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बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

अथार्गलाध्यायः १०१
चौथे, दूसरे और एकादश भाव में ग्रहों के होने से अर्गला योग होता
है और उसकी दृष्टि आदि पूर्वोक्त प्रकार से ही होती है।।२।।
एकग्रहार्गलाल्पं च द्विग्रहा मध्यमा भवेत्।
त्रयेण ग्रहयोगेन अर्गला पूर्णमुच्यते ।।३।।
वह भी एक ग्रह के होने से अल्प, दो ग्रह के होने से मध्यम और तीन
ग्रह के होने से पूर्ण अर्गला होती है।।३।।
राश्यर्गलापि सा ज्ञेया ग्रहयुक्ता विशेषतः।
तुर्यवित्तैकादशेषु यस्य कस्यार्गला भवेत् ।।४।।
इसी प्रकार किसी राशि से उक्त स्थानों में राशि की अर्गला होती
है। चौथे, दूसरे और एकादश भाव की अर्गला जिस किसी की होती
है।।४।।
द्विविधा सार्गला विप्र ब्रह्मणा चोदितं पुरा।
शुभकृत् पापकृच्चैव तन्वादीनां विचिन्तयेत् ।।५।।
वह दो प्रकार की होती है। शुभग्रह और पापग्रह कृत होती है।।५।।
भिन्नार्गलां पुनर्वक्ष्ये चतुर्थार्गलपापयुक्।
तृतीये तु यदा विप्र बहुपापयुते सति ।।६।।
एक भिन्न अर्गला होती है जो कि चौथी होती है। वह तीसरे भाव में
अधिक पापग्रहों के होने से होती है।।६।।
बहुपापा तृतीयस्था पापषड्वर्गयोगतः।
पापार्जितः पापदृष्ट्या संयुक्तार्गलकारकः ।।७।।
तृतीये शुभसम्बन्धे शुभक्षेत्रे शुभान्विते।
शुभवर्गे च षड्वर्गे विज्ञेयं तुर्यमर्गला ।।८।।
तीसरे भाव में शुभग्रह का संबन्ध हो, शुभग्रह की राशि हो, शुभग्रह
देखता हो, शुभग्रह का षड्वर्ग हो तो चौथा अर्गला योग होता है।।७-८।।
तुर्यवित्तैकादशे च पापयुग्वा शुभोऽपि वा।
उभयक्षेत्रसम्बन्धे अर्गलां कारयेद्द्विज।।९।।
चौथे, दूसरे, एकादश भाव में पापग्रह युत हो वा शुभग्रह हो, दोनों
के संबंध से अर्गला योग होता है।।९।।
तृतीये बहुपापस्थे बहुयुक्तार्गला भवेत्।
निर्बाधिका तु सा ज्ञेया निर्विशङ्कं द्विजोत्तम ।।१०।।

१०२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
तीसरे भाव में बहुत से पापग्रह हों तो बहुयुक्त अर्गला होती है और
इसे निर्बाध अर्गला कहते हैं।।१०।।
एकेन द्वितयेनापि अर्गला या भवेद्द्विज।
सार्गला नैव विज्ञेया बहुपापयुतिं विना।।११।।
एक ग्रह या दो ग्रह से जो अर्गला होती है वह फलदं नहीं होती है।।११।।
चतुर्थे धनलाभस्था शुभपापकृतार्गला।
तस्यापि बाधकाः खेटा व्योमारिष्फतृतीयाः।।१२।।
चौथे, दूसरे, एकादश में शुभग्रह एवं पापग्रह से अर्गला योग होता है,
किन्तु दशम, द्वादश और तीसरा स्थान उसका बाधक होता है।।१२।।
क्रमेण ज्ञायते विप्र चतुर्थं व्योमबाधकम्।
धने च व्ययभावं च भवेज्ज्ञेयं तृतीयकम्।।१३।।
चौथे का दशमं, दूसरे का द्वादश और एकादश का तीसरा स्थान
बाधक होता है।।१३।।
निर्बाधका च फलदा न दातव्या सबाधका।
चिन्तनीयं प्रयत्नेन तत्फलं द्विजपुङ्गव।।१४।।
अर्थात् बाधक स्थानों में ग्रहों के होने से अर्गला योग नहीं होता है।
निर्बाध अर्गला फलदायक और सबाधक अर्गला निष्फल होती है।।१४।।
अर्गलाया बाधकानां बाधकान् कथयेऽधुना।
नूनं सा निर्बला खेटा ज्ञायते गणकैस्तदा।।१५।।
अर्गला योग से बाधक ग्रहों के बाधकों को मैं कह रहा हूँ, निश्चय
ही वह निर्बल ग्रह होता है।।१५।।
वित्तलाभचतुर्थानां यः पश्यति शुभार्गलाम्।
व्ययभ्रातृनभस्थाश्चेद्विपरीतार्गला द्विज।।१६।।
दूसरे, ग्यारहवें ओर चौथे भाव को देखता हो तो शुभ अर्गला होती है।
किन्तु १२वें, ३रे और १०वें स्थान में स्थित ग्रह देखते हों तो विपरीत अर्गला
होती है।।१६।।
पुनर्योगार्गलं ज्ञेयं त्रिकोणे पूर्ववद्द्विज।
पञ्चमे चार्गलास्थानं नवमस्तद्विरोधकः।।१७।।

अथाऽर्गलाध्यायः १७३
इसी प्रकार त्रिकोण (५।९) अर्गला योग होता है। ५वें भाव में ग्रह
हो तो अर्गला होता है, किन्तु नवम भाव में कोई ग्रह हो तो अर्गला नहीं
होता है।।१७।।
विपरीतेन केतुश्च नवमेऽर्गलकारकः।
पञ्चमस्थस्तद्विरोधो ज्ञायते गणकैर्द्विज।।१८।।
केतुग्रह विपरीत यानि ९वें भाव में अर्गला योगकारक और पाँचवें
भाव में वाचक होता है।।१८।।
क्रमेण केतुः प्रकरोत्यर्गलां द्विज।
नवमस्थस्तद्विरोधो लग्नार्गलमिदं विदुः।।१९।।
हे द्विज ! केतु ग्रह भी क्रम से अर्गला योग करता है। किन्तु नवमस्थ
ग्रह उसका विरोधी होता है, इसे लग्नार्गल कहते हैं।।१९।।
राश्यर्गलं च खेटानां चिन्तयेद्विविधार्गलम्।
यस्या यस्या दशा प्राप्ता तस्यां तस्यां फलं भवेत्।।२०।।
इसी प्रकार राशियों का भी अर्गला योग विचार करना चाहिए।।२०।।
यत्र राशिस्थितः खेटंस्तस्य पाकान्तरे भवेत्।
तत्काले च फलं वाच्यं निर्विशङ्कं द्विजोत्तम।।२१।।
जो-जो अर्गलायोगकारक ग्रह हों उनके दशा अन्तर में अर्गला योग का
फल होता है।।२१।।
सारांश यह है कि जिस किसी भाव या ग्रह का विचार किया जाय तो
यह देखना चाहिए कि उस भाव या ग्रह से चौथे, दूसरे और ग्यारहवें भाव
में कोई ग्रह हो तो उस भाव या ग्रह का अर्गला योग होता है।
किन्तु उक्त अर्गला योग का भंग भी होता है अर्थात् राशि का ग्रह से चौथे
भाव में ग्रह के होने से अर्गला होता है, यदि राशि का ग्रह से दशमस्थ
कोई ग्रह न हो। इसी दूसरे भाव में योग होता है, किन्तु १२वें कोई ग्रह न
हो तथा ग्यारहवें भाव में योग होता है, यदि तीसरे भाव में कोई ग्रह न
हो। यदि योगकारक ग्रह से बाधक ग्रह निर्बल या संख्या में कम हों तो
अर्गला का प्रतिबंध नहीं होता है। इसी प्रकार राशि या ग्रह से तीसरे भाव
में तीन से अधिक खल ग्रह हों तो निर्विरोधी अर्गला योग होता है। इसी
प्रकार ५वें भाव में भी अर्गला योग होता है, यदि नवम में कोई
ग्रह न हों तो। केतुग्रह का विपरीत अर्गला योग होता है अर्थात् बाधक स्थान
में अर्गला और योगस्थान में प्रतिबंधक होता है।

s are:

  • ो over य
  • े over त
    There is NO other mātrā!
    And the consonants are:
    प्र
    ब
    ल + ा = ला
    य + ो = यो
    प
    क
    ल + प = ल्प
    य
    त + े = ते
    It is 100% प्रबलायोपकल्प्यते!

Let's double check line 24:
यत्र जन्मनि सोऽपि स्याच्छुभदृष्टे शुभागर्ला।
Wait, look at शुभागर्ला:
श + ु = शु
भ + ा = भा
ग
र् + ल + ा = र्ला
Yes, शुभागर्ला।

Line 25:
तेन दृष्टेक्षिते लग्ने प्रबलायोपकल्प्यते।।२७।।

Line 26:
यदि जन्मकाल में शुभग्रह से दृष्ट शुभ अर्गला हो और उसी शुभग्रह

Line 27:
से लग्न युत वा दृष्ट हो तो लग्न प्रबल होती है।।२७।।

Line 28:
यदि पश्येद्ग्रहस्तत्र विपरीतार्गलसंस्थितः।

Line 29:
`प्रथमां तु विजानीयाद्विपरीतार्गलां द्व

अथ कारकाध्यायः १०५
लग्नसप्तमयोगेन भाग्ययोगं विचिन्तयेत्।
भाग्यप्रबलता ज्ञेया लग्नसप्तशुभार्गला।।२९।।
लग्न और सप्तम के योग से भाग्ययोग की चिंता करनी चाहिए।
लग्न सप्तम में शुभ कृत अर्गला हो तो भाग्य की प्रबलता जाननी
चाहिए।।२९।।
शुभार्गले स्ववृद्धिः स्यात्पापे स्वल्पधनं वदेत्।
उभयार्गले तु तत्रैव क्वचिद्वृद्धिः क्वचित् क्षयम्।।३०।।
शुभग्रह की अर्गला में धन की वृद्धि और पापग्रह की अर्गला में अल्पधन
की हानि होती है।।३०।।
तत्तद्राशिदशायां तु अर्गलाफलसिद्धये।
शुभो वाऽप्यशुभो वापि ह्यर्गला फलदायकः।।३१।।
उन-उन राशियों के अर्गला फल को देने वाले शुभग्रह शुभफल और
पापग्रह अशुभ फल को देने वाले होते हैं।।३१।।
इति बृहत्पाराशरहोरायां पूर्वखण्डे सुबोधिन्यां अर्गलाफलकथनं
नाम सप्तमोऽध्यायः।
अथ कारकाध्यायः
अथाग्रे सम्प्रवक्ष्यामि ग्रहाणां कारकान् द्विज।
आत्मादिकारकान् सप्त यथावत् कथयामि ते।।१।।
हे द्विज ! अब मैं ग्रहों के आत्मा आदि सात कारकों को कहूँगा।।१।।
रव्यादिशनिपर्यन्ता भवन्ति सप्तकारकाः।
अंशैः समौ ग्रहौ द्वौ च राह्वन्तान् गणयेद्विज।।२।।
रवि आदि ग्रह सात किसी-किसी के मत से राहु पर्यन्त आठ कारक
होते हैं। यदि दो ग्रहों में अंश साम्य हो तो राहु पर्यन्त ८ ग्रहों
में कारक का विचार करना चाहिए।।२।।
रव्यादिपङ्गुपर्यन्तमंशाधिकग्रहो द्विज।
कारकेन्द्रोऽथ स ज्ञेयो आत्माकारक उच्यते।।३।।
रवि से राहु पर्यन्त ग्रहों में भी जो ग्रह अंश से अधिक हो वह आत्मकारक
ग्रहों का राजा होता है।।३।।

१०६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
अंशसाम्यग्रहो यत्र कलाधिक्यं च पश्यति।
कलासाम्ये पलाधिक्यमात्माकारक ईर्यते ।।४।।
जहाँ ग्रहों के अंश तुल्य हो वहाँ कला से अधिकता लेना चाहिए और
कला समान हो तो विकला से जो अधिक हो वही आत्मकारक होता
है।।४।।
तत्र राशिकलाधिक्ये नैव ग्राह्यः प्रधानकः।
अंशाधिक्ये कारकः स्यादल्पभागोऽन्तकारकः ।।५।।
राशि और कला से अधिक हो तो वह आत्मकारक नहीं होता
है। जिसका अंश अधिक हो वही आत्मकारक होता है, अल्प अंश वाला
अंतिमकारक होता है।।५।।
मध्यांशो मध्यखेटः स्यादुपखेटः स एव हि।
अधोऽधः कारका ज्ञेयाश्चराणि सप्तकारकाः ।।६।।
दोनों के मध्य अंश वाले अन्य कारक होते हैं। क्रम से कारक
होते हैं उसी को उपकारक कहते हैं।।६।।
तेषां मध्ये प्रधानं तु आत्मकारक उच्यते।
जातकराट् स विज्ञेयः सर्वेषां मुख्यकारकः ।।७।।
इन सभी में आत्मकारक प्रधान जातक का स्वामी होता है, इसी
को मुख्यकारक कहते हैं।।७।।
यथा भूमौ प्रसिद्धोऽस्ति नराणां क्षितिपालकः।
सर्ववार्ताधिकारी च बन्धकृन्मोक्षकृत्तथा ।।८।।
जिस प्रकार पृथ्वी पर मनुष्यों में राजा बंधन, मोक्ष आदि सभी बातों
का अधिकारी होता है।।८।।
पुत्रामात्यप्रजानां तु तत्तद्दोषगुणैस्तथा।
बन्धकृन्मोक्षकृद्विप्र तथा सम्मानकारकः ।।९।।
वही पुत्र, मंत्री और प्रजा का उनके गुण-दोष के अनुसार बंधन, मोक्ष
तथा सम्मान आदि करने वाला होता है। उसी प्रकार कारकराज के
वश से अन्य कारक फल देने वाले होते हैं।।९।।
तथैव कारको राजा ग्रहाणामात्मकारकः।
आत्मेत्यादि फलं दत्ते चान्यथा स्थापयेद्द्विज ।।१०।।

अथ कारकाध्यायः १०७
जिस प्रकार राजा के क्रोधित होने से सभी मंत्री आदि अपने मन का
कार्य करने में असमर्थ होते हैं।।१०।।
यथा राजाज्ञया विप्र पुत्रामात्यादयोऽपि च।
समर्था लोककार्येषु तथैवान्योन्यकारकः।।११।।
कारकराजवश्येन फलदातान्यकारकः।
यथा राजनि क्रुद्धे च सर्वेऽमात्यादयो द्विज।।१२।।
स्वजनानां कार्यकर्त्तुमसमर्था भवन्ति हि।
स्निग्धे भूपे ह्यमात्यादिः स्वशत्रूणां द्विजोत्तम।।१३।।
अकार्यं कर्तु नो शक्तस्तथैवान्योपकारकः।
आत्मकारकवश्येन ह्यमात्यादि फलं ददुः।।१४।।
यदि राजा प्रसन्न होते हैं तो मंत्री आदि अपने शत्रु का भी अहित नहीं
करते हैं, उसी प्रकार अन्य कारक भी आत्मकारक के वश में होते
हैं।।१४।।
आत्मकारकखेटेन न्यूनभागो हि यद्ग्रहः।
अमात्यसंज्ञा तस्यैव ज्ञायते द्विजसत्तम।।१५।।
आत्मकारक ग्रह से न्यून अंशवाला ग्रह अमात्यकारक होता है।।१५।।
अमात्यन्यूनो भ्राता च भ्रातृन्यूनं च मातृकम्।
मातृकारकखेटेन न्यूनभागो हि यो ग्रहः।।१६।।
इससे न्यून अंश वाला ग्रह भ्राताकारक, इससे न्यून अंश वाला
मातृकारक, इससे न्यून पुत्रकारक।।१६।।
सपुत्रकारको ज्ञेयस्तद्धीनो ज्ञातिकारकः।
ज्ञातिकारकखेंटेन हीनभागो हि यो ग्रहः।।१७।।
इससे न्यून अंश वाला ग्रह शांति (जाति) कारक, इससे न्यून अंश वाला
ग्रह।।१७।।
दारकारकविज्ञेयो निर्विशङ्कं द्विजोत्तम।
चराश्च कारकाः सप्त ब्रह्मणा चोदितः पुरा।।१८।।
स्त्रीकारक होता है। यही सात चरकारक होते हैं।।१८।।
अंशसाम्यौ ग्रहौ द्वौ च जायेतां यस्य जन्मनि।
स्वकारकं विना विप्र लुप्यति चात्मकारकः।।१९।।

१०८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
यदि ग्रहों के अंश तुल्य हों तो दोनों ही एक कारक होते हैं ।।१९।।
तत्कारको लुप्यति चेदन्यन्नैवास्ति कारकम् ।
कारकाणां स्थिराणां च मध्ये सञ्चितयेद्विज ।।२०।।
वहाँ दोनों का नाश हो जाता है, फिर स्थिरकारक से ही फल
को देखना चाहिए ।।२०।।
अथ योगकारकमाह-
अधुना सम्प्रवक्ष्यामि खेटान् कारकसंज्ञकान् ।
यस्य जन्मनि भावानां यथास्थाने च वै द्विज ।।२१।।
अब मैं योग करने वाले कारक ग्रहों को कह रहा हूँ ।।२१।।
स्वक्षे तुङ्गे च मित्रर्क्षे कण्टके संस्थिता ग्रहाः ।
अन्योन्यकारका विप्र कर्मगास्तु विशेषतः ।।२२।।
जन्म समय ग्रह अपनी उच्चराशि, अपनी राशि वा अपने मित्र की
राशि में होकर परस्पर केन्द्र में हों तो परस्पर कारक (भाग्योदय)
करने वाले होते हैं। इसमें भी दशम स्थान में विशेष योगकारक होते
हैं ।।२२।।
लग्ने सुखे तथा कामे ग्रहभाववशेन च ।
भवन्ति कारका विप्र विशेषेण च खेगताः ।।२३।।
लग्न चतुर्थ, सप्तम, दशम में कारक होते हैं, विशेषतः दशम
में कारक होता है ।।२३।।
स्वमित्रर्क्षोच्चगो हेतुरन्योन्यं यदि केन्द्रगः ।
ससुहृद्गणसम्पन्नः सोऽपि कारक एव वै ।।२४।।
यदि ग्रह अपने मित्र, राशि, उच्च में होकर परस्पर केन्द्र में हों तो
वे भी परस्पर कारक होते हैं ।।२४।।
नीचान्वये यस्य जन्म बभूव द्विजसत्तम ।
पतन्ति कारका लग्ने प्रधानत्वं च स आप्नुयात् ।।२५।।
नीच वंश में उत्पन्न हो और योगकारक ग्रहों से योग होता हो तो वह
अपने कुल में प्रधान होता है ।।२५।।
राज्ञां कुले समुत्पन्नो राजा भवति निश्चितम् ।
एवं कुलानुसारेण कारकाणां फलं भवेत् ।।२६।।

अथ कारकाध्यायः ६९
और राजकुल में उत्पन्न हो और योग होता हो तो अवश्य राजा होता
है। इस प्रकार कुल के अनुसार कारकों का फल होता है॥२६॥
अथ स्थिरकारकमाह—
अधुना सम्प्रवक्ष्यामि कारकाणि स्थिराणि च।
सूर्यादीनां ग्रहाणां च वीर्यवान् कारको भवेत्॥२७॥
अब मैं स्थिर कारकों को कह रहा हूँ। सूर्य आदि ग्रहों के बलाबल
के अनुसार ये कारक होते हैं॥२७॥
बलवान् जायते विप्र जन्मनि रविशुक्रयोः।
स पितृकारको ज्ञेयो निर्विशङ्कं द्विजोत्तम॥२८॥
जन्मकाल में रवि और शुक्र में जो बलवान् हो वह पितृकारक होता
है॥२८॥
चन्द्रारयोश्च बलवान् मातृकारक उच्यते।
भौमतस्तु विशेषेण भगिनीदारभ्रातृकौ॥२९॥
चंद्रमा और भौम में जो बलवान् हो वह भावकारक होता है॥ विशेषतः
भौम से बहिन और साला (स्त्री के भाई) का विचार होता है॥२९॥
बुधान्मातुलमाख्यातो मातृतुल्यानपि द्विज।
गुरुणा चात्र विज्ञेया पुत्रस्वामिपितामहाः॥३०॥
बुध से मामा और मातृसदृश (मौसी) आदि का विचार होता है॥ गुरु
से पुत्र और पितामह आदि का विचार होता है॥३०॥
स्वभार्यामातृपितरौ तथा मातामही द्विज।
भृगुद्वारा विजानीयादेतेषां शुक्रकारकाः॥३१॥
सास-ससुर और नानी का विचार शुक्र से होता है॥ यही उनका कारक
होता है॥३१॥
सूर्याच्च पुण्यभे तात इन्दोर्माता चतुर्थतः।
कुजात्तृतीयतो भ्राता मातुलो रिपुभाद्बुधात्॥३२॥
सूर्य से ९वें स्थान में पिता का, चन्द्रमा से चतुर्थ स्थान पर माता
का, भौम से तीसरे भाई का, बुध से छठे मामा का॥३२॥
देवेज्यात्पञ्चमे पुत्रो दैत्येज्याद्यूनभे स्त्रियः।
मन्दादष्टमतो मृत्युस्तातादीनां विचिन्तयेत्॥३३॥

११० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
गुरु से पाँचवें पुत्र का, शुक्र से सातवें स्त्री का और शनि से आठवें
भाव में आयु का विचार करना चाहिए।। ३३ ।।
अथ भावकारकमाह-
अधुना सम्प्रवक्ष्यामि विशेषं भावकारकम् ।
जनुर्लग्नं च विद्याद्धै आत्मकारकमेव च ।। ३४ ।।
अब विशेषकर भावकारक को कह रहा हूँ। जन्मलग्न आत्मकारक ।। ३४ ।।
धनभावं विजानीयाद्दारकारकमेव च ।
एकादशे ज्येष्ठभ्रातुस्तृतीये च कनिष्ठकाः ।। ३५ ।।
धनभाव स्त्रीकारक, ग्यारहवाँ ज्येष्ठ भाई का और तीसरा कनिष्ठ ।। ३५ ।।
सुते सुतं विजानीयाद्दारं सप्तमभावतः ।
सुतस्थाने ग्रहस्तिष्ठेत्सोऽपि कारक उच्यते ।। ३६ ।।
पंचम भाव पुत्र का और सातवाँ स्त्री का कारक होता है। पाँचवें भाव
में यदि कोई ग्रह हो तो वह भी उस भाव का कारक होता है ।। ३६ ।।
सूर्यो गुरुः कुजः सोमो गुरुर्भौमः सितः शनिः ।। ३७ ।।
गुरुश्चन्द्रसुतो जीवो मन्दश्च भावकारकः ।। ३७ ।।
क्रम से सूर्य, गुरु, भौम, बुध, गुरु, भौम, शुक्र, शनि, गुरु, बुध,
गुरु और शनि ये लग्नादि भावों के कारक होते हैं ।। ३७ ।।
पुनस्तन्वादयो भावाः स्थाप्यास्तेषां शुभाऽशुभम् ।
लाभं तृतीयं रन्ध्रं च शत्रुभावव्ययं तथा ।
एषां योगेन यो भावस्तन्नाशं प्राप्नुयाद्‌ध्रुवम् ।। ३८ ।।
फिर भी लग्न आदि भावों के शुभ-अशुभ को लिखकर उनके शुभाशुभ
का निर्णय करना चाहिए। एकादश, तृतीय, आठवाँ, छठवाँ और बारहवाँ
भाव- इनके साथ जिस भाव का सम्बन्ध होता है उस भाव के फल का
नाश हो जाता है अर्थात् इन भावों के स्पष्ट दृश्यादि का योग करने से
जो भाव बने वह नष्ट हो जाता है ।। ३८ ।।
चत्वारो राशयो भद्राः केन्द्रकोणशुभावहाः ।
तेषां संयोगमात्रेण अशुभोऽपि शुभो भवेत् ।। ३९ ।।
केन्द्र और कोण ये चार भाव शुभद हैं। इनके संयोग से जो भाव हो
वह भी शुभद होता है।। ३९ ।।

सूर्यादिग्रहाणां कारकत्वमाह १११
अथ सूर्यादिग्रहाणां कारकत्वमाह
राज्यविद्दुमरक्तवस्त्रमाणिक्यराजवन-
पर्वतक्षेत्रपितृकारको रविः॥१॥
राज्य, मूँगा, रक्तवस्त्र, मानिक, राज, वन, पर्वत, क्षेत्र और पिता का
कारक सूर्य होता है॥१॥
मातृमनःपुष्टिगन्धरसेक्षुगोधूमक्षारक-
द्विजशक्तिकार्यसस्यरजतादिकारकश्चन्द्रः॥२॥
माता, मन, शरीरपुष्टि, गंधद्रव्य, रस, ऊख, गेहूँ, क्षारपदार्थ, ब्राह्मण,
शक्तिकार्य, धान्य और चाँदी आदि का कारक चन्द्रमा है॥२॥
सत्त्वसद्मभूमिपुत्रशीलचौर्यरोगब्रह्मभ्रातृ-
पराक्रमाग्निसाहसराजशत्रुकारकः कुजः॥३॥
ओज, भूमि, पुत्र, शील, चोर, रोग, ब्रह्म, भाई, पराक्रम, अग्नि, साहस
और राजशत्रु के कारक भौम हैं॥३॥
ज्योतिर्विद्यामातुलगणितकार्यनर्तनवैद्य-
हास्यभीश्रीशिल्पविद्यादिकारको बुधः॥४॥
ज्योतिष विद्या, मामा, गणित विद्या, नृत्य, वैद्यक, हास्य, भय,
लक्ष्मी, शिल्पविद्या का कारक बुध है॥४॥
स्वकर्मयजनदेवब्राह्मणधनगृहकाञ्चन-
वस्त्रपुत्रमित्रान्दोलनादिकारको गुरुः॥५॥
अपने कार्य, यज्ञ, देवता, ब्राह्मण, धन, गृह, सुवर्ण, वस्त्र, पुत्र, मित्र,
आंदोलन आदि के कारक गुरु हैं॥५॥
कलत्रकार्मुकसुखगीतशास्त्र-
काव्यपुष्पसुकुमारयौवनाभरणरजत-
यानस्वर्गलोकमौक्तिक-
विभवकवितारसादिकारको भृगुः॥६॥
स्त्री, धनुष, सुख, गीतशास्त्र, काव्यशास्त्र, पुष्प, यौवन, आभूषण,
चाँदी, सवारी, स्वर्गलोक, मोती, वैभव, कविता, रस आदि के कारक शुक्र
हैं॥६॥

२२२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
महिषह्वगजतैलवस्त्रशृङ्गार-
प्रयाणसर्वराज्यसर्वायुधगृहयुद्ध-
सञ्चारशूद्रनीलमणिविघ्नकेशशल्य-
शूलरोगदासदासीजनायुष्यकारकः शनिः॥७॥
भैंस, घोड़ा, हाथी, तेल, वस्त्र, शृंगार, यात्रा, सभी प्रकार के राज्य, सभी
प्रकार के आयुध, गृह, युद्ध संचार, शूद्र, नीलममणि, विघ्न, केश, हड्डी,
शूलरोग, नौकर, नौकरानी, आयुष्य के कारक शनि है॥७॥
प्रयाणसमयसर्परात्रिसकलसुप्तार्थद्यूतकारको राहुः॥८॥
यात्राकाल, सर्प, रात्रि, सम्पूर्ण खोये हुए द्रव्य, जूआ का कारक राहु
है॥८॥
व्रणरोगचर्मातिशूलस्फुटक्षुधार्तिकारकः केतुः॥९॥
फोड़ा आदि रोग, चर्मरोग, अत्यंत शूल, भूख से कष्ट आदि का कारक
केतु है॥९॥
इति कारकाध्यायः।
अथ कारकांशफलमाह
अधुना सम्प्रवक्ष्यामि कारकांशाधिकान् ग्रहान्।
योगसम्बन्धमात्रेण यथावत् फलदा ग्रहाः॥१॥
अब मैं कारकांश के स्वामी ग्रहों के फल को कह रहा हूँ, जिसके संबंध
मात्र से योग का फल प्राप्त होता है॥१॥
स्वांशकारककुण्डल्यां नवमांशाधिपोऽथवा।
यस्मिन् राशौ स्थितो विप्र तद्राशिफलमुच्यते॥२॥
आत्मकारकांश कुंडली में नवांश के अधिपति जिस राशि में
हों उसके अनुसार फल होता है॥२॥
मेषादिमीनपर्यन्तं सर्वेषां फलमादिशेत्।
यथावद्भाषितं पूर्व शूलिना रुद्रयामले॥३॥
मेष से मीन पर्यन्त सभी राशियों का फल इस प्रकार है॥३॥
अस्वांशकारकांशेषु तिष्ठन्ति च यदा ग्रहाः।
तदा मूषकमार्जारौ दुःखदौ भयकारकौ॥४॥

कारकांशफलमाह ११३
यदि आत्मकारक मेष राशि के नवांश में हो तो मूसा, बिलार दुःख देते
हैं।।४।।
सुयोगे च यदा विप्र मार्जारादि सुखप्रदौ।
वृषे च कारकांशे तु भयार्ती च चतुष्पदात् ।।५।।
शुभग्रह के योग से मूसा, बिलार आदि सुख देते हैं। वृष का नवांश
हो तो चौपाये जानवरों से भय होता है।।५।।
शुभे चतुष्पदात्सिद्धिरीति तत्त्वं द्विजोत्तम।
मिथुने कारकांशे च कण्ड्वादिरोगसम्भवः।।६।।
शुभग्रह का योग हो तो चौपायों से सुख होता है। मिथुन के नवांश में
कारक हो तो खुजली आदि रोगों की संभावना होती है।।६।।
कर्कांशे च जलाद्दुःखं जलभीतिर्न संशयः।
कुष्ठादिरोगसम्भूतिः शुभे फलविपर्ययः।।७।।
कर्क के नवांश में कारक हो तो जल से कष्ट वा जल का भय और
कुष्ठ आदि रोग की संभावना होती है।।७।।
सिंहांशे कारके खेटे तिष्ठत्येवं द्विजोत्तम।
शुनकादि भयं दद्याच्छुभे सिद्धिप्रदायकः।।८।।
सिंह के नवांश में हो तो खाज आदि से भय होता है। शुभग्रह का योग
हो तो शुभ फल होता है।।८।।
उदाहरण— पृष्ठ २५ के दिये हुए स्पष्ट ग्रहों के अनुसार चरकारक इस
प्रकार है –
चरकारकाः

आत्म-कारकअनात्म-कारकभ्रातृ-कारकमातृ-कारकपुत्र-कारकजाति-कारकदारा-कारक
भौमचंद्रमासूर्यगुरुबुधशुक्रशनि

११४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
कारकांशचक्रम्

+---------------------------------------+
| \       बु. २       /   \       १२      / |
|   \               /  च.  \            /   |
| ३   \           /   १ म.   \        /  ११ |
|       \       /              \    /       |
|---------+----------------------+----------|
|       /       \              /    \       |
| श. ४ वृ.        \          /        १०    |
|       \           \      /        /       |
|   ५     \       ७   \  /        /   सू. ९ |
|           \       /   \       /           |
|             \   /   ६   \   /             |
|               +-----------+               |
|               |   शु. ८   |               |
+---------------------------------------+

(टिप्पणी: १ म. = चन्द्र, २ = बुध, ४ वृ. = शनि, ८ = शुक्र, ९ = सूर्य)

कन्यायां कारकांशे चेत्तिष्ठत्येवं फलं भवेत्।
युग्मवत्कण्डुरोगात्तिर्वह्निदोषेण दुःखभाक् ।। ९ ।।
कन्यांश में आत्मकारक हो तो मिथुनांश के समान ही कंडू (खुजली)
आदि रोग से कष्ट होता है॥९॥
तुलाख्यं कारकांशे च व्यापारेषु रतोऽधिकः।
क्रयविक्रयकर्त्ता च यदि जातो नृपालये ॥१०॥
तुला कारकांश हो तो वह व्यापार में अधिक संलग्न, खरीद-बिक्री
करने में पटु होता है॥१०॥
वृश्चिके कारकांशे च सर्पादिभयकारकः।
मातुः पयोधरे पीडा जायते द्विजसत्तम ॥११॥
वृश्चिकांश में कारक हो तो सर्प आदि से भय और माता के स्तन
में पीड़ा होती है॥११॥
चापस्थे कारकांशे च वाहनाद्भयमादिशेत्।
उच्चात्पतनं वापि कोपी वस्तुसमन्वितः॥१२॥
नक्रकारकांशे विप्र सिद्धिर्जंलचरादयः।
शङ्खमुक्ताप्रवालादिमत्स्यंखेचरदेवताः॥१३॥
धन. कारकांश हो तो वाहन से गिरने का भय वा ऊँचे से गिरने का
भय, कोपी और वस्तुसंग्रही होता है॥१२॥ मकर के अंश में कारक के
होने से मूँगा आदि, मछली एवं पक्षियों से लाभ होता है॥१३॥
कुम्भाख्यकारकांशे च तडागादीनि कारयेत्।
कीर्त्तिमान्धर्मवान्सोऽपि जायते द्विजसत्तम ॥१४॥

.कारकांशफलमाह ११५
कुम्भांश में कारक हो तो तालाब आदि का रचयिता, यशस्वी और
धार्मिक होता है॥१४॥
मीने च कारकांशे वै सायुज्यमुक्तिभाग्भवेत्।
शुभयोगे शुभं ब्रूयात्रशुभं विपरीतके॥१५॥
मीनांश में कारक हो तो साक्षात् मोक्ष पाता है। शुभग्रह के योग से
शुभ फल और पापग्रह के योग से अशुभ फल होता है॥१५॥
शुभांशे शुभराशौ वा कारके धनवान् भवेत्।
लग्नांशे चेच्छुभो वा स्याद्राजा भवति निश्चितम्॥१६॥
यदि आत्मकारक शुभग्रह के अंश में वा शुभग्रह की राशि में हो
तो जातक धनी होता है। एवं आत्मकारकांश में अथवा लग्नांश
में शुभग्रह हो तो निश्चय ही राजा होता है॥१६॥
उपग्रहे शुभांशे चेत्स्वोच्चस्वर्क्षे शुभर्क्षभे।
पापदृग्योगरहिते चान्त्ये कैवल्यं विनिर्दिशेत्॥१७॥
यदि उपग्रह शुभग्रह के अंश में हो अथवा अपनी उच्चराशि या
अपनी राशि के शुभग्रह की राशि में हो, पापग्रह के दृष्टि और योग
से रहित हो तो अन्त में मोक्ष की प्राप्ति होती है॥१७॥
चन्द्रभृग्वारवर्गस्थे कारके पारदारिकः।
मिश्रे मिश्रं विजानीयाद्विपरीते विपर्ययम्॥१८॥
यदि आत्मकारक चन्द्र, शुक्र या भौम के षड्वर्ग में हो तो परस्त्री का
सुख भोगने वाला होता है। उपर्युक्त फलों में मिश्रित ग्रह (शुभ और पाप
दोनों) का संबंध हो तो मिश्रित फल और विपरीत हो तो विपरीत फल कहना
चाहिए॥१८॥
कारकांशस्थितग्रहाणां फलम्-
अथैकः कारकांशेषु रव्यादिस्तिष्ठति ग्रहः।
तेषां फलं प्रवक्ष्यामि शृणु त्वं द्विजसत्तम॥१९॥
अब सूर्यादि ग्रहों का फल आत्मकारकांश के अनुसार कह रहा हूँ॥१९॥
कारकांशे यदा सूर्यस्तिष्ठति द्विजवीर्ययुक्।
आदावन्ते पुमान् सोऽपि राजकार्येषु तत्परः॥२०॥
यदि आत्मकारकांश में बलवान् सूर्य हो तो जातक अवस्था के आदि
और अंत मे राजकर्मचारी होता है॥२०॥

११६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
कारकांशे तु पूर्णेन्दुर्दैत्याचार्येण वीक्षितः।
शतभोगी भवेत्सोऽथ विद्याजीवी च जायते ।।२१।।
यदि कारकांश में पूर्णचन्द्रमा हो और शुक्र से देखा जाता हो तो १००
वर्ष की आयु होती है और विद्या द्वारा जीविका होती है।।२१।।
कारकांशे यदा भौमे बलाढ्येन युतेक्षिते।
रसवादी कुन्तधारी वह्निकृज्जीवनं भवेत् ।।२२।।
यदि कारकांश में भौम हो और किसी बली ग्रह से युत वा दृष्ट हो
तो रस बनाने वाला, कुंत (माला) धारण करने वाला और अग्नि
द्वारा जीविका प्राप्त करने वाला होता है।।२२।।
कारकांशे यदा सौम्यः तिष्ठत्येव बलाढ्यकः।
शिल्पको व्यवहारी च वणिक्कृत्यकसे द्विज ।।२३।।
यदि कारकांश में बुध हो तो और बली हो तो शिल्पी, व्यवहारी
और बनिए का कार्य करने वाला होता है।।२३।।
कारकांशे गुरौ विप्र कर्मनिष्ठापरो भवेत्।
सर्वशास्त्राधिकारी च विख्यातः क्षितिमण्डले ।।२४।।
यदि कारकांश में गुरु हो तो कर्म करने वाला, सभी शास्त्रों का
अधिकारी और पृथ्वी पर प्रसिद्ध होता है।।२४।।
कारकांशे यदा शुक्रो राजमान्यः सदा भवेत्।
सदिन्द्रियः शतायुश्च कथनीयं द्विजोत्तम ।।२५।।
यदि कारकांश में शुक्र हो तो राजा से सम्मान प्राप्त करता है, सुन्दर
और १०० वर्ष की आयु वाला होता है।।२५।।
कारकांशे यदा सौरिर्मृत्युलोके प्रसिद्धियुक्।
महतां कर्मणां वृत्तिः क्षितिपालेन पूजितः।।२६।।
कारकांश में शनि हो तो संसार में प्रसिद्ध, बड़े कार्यों को करने वाला
और राजा से पूजित होता है।।२६।।
कारकांशे यदा राहुर्धनुर्धारी प्रजायते।
जाङ्गल्यलौहयन्त्रादिकारकश्चौरसङ्गमी ।।२७।।
कारकांश में राहु हो तो धनुष धारण करने वाला, जंगली, लोह के
यंत्रों को बनाने वाला, चोर और संयमी होता है।।२७।।

कारकांशफलमाह ११७
कारकांशे यदा केतुस्तिष्ठति द्विजसत्तम।
व्यवहारी गजादीनामुशन्ति परद्रव्यके ॥१२८॥
कारकांश में केतु हो तो हाथी आदि का व्यवहार दूसरे के द्रव्य से करने
वाला होता है॥१२८॥
कारकांशे यदा विप्र संस्थितौ रविसैंहिकौ।
सर्पाद्भीतिर्भवेन्मृत्युः शुभदृष्ट्या निवर्तते ॥१२९॥
यदि कारकांश में सूर्य और राहु हों तो सर्प से भय या मृत्यु होती है,
शुभग्रह की दृष्टि हो तो निवृत्ति हो जाती है॥१२९॥
कारकांशे भानुतमौ शुभषड्वर्गसंयुतौ।
विषवैद्यो भवेन्नूनं विषहर्ता विचक्षण॥१३०॥
कारकांश में सूर्य और राहु हों और शुभ ग्रह के षड्वर्ग में हों तो विषवैद्य
या विष का हरण करने वाला होता है॥१३०॥
भौमेक्षिते कारकांशे भानुस्वर्भानुसंयुते।
अन्यग्रहा न पश्यन्ति स्ववेश्मपरदाहकः॥१३१॥
कारकांश में सूर्य और राहु हों, उसे भौम देखता हो शेष ग्रह न
देखते हो तो अपना और दूसरे का घर जलाने वाला होता है॥१३१॥
सगुलिके कारकांशे पूर्णेन्दुवीक्षिते द्विज।
सति चौरैर्णीतधनः स्वयं चौरोऽथवा भवेत्॥१३२॥
कारकांश में गुलिक हो और पूर्ण चन्द्र से देखा जाता हो तो चोरों से
धन अपहृत होता है अथवा स्वयं चोर होता है॥१३२॥
सगुलिके कारकांशे अन्यग्रहयुतेक्षिते।
बुधदृष्टियुते वापि अण्डवृद्धिः प्रजायते॥१३३॥
कारकांश में गुलिक हो और अन्य ग्रहों से देखा जाता हो अथवा बुध
से दृष्ट वा युत हो तो अंडवृद्धि होती है॥१३३॥
कारकांशे केतुयुक्ते पापग्रहनिरीक्षिते।
श्रोत्रच्छेदं भवेन्नूनं कर्णरोगार्तिना द्विज॥१३४॥
कारकांश में केतु हो और पापग्रह से देखा जाता हो तो कर्णरोग से पीड़ित
होने से कान काटा जाता है॥१३४।
कारकांशे स्थिते केतौ भृगुणा च समीक्षिते।
युते वा जायते विप्र क्रियाकर्मसमन्वितः॥१३५॥

११८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
कारकांश में केतु हो और शुक्र से दृष्ट वा युत हो तो क्रिया-कर्म
से युक्त होता है।।३५।।
कारकांशे स्थिते केतौ शनिसौम्यनिरीक्षिते।
बलवीर्येण रहितो जायते सोऽपि मानवः।।३६।।
कारकांश में केतु हो, शनि-बुध से देखा जाता हो तो मनुष्य बलवीर्य
से हीन होता है।।३६।।
सकेतौ कारकांशे च बुधशुक्रनिरीक्षिते।
जायते पौनःपुनिको दासीपुत्रोऽथवा भवेत् ।।३७।।
कारकांश में केतु हो और बुध-शुक्र से देखा जाता हो तो रुक-रुक कर
बोलने वाला या दासीपुत्र होता है।।३७।।
सकेतौ कारकांशे च अन्यग्रहनिरीक्षिते।
शनिदृष्टिविहीने च सत्याच्च रहितो भवेत् ।।३८।।
कारकांश में केतु हो, शनि को छोड़कर शेष ग्रह देखते हों तो असत्य
बोलने वाला होता है।।३८।।
कारकांशे यदा विप्र भृगुभास्करवीक्षिते।
राजप्रेष्यो भवेद्बालो जायते नात्र संशयः ।।३९।।
यदि कारकांश को शुक्र-सूर्य देखते हों तो जातक राजा का नौकर होता
है।।३९।।
कारकांशाद्धनभावफलम्—
अंशात्कुटुम्बे भृग्वारवर्गे स्यात्पारदारिकः।
तयोर्दृग्योगकाभ्यां च भवेदामरणं किल ।।४०।।
कारकांश से धन भाव में शुक्र-भौम का षड्वर्ग हो तो परस्त्रीगामी
होता है। यदि शुक्र-भौम देखते हों तो आमरण परस्त्रीगामी होता है।।४०।।
केतुना प्रतिबन्धः स्याद्गुरुणा स्त्रैण एव च।
राहुणा चार्थनिवृत्तिः स्याद्धने एवं फलं भवेत् ।।४१।।
केतु देखता हो तो नहीं होता है, गुरु देखता हो तो स्त्री के वश में
होता है, राहु देखता हो तो परस्त्री के लिए द्रव्य खर्च करता है।।४१।।

कारकांशफलमाह १११ .
कारकांशात्तृतीये च पापखेटयुतेक्षिते।
सशूरो जायते बालो वीर्यवान्बहुविक्रमी ।।४२।।
कारकांश से तीसरे भोव में पापग्रह युत हो वा देखते हों तो
बालक शूरवीर एवं पराक्रमी होता है ।।४२।।
कारकांशात्तृतीये च शुभखेटयुतेक्षिते।
जायते तत्त्वहृदयः कातरोऽपि विशेषतः ।।४३।।
कारकांश से तीसरे भाव में शुभग्रह हों वा देखते हों तो बालक शुद्ध
हृदय का और विशेषकर कातर होता है ।।४३।।
कारकांशात्तृतीये च षष्ठे पापयुतेक्षिते।
कृषिकर्मरतो नित्यं जायते नात्र संशयः ।।४४।।
कारकांश से तीसरे व छठे भाव में पापग्रह हों या देखते हों तो बालक
कृषिकर्म को करने वाला होता है ।।४४।।
कारकांशाच्चतुर्थभावफलम्-
पाताले कारकांशाच्च शशिशुक्रयुतेक्षिते।
प्रासादवान् भवेद्बालो विचित्रगृहवांन्भवेत् ।।४५।।
कारकांश से चतुर्थ स्थान में चन्द्रमा, शुक्र युत हों वा देखते हों तो
विचित्र प्रासाद (किला) या गृह वाला होता है ।।४५।।
कारकांशाच्च पाताले तुङ्गर्क्षे कोऽपि खेचरः।
हर्म्यमन्दिरसंयुक्तो ह्यंत्युच्चो बहुदीप्तिमान् ।।४६।।
चौथे में यदि कोई ग्रह अपनी उच्चराशि का हो तो बहुत ऊँचा, खूबसूरत
एवं प्रकाशमान् गृह होता है ।।४६।।
कारकांशाच्च पाताले शनिराहुयुतेक्षिते।
विप्रेच्छाटनपट्टीयुग्जायते मन्दिरं द्विज ।।४७।।
कारकांश से चौथे भाव में शनि-राहु हों या देखते हों तो पत्थर
का गृह होता है ।।४७।।
कारकांशाच्च पाताले कुजकेतुशनीक्षिते।
ऐष्टिकं मन्दिरं तस्य जायते नात्र संशयः ।।४८।।
कारकांश से चौथे भाव में भौम, केतु एवं शनि हों वा देखते हों तो ईंटे
का मकान होता है ।।४८।।

१२० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
कारकांशाच्च पाताले गुरुयुक्तनिरीक्षिते ।
दारवं मन्दिरं तस्य जायते नात्र संशयः ॥४९॥
कारकांश से चौथे भाव में गुरु युक्त हो वा देखता हो तो लकड़ी का
गृह होता है॥४९॥
कारकांशाच्च पाताले रवियुक्तनिरीक्षिते ।
तृणावेष्टितगृहं तस्य जायते नात्र संशयः॥५०॥
कारकांश से चौथे भाव में सूर्य युत हो वा देखता हो तो फूस
का गृह होता है॥५०॥
कारकांशात्पञ्चमभावफलम्—
स्वांशे तत्सुते वापि गुरुचन्द्राभ्यां च ग्रन्थकृत्।
भृगुणा किञ्चिदूनोऽसौ तस्मान्न्यूनो बुधेन च ॥५१॥
आत्मकारकांश में अथवा उससे पाँचवें स्थान में चन्द्रमा-गुरु हों तो ग्रंथ
बनाने वाला होता है।
यदि शुक्र हों तो कुछ न्यून होता है और बुध हो तों और भी न्यून होता
है॥५१॥
सुराचार्येण सर्वज्ञः ग्रन्थकर्त्ता तथैव च।
वेदवेदान्तविच्चापि न वाग्मी शाब्दिकेऽपि च ॥५२॥
केवल गुरु हो तो सर्वज्ञ और ग्रन्थकर्त्ता होता है तथा वेद-वेदान्त को
जानने वाला वैयाकरणी होते हुए भी वाग्मी नहीं होता है॥५२॥
न्यायज्ञः धरणीजेन बुधे मीमांसकस्तथा।
सभामूकस्तु शनिना गीतज्ञो रविणा तथा ॥५३॥
यदि भौम हो तो नैयायिक, बुध हो तो मीमांसक, शनि हो तो सभा में
मूक रहने हाला और सूर्य हो तो गानविद्या में पंडित ॥५३॥
शशिना सांख्ययोगज्ञः काव्यज्ञश्च तथा द्विज।
केतुना गणितज्ञश्च जायते नात्र संशयः॥५४॥
चन्द्रमा हो तो सांख्यशास्त्र और काव्य का पंडित और केतु हो तो
गणित का पंडित होता है॥५४॥
उक्तफलानां साफल्यं गुरुसम्बन्धमात्रतः।
कारकांशाद्धने केचित्फलमेवं ब्रुवन्ति हि॥५५॥