बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ कारकाध्यायः ६९
और राजकुल में उत्पन्न हो और योग होता हो तो अवश्य राजा होता
है। इस प्रकार कुल के अनुसार कारकों का फल होता है॥२६॥
अथ स्थिरकारकमाह—
अधुना सम्प्रवक्ष्यामि कारकाणि स्थिराणि च।
सूर्यादीनां ग्रहाणां च वीर्यवान् कारको भवेत्॥२७॥
अब मैं स्थिर कारकों को कह रहा हूँ। सूर्य आदि ग्रहों के बलाबल
के अनुसार ये कारक होते हैं॥२७॥
बलवान् जायते विप्र जन्मनि रविशुक्रयोः।
स पितृकारको ज्ञेयो निर्विशङ्कं द्विजोत्तम॥२८॥
जन्मकाल में रवि और शुक्र में जो बलवान् हो वह पितृकारक होता
है॥२८॥
चन्द्रारयोश्च बलवान् मातृकारक उच्यते।
भौमतस्तु विशेषेण भगिनीदारभ्रातृकौ॥२९॥
चंद्रमा और भौम में जो बलवान् हो वह भावकारक होता है॥ विशेषतः
भौम से बहिन और साला (स्त्री के भाई) का विचार होता है॥२९॥
बुधान्मातुलमाख्यातो मातृतुल्यानपि द्विज।
गुरुणा चात्र विज्ञेया पुत्रस्वामिपितामहाः॥३०॥
बुध से मामा और मातृसदृश (मौसी) आदि का विचार होता है॥ गुरु
से पुत्र और पितामह आदि का विचार होता है॥३०॥
स्वभार्यामातृपितरौ तथा मातामही द्विज।
भृगुद्वारा विजानीयादेतेषां शुक्रकारकाः॥३१॥
सास-ससुर और नानी का विचार शुक्र से होता है॥ यही उनका कारक
होता है॥३१॥
सूर्याच्च पुण्यभे तात इन्दोर्माता चतुर्थतः।
कुजात्तृतीयतो भ्राता मातुलो रिपुभाद्बुधात्॥३२॥
सूर्य से ९वें स्थान में पिता का, चन्द्रमा से चतुर्थ स्थान पर माता
का, भौम से तीसरे भाई का, बुध से छठे मामा का॥३२॥
देवेज्यात्पञ्चमे पुत्रो दैत्येज्याद्यूनभे स्त्रियः।
मन्दादष्टमतो मृत्युस्तातादीनां विचिन्तयेत्॥३३॥