पुरुख चाँदा घर लेठसि । ६—के पाँवदि । ७—
सुरुज । ८—माँच । —नीर । ९ —सुरुज । ११—बेगि बेगि चलु
चाँद कुमारी गँहि गहा दूर उड़ाइ ।

१०४
२९२
( मनेर १४०अ )
दास्तान आमदने चाँदा अज सर कस ब रस्तन
(चाँदका महलसे निकलकर रवाना होना)
लै लोरक पर पाँवर दिखाबा । देखि चाँद कुछ चितहिं न लावा ॥१
चलहु लोर पुनि हो भिनसारा । लागि गुहार सब लोग हमारा ॥२
यस सुन पावइ बावन पीरू । बिरह दगध पुनि मोर सरीरू ॥३
ओहि देखत कोई बाइ न पारइ । पोलत बोल माँछ (सँइ) मारइ ॥४
अरजुन सँस धनुष कर गइइ । ओहिर्क हाक न मनुसं सहरी ॥५
कहहि लोर सुनहु तुम्ह चाँदा, अहिसै महिं न हराउ ।६
राठ रूपचंद बाँठा मारेउँ, अब बावन पर जाउ ॥७
मूलपाठ-मह ।
टिप्पणी-(२) भिनसारा-प्रात काल सुबह ।
(३) गुहार-पुकार ।
(५) ओहिर्क-उसका ।
(६) अहिसै-इस प्रकार ।
२९३
( मनेर १४०ब : १४१अ )
दास्तान शमशीरे व गिरे लोरक गिरफ्तने मैना
(मैनाका लोरककी तलवार और डाक के लेना)
ओडन छोड़ मैना लै छूटी । सँह निसि बागि बिरह कै यूठी ॥१
दुन्दु मरुखम्महि रोइ संचारा । करहिं मइत धनु उठइ झनकारा ॥२
मैना माँजरि रूप मरारी । इहँ गुन कितहु न देखेउँ नारी ॥३
ओडन छोड़ फन्दु अस धरा । नैन नीर परु काजर सरा ॥४
कठ ऊँच न बोलसि बोलू । औगुन करब राख मोर तोलू ॥५
अति सरूप सयानी, औ कुलबन्ती नारि संजोग ।६
तुम्ह चाँदा मन राता, महिं परा बिजोग ॥७

प्रस्तुत चित्र पूर्णतः रिक्त (खाली/श्वेत) है, इसमें कोई पाठ (टेक्स्ट) उपलब्ध नहीं है।

२४४
टिप्पणी—(१) झगा—लम्बा ढीला कुरता अँगबरगा ।
(५) उहूँमाँ—वहाँ उस जगह ।
२९५
( रीडेन्ड्स २३ : मनेर १४८ब )
शिनाख्तने कूँवरू लोरक रा दरमियाने राह अज पस्ते च चाँदा
( मार्गमें कुँवरूका लोरक और चाँदाको पहचानना )
कुँवरू आवध¹ चीन्हौं लोरू । धावा संखि चलायहु गोरू² ॥१
पाछें हेरत³ चाँदा भाई । जिउ कुँवरू कर गयउ उड़ाई ॥२
कइसि लोर सों भला न किया । कित ले चलों महर कै धिया ॥३
तिरियहि सरम नाँग भुखि होई । तिन्ह कँ⁴ सप न लागइ कोई ॥४
धूड़ी खोलिन तुम्हरी माई । तिहँकै मया न तुम्हे चित आई ॥५
बारि बियाही मैना माँझरि , लोरक आइ तुम्हार ॥६
पारि बूड़ ररि मरियेंहि, माइ बचन हमार ॥७
पाठान्तर—मनेर प्रति—
शीर्षक—शिनाख्तने कुँवरू लोरक रा (कुँवरूका लोरकको पहचानना)
१—अगुवत । २—रहा सखि परा सब गोरु । ३—हेरन्त । ४—
गुन्द । ५—रूख चढ़े । ६—तेउरे । ७—तिहके मयाँ न चित मूँह
आई । ८—बारि बिदाही मैना ।
९—म—करहि जिन्त तुम्हार ।
टिप्पणी—(१) आवध—आता हुआ । चीन्हौं—पहचाना । संखि—उद्यत होकर !
गोरू—ढोर, गाय भैंस आदि ।
(२) पाछे—पीछे । हेरत—देखते ही ।
(४) तिरियहि—स्त्रियों की । सरम—शर्म । नाँग—अरथ, बोदा ।
(७) ररि—रट रट कर ।
२९६
( रीडेन्ड्स २३१ बम्बई २६ मनेर १४९क )
गुफ्तने बादा कुँवरू रा हिकायते इश्क
( चाँदका कुँवरूसे अपने प्रेमकी बात कहना )
चाँद कहा कुँवरू सुनु बाता । लोर मोर धिउ एकै¹ राता ॥१
जियतेँ जीठ² न छाड़ेउँ³ काछू । दिन अस मये सो सोग पठाऊँ ॥२

२४०
हौं ठँइकै उहँ चिंतँ मोरें । काइ कुँवरू होई रोयें तोरे ॥३
इँह बिधि देखि देसन्तर लीन्हों । काह कहौं'अनउत्तर दीन्हों" ॥४
तुम तज हम जाइहँ परदेसू" । मैं देखुकीन्हि" पुरुख कर भेसू ॥५
हौं सो महर धिय चाँदा", चहूँ भुवन उजियार ।६
कौन अजोग संघ कियउ", कुँवरू भाइ तुम्हार ॥७
पाठान्तर—बम्बई और मनेर प्रतियाँ—
शीर्षक—(बं) जबान दादने चाँद बज कुँवर [य]। (चाँदका कुँवरूको
उत्तर) (म) गुफ्तने चाँद कुँवरू रा जवाब (चाँदका कुँवरूको जवाब)।
दोनों ही प्रतियों में पंक्ति ४ और ५ क्रमशः ५ और ४ है।
१—(ब म) सुनु कँवरू। २—(ब) कह; (म) कहि। ३—
(ब) धिय। ४—(ब, म) छाडतँ। ५—(ब) वोइ दस गवे यह
लोग पठाऊ (म) वोइ दस होन्के बाट पठाऊ। ६—(ब) हीं
ठैंहकैं तह चित्त कसाह (म) ही ठइकैं तह बिय बसि। ७—(ब)
रोये (म) हो कुँवरू रोये। ८—(ब) इह बिध देस देअन्तर लेऊँ;
(म) लेऊँ। ९—(ब) करौं। १०—(ब म) कछ ऊत्तर देउँ।
११—(ब) हम नज (?) जाब परदेसू (म) तुम तज जायब परदेसू।
१२—(ब) कीन्ह। १३—(ब) हौं महरे के धिय सो चाँदा (म)
हौं महरे के धिय चोंदा। १४—(ब) कौन अजोग संग मिक : (म)
तोर साग चित्त बाँध भयउँ।
टिप्पणी—(१) मोर—मेरा। राता—अनुरक्त।
(३) ठँइकै—ठहाका दी। उँह—वह।
(५) जाइहँ—जाऊंगी हूँ।
(७) अजोग—अयोग्य। सघ—सग साथ।
२९७
(रीर्यण्ड्स २३३ । मनेर १४१ख)
जबान दादने कँवरू या पदानत चांदा रा
(कुँवरूका चाँदाकी भर्त्सना करना)
अस चाँदा तुम लाज गँवाई । मरग हथौ सुइँ उतरी' आइ ॥१
(मुख कारी मसि) फिरसि कुँपागीं। पाग पास हाई अँधियारी ॥२
रहु न चाँदे मनहि म्जाइ । अग का न हाइगवन कें जाई ॥३

१४८
बारह मंदिर रैन अँधावसिं¹। सुरुज सेज उजियारी राखसि ॥४
तज सोफ आ रहु तुमाइ । फड़इँ मात तूं खिन न [स*]बाई ॥५
दान सुरुग कर निरमल, लोरक भाइ हमार ।६
तारै नीलञ्ज अमावस, फरि जो लिन्हि अँधियारं॥७
मूलपाठ—(१) मुग कारी मुग निसि ।
पाठान्तर—मनेर प्रति—
शीर्षक—मलामत कर्दने कँवर चाँदा रा (कँवरका चाँदको मलाना
करना) ।
१—घर उतारि । २—मुगकारी पतराहि तिह बुझारी । ३—पास पास
दिन होइ । ४—रहनि नहिं चाँदा । ५—अस निह होइ गांयर वै बाई ।
६—रैन मूँ बाजसि । ७—अँधियारै राखसि । /—तब जो सोक मईह
रजाइ । —मन होइ तो मरे रजाइं । १ —मूँ ता मनै अस निरुञ्ज,
अमावस वै अँधियार ।
टिप्पणी—(१) इसीं—थी ।
(१) रूप—ऐसा ।
२९८
(रैकीयूस ३३३)
विदान कर्दने लोरक बा कुँवर व पेश्तर रफ्तन
( लोरकका कुँवरको विदा कर आगे बढ़ना )
धरि कँवरू लोरक कँठलावा । नैन नीर भरि गाँग बहावा ॥१
केस छोर कँवरू पाँयन परा । बिरह दगध पाथर धनु ररा ॥२
देखतहिं चाँदा चितहिं सैंखानी । मङ्गु न लोर छोड़ै लोरकानी ॥३
कातिक मास रोतु रितु गाइ । हम पुनि कँवरू खेलत आइ ॥४
ठाढ़े कँवरू सिर दइ हाथा । जान देइ चाँद संघाता ॥५
गाउ खोलिन आ मैनाँ, कहु सँदेस अस जाइ ।६
बहर जान न पावइ माँजरि, रहे खोलिन के पाइ ॥७
टिप्पणी—(१) कँठलावा—गले लगाया ।
(२) पाथर—पाथर । ररा—चिरकाया ।

२४९
(३) संभाषी—शंकित हूँ ।
(५) ढाहे—नष्ट ।
२९९
(रीडिंग्स १३७)
रवान शुदने लोरक व चाँदा बशिताम
(तेज़ी से लोरक और चाँदा जाना)
चले दोउ सुइँ पाडैं न धरहीं। पेग बेग उताबर मरहीं ॥१
चला लोर मिलि चाँदा आई। खोलिन मैना बिसरी माई ॥२
चाँदहि देखि लोरकहि कहा। कैंसैं सो मिलत जो चित अहा ॥३
औ अस कहा मइँ तूँ लोरा। नीके मन चित करिहूँ मोरा ॥४
तोर सनेह छाड़ेउँ घर बारू। कै बोरहु कै लावहु पारू ॥५
साँझ परी दिन अँथवइ, लोरक चाँदा दोइ ।६
औघट घाट गाँग कै, रहे निरिउ तर सोइ ॥७
टिप्पणी—(५) बोरहु—डुबा दो।
(७) तर—नीचे।
३००-३०३
(अनुपलब्ध)
३०४
(रीडिंग्स १३५; मनेर १५३अ)
रसीदने लोरक व चाँदा बरे गंगा व इशारत कर्दने चाँदा मल्लाह रा
(लोरुक और चाँदा का गंगा के किनारे पहुँचना और चाँदा का
मल्लाह को संकेत करना)
गाँग सरिम भभासम करनों¹। सारफ जाइ लेव² एक छरनों ॥१
चाँदा फिर फिर³ आपु दरशारा। मदु गवट मोहि दरसत आपा ॥२
मँरगा टाँउ जो गवट आवा। फर फगन भाँदि झनकाया³ ॥३
गरर दरउ अगम्भे रहा। तिरिया एक अस्तरै⁴ अहा ॥४

२५
कहै नाउ बैठु' देखउँ आइ । फटन तिरी यह ईंहवाँ आई ॥५
सँरगा बेग पलावसि, खिन खिन फिरैहि सँकाइ'' ।६
काइ कहें कस पूँछँ', कइसे ईंहाँ आइ ॥७
पाठान्तर—मनेर प्रति—
शीर्षक—दास्तान नमूने चाँदा दस्ताने मल्लाह रा (मल्लाहको चाँदाका
हाय दिगराना)
१—गग खरित औरय करना । २—सोरफ गैन्द आइ । ३—फिर
फिर चाँदा । ४—सोइ बेगी महु केवट आवर । ५—सँरगा तौर
ओ केवट आवा । ६—चमैकावा । ७—केवट बैठ अचम्मो पा ।
८—अकेली । ९—से । १०—कौन नार कहँवा हुत आइ । ११—
सकार । १२—काइ कहीं केउँ पूँछउँ ।
३०५
( रीकेन्हम २३४ : मनेर १५२८ )
आशिक शुदने मल्लाह बज दीदने जमाले सूरते चाँदा
( चाँदाका सौन्दर्य देखकर मल्लाहका मुग्ध होना )
खेवट' देख बिमोहा रूप । अमरन बहुत' सुनारि सरूप ॥१
दई विधाता' पूजई आसा । जस सिरिया ओ आवइ पासा ॥२
खेवट कहा उतर दिस जाइ । बैसि सरगा नाउ रुधाइ ॥३
चाँदा नारि उतावर चली । खेवट कहा रात है भली ॥४
गई फोंद यहँ सोरफ रहा। खेवट सँरगा बैस एक अहा ॥५
गुन बाँधी यह खेवट, सँरगा फेरी आइ ।६
लेके पार उतारों सो धनि, नौलहि लोगहिं आइ ॥७
पाठान्तर—मनेर प्रतिमें इस कड़वककी केवल आरम्भिक तीन पंक्तियाँ हैं। शेष
पंक्तियाँ कड़वक ३०७ की हैं।
शीर्षक—दास्तान मुफ़तार शुदने केवट बज दीदने ऊ (उसे देख कर
मल्लाहका प्रेमासक्त होना)
१—केवट । २—बहुत । ३—तुम्हार । ४—कहा नाउ परबैतैं ब्यहु ।
५—लेंबर ।

९५१
टिप्पणी—(१) सँरगा—नाव ।
(७) ओऊहि—जब तक ।
३०६
( रीडेण्ड्स २१७प )
सबारी खुदने लोरक व चाँदा बर कश्ती
( लोरक व चाँदा नावमें बैठना )
माँझ गाँग हुत खेवट कहा । कउन नारि घर कइवाँ अहा ॥१
रैन कहाँ तुम्ह कीन्हि बसेरा । नदि नियर न देखेउँ गाँउ न खेरा ॥२
परहुँस मया चलेउँ रिसाई । भर एक रात गाँग हँ आई ॥३
मूँ महरी के जाति अकेली । साथ न कोऊ सखी सहेली ॥४
काह न कोउ मनावन आवा । जिंह घर आइ सो आठ न पावा ॥५
सास ननद मोर माखउँ, दीख न कुँबइँ पतार । ६
पिया सन मोर साइ बिरोधा, यहिं छाड़ेउँ घर पार ॥७
३०७
( रीडेन्ट्स २३४; मनेर १५२व )
गुजार खुदने लोरक व चाँदा अज आबे गाँग
( लोरक-चाँदाका गंगा पार करना )
चाँदहि खवट सों अस कहा । अभरन मोर बहि पारहिं अहा ॥१
मवर मँरगा साँध लै आवा । घालंतहिं लोरक माथ उचाया ॥२
दीन्हि तराइ खेवट बहे । दाइ जन चले न तीमर अहा ॥३
सार चाँद दाइ मँरगा चढ़े । एक फाठ के दोउ गढ़े' ॥४
गवर ठाइ अरवारहिं रहा' । फरिया लार आपु कइ गहा ॥५
अगों चाँद मयानी, पाछ लोरक पीर । ६
दपी मंयाग गाँग हर आयि, पूइत पारा तीर ॥७
पाठान्तर—मनेर प्रतिमें केवल अन्तिम चार पंक्तियाँ हैं । इनके साथ आरम्भकी तीन
पंक्तियाँ कड़कक ३०७ की हैं।

१५९
१—बाँद जर आइ सैरगहि भवे। २—अति सरूप सर में गये।
३—केवट उतर बकर पावहि गहा। ४—करथा (यह केवल गुप्तोंकी
भूल है। ५—आपुन। ६—आगे। ७—पाऊँ। ८—साँग तब ऊपर,
बूहल पावो।
३०८
(रीसेंग्स १३९ : मनेर १५३ख)
आमदने बामन बर किनारे गंगा व पुरसीदन मस्काह रा
(गंगाके किनारे आकर बामनका मस्काह से पूछना)
साँलहि पावन आइ तुलानों। पूछा केवट पिरम मुलानों ॥१
फेरी फेर मोर दुइ आये¹। इँह मारग तिहिँ देखी पाये² ॥२
सुन केषट मुख देखत हँसा³। कुँवर कुँवरी इक इँहवाँ बसा ॥३
पुरुख तुफ्रान तिरी दिखरावा। हाँ रंगराता तिहिकेँ⁴ आवा ॥४
नहिँ राजा नहिँ रानी जानी। कहुँ साथ तिहि जानु न पछानी ॥५
उहूँ नाव ले डाड़े लाये, ऊ फिर फेर न होइ ।६
बामन देख दौर धस लीन्हे, इहँ फिरैँ रोइ⁷ ॥७
पाठान्तर—मनेर प्रति—
शीर्षक—दास्तान आमदने बामन धीरे बाँद मे रसीदन (बाँदके पीछे
बामनका आ पहुँचना)।
१—फेरा फेरि मोरे दोइ। २—इहँ मारग हैं देती कोई। ३—सुनके
पवट मुख देख हँसा। ४—कुँवरि कुँवरा। ५—तिरिया। ६—रंगराची
तिहफै। ७—भल रसन्त बिचक्रसन सांड। उन गतरी पुरुप औ
जाइ॥ ८—उह देगु भैरगा ल्वाय तीपई उई न ओगी फेर। —
बामन दौरि ऊभ पल कीन्हें, बहुत गै तिह नेर॥
३०९
(रीसेंग्स २४ : मनेर १५३ख)
दर रग उफ़ादन बामन व कुम्हाते तरफ करन
(बामनका गंगामें कूदकर लोरकका पीछा करना)
धनुरु बान पावन मर पग। तारफ़ दरि गाँग महँ परा ॥१
जउतहि पारन पार न भयऊ। हालहि लार काम छ गयऊ¹ ॥२

२६३
साँस मार पायन तस धावा । मार बिपारतैं बान न पावा ॥३
बात' गोषार धरावइ गायी । अपने करी सो धाइ परायी ॥४
खेदै जेठैं पावइ पावइ खोजू' । इहँ परिहँस तो रही न रोजू ॥५
भै रे चलहिं यह धावइ, मिला कोस दस जाइ ।६
ऊँचा धिरिख सुहाबन एक हुत, लोरह लीन्हों आइ' ॥७
पाठान्तर—मनेर प्रति—
शीर्षक—दास्तान हुम्बाक्य पौदा व लोरक दवीदने बावन (बावनका
पाँव और लोरकका पीछा करना)
१—कर । २—करक । ३—तोग्हि लोरक कोस दोइ गयऊ । ४—
गाइ । ५—आसन (?) । ६—बाठ बठ पाउ न पावइ गाजू । ७—
रहें परिहँस रहे न रोजू । ८—यह र चले। ९—ऊँचा धेय सुहावन,
लोरक लीन्हों आइ ।
३१०
(अनुपलब्ध)
३११
(रीड्स २४१ : मनेर १५४अ )
खबर कर्दने पौदा बावन भी आमद व आमदने बावन
(पौदका बावनके आनेकी सूचना देना और बावनका आ पहुँचना )
चाँदइ देखा पावन आवा । बचन न आवइ धाफे पावा' ॥१
बावन आइ बाघ जस घेरा । फिरि जो चाँदहूँ पाछों हेरा' ॥२
मुख फिराइ लोर सों कहा । अब देखहु पायन आवत अहा' । ३
धनुक चढ़ाइ बान कर गहा । तस मारौं जस देह न रहा ॥४
भाषत हुतं' बावन सर मेला । सो सर लोरक' ओडन टला ॥५
आठन फुटि लिहावट फुटा, अउ लोरक ग पाँह ।६
पग पिरिख भम्प कर, लोरक भाऊ भा तिह छाँह ॥७
पाठान्तर—मनेर प्रति—
शीर्षक—दास्तान सभीदने पौद अज आमदने बावन (बावनका आना
देख पौदका भयभीत होना) ।

२६४
इस प्रतिमें पंक्तियों ५ और ३ क्रमशः ३ ओर २ हैं और पंक्ति २ के पद
पीछे-आगे हैं।
१-आबइ डाँत कपाय। । २-पाछेँ फिरि ब्वो लोरक हेरा। बावन मार
वाफ (वाप) कस फेरा। ३-मुँह फिराइ लोर सँत कहा। बह देखु बावन
आवत बाहा। ४--बाकन। ५-आअत आवत। ६-ब्वोह लोरक।
७-ओ लोरक बाँह। ८-ऊँचा बिरिल मुहाजन लोरक रीनाहि छाँह।
टिप्पणी-(१) पाछा-देर।
(२) बाछें-पीछे। हेरा-देखा।
(५) आपठ हुतें-भात ही आते आते। ओहन-डाक। देखा-पीठ
हटाया।
(६) बाँह-बाप।
(७) अम्ब-आम। आउ-आवर। भा-(भूतकालिक क्रिया) हुआ।
३१२
(रीडिंग्स २७९। मनेर १५७ब )
गुफ्तने चाँदा बर बावन रा
(बावनसे चाँदा कहना)
पावन कहि गौं चाँद कुंवारी। काइ लागि तुम्ह कीन्हि गुहारी ॥१
माइ बाप जो दीन्हि बियाही। बरस देबस हौं तुम्ह पहिं आही' ॥२
पिरम कहा न कीन्हि न बाता। तुहँ न देखउँ फार कि राता ॥३
सुपन गुनौँ हुत तुम्हारा नाऊँ। तरसि सुपउँ पै सेज न पायऊँ ॥४
जस आपठँ तस मके गयउँ। दयी क लिखा सो मैं पयेउँ' ॥५
बहुरि जाहु घर अपने, बावन मंग सभ मोर ।६
राउ रूपचन्द बाँठा मारा, आइ मो कइँ लार' ॥७
पाठान्तर-मनेर प्रति-
शीर्षक-दास्तान हुम्बार्य चाँद ब लोरक दरीदने बावन ब गुफ्तने
चाँदा बावन रा बेहुजुरी लोरक (चाँदाका चाँद और लोरकका पौम
करना और चांदका बावनसे लोरककी प्रशंसा करना)।
इस प्रति में पंक्ति ३ और ४ क्रमश ४ और ३ हैं।
१- बावन सन कहि । २-मुँ कहसि। ३-बरस दवस तुम्हरी आही।
४-पिरम कहा नह कही ना बाता। दिह न देख कार कि राता। -

तुम्हारे । ६—उपत । ७—अस देखिउँ अस मैंक आपतँ । दपीका
ढिला हुत सो पायतं ॥ ८—बावन कहाँ सुनहु तूं मोर । ९—मने
सो कुंकुद मोर ॥
टिप्पणी—(१) काइ लागि—किस लिए । कीन्हि—किया ।
(२) पहिं—पास । आही—थी ।
(३) पिरम—प्रेम । कार—काल । राता—रक्त यहाँ तात्पर्य गारेसे है ।
३१३
( रोलैण्ड्स २७३ ; मनेर १५५अ )
जवाब दादने बावन चौंदा व अन्दाख्तन तीरे दुअममुरु
( बावनका चाँदेको उत्तर देना और दूसरा तीर छोड़ना )
अहि¹ पापिन तिहिका मारों । नाक काटि कै² देस निसारौं ॥१
तिहि अस तिरि गोवरौं³ घसि लेई । पात फइस अस ऊतर देई ॥२
कस लोरक⁴ सेतें मोहि डरावई⁵ । तू बड़बोल जान जो पावइ ॥३
तिहि लग लोरक जी गँवाइह । भेंट मई अब जान न पाइह ॥४
पुरुष मार ओडन मदिं¹¹ फोरउँ । काटउँ मूँड़ भुजादण्ड तोरउँ ॥५
अस सुन लोरक (सिंघ) कोपा, ओडन ढाँढ सँभार¹² ॥६
बावन एक फॉक सर छोड़ा, गयउ भिरिख सो फार ¹³ ॥७
पाठान्तर—मनेर प्रति—
शीर्षक—दास्तान जवाब गुफ्तने बावन बा चाँदा (चाँदको बावनका उत्तर) ।
१—अरी । २—तिहि । ३—गावा ('र' लिखनेसे छूट गया प्रतीत होता है) । ४—अन । —शेर । ५—डरपावति । ७—तू पै बाल आइ जन पावति । ८—गँवावा । ९—भइ भट । १०—पावा । ११— सँठ । १२—अस सुनि लोरक सिंघ अस गावा कर ओन्न सँभार । १३—बावन एन चाहि सर छोड़ा अगराई तीर सभार ॥
मूलपाठ—(१) सिग ।
टिप्पणी—(१) तिहि—तुझको । निसारौं—निकालूँ ।
(३) बड़बोल—लम्बी लम्बी बातें करनेवाली; बातूनी ।

२५६
(५) चोरेउँ—पोहेँ। काढेउँ—काढ़ेँ। मूँड—सिर मुष्ठरण—
मुण्डण्ड । तोरेउँ—तोड़ेँ ।
(७) फाँक—मुकीला (देखिये टिप्पणी ११९।५) ।
३१४
( रीकॅण्ड्स २४४ : मनेर १५७ब )
फह्मादने पाबा लोरक रा व अन्दाख्तने बाबन तीरे सुवम
(चाँदका लोरकको सचेत करना और बाबनका तीसरा तीर छोड़ना )
चाँद कहा अब देउर लीजइ । गाड़े आँखद ढील न दीजइ ॥१¹
दू सर गये रहा अब एकउ । लोर² पीर कँसौ के टेकउ ॥२
सर मेठसि कस निभर नँ आवइ । जो आवइ तो जीव गँवावइ ॥३
आइ देउल महँ सोर सँभारा । नाँघसि बान उठा झनकारा ॥४
बाबन बान छूटा आइ⁸ । मारसि देउर गयउ उड़ाइ ॥५
पर बाबन कर भागा, चाँद कहा विचार ।६
बँधवा सुरुज बहुरि परगासा, आनइ सम ससार⁹ ॥७
पाठान्तर—मनेर प्रति—
शीर्षक—दास्तान चाँद गुफ्तने पनाह देवर पैकर आए लोरक (चाँदका
लोरकको देवरका सहारा लेनेको कहना)
१—दी० अधीजइ । २—दोइ । ३—मीरक । ४—बह हर दे० पुनि
निपर न भावइ । ५—नाचे अधउर जो बान रुषारु । गरया देउर
उड़ा झनकारू ॥ ६—बाबन तबही धनुष बजार । ७—कर महा चार ।
८—विधार बिचार । —अधवा मुत्र सुरुज परगासा । ९ —सतार ।
टिप्पणी—(१) देउर —देवर, मन्दिर । गाड़ —कठिन । आँखइ—समय ।
( ) कँसौ—किसी प्रकार ।
(३) निबर—निकट । नैं—नही ।
(४) देउल—देवल, मन्दिर ।

२७७
३१५
( मनेर १५६प । रीकैण्ड्स २७५ )
दास्तान गुफ़्तने बामन बेगेरुक खुद रा
( बामनका स्वागत-कथन )
बावन कहा बाच हौं मोरी । तोर पुरुप यह तिरिया तोरी ॥१
लोग कुटुम्ब महँ कहियतौँ जाई । मैं तिहि दीन्हों गाँग बहाई ॥२
लोरक चाँद बहुर घर जाइ । धोबी पाछैँ लिखीं पुराइ ॥३
देवर माँझ लोर सर कादा । श्रौ दुनु मौन हुत ठाढा ॥४
तइ चाँदहि आगै ह्वै चला । लोरक वीर पाछ मा भला ॥५
चाँद कहा सो मूरख, जो अइसहिँ पतियाइ ।६
जाकर लीजइ यार मियाही, सो काहे कर पहुनाइ ॥७
पाठान्तर—रीलैण्ड्स प्रति—
शीर्षक—गुफ़्तने बामन लोरक रा पाव उपतादन दर राह तीर राखी
(तीनों तीर राखी जानेक बाद बामनरा लोरकस कहना) इस प्रतिम
पङ्क्तियोंका क्रम ४ ७ १ २ ३ है ।
१- यह । २- लोर बीर यह तिरिया तोरी । ३- लोग कुटुम्प हीं आँगी
जाउ । ४-लोरफ बहुरि घर अपने चा० । ५- नौनी । ६-लिखी ।
७-ओडन फूट (?) बैठ हुत टाढा । ८-लोर । ९-चाँद कहा
सुनु बारी लोरक अहत बहुरि को जाइ । १०-जिहर यार बियाही लीजै,
तिह बरूसे पतियाइ ।
टिप्पणी—( ) बाच—वचन ।
(२) दीन्ह—दिया । गाँग—गङ्गा ।
(३) धोबी—सम्भवतः यह अपपाठ है । रीलेण्ड्सका पाठ 'नौनी ठीक
जान पडता है । नौनी (नवनी)—नवेली युवती । पाछै—पीछा के
कारण ।
(४) इस पक्तिके उत्तर पदका पाठ दोनों ही प्रतियोंमें समुचित रूपमें पढ़ा
नहीं गया ।
(६) अइसहिँ—इसी प्रकार, बिना सोच समझे । पतियाइ—विश्वास कर ।
१०

२५८
३१६
(रीडिंग्स २४६। मनेर १५६अ)
अनदास्तने बाबन कमान व अफसोस कदन
(बावनका धनुष फेंककर खेद प्रकट करना)
बावन धनुफ सो दीन्ह उडारी¹। बारह बरीख बसी में नारी ॥१
इम³ माना धनुकाहि⁴ सिधि पाई। बान भरोसे जोइ गँवाई ॥२
धस लैं हौं गाँग परउँ⁵। बूडि मरउँ कै फूँकर म परउँ ॥३
अब हूँ धनुफ हाथ कस करउँ⁷। परु कंठसाय कुतारा परउँ ॥४
पर यहँ आँखि न देखत आई। लहगा सुरुझ चाँद भुलाई' ॥५
जो यह मोरी बार दियाही, माइ दीन्ह अउ बाप'' ।६
राज करो जप लोरक, चाँदहि खाइइ साँप'' ॥७
पाठान्तर—मनेर प्रति—
शीर्षक—दास्तान अन्दाख्तने बाबन तीरो कमाने खुदरा बर ज़मीं जद
(बावनका धनुष-बाण भूमिपर फेंक देना)।
इस प्रतिमे पंक्तियाँ ३, ४, ५ क्रमशः ५, ३, ४ हैं।
१—जो दीन्ह उठारी। २—मै। ३—धनुष। ४—बान भरोसे तियै।
५—के धँस कें गंग महँ परउँ। ६—बूड़त मरउँ निकरि मन् मरउँ।
७—बरु कंठ मार कुठारी मरउँ। ८—पर यह रोख न देखउँ काई।
९—लेइगा लोरक चाँद पराही। १०—मोर। ११—लेगा करियो
जरिया साँप। १२—लोर फिर एक सुरझा दिया भौरउ परा रून्धाथ।
टिप्पणी—(१) बरीख—वर्ष।
(२) जोइ—स्त्री पत्नी।
३१७
(रीडिंग्स २४७)
बाज गुफ्तन बावन व गुजारात कर्दने लोरक व चाँदा बा विदा (१)
(बावनका लौटना लोरक और चाँदासे विदा (?) की भेंट)
बावन फिरि गोबर दिसि गये। लोर चाँद दोइ आगेँ भये ॥१
गइ करंका विदा दानी। माँग दान अहस अग न जानी ॥२

२५९
पान दिखावहि लीन्ह न सोई। पुरुख माँग के माँगी जोई ॥३
अस दान जग काऊ न लिया। कहि तइस जो काठ न दिया ॥४
देस देसन्तर मानुस जाइ। महरी अस बाप औ माई ॥५
ठौर ठौर जो मनुसें इहँ महँ, एक एक लेहिं ।६
घर महँ लोग सूखें मरहिं, बाहर पाठ न देंहि ॥७
३१८
( मनेर १५०ख )
दास्तान रवान शुदने बावन तरफ़े खानये खुद
( बावनका अपने घर लौटना )
भपर आइ राइ गुहरावा। कउतुक एक घोर दिखरावा ॥१
तिरिया एक ओ दधी उछारी। सरग हुतें जनु आछरि आई ॥२
इसी तिरिया कितहूँ नहि देखेउँ। चाँद तरायीं एक न लेखेउँ ॥३
पुरुख एक अहें जहि पासा। देखत दुहु कहूँ गयी भुर सासाँ ॥
और पिटार सब सोने भरा। अइस न जानउँ किह कँह धरा ॥५
चलहु राउ वहि मारि के, सूछे अबरइ जाइ ।६
घरहिं माझ होइ उजिआरा, अस तिरिया जो आइ ॥७
टिप्पणी—कडवकका शीर्षक विषयसे से सम्बन्ध नहीं रखता। ऐसा बान पड़ता है
कि लिपिक उससे सम्बद्ध कडवक लिखना छोड़ गया है।
३१९
( मनेर १५०ख )
दास्तान बाज गुश्तेन शुदन व आमदने राज गँगेव बर लोरक
( राज गँगेवका तैयार होकर लोरकके पास आना )
पहिल लोरक राइ घर आवा। फिर गँगेउ गइ होइ आवा ॥१
चाँद लेउँ ताहि सरग चलावउँ। सरग तरायीं माँझ यमावउँ ॥२
कहा सार तुम्ह खाँड मँभारहु। मुहि मेंड गँगेउ तुम्ह न पागुहु ॥३
एक खाँड लरिक तम लावा। फिर फाट तावर महँ आवा ॥४

५६
पाप पाप के आप उबारसि । मिल माइ कै पैं जिउ हारसि ॥५
कहसि घेर तोर हा, होइ हीँ अगसर के मुँह लाग ।६
कहा छोर सेटौं सेवक, गँगोट अइस बोल कहि भाग ॥७
टिप्पणी—(१) घर भाषा—'गुहरावा अथवा फिरावा पाठ भी सम्भव है। इस
प्रसंग स्पष्ट न होनेसे पाठका निश्चय करना सम्भव नहीं है।
३२०
(रीडिंग्स २४८ : बम्बई २७ )
तंग करने लोरक का कोतवाल व विद्यारानी
( लोरकका कोतवाल और विद्यारानीसे युद्ध )
तीनहुँ हाँक फिरा कोतवारा । पोलत बोलि माँछ सँदि मारा ॥१
देखि मकेरी' चितैहि न लागहिं । दुँहु मेह अनै लै चाहहिं ॥२
देहि दान औ बिनति कराहीं । कहा चलहु राजा पहँ वाहीं ॥३
कहा न सुनैं औ दान न लीन्हें । बात कहत अनउत्तर दीन्हें ॥४
लोरक चाँदहि अस मत कहई' । अस मनुखै कै बैरी मई' ॥५
लोरक खड़ग हथवासा, चाँदे धनुख चढ़ाइ ।१०
छोट जन सबही मारे, जान न कोऊ पाइ' ॥७
पाठान्तर—बम्बई प्रति—
शी र्तक—नशिश्तने जकबारियान दरमियाने राह अज्याने चाँदा व लोरक
(चाँदा और लोरकके मध्यमें दानियोंका बैठना ) !
१—बैठ दानी औ कतवारा । २—मजु । ३—अकेल । ४—जावा ।
—दानु मह एक पै रह धावा । ६—दान देहि औ बिनय कराहीं ।
७—कह । ८—छोहन । ९—अल वाहत । १०—लोर चाँदा दुहुन
कहि मई । ११—अस बिनती कहि औ इट गई । १२—लोर बीर
हथवासा काढ़न चाँदा धनुख चढ़ाउ । १३—छोर जन सबै सँहारे,
जान न कोऊ पाउ ॥
३२१
(अनुपलब्ध)