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चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary

मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा

DevanagariAwadhipublished520 पृष्ठ

२ २
४०
( रीकैण्ड्स ९ )
बाज नमूदने खुपारदार पैगामे-बावन व कबूल कर्द्ने महर व दहानीदने नेग
(ब्राह्मणके बावनका सन्देश कहनेके पश्चात् महरका उसे स्वीकार करना
नेग दिलाना )
बाँभन टीक बोल कै पहू । बरठ चाँद रहु मोर बढ़ाई ॥१
तूँ नरिन्द देस कइ राऊ । तोफइँ बरहि न आवइ फाऊ ॥२
रास गुनित फर नाँवँ न छीजा । राइ बीव घर बेटी दीजा ॥३
दयी लाग काज जो करा । ताकर धरम दुहूँ जग घरा ॥४
बाँभन बोल महर जो मानाँ । गोष क बनिज दिवाई पाना ॥५
सेंदुर फुछ चढ़ाये, भी मोविह गलबार ।६
देत चाँदा बावन कइँ, बीर लाउ फरतार ॥७
४१
( रीकैण्ड्स ११ )
बाज गप्तन खुपारदार व हम्माम व बाज गुफ्तन बैसियत निकाह वर जीव
(ब्राह्मण और नाईका आपस आउर जीवसे सगाईकी बात कहना )
तेल फुलेल दुवठ अन्हवाये । अपूरुव वस्त्र काढ़ि पहिराये ॥१
महर मंदिर जेइहिं सेवनारा । छीन्हि पान मये असबारा ॥२
दसी असीस फिरामी बागा । रहस भले बोल भल लागा ॥३
जानि सीव घर देस बघाइ । घरी चाँद बावन कइँ पाई ॥४
पह भयी निसि अँधियार बिहावा । करहु बियाह चाँद घर जावा ॥५
जीव सुठाम सांग कहुँप, जिन सुनइ एक सस आइ ।६
महर दत बावन कइँ चाँदा, पलहु पियाहिं आइ ॥७
टिप्पणी—अन्हवाये—स्नान कराया।

१०१
४२
( रौकन्दुम १२ )
रधौ बर्दन जीत बरात निकार कर बर्दन घर खाने रपि महर
( विवाहके निमित्त रपि महरके घर जीतका दारात खाना करना )
मार सहम दोइ लादू लावहूँ । घाँघर पापर बहुतै पकावहिं ॥१
कीन्ह खिरौरा औ केसारा । फल कंडोर भये अमेभारा ॥२
चीर पनेर पराठी माँगा । टाँका लास सो अभरन लागा ॥३
हाँडी अमी नव इक घली । एक एक वाह सो एक एक पहली ॥४
सात आठ मे घोर पिलाने । भये असवार राइ औ राने ॥५
जस वसन्त रितु टसू फूलें, जिह अस देसी रात ।६
भाट फलावत बहुरिया, तस होई चली बरात ॥७
टिप्पणी-(१) खिरौरा-इसका उल्लेख जायसीने भी किया है (पद्मावत ५८९।२);
ग्रियर्सनके अनुसार चाँवलके आटेसे गर्म पानीमें बनाय हुए
लट्टू (बिहार पेजेंट लाइफ पृ १४०) । केसारा-सम्भवतः
कसार, आटा भून कर शकर मिलाकर बनाया हुआ मण्डू । यह
पूर्वी उत्तर प्रदेशमे विवाहके अवसरपर विशेष रूपसे बनाया
जाता है। कंडोर-सम्भवतः गुड़ पाट कंडोर होगा । इसका
तात्पर्य मिठाईसे होगा ।
(३) टाँका-टका; दिल्ली सुल्तानोंके समयमें प्रचलित चाँदीका सिक्का
जिसका वजन १६८ १७ ग्रेन था ।
(५) पिलाने-पोस हाथी ।
(७) फलावत-गायक । बहुरिया-नर्तकी ।
४३
( रौकन्दुम १३ )
निपन्दीन्ह जीत रा हर जाने ब यादन निकार कियान पान्त्र क च दा
( जीतका स्वागत और बाचन चाँदका विचार )
उठी महर यनसार गँवारी । आन परान महो दैगारी ॥१
दीपर नल पनेर दिसाइ । सुरुभी एक पग निद राइ ॥२

१४
दिया सहस चहुँ दिसि धारा। घर बाहर सब भा उजियारा ॥३
भयी जेवनार फिर आये पानों। बेद भनहिं भौमन परभानों ॥४
मानुस बहुत सो देखत रहा। कोउ कहे रात देबस कोइ कहा ॥५
लाये धरन्हि पावन कँह, चाँदा आरति दीन्ह उतार। ६
आत सराफत देखेउ नाहीं, बेटवा भाँमर भार ॥७
टिप्पणी—(१) छाँपर—छया हुआ। नेत (सं० नेत्र)—इसका उल्लेख बाणभट्ट और
उसके पश्चात् के प्राचीन और मध्यकालीन साहित्य में प्रायः मिलता
है। क्षीरस्वामी के कथनानुसार यह व्यंगदुक था। अन्यत्र उसे सूक्ष्म
रेशमीवस्त्र (सूक्ष्मपट्टसूत्रवारचना) बताया गया है। नेत्र का अर्थ
मटा हुआ भी होता है। यह इस बात का संकेत करता है कि यह
बंटे सूत का बनता रहा होगा। ऐसा जान पड़ता है कि यह वस्त्र
पहनने के काम में कम बाहरी काम के लिए ही अधिक प्रयुक्त होता
था यहाँ इसके फर्श पर बिछाने जाने का उल्लेख है। धनपाल
(१०१९ ई०) ने अपनी तिलकमंजरी में इसके बने वितान का उल्लेख
किया है (पृ० ९१)। किन्तु उत्तम कोटि नेत्र का उपयोग परिधान में
भी होता था ऐसा नल-चम्पू (आरम्भिक ९ वीं शती) से ज्ञान
पड़ता है (पृ० २१८)। पछोर—देखिने पीछे १२।७।
(७) भाँमर—फाना शोरयुक्त नेत। बार—बाल अस्तव्यस्त।
४५
(रीडिंग्स १७)
निरत दहेज चाँदा सोयर
(दहेज का बयान)
गाँव बीस भठ सामंजि पाये। फीनस एक हरष भरि आये ॥१
घोर पचास आन कै ठाढ़े। टंकण लाख दूज ते बाँधे ॥२
घरी चंर सहस एक पावा। गाइ मस नहिं गिनत बतावा ॥३
कापर सात पवन सों फाहा। हीरा मोति लागि सिंह आहा ॥४
सज मार कर नाँउ न जानीं। फर्सों सेज अस फह फरानीं ॥५
पाडर, कनक, खाँड घिउ, लान, तेल बिस्तार। ६
लाद टाँड़ सुरुतापा, बरद भये असँभार ॥७

१५
टिप्पणी—(१) उत्तर पदका मैस एक वरब बहिराये पाठ भी सम्भव है।
किन्तु तीसरे यमकको देखते हुए मैस पाठ यहाँ सम्भव नहीं है।
अरबकी अपेक्षा वरब मूल शे'रके अधिक निकट है।
(५) सौर—ओढ़ना-बिछौना। दिल्ली मेरठकी बोलीम सौरका अर्थ
रुइ भरी रज़ाइ है जो ओढनेके काम आती है। चित्रावली
(२१९।७) से ज्ञात होता है कि रुइ भरे हुआ बिछानेके गद्देको
सौर कहते हैं (सौरि माँह बिन बिनठर टोवा। फुस साँचरि सो
कैसें धोवा ॥) जायसीने भी इसका कई स्थानोंपर उल्लेख किया
है (१३९।२, ३३५।४ ३३६।६, १४ ।२) पर उन्होंने सौर-सुपेती
युग्म का प्रयोग किया है और उसका तात्पर्य कहीं ओढने और कहीं
बिछौनेसे है (देखिये—वासुदेवशरण अग्रवाल, पदमावत ३३६।४
टिप्पणी)।
(६) चाउर—चावल। कनक—आटा। खाँड—शक्कर, चीनी। घिउ—
घी। लोन—लवण नमक। बिसवार—मसाला।
(७) राँध—सामग्री। सुकराना—शुकराना दहेजम प्राप्त वस्तुएँ।
४५
(रैडिंग्क्स ३५)
बुशायददुम साले शुदन निकाह चाँदा ब बामन व नज़दीक नेशामद ने बामन
(चाँदा-बामनके विवाहके बारह साल बाद, बामनका
चाँदाके पास न आना)
बरख दुआदस भयउ बियाहू । चाँदा सरै सोफ जस नाहू ॥१
उनत जोबन भइ चाँदा रानी । नाँहछोट औ अँखियी फनी ॥२
जाफहिं पिउइर बोलँ लोगू । सो पै चाँद न दीन्हों मोगू ॥३
हाथ पाठ मुख धरम न धोवा। औ तिह ऊपर संग न सोवा ॥४
दह्या फौन मैं कीन्हि पुराई । सरै कचोरें थूकेउ आई ॥५
रात दिवस मन झुरनइ, ऊपह सास फेरोई ।६
चाँद धौराहर ऊपर, बामन धरती सोइ ॥७
टिप्पणी—(१) दुआदस—द्वादश बारह। नाहू—नाथ।
(२) उनत—उन्नत उभरा हुआ। नाँह—पति।
(५) कचोरे—कटोरा।
⁀

१६
(९) हरबर—(सं रम) उत्सुकता या भावावेश हर्ज चिन्तित रहती
है। बेरीह—दुखती है काँपती रहती है।
४६
(रौकन्दस ५१)
गिरिया व जारी कर्दन् चाँदा अज दूर मानदने साजन व शुनीन्दने ननद
चाँदाका विरह-विलाप, ननद का सुनना)
बरस दिवस भा चाँदु बिपाँहै। घर न देखी आछी छाँईं ॥१
पतियाैंती निसि सेज हुड़ेली। सो धनि कैसे जिये अकेली ॥२
भावन फाठ पूछि नहिं माता। हाँ रे न सीयउँ फार फराता ॥३
एको साध न हियें पुजानी। मुयो पियासन नॉकलहि पानी ॥४
यहि घिरहँ उठि जैकें जाऊँ। जैसों राँड़ सुहागिन नाऊँ ॥५
ननद मात सब सुन के, कही महरि सो जाइ। ६
दीदी जाय मनावहु, चाँदा [रजलस*] खाइ ॥७
टिप्पणी—(२) हुड़ेली—होके हाय।
(७) दीदी—माँ। यह प्रयोग असाधारण है। पिताके लिए दादा सम्बो-
धन लोकमें प्रचलित है। सम्भव है उसीके अनुकरणपर माँको
दीदी कहा जाता रहा हो। पर अब इसका प्रयोग बड़ी बहनके
लिए होता है। दाउदने अन्यत्र (१९९।१) सासके लिए भी बहुसे
यही सम्बोधन कराया है।
४७
(रौकन्दस २)
आम्दने महूम व तफ़हीम कर्दन् चाँदा रा
(सासका आकर चाँदाको समझाना)
सुनिके महरि चाँद पहँ आयी। काहे बहु रजलस खायी ॥१
दूध दाँत तू बिटिया बारी। तूँ का जानसि पुरुख बड़ोरी ॥२
तूँ अचत पुरुख का जानसि। बिन पानी सातू कस सानसि ॥३

१७
सोन रूप भल (अमरन) आई । दिन-दिन पहिरहु चीर धोआई ॥४
जौँलहि भाषन होइ सँओगा । पान फूल रस फरिदै भोगा ॥५
ओ तुम्ह रापि महर के बेटी, अजहुँ हूर न लआइ ।६
ताथ दूध अनटहु, रहि चाँदा पीय मिलाइ ॥७
मूल पाठ—४ म० फिर पहिर म भल फिर-फिर आइ है। पर इनमें से कोई भी
प्रसंग संगत पाठ नहीं है । हमारी समझमे मूल पाठ अमरन रहा
होगा । जान पडता है लिपिक आरम्भका अधिक और अन्तका भून
लिखना भूल और बीजके भरको दो बार लिख गया है ।
टिप्पणी—(१) साटू—सत्तू भुने हुए चने, जौ, मटर आदि का मिश्रित आटा
जिसे पानीमें घोल अथवा सान कर नमक अथवा शकर मिला कर
खाया जाता है । यह पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहारके लोक-जीवन
में बहु प्रचलित भोजन है ।
(६) हूर—हुड़ ।
(७) ताथ—गर्म ।
४८
(रौकंग्धूम २८)
जवाब दादने चाँदा बर ससुअ रा
(चाँदाका सासको उत्तर )
तुम्ह हूँ सास अतहिँ गँवानी । राखहु दूध पियायहु पानी ॥१
दही न देइ खाँउ जिहँ लाइ । महरँ कै हौँ परी अदाइ ॥२
सोन रूप का हमरे नाहीं । अनौँ सइज जेउनारहि खाहीं ॥३
तुम्हरे घी जो सीरै थाहा । पीठ न पूँछत पोलहु फाहा ॥४
अबलहि पैँ हुर आपन घरा । काम लुपुध बिरहूँ धन जरा ॥५
निसि अँधियार नीर घन, पीज लबइ सुँइ लागि ।६
सेज अकेलि फाटि मोरि हिरदै, ओ जो देउतँ जागि ॥७

१६
(६) झुरइ—(तु स्मृ धातुका प्रा भाषावेध रूपं चिन्तित घटती
है। फेरोइ—कुरेदती है, काँचती रहती है।
४६
(रौंडंग्हस २६)
गिरिया व जारी कर्दून चौंदा अज तूर मानदने बावन व सुनीन्दने नन्द
चाँदाका विरह-विलाप; ननद का सुनना )
बरस देबस भा चाँद पियाहूँ। घर न देखी आछी छाँहूँ ॥१
पतिमाँती निसि सेझ दुहेली। सो धनि कैसे जिये अकेली ॥२
पावन काठ पूछि नहिं पाता। हाँ रे न खीमठ कार क राता ॥३
एको साथ न हियें मुझानी। मुयों पियासन नँकलहि पानी ॥४
यहि बिरहँ उठि मैके जाऊँ। तैंसों राँड़ सुहागिन नाऊँ ॥५
ननद् बात सब सुन के, कही महरि सों जाइ ।६
दीदी आय मनाबहु, चाँदा [रजलस*] खाइ ॥७
टिप्पणी—(२) दुहेली—शोक-ताप।
(७) दीदी—माँ। यह प्रयोग असाधारण है। पिताके लिए बाबा शब्द
जन लोकमें प्रचलित है। सम्भव है उसीके अनुकरणपर माँको
दीदी कहा जाता रहा हो। पर अब इसका प्रयोग बड़ी बहनके
लिए होता है। साठचने अन्यत्र (११९।१) सासके लिए भी बहूने
यही सम्बोधन कराया है।
४७
(रौंडंग्हस २ )
आमदने महरि ब तसलीम कइन चौंदा रा
(सासका आकर चाँदाको समझाना )
सुनि के महरि चाँद पहँ आयी। कहइ बहु रखलम राखी ॥१
दूध दाँत तूँ बियिया बारी। तूँ का जानसि पुरुख बहौरी ॥२
तूँ अचत पुरुउ का जानसि। बिन पानी सातू कस सानसि ॥३

जस मँछरी देखी बिनु पानी । (तरपत) महरैं रैन बिहानी ॥२
भानु सँझान न कीस पयारू । फँस आइ सो चाँद दुलारू ॥३
देत सुखासन चले कहारा । नावी पूत भये असवारा ॥४
घानुक पाँयक आगे पैंठे । जीत महर के पाखर केते ॥५
काढ़ि चाँद बैसार सुखासन, तुरत बेग लै आइ ।६
परनी होइ महर गँ, चूँब घाँट के पाइ ॥७
मूलपाठ—२-पिहंत ।
टिप्पणी—(१) मैं—दावाग्नि ।
(३) भानु—सूर्य । सँझान—अस्त हुए । कीस—किया । पयारू—व्यालू,
रात्रिका भोजन ।
(४) सुखासन—पालकी ।
५२
( रीकमदस ३२ )
आमदने चाँदा दर खानये मादर व पिदर व रसीदन सहासियान चाँदा रा
( चाँदाका मैके आना और सखियोंस भेंट )
हैंरैं मरद चाँद अन्हवाए । सेंदुरी चीर काढ़ि पहराए ॥१
माँग चीर सिर मेंदुर (पूरी) । जानहु चाँद पर आँवरी ॥२
सखी सहेलिन देखन आईं । हँस हँस चाँद पहिरि फैलाई ॥३
सेन पिरम रस बनिज सुहागू । पिरत पियार सुगति फल मागू ॥४
अध पैठि दरअहुँ जिंह पासा । कहँहु चाँद कम कीन्ह पिआसा ॥५
चाँद सहेलिन पूँछि रस, धीरहरों राइ ।६
सीत आह जिनु मरु, कहु फँम रैन बिहाइ ॥७
मूलपाठ—१-पृग ।
टिप्पणी—(२) मेंदुर पूरी—माँगमें सदूर भरनेका जिसे अनूप पूरना कहती है ।
५३
( रीकमदस ३३ )
जबाब दादन चाँदा बा सहस्त्याने खुद बहार माह जमीता
( चाँदाका सहेलियोंका उत्तर—जाड़ेके बार आपसका कथन )
जस तुम्ह पूछहु तस हों कहा । सुर कै कान रजाती अहा ॥१

१८
४९
( रीकैण्ड्स २१ )
गुफ़्तम फ़रने पहूम बर चाँदा दर ब रवा दादन बराब महर रफ्तन
( सासका चाँदेसे क्रुद्ध होकर महरके घर चले जानेको कहना )
तोरे आघ में तहिया जानी । बात कहत तूँ मुँहि न छजानी ॥१
तोकों काही कीन्ह पसेऊ । बिन दहि मथें कै निसरे घीऊ ॥२
बाबन मोर दूध कर पोवा । निस दिन भावन तों संग सोवा ॥३
तूँ अचरैत न देखसि काहू । बिन धहि कस नघइ गयाहू ॥४
सौखहि भावन होइ सयाना । और पियाहि के है तो आना ॥५
जो तँ जेहसि मैकेँ, अमेँ पठै सन्देस ।६
कहाँ कर तूँ झाँगर बिटिया, आरों सोइ देस ॥७
५०
( रीकैण्ड्स ५ )
तस्वीदने चाँदा कुश्रादार रा ब फिरिस्तादने तुष्यारी बर स्तिर
( चाँदाका ब्राह्मणको बुलाकर पिताके पास अपना कष्ट कहलाना)
चाँदहि गरुर भयउ घरबारू । चेरी बाँभन आइ हँकारू ॥१
आइ सो बाँभन दीन्ह असीसा । चन्द्र बदन मुख फेँफर दीसा ॥२
परहँसि कहि संदेस पठावा । बोल थाक हियँ पघरावा ॥३
नैन सीप जस मोतिहँ भरे । रोयसि चाँद आँसु जस ढरे ॥४
धोली चीर भीज गा पानी । जनु अभरन सों गांग नहानी ॥५
बाँभन कहुतु महर सों, मोरै दुख कै बात ।६
भाउ कहार सुखासन, बेगि पठउ परभात ॥७
५१
( रीकैण्ड्स २१ )
बाज नमूदने ब्रॉहमन बर महर आयनीदने महर चाँदा रा ब बाछन बर खान
( ब्राह्मणका महरसे सन्देश कहना और महरका चाँदाको अपने घर बुलाना )
बाँभन जाइ महर सों कहा । हियें लाग हीं जरतईं रहा ॥१

११
बस मँछरी देखी बिनु पानी । (तरपत) महरैं रैन बिहानी ॥२
मानु सँझान न कीत बयारू । फैँसँ आइ सो चाँद दुलारू ॥३
देत सुखासन चले फहारा । नाती पूत भये असवारा ॥४
घानुक पाँयक आगे पैठे । जीस महर के पाखर फेते ॥५
फाड़ि चाँद बैसार सुखासन, तुरत बेग लै आइ ।६
बरनी होइ महर गँ, चूँय चाँद के पाइ ॥७
मूलपाठ—२-बिठव ।
टिप्पणी—(१) बी—दावाग्नि ।
(३) मानु—सूत । सँझान—अस्त हुए । कीत—किया । बयारू—व्यालू,
रात्रिका भोजन ।
(४) सुखासन—पाल्की ।
५२
( रीफैन्ड्स ३१ )
आमदने चाँदा दर खानये मादर व पिदर व रसीदन सहलियान चाँदा रा
( चाँदाका मैके आना और सहेलियोंसे भेंट )
फूँकैँ मरद् चाँद अन्हवाए । सेंदुरी चीर फाड़ि पहराए ॥१
माँग चीर सिर सेंदुर (पूरी) । जानहु चाँद फर आँतरी ॥२
सखी सहेलिन देखन आईं । हँस हँस चाँद बहिरि फलाई ॥३
सेज पिरम रस मनिज सुहागू । पिरत पियाग भुगति कस भागू ॥४
अब पैठि देखहुँ बिह पासा । कहँहु चाँद कस कीन्ह पिलासा ॥५
चाँद सहेलिन पूँछि रस, धौरहरों लाइ ।६
सीव आइ जिनु मरु, फहु फैंसे रैन बिहाइ ॥७
मूलपाठ—२-पूय ।
टिप्पणी—(२) सेंदुर पूरी—माँगमें सेंदुर भरनेको स्त्रियों सेंदुर पूरना कहती हैं।
५३
( रीफैन्ड्स ३२ )
जबाब दादन चाँदा बा सहलियाने खुद चहार माहे जमिस्ता
( चाँदाका सहेलियोंको उत्तर—जाड़ेके चार मासका वर्णन )
जस तुम्ह पूछहु रस हौँ कहा । डर कँ फान लजाती अहाँ ॥१

माह माँस मो यों धुँधुवाई। लागी सीउ न पीउ तन आइ ॥२
रैन अमासी परी तुसारू। हियें अँगीठी धरा सरारू ॥३
बिरहिन नैन न आग बुझायी। सौर-सुपेती जाड़ न जायी ॥४
अस कै सखी बिगोवउ नाहीं। सेज भई निसि जलहर माँहीं ॥५
अस बरै दह मारे, हींठँ सरहि सुखाइ ।६
पिउ बिरहैं मोर जोबन, फुल जैस कुँभलाइ ॥७
टिप्पणी—(४) सौर-सुपेती—बिछौना बिस्तर।
५४
(पंजाब [प])
बैसियत कदन बाँद पियक माह फागुन पेख सहेन्दिान बुझाइ घोहर
(चाँदा का सहेलियों से फागुण मास में पति-विरह की स्थिति का वर्णन करना)
कहौं सखी माह माँस कै बाता। फरसि रांग सबै घनि राता ॥१
कर गहि गरौं कन्त ले लावइँ। उठ कै पिया सखि सेज बिछावइँ ॥२
तिल दिन भाइ होइ तिलखानी। हौं तिल एक पिय संग न खानी ॥३
रैन डरावन बराबर फारी। घट न आवइ बजर कै भारी ॥४
जागत लोयन आधी राती। पहरेबर पिउ घर सरसहिं राती ॥५
रैन तुसार जनु फट्ठु घोरों, रहीं भू पर गिय लाइ ।६
सौर सुपेती कन्त बिनु, तिल एक बाँभ न जाइ ॥७
टिप्पणी—शीर्षक में फाल्गुन मास का उल्लेख है। कड़बक में माघ मास का वर्णन
है। (१) माह—माघ।
५५
(पंजाब [क])
(फाल्गुन कथन)
फागुन पवन झरहिं बन पाता। रोलहिं फाग जिह घर पिउ (राता०) ॥१
फूल सुहावा कूंज औ करनाँ। बबुल बइठ देखि हइ बरनाँ ॥२

१११
सुन्दर फागुन [- -] री । केस सिंगार क [ --- -] ॥३
जिह रस दीस बन फूले टेसू । हाँ पी पिन भइ डाखन मेसू ॥४
[ ] । [ ] ॥५
[ ] ।६
[ ] ।७
टिप्पणी—उपलब्ध फोटो में शीर्षक और अन्तिम तीन पंक्तियाँ नहीं आयी हैं। तीसरी
पंक्ति भी अत्यन्त अस्पष्ट है।
(१) फागुन पवन—पगुनावट; यह बहुत तेज और बरफीली होती है।
(२) कूब—इसे फारसी में कूजा कहते हैं। आइने अकबरी में इसे गुलाब
के आकृति का फूल कहा गया है। सम्भवत यह मोतिया या बेले का ही
पारसी नाम है। करना (सं कर्ण)—मोनियर विलियम्स के संस्कृत कोष
के अनुसार कण अमलतास और आक (मदार) के पुष्प को कहते हैं।
हिन्दी शब्द सागर में इसे केवड़े की तरह लम्बे किन्तु बिना काँटोंवाला
पौधा कहा गया है और पवाड़ रूपमें सुगन्धित का उल्लेख है। आइने
अकबरी के फूलों की सूची में इसे वसन्त में फूलनेवाला सफेद फूल बताया
गया है।
५६
(पंथाय [प])
( चैत बजन )
चैत नाँग सब क [ ] ५ । [ ] वर होइ सुई [ ] ॥१
जोइ कहीं सब जग होली । [ ] धरती फूली ॥२
नौ खंड फूले फूल सुहाए । [ ] ॥३
ससी बसन्त सब देख [ ] । [ - ] ॥४
डींडर बैस बैसन्दर जरै । [ - -- ] ॥५
[ - - - - ] ।६
[ - ] ।७
टिप्पणी—यह पृष्ठ अत्यन्त जीर्ण अवस्था में है। इसका अधिकांश अंश गायब है।
जो बचा है वह भी उपलब्ध फोटो में अत्यन्त अस्पष्ट है। अतः यहाँ कुछ
अनुमानतः पढ़ा या बैठा दिया गया है। पर इसे एक सामान्य वाचन
ही मानना चाहिये।

१११
५७-६५
( अप्राप्य )
[ सम्भवतः यहाँ शेष नौ महीनों का वर्णन नौ कड़बकों में रहा होगा । ]
६६
( बम्बई २१ )
आमदने बाज़िर दर गोचर व शुनिदन बजारे कस पौंद व
दीदन व आशिक शुदन व उफ़्तादन
( गोचर में बाज़िर का आना और चाँद के महुक के नीचे से जाना
और उसे देख कर मोहित होकर मूर्च्छित होना )
बाज़िर एक फिर्तेंहुत आवा । गोचर फिरै बिहाऊ गावा ॥१
घर घर सुगुति माँग लै खाई । खिन खिन राजदुआरिहिँ जाइ ॥२
दिन एक चाँद मौरहर ठाढ़ी । झाँकसि माँध झरोखा फाड़ी ॥३
तिह खन बाज़िर मूँड़ उघावा । देखसि चाँद झरोखें आवा ॥४
देखतहिँ जनु नौहारहिँ लीन्हा । बिदका चाँद झरोखा दीन्हा ॥५
धरहुत जीउ न आनै फिरगा, काया भई बिनु साँस ।६
नैन नीर दइ मुँह छिरकहिँ, आय लोग तिहिँ पास ॥७
टिप्पणी—(१) बाज़िर—वज्रपानी योगी । बिहाऊ—बिहाग ।
(२) सुगुति—मुक्ति भोजन ।
(३) माँध—हर । झरोखा—(स चक गवाक्ष) महल का वह स्थान या
गोपुर जहाँ बैठ कर राजा प्रजा को दर्शन देते या महल से बाहर
देखते थे; खिड़की । फाड़ी—निगाह कर ।
(४) मूँड़—सर । उघावा—ऊँचा किया ऊपर उठाया ।
(५) नौहारहिँ—डर कर जी उठने को नौहार लेना कहते हैं । बिदका—
बन्द कर दिया ।
६७
( रीईंग्स ३७ )
परसीदने ख़ल्क बाज़िर रा अज हाले बेहोशी
( बाज़िर की मूर्च्छा सुन कर जनता का आना )
कहु बाज़िर तोर बेदन काहा । लोग महाजन पूछत आहा ॥१
पीर कहसि तू मँह पिनानी । औखद मूर देहुँ तिहिँ आनी ॥२

१११
कै जर जाइ कै पेट कै पीरा । कै सिर डाह को उसहुँ कीरा ॥३
कै खर लाग घाम कै झारा । पान पेट तूँ गा बिसँभारा ॥४
कै दरसन काहू कै राता । पिरम भुलान कहसि नहिं बाता॥५
कै तिहँ अरघ गँवावा, मार लीन्ह घटमार ।६
नाउँ न कहसि नहिं ताकै, बाजिर मुरुख गँवार ॥७
टिप्पणी-(१) जर-ज्वर । जाइ-अधिक । सिरडाह-सिरदर्द । कीरा-सर्प ।
(४) खर-तीव्र । घाम-धूप । झारा-गरमी । बिसँभार-बेहोश ।
(६) बटपार-भटमार रास्तेमें यात्रियोंको लूटने वाले ।
६८
(रीफ़्रेन्स १५)
जवाब दादन बाज़िर मर खल्क रा तरीके मुअम्मा
(सांकेतिक ढंगस बाज़िरका जनताको उत्तर)
लोग कहैं यह मुरुख अवानां । कहौं हियारी बूझ सयानां ॥१
बिरिख ऊँच फल'[लाग*] अकासा । हाथ चढ़ै कै नाँही आसा ॥२
गहि भूकत को बाँह पसारे । तरुवर डार धरैं को पारे ॥३
रात देबस राखहिँ रखवारा । नैन भो देखें जाइ सो मारा॥४
उरग डार फिरि देखेंउ रूखा। कँवल फूल मोर हिरदै सूखा॥५
पियर पात अस बन जर, रहेउँ काँप कुँभलाइ ।६
बिरह पवन जो डोलेउ, टूट परेउँ गहराइ ॥७
प्रस्तुत कड़बककी दूसरी तीसरी और चौथी पंक्तियोंको हजरत रुकनुद्दीनने
अपनी पुस्तक लताफ्ते कुद्दूसियामें उद्धृत किया है और उसके साथ अपने पिता
अब्दुलकुद्दूस गंगोहीका किया हुआ उनका फारसी अनुवाद भी किया है। यह
इस प्रकार है :
(२) शजरे बलन्दस्त समर बर समा। किता उम्मीदरस्त बरा दस्ते मा ॥
(३) बह किरा दस्त फराजी कुनद । शाखे पलक दस्त क पाजी कुनद ॥
(४) रोज शव गश्ता निगाहबा कसे । कुश्ता शवद चौँकि बबीनद कसे ॥
पाठान्तर : लताफ्ते कुद्दूसियासे।
१-पर। २-मुवै। ३-बहुस। ४-नैनन देखहि ।
टिप्पणी-(५) उरग-साँप ।
८

११४
६९
(रिफेरन्स १०)
इस्तरहाम नमूदन् बाज़िर पेश गुन्दए शहरे गोबर
(गोबरवासियोंस बाज़िरका प्रश्न)
हौं मारेउँ ईंह गोब तुम्हार। नैन बान हस गयी बिसारे ॥१
रकत न आवा दीस न घाऊ। हियें साल मोर उठै न पाऊ ॥२
कितैं मैं देख पराहेर ठाढ़ी। इत नैन जिउ लै गइ काढ़ी ॥३
कौन बनिज मोर आगें आवा। लाभ न बिसुवा मूर गँवावा ॥४
हौं तुम कहेउँ बोल पतियाहू। जे मारेउँ सिद्धि कहू न काहू ॥५
पूछि देखि विह पामल, रात पीर जो आग। ६
गयो सो जान जिन्ह मेला, फँसो जान बिष लाग ॥७
टिप्पणी—(१) बिसारे—विषाक्त।
७०
(रिफेरन्स १)
गुरीख्तने बाज़िर अज शहर गोबर बेखौफे राव महर
(राव महरके भयस बाज़िरका गोबर नगर छोड़कर भागना)
बाज़िर देखि मीचु मोर आइ। गोबर तजि हौं बाँउ पराई ॥१
कहा दीप महँ नींद न (आवइ)। भूख गयी अन-पानि न भावइ ॥२
जो सो तिरी फिर दिखरायइ। चौहट मीचु नियर होइ आवइ॥३
महर पास जो कहि फोठ खाई। खिन एक भीतर खाल भड़ाई ॥४
बिधना क कहा भिमस्तैं कीन्हा। आनै बाँध कर सास्तो दीन्हा ॥५
चला छाड़ि कै बाज़िर, बसा ओर ठहँ जाइ। ६
बाँद रहे मन भीतर, सँभर सँभर पछताइ ॥७
मूल पाठ—२-भावा।
टिप्पणी—(१) मीचु—मृत्यु।
(२) अन पानि—अन्न-पानी खाना पीना।

१६६
(६) इहँ—ठौर, जगह ।
(७) सँभार-सँभार—स्मरण कर करके ।
७१
( रीडैन्ट्स ३८ )
रसीदन बाज़िर दर शहर व सुरुद कर्दने बाज़िर अन्दर शब व शुनीदने
शब बज बाम
( बाज़िरका एक नगरमें जाकर रातको गाना और छतपरसे
राजाका सुनना )
एक खूँड छाड़ आन खूँड जाई । माँस एक बाज़िर पाट घटाई ॥१
पुनि ओ आइ मयठ पैसारा । पैठि पौंरिया नगर दुआरा ॥२
बात भूझ सब लेतस नाऊँ । भीख माँग खाओं इँह गाँऊँ ॥३
राइ रूपचंद भाँठ सरेखा । नगर राज फिर बाज़िर देखा ॥४
दिवस गयो निसि मयठ उझेरा । बाज़िर फिर कर लेस बसेरा ॥५
तिहँ रात सुहावन, बाज़िर ठोका तार ।६
गाइ गीत चंद्रावल, नगर मयठ झनकार ॥७
टिप्पणी—खूँड—खण्ड देश-विभाग ।
७२
( रीडैन्ट्स ३९ )
दर रोज तलबक्रीदन शब बाज़िर रा व पुरसीदन कैफियते सुरुदे शब
( दूसरे दिन राजाका बाज़िरको बुलवाकर गानेका कारण पूछना )
दिन भा रावँ भाँठ भुलावा । आज रात निसईं कँ गावा ॥१
भाँठ कहा इँहमों क न होई । होइ रजायसु आनौं सोई ॥२
चहुँ दिसि भाँठै वन दौराये । बाज़िर हेर तोह ले आये ॥३
पूछा राउ कौन तोर ठाऊँ । सुर कण्ठ विह दीन्हि गुसाऊँ ॥४
आज रात निसईं तैं गावा । चंद्रावल मन रहराँ लाभा ॥५
गीत नाद सुर कबिस बखानी, कथा कहु गायनहार ।६
मोर मन रैन देवस सुरउ राउ, भूँजसु गाउँ गिसदार ॥७

१२६
टिप्पणी—(२) इहवाँ—यहाँ । रचाबसु—राज्यादेश । आऔं—ले आऊँ ।
(३) हेर टोह—ढूँढ़-खोज कर ।
(७) पिवहार—गीतकार, गायक ।
७३
( रीडिंग्स ४ )
हिकायते दीदने चाँदा बयान करदन पेश राव रूपचन्द
(राव रूपचन्दके सम्मुख चाँदाके दर्शनका उल्लेख)
सुपन क सुनाँ कहउँ हौं काहा । बोलेउँ सोइ जो देखेउँ आहा ॥१
नगर उजैन मोर अस्मानू । विकराजित राजा घरमानू ॥२
चारिउँ भुवन फिरत हौं आवा । गोवर देखेउँ नगर सुहावा ॥३
विहवाँ चाँद तिरि मैं देखी । पायर खीर अहस चित पैठी ॥४
मनहुत अइसहिं मेट न जाई । दिन-दिन होइ अधिक सवाई ॥५
सहदेव महर कर धिय चाँदा, चहुँ भुवन उजियार ।६
मानिक जोत आन बर जरैहि, नागर चतुर अपार ॥७
७४
(रीडिंग्स ४१ ; बम्बई ६)
आशिक शुदने राव बर नामे चाँदा व अस्म बखशीदन बासिर रा
(चाँदाका नाम सुनकर रावका आसक्त होना और बासिरको
घोड़ा देना)
सुन कै चाँद राउ अँगरानाँ । बासिर उभत' नीर ढर आनाँ ॥१
जसको सूत बैठि' उठि बागी । राजा हियँ घटपटी लागी ॥२
जुरी दइ बाजिर कहुँ आनी' । पीठ घाल पाखर सनबानी' ॥३
बासिर कौन देस सो नारी । ठौर कहहु बरु तुमहि बिचारी' ॥४
करन कहत भौ लखन बिसेखी । अछरं रूप सो तिरिया देखी ॥५
मारग कौन फैस बैठारा, साँध छोट कस आह ।६
सहज सिंगार भोग रस, पिंडक, पराक्रम कै चाहि' ॥७

११७
पाठान्तर—बम्बई प्रति—
शीर्षक—शुनीदने राब रूपचन्द नामे चाँदा व पुरसीदने बाज़िर रा सूरते
जेबाइये ऊ (चाँदाका नाम सुनकर राय रूपचन्दकी बाज़िरसे उसके
सौन्दर्यके प्रति जिज्ञासा )।
१—अहत । २—कोइ । ३—गैल । ४—भानीं । ५—सनबानी ।
६—गाँठ कहउ अब ठाँठ बिचारी । ७—करन कहि ओ करन बितेगी ।
८—कौन । —रूप । १ —कस ताह ।
टिप्पणी—(१) चटपटी—छटपटी, उत्सुकता ।
(३) तुरी—(सं तुरंग>तुरग>तुरीय>तुरी) घोड़ा । पाखर = पख्खर,
कवच ।
(५) बितेगी—बिछोह । बजर—अप्सरा ।
(७) पिंइक—पिण्ड शरीर । पराक्रित—प्रकृति, स्वभाव ।
७५
( रीट्सूक्स ४१ )
सिफ़ते फर्के चाँदा गुफ़्तन बाज़िर बर राव रूपचन्द
( राय रूपचन्दसे बाज़िरका चाँदाके माँगका वर्णन )
पहले माँग क कहउँ सोहागू । तिहिं राता जग खेलै फागू ॥१
माँग चीर सर मेंदुर पूरा । रंग चला जनु फानफेजूरा ॥२
दिया जोत रैन जस पारी । कारें सीस दीस रतनारी ॥३
म यह माँग चीर तर दीठी । उवत सूर जनु किरिन पइठी ॥४
माँथ पिराय जोत पँसारा । सगरै देस होइ उजियारा ॥५
राउ रूपचंद बोला, पुनि मई छाँड गाउ ।६
माँग सुनत मन राता, बाज़िर करब बिपाउ ॥७
टिप्पणी—(१) राता—अनुरक्त ।
(२) मेंदुर पूरा = माथे सिन्दूर भरनेको स्त्रियाँ सिन्दूर पूरना कहती हैं ।
फानकेजूरा—कनकधतूरा, धतूरा का एक अच्छा पौधा ।

११८
७६
(रौकेन्ड्स ७३)
किस्तवे मुयेषा चौदा गोयद
(केस वर्णन)
भँवर बरन सो बेनी बारा। जनु बिसहर लर परे मॅडारा ॥१
लोंग फेन मुर [मूँध*] भराये। आनु सेंदुरी नाग सुहाये ॥२
बेनी गूंद जूहि जरमावइ। ल्हर चहहि बिस सतक दहावइ॥३
देखत बिस चढ़हि मंतर न माने। गारुर काइ अनारी जाने ॥४
जूड़ा छोर झार सो नारी। देवसहिँ रात होइ अँधियारी ॥५
डंक चढ़ा सुन राजा, परा लहर मुरझाइ ।६
बात कहत जिह बिस चढ़हि, गारुर काइ कराइ ॥७
टिप्पणी-(१) भँवर—भ्रमर, काला। बरन—वर्ण रंग। बारा—बाल केश।
बिसहर—विषधर, सर्प। लर—लड़ लड़ी, पंक्ति।
(२) सुर—मुंड मूँड सिर।
(४) गारुर—विष वैद्य सर्प के विष को उतारने वाला। काइ—क्या।
(५) जूड़ा—बँधे हुए केश। छोर—खोल कर। झार—झाड़।
७७
(रौकेन्ड्स ७४)
सिफते पेशानी चौदा गोयद
(ललाट वर्णन)
देखि लिलार बिमोहे देवा। लोक सब कुटुंब कीनहिं सेवा ॥१
दूज क चाँद जानु परगासा। कै खर सोभन कसौटी कसा ॥२
बदन पसीज मूँद जो आवहिं। चाँद माँझ जनु नखत दिखावहिं ॥३
मुँह दप सोह न देखी जायी। सरग घूर जनु अवनल आयी ॥४
ससहर रूप भइ उठ रेखा। मैं न अकेलि सम जग देखा ॥५
मोर चड़ा बिस उतरा, रायँ करपट लेत ।६
सुन लिलार उठ बैठो, बाजिर कंचन देत ॥७

१२९
टिप्पणी—(१) छिकार—सलाह।
(२) पर—पखरा, घुड़। सोवन—सुवर्ण, सोना।
७८
(रीडिंग्स ४५८)
( भौंह वर्णन )
भौंहैं धनुक जनु दुइ कर ताने । पंचबान गुन खींच सधाने ॥१
बान बिसार सान दइ सारइ । पारथ जेम अहेरै आवइ ॥२
अरजुन धनुक सरग में देखी । चाँद माँह गुन सोइ बिसेखी ॥३
सर तीखे जिन्ह मार फिरावइ । ठाँर परे सो येगि न जाघइ ॥४
चाँद माँह गुन ऐसें अहा । मूँड न डोल छु गाइ कहा ॥५
मन सिकार कैंद याजिर, धानुक भइ सो नारि ।६
मइझ मिरग भा राजा, मया मोह गमे बिसारि ॥७
टिप्पणी—(१) पंचबान—पंचशर, कामदेव।
(२) बिसार—विषाक्त। सान—शान। दइ—देकर। पारथ—शिकारी।
अहेरै—शिकार को।
७९
( रीडिंग्स ४५९ )
जितने वरमहाय पाढा गोयद
( नेत्र वर्णन )
नैन सरूप मेत महँ कारे । रिउन बिनु घरन होंहि रतनारे ॥१
अम्प फार जनु मोतिन्ह भरे । से दइ भाँह कैं तर धरे ॥२
महझिडोलहि जानु मषुपिया । भै निमि पवन झकारें दिया ॥३
असन समुंद मानिक भर गह्र । गइ याफ घर गाँठ न गह्र ॥४
नैन समुंद अति अरगाहा । बूड़हिं राह न पावहिं पाहा ॥५
आँभर नैन चाँद यस आप, दीगर दिन माह ।६
मरग जापि थद दैमे, गजा पूछहु काह ॥७