बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
कारकांशाच्च पाताले गुरुयुक्तनिरीक्षिते ।
दारवं मन्दिरं तस्य जायते नात्र संशयः ॥४९॥
कारकांश से चौथे भाव में गुरु युक्त हो वा देखता हो तो लकड़ी का
गृह होता है॥४९॥
कारकांशाच्च पाताले रवियुक्तनिरीक्षिते ।
तृणावेष्टितगृहं तस्य जायते नात्र संशयः॥५०॥
कारकांश से चौथे भाव में सूर्य युत हो वा देखता हो तो फूस
का गृह होता है॥५०॥
कारकांशात्पञ्चमभावफलम्—
स्वांशे तत्सुते वापि गुरुचन्द्राभ्यां च ग्रन्थकृत्।
भृगुणा किञ्चिदूनोऽसौ तस्मान्न्यूनो बुधेन च ॥५१॥
आत्मकारकांश में अथवा उससे पाँचवें स्थान में चन्द्रमा-गुरु हों तो ग्रंथ
बनाने वाला होता है।
यदि शुक्र हों तो कुछ न्यून होता है और बुध हो तों और भी न्यून होता
है॥५१॥
सुराचार्येण सर्वज्ञः ग्रन्थकर्त्ता तथैव च।
वेदवेदान्तविच्चापि न वाग्मी शाब्दिकेऽपि च ॥५२॥
केवल गुरु हो तो सर्वज्ञ और ग्रन्थकर्त्ता होता है तथा वेद-वेदान्त को
जानने वाला वैयाकरणी होते हुए भी वाग्मी नहीं होता है॥५२॥
न्यायज्ञः धरणीजेन बुधे मीमांसकस्तथा।
सभामूकस्तु शनिना गीतज्ञो रविणा तथा ॥५३॥
यदि भौम हो तो नैयायिक, बुध हो तो मीमांसक, शनि हो तो सभा में
मूक रहने हाला और सूर्य हो तो गानविद्या में पंडित ॥५३॥
शशिना सांख्ययोगज्ञः काव्यज्ञश्च तथा द्विज।
केतुना गणितज्ञश्च जायते नात्र संशयः॥५४॥
चन्द्रमा हो तो सांख्यशास्त्र और काव्य का पंडित और केतु हो तो
गणित का पंडित होता है॥५४॥
उक्तफलानां साफल्यं गुरुसम्बन्धमात्रतः।
कारकांशाद्धने केचित्फलमेवं ब्रुवन्ति हि॥५५॥