बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथार्गलाध्यायः १०१
चौथे, दूसरे और एकादश भाव में ग्रहों के होने से अर्गला योग होता
है और उसकी दृष्टि आदि पूर्वोक्त प्रकार से ही होती है।।२।।
एकग्रहार्गलाल्पं च द्विग्रहा मध्यमा भवेत्।
त्रयेण ग्रहयोगेन अर्गला पूर्णमुच्यते ।।३।।
वह भी एक ग्रह के होने से अल्प, दो ग्रह के होने से मध्यम और तीन
ग्रह के होने से पूर्ण अर्गला होती है।।३।।
राश्यर्गलापि सा ज्ञेया ग्रहयुक्ता विशेषतः।
तुर्यवित्तैकादशेषु यस्य कस्यार्गला भवेत् ।।४।।
इसी प्रकार किसी राशि से उक्त स्थानों में राशि की अर्गला होती
है। चौथे, दूसरे और एकादश भाव की अर्गला जिस किसी की होती
है।।४।।
द्विविधा सार्गला विप्र ब्रह्मणा चोदितं पुरा।
शुभकृत् पापकृच्चैव तन्वादीनां विचिन्तयेत् ।।५।।
वह दो प्रकार की होती है। शुभग्रह और पापग्रह कृत होती है।।५।।
भिन्नार्गलां पुनर्वक्ष्ये चतुर्थार्गलपापयुक्।
तृतीये तु यदा विप्र बहुपापयुते सति ।।६।।
एक भिन्न अर्गला होती है जो कि चौथी होती है। वह तीसरे भाव में
अधिक पापग्रहों के होने से होती है।।६।।
बहुपापा तृतीयस्था पापषड्वर्गयोगतः।
पापार्जितः पापदृष्ट्या संयुक्तार्गलकारकः ।।७।।
तृतीये शुभसम्बन्धे शुभक्षेत्रे शुभान्विते।
शुभवर्गे च षड्वर्गे विज्ञेयं तुर्यमर्गला ।।८।।
तीसरे भाव में शुभग्रह का संबन्ध हो, शुभग्रह की राशि हो, शुभग्रह
देखता हो, शुभग्रह का षड्वर्ग हो तो चौथा अर्गला योग होता है।।७-८।।
तुर्यवित्तैकादशे च पापयुग्वा शुभोऽपि वा।
उभयक्षेत्रसम्बन्धे अर्गलां कारयेद्द्विज।।९।।
चौथे, दूसरे, एकादश भाव में पापग्रह युत हो वा शुभग्रह हो, दोनों
के संबंध से अर्गला योग होता है।।९।।
तृतीये बहुपापस्थे बहुयुक्तार्गला भवेत्।
निर्बाधिका तु सा ज्ञेया निर्विशङ्कं द्विजोत्तम ।।१०।।