बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
षोडशवर्गाध्यायः ५९
| सं. | स्वामी | मे. | वृ. | मि. | क. | सिं. | कं. | तु. | वृ. | ध. | म. | कुं. | मी. | अ. | क. | वि. |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १० | पितर | ७ | १० | १ | ४ | ७ | १० | १ | ४ | ७ | १० | १ | ४ | ११ | ६ | ४० |
| ११ | यम | ८ | ११ | २ | ५ | ८ | ११ | २ | ५ | ८ | ११ | २ | ५ | १२ | १३ | २० |
| १२ | अर्यमा | ९ | १२ | ३ | ६ | ९ | १२ | ३ | ६ | ९ | १२ | ३ | ६ | १३ | २० | ० |
| १३ | अर्क | १० | १ | ४ | ७ | १० | १ | ४ | ७ | १० | १ | ४ | ७ | १४ | २६ | ४० |
| १४ | त्वष्टा | ११ | २ | ५ | ८ | ११ | २ | ५ | ८ | ११ | २ | ५ | ८ | १५ | ३३ | २० |
| १५ | वायु | १२ | ३ | ६ | ९ | १२ | ३ | ६ | ९ | १२ | ३ | ६ | ९ | १६ | ४० | ० |
| १६ | शक्राग्नि | १ | ४ | ७ | १० | १ | ४ | ७ | १० | १ | ४ | ७ | १० | १७ | ४६ | २० |
| १७ | मित्र | २ | ५ | ८ | ११ | २ | ५ | ८ | ११ | २ | ५ | ८ | ११ | १८ | ५३ | २० |
| १८ | वासव | ३ | ६ | ९ | १२ | ३ | ६ | ९ | १२ | ३ | ६ | ९ | १२ | २० | ० | ० |
| १९ | निर्ऋति | ४ | ७ | १० | १ | ४ | ७ | १० | १ | ४ | ७ | १० | १ | २१ | ६ | ४० |
| २० | उदक | ५ | ८ | ११ | २ | ५ | ८ | ११ | २ | ५ | ८ | ११ | २ | २२ | १३ | २० |
| २१ | विश्वेदे | ६ | ९ | १२ | ३ | ६ | ९ | १२ | ३ | ६ | ९ | १२ | ३ | २३ | २० | ० |
| २२ | गोविंद | ७ | १० | १ | ४ | ७ | १० | १ | ४ | ७ | १० | १ | ४ | २४ | २६ | ४० |
| २३ | वसु | ८ | ११ | २ | ५ | ८ | ११ | २ | ५ | ८ | ११ | २ | ५ | २५ | ३३ | २० |
| २४ | वरुण | ९ | १२ | ३ | ६ | ९ | १२ | ३ | ६ | ९ | १२ | ३ | ६ | २६ | ४० | ० |
| २५ | अजपात् | १० | १ | ४ | ७ | १० | १ | ४ | ७ | १० | १ | ४ | ७ | २७ | ४६ | ४० |
| २६ | अहिर्बुध्न्य | ११ | २ | ५ | ८ | ११ | २ | ५ | ८ | ११ | २ | ५ | ८ | २८ | ५३ | २० |
| २७ | पूषा | १२ | ३ | ६ | ९ | १२ | ३ | ६ | ९ | १२ | ३ | ६ | ९ | ३० | ० | ० |
| अथ त्रिंशांशमाह— | ||||||||||||||||
| त्रिंशांशेशाश्च विषमे कुजार्कीज्यज्ञभार्गवाः। | ||||||||||||||||
| पञ्चपञ्चाष्टसप्ताक्षभागा व्यत्ययतः समे॥२६॥ | ||||||||||||||||
| वहिनः समीरशक्रौ च धनदो जलदस्तथा। | ||||||||||||||||
| विषमेषु क्रमाज्ज्ञेया समराशौ विपर्ययम्॥२७॥ | ||||||||||||||||
| विषम राशि में भौम, शनि, गुरु, बुध और शुक्र का क्रम से ५, ५, ८, ७, ५ | ||||||||||||||||
| अंश और सम राशि में शुक्र, बुध, गुरु, शनि और भौम का क्रम से | ||||||||||||||||
| ५, ७, ८, ५, ५ अंश त्रिंशांश होता है। विषम राशि में क्रम से वहिन, वायु, इन्द्र, | ||||||||||||||||
| धनद और जलद तथा सम राशि में जलद, धनद, इन्द्र, वायु और अग्नि | ||||||||||||||||
| अधिपति होते हैं।। २६-२७ ।। | ||||||||||||||||
| उदाहरण— लग्न ९।१५।२२।३७ है। लग्न सम है अतः गुरु का | ||||||||||||||||
| त्रिंशांश हुआ और इन्द्र स्वामी हुए। |
६० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
विषमे त्रिंशांशचक्रम्— समराशौ त्रिंशांशचक्रम्—
| अं. | स्वामी | मे. | मि. | सिं. | तु. | घ. | कुं. | वृ. | क. | क. | वृ. | म. | मी. | स्वामी | |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ५ | वह्नि | मं. | मं. | मं. | मं. | मं. | मं. | ५ | शु. | शु. | शु. | शु. | शु. | शु. | जलद |
| १० | वायु | श. | श. | श. | श. | श. | श. | १२ | बु. | बु. | बु. | बु. | बु. | बु. | घनद |
| १८ | इन्द्र | बृ. | बृ. | बृ. | बृ. | बृ. | बृ. | २० | बृ. | बृ. | बृ. | बृ. | बृ. | बृ. | इन्द्र |
| २५ | घनद | बु. | बु. | बु. | बु. | बु. | बु. | २५ | श. | श. | श. | श. | श. | श. | वायु |
| ३० | जलद | शु. | शु. | शु. | शु. | शु. | शु. | ३० | मं. | मं. | मं. | मं. | मं. | मं. | वह्नि |
अथ खवेदांशमाह—
चत्वारिंशतिभागानामधिपा विषमे क्रियात्।
विष्णुश्चन्द्रो मरीचिश्च त्वष्टा धाता शिवो रविः ॥२८॥
यमो यक्षेशगन्धर्वः कालो वरुण एव च।
समभे तुलतो ज्ञेयाः स्वस्वाधिपसमन्विताः ॥२९॥
विषम राशि में मेष से और सम राशि में तुला राशि से ४०वाँ अंश
आरम्भ होता है। क्रम से विष्णु, चन्द्र, मरीचि, त्वष्टा, धाता, शिव,
रवि, यम, यक्षेश, गंधर्व, काल, वरुण यही स्वामी होते हैं ।। २८-२९ ।।
उदाहरण—लग्न ९।१५।२२।३७ है। एक चालीसवाँ अंश ४५ कला का
होता है। इस हिसाब से २१वाँ भाग मिथुन राशि बुध का अंश और यक्षेश
स्वामी हुए।
खवेदांशचक्रम्—
| सं. | स्वामी | मे. | वृ. | मि. | क. | सिं. | कं. | तु. | वृ. | घ. | म. | कुं. | मी. | अं.क. |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १ | विष्णु | १ | ७ | १ | ७ | १ | ७ | १ | ७ | १ | ७ | १ | ७ | ०।४५ |
| २ | चन्द्रः | २ | ८ | २ | ८ | २ | ८ | २ | ८ | २ | ८ | २ | ८ | १।३० |
| ३ | मरीचि | ३ | ९ | ३ | ९ | ३ | ९ | ३ | ९ | ३ | ९ | ३ | ९ | २।१५ |
| ४ | त्वष्टा | ४ | १० | ४ | १० | ४ | १० | ४ | १० | ४ | १० | ४ | १० | ३।० |
| ५ | धाता | ५ | ११ | ५ | ११ | ५ | ११ | ५ | ११ | ५ | ११ | ५ | ११ | ३।४५ |
| ६ | शिव | ६ | १२ | ६ | १२ | ६ | १२ | ६ | १२ | ६ | १२ | ६ | १२ | ४।३० |
| ७ | रवि | ७ | १ | ७ | १ | ७ | १ | ७ | १ | ७ | १ | ७ | १ | ५।१५ |
| ८ | यम | ८ | २ | ८ | २ | ८ | २ | ८ | २ | ८ | २ | ८ | २ | ६।० |
| ९ | यक्षेश | ९ | ३ | ९ | ३ | ९ | ३ | ९ | ३ | ९ | ३ | ९ | ३ | ६।४५ |
| १० | गंधर्व | १० | ४ | १० | ४ | १० | ४ | १० | ४ | १० | ४ | १० | ४ | ७।३० |
| ११ | काल | ११ | ५ | ११ | ५ | ११ | ५ | ११ | ५ | ११ | ५ | ११ | ५ | ८।१५ |
| १२ | वरुण | १२ | ६ | १२ | ६ | १२ | ६ | १२ | ६ | १२ | ६ | १२ | ६ | ९।० |
| १३ | विष्णु | १ | ७ | १ | ७ | १ | ७ | १ | ७ | १ | ७ | १ | ७ | ९।४५ |
इस चक्र का शेष आगे पृष्ठ में देखें।
षोडशवर्गाध्यायः ६१
| सं. | स्वामी | मे. | वृ. | मि. | क. | सिं. | कं. | तु. | वृ. | ध. | म. | कुं. | मी. | अं. क. |
| १४ | चन्द्र | २ | ८ | २ | ८ | २ | ८ | २ | ८ | २ | ८ | २ | ८ | १०।३० |
| १५ | मरीचि | ३ | ९ | ३ | ९ | ३ | ९ | ३ | ९ | ३ | ९ | ३ | ९ | ११।१५ |
| १६ | त्वष्टा | ४ | १० | ४ | १० | ४ | १० | ४ | १० | ४ | १० | ४ | १० | १२।० |
| १७ | धाता | ५ | ११ | ५ | ११ | ५ | ११ | ५ | ११ | ५ | ११ | ५ | ११ | १२।४५ |
| १८ | शिव | ६ | १२ | ६ | १२ | ६ | १२ | ६ | १२ | ६ | १२ | ६ | १२ | १३।३० |
| १९ | रवि | ७ | १ | ७ | १ | ७ | १ | ७ | १ | ७ | १ | ७ | १ | १४।१५ |
| २० | यम | ८ | २ | ८ | २ | ८ | २ | ८ | २ | ८ | २ | ८ | २ | १५।० |
| २१ | यक्षेश | ९ | ३ | ९ | ३ | ९ | ३ | ९ | ३ | ९ | ३ | ९ | ३ | १५।४५ |
| २२ | गंधर्व | १० | ४ | १० | ४ | १० | ४ | १० | ४ | १० | ४ | १० | ४ | १६।३० |
| २३ | काल | ११ | ५ | ११ | ५ | ११ | ५ | ११ | ५ | ११ | ५ | ११ | ५ | १७।१५ |
| २४ | वरुण | १२ | ६ | १२ | ६ | १२ | ६ | १२ | ६ | १२ | ६ | १२ | ६ | १८।० |
| २५ | विष्णु | १ | ७ | १ | ७ | १ | ७ | १ | ७ | १ | ७ | १ | ७ | १८।४५ |
| २६ | चन्द्र | २ | ८ | २ | ८ | २ | ८ | २ | ८ | २ | ८ | २ | ८ | १९।३० |
| २७ | मरीचि | ३ | ९ | ३ | ९ | ३ | ९ | ३ | ९ | ३ | ९ | ३ | ९ | २०।१५ |
| २८ | त्वष्टा | ४ | १० | ४ | १० | ४ | १० | ४ | १० | ४ | १० | ४ | १० | २१।० |
| २९ | धाता | ५ | ११ | ५ | ११ | ५ | ११ | ५ | ११ | ५ | ११ | ५ | ११ | २१।४५ |
| ३० | शिव | ६ | १२ | ६ | १२ | ६ | १२ | ६ | १२ | ६ | १२ | ६ | १२ | २२।३० |
| ३१ | रवि | ७ | १ | ७ | १ | ७ | १ | ७ | १ | ७ | १ | ७ | १ | २३।१५ |
| ३२ | यम | ८ | २ | ८ | २ | ८ | २ | ८ | २ | ८ | २ | ८ | २ | २४।० |
| ३३ | यक्षेश | ९ | ३ | ९ | ३ | ९ | ३ | ९ | ३ | ९ | ३ | ९ | ३ | २४।४५ |
| ३४ | गंधर्व | १० | ४ | १० | ४ | १० | ४ | १० | ४ | १० | ४ | १० | ४ | २५।३० |
| ३५ | काल | ११ | ५ | ११ | ५ | ११ | ५ | ११ | ५ | ११ | ५ | ११ | ५ | २६।१५ |
| ३६ | वरुण | १२ | ६ | १२ | ६ | १२ | ६ | १२ | ६ | १२ | ६ | १२ | ६ | २७।० |
| ३७ | विष्णु | १ | ७ | १ | ७ | १ | ७ | १ | ७ | १ | ७ | १ | ७ | २७।४५ |
| ३८ | चन्द्र | २ | ८ | २ | ८ | २ | ८ | २ | ८ | २ | ८ | २ | ८ | २८।३० |
| ३९ | मरीचि | ३ | ९ | ३ | ९ | ३ | ९ | ३ | ९ | ३ | ९ | ३ | ९ | २९।१५ |
| ४० | त्वष्टा | ४ | १० | ४ | १० | ४ | १० | ४ | १० | ४ | १० | ४ | १० | ३०।० |
अथाक्षवेदांशमाह—
तथाक्षवेदभागानामधिपाश्चलभे क्रियात्।
स्थिरे सिंहाद्द्विस्वभावे चापाद्ब्रह्मेशकेशवाः।
ईशाच्युतसुरज्येष्ठविष्णुकेशाश्चरादिषु ।।३०।।
चर राशि में मेष से, स्थिर राशि में सिंह से और द्विस्वभाव राशि में धन
राशि से गणना करने से अक्षवेदांश के स्वामी होते हैं और चर, स्थिर,
६२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
द्विस्वभाव के क्रम से ब्रह्मा, शंकर, विष्णु; शंकर, विष्णु, ब्रह्मा; विष्णु, ब्रह्मा,
शंकर ये स्वामी होते हैं॥३०॥
उदाहरण— लग्न ९।१५।२२।३७ है। ४० कला का एक भाग होता है,
अतः २४वाँ मीन राशि अर्थात् गुरु का अक्षवेदांश हुआ और विष्णु स्वामी
हुए।
अक्षवेदांशचक्रम्—
| ब्रह्मा | शं. | वि. | ब्र. | शं. | वि. | ब्र. | शं. | वि. | ब्र. | शं. | विष्णु | |||
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| शंकर | वि. | ब्र. | शं. | वि. | ब्र. | शं. | वि. | ब्र. | शं. | वि. | ब्रह्मा | |||
| विष्णु | ब्र. | शं. | वि. | ब्र. | शं. | वि. | ब्र. | शं. | वि. | ब्र. | शंकर | |||
| सं. | मे. | वृ. | मि. | क. | सिं. | कं. | तु. | वृ. | ध. | म. | कुं. | मी. | अं. | क. |
| १ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | ० | ४० |
| २ | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | १ | २० |
| ३ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | २ | ० |
| ४ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | २ | ४० |
| ५ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ३ | २० |
| ६ | ६ | १० | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | २ | ४ | ० |
| ७ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | ४ | ४० |
| ८ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | ५ | २० |
| ९ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ६ | ० |
| १० | १० | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | २ | ६ | ६ | ४० |
| ११ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ७ | २० |
| १२ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | ८ | ० |
| १३ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | ८ | ४० |
| १४ | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | ९ | २० |
| १५ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | १० | ० |
| १६ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | १० | ४० |
| १७ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ११ | २० |
| १८ | ६ | १० | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | २ | १२ | ० |
| १९ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | १२ | ४० |
| २० | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | १३ | २० |
| २१ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | १४ | ० |
| २२ | १० | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | २ | ६ | १४ | ४० |
| २३ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | १५ | २० |
| २४ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १६ | ० |
| २५ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १६ | ४० |
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षोडशवर्गाध्यायः ६३
| | ब्रह्मा | शं. | वि. | ब्र. | शं. | वि. | ब्र. | शं. | वि. | ब्र. | शं. | विष्णु | | |
| | शंकर | वि. | ब्र. | शं. | वि. | ब्र. | शं. | वि. | ब्र. | शं. | वि. | ब्रह्मा | | |
| | विष्णु | ब्र. | शं. | वि. | ब्र. | शं. | वि. | ब्र. | शं. | वि. | ब्र. | शंकर | | |
| सं. | मे. | वृ. | मि. | क. | सिं. | कं. | तु. | वृ. | ध. | म. | कुं. | मी. | अं. | क. |
| २६ | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | १७ | २० |
| २७ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | १८ | ० |
| २८ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | १८ | ४० |
| २९ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | १९ | २० |
| ३० | ६ | १० | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | २ | २० | ० |
| ३१ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | २० | ४० |
| ३२ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | २१ | २० |
| ३३ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | २२ | ० |
| ३४ | १० | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | २ | ६ | २२ | ४० |
| ३५ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | २३ | २० |
| ३६ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | २४ | ० |
| ३७ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | २४ | ४० |
| ३८ | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | २५ | २० |
| ३९ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | २६ | ० |
| ४० | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | २६ | ४० |
| ४१ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | २७ | २० |
| ४२ | ६ | १० | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | २ | ६ | १० | २ | २८ | ० |
| ४३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | ७ | ११ | ३ | २८ | ४० |
| ४४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | ८ | १२ | ४ | २९ | २० |
| ४५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ९ | १ | ५ | ३० | ० |
अथ षष्ट्यंशमाह-
घोरश्च राक्षसो देवः कुबेरो यक्षकिन्नरौ।
भ्रष्टः कुलघ्नो गरलो वह्निर्माया पुरीषकः ।।३१।।
विषम राशि में १ घोर, २ राक्षस, ३ देव, ४ कुबेर, ५ यक्ष, ६ किन्नर,
७ भ्रष्ट, ८ कुलघ्न, ९ गरल, १० अग्नि, ११ माया, १२ यम (पुरीष) ।।३१।।
अपाम्पतिर्मरुत्वांश्च कालः सर्पामृतेन्दुकाः।
मृदुः कोमलहेरम्बब्रह्मविष्णुमहेश्वराः ।।३२।।
१३ वरुण, १४ इन्द्र, १५ काल, १६ सर्प, १७ अमृत, १८ चन्द्रमा,
१९ मृदु, २० कोयल, २१ हेरम्ब, २२ ब्रह्मा, २३ विष्णु, २४ शिव ।।३२।।
देवाद्रौ कलिनाशश्च क्षितीशकमलाकरौ।
६४ .. बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
गुलिको मृत्युकालश्च दावाग्निर्घोरसंज्ञकः ।। ३३ ।।
२५ देव, २६ आर्द्र, २७ कलिनाश, २८ क्षितीश, २९ कमलाकर, ३०
गुलिक, ३१ मृत्यु, ३२ काल, ३३ दावाग्नि, ३४ घोर ।। ३३ ।।
यमश्च कण्टकसुधाऽमृतौ पूर्णनिशाकरः ।
विषदग्धकुलान्तश्च मुख्यो वंशक्षयस्तथा ।। ३४ ।।
३५ यम, ३६ कंटक, ३७ सुधा, ३८ अमृत, ३९ पूर्णचन्द्र, ४०.
विषदग्ध, ४१ कुलनाश, ४२ मुख्य, ४३ वंशक्षय ।। ३४ ।।
उत्पातकालसौम्याख्याः कोमलः शीतलाभिधः ।
करालदंष्ट्रचन्द्रास्यौ प्रवीणः कालपावकः ।। ३५ ।।
४४ उत्पात, ४५ काल, ४६ सौम्य, ४७ कोमल, ४८ शीतल, ४९
करालदंष्ट्र, ५० इन्दुमुख, ५१ प्रवीण, ५२ कालाग्नि ।। ३५ ।।
दण्डभृन्निर्मलः सौम्यः क्रूरोऽतिशीतलोऽमृतः ।
पयोधि भ्रमणाख्यौ च चन्द्ररेखात्वयुग्मपौ ।। ३६ ।।
५३ दंडभृत्, ५४ निर्मल, ५५ सौम्य, ५६ क्रूर, ५७ अतिशीतल, ५८
अमृत, ५९ भ्रमण और ६० इन्दुरेखा ।। ३६ ।।
समे भे व्यत्ययाज्ज्ञेयाः षष्ठ्यंशाश्च प्रकीर्तिताः ।
षष्ठ्यंशस्वामिनस्त्वोजे तदीशाद् व्यत्ययतः समे ।। ३७ ।।
विषम राशि में घोर आदि और सम राशि में चन्द्ररेखा आदि क्रम से
षष्ठ्यंश के अधिपति होते हैं ।। ३७ ।।
शुभषष्ठ्यंशसंयुक्ता ग्रहाः शुभफलप्रदाः ।
क्रूरषष्ठ्यंशसंयुक्ता नाशयन्ति खचारिणः ।। ३८ ।।
शुभग्रहं के षष्ठ्यंश में ग्रह हो तो शुभफल देता है और क्रूर ग्रह के षष्ठ्यंश
में हो तो नाश करता है ।। ३८ ।।
राशीन् विहाय खेटस्य द्विघ्नमंशाद्यमर्कहृत् ।
शेषं सैकं च तद्राशिनाथ षष्ठ्यंशपाः स्मृताः ।। ३९ ।।
जिस ग्रह का षष्ठ्यंश देखना हो उसकी राशि को छोड़कर अंश,
कला, विकला आदि को २ से गुणा कर गुणनफल में १२ से भाग देने पर
जो शेष बचे उसमें १ जोड़कर जो संख्या हो उतनी ही संख्या वाली ग्रह की
राशि से जो राशि हो उसके स्वामी षष्ठ्यंश के स्वामी होते हैं ।। ३९ ।।
उदाहरण—लग्न ९।१५।२२।३७ है। इसकी राशि को छोड़कर अंशादि
को २ से गुणा करने से ३०।४५।१४ हुआ। इसमें १२ से भाग
षोडशवर्गाध्यायः ६५
देने पर शेष ६ बचा। इसमें १ और जोड़ देने से ७वाँ षष्ठ्यंश हुआ। मकर
से ७वीं राशि कर्क के स्वामी चन्द्रमा षष्ठ्यंश के स्वामी हुए। दूना
किये हुए अंश ३० में १ जोड़ देने से ३१वाँ सम राशि में कुलिक षष्ठ्यंश
का अधिपति हुआ।
अथ षष्ठ्यंशचक्रम्—
| सं. | स्वामी | मे. | वृ. | मि. | क. | सिं. | कं. | तु. | वृ. | ध. | म. | कुं. | मी. | स्वामी | अं. क. |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १ | घोर | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | इन्दुरेखा | ०।३० |
| २ | राक्षस | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | भ्रमण | १।० |
| ३ | देव | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | पयोधीश | १।३० |
| ४ | कुबेर | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३ | सुधा | २।० |
| ५ | यम | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | अ.शीतल | २।३० |
| ६ | किन्नर | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | ५ | क्रूर | ३।० |
| ७ | भ्रष्ट | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | सौम्य | ३।३० |
| ८ | कुलघ्न | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | निर्मल | ४।० |
| ९ | गरल | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | दण्डायुध | ४।३० |
| १० | अग्नि | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | कालाग्नि | ५।० |
| ११ | माया | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | प्रवीण | ५।४० |
| १२ | पुरीष | १२ | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | इन्दुमुखी | ६।० |
| १३ | अपांपति | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | दंष्ट्राकराल | ६।३० |
| १४ | मरुत्वान् | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | शीतल | ७।० |
| १५ | काल | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | कोमल | ७।३० |
| १६ | अहि | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३ | सौम्य | ८।० |
| १७ | अमृत | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | कालरूप | ८।३० |
| १८ | चन्द्र | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | ५ | उत्पात | ९।० |
| १९ | मृदु | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | वंशक्षय | ९।३० |
| २० | कोमल | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | कुलनाश | १०।० |
| २१ | हेरम्ब | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | विषदग्ध | १०।३० |
| २२ | ब्रह्म | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | पूर्णचंद्र | ११।० |
| २३ | विष्णु | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | अमृत | ११।३० |
| २४ | महेश्वर | १२ | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | सुधा | १२।० |
| २५ | देव | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | कंटक | १२।३० |
| २६ | आर्द्र | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | यम | १३।० |
| २७ | कलिनाश | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | घोर | १३।३० |
| इस चक्र का शेष आगे पेज पर देखें। |
६६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
| सं. | स्वामी | मे. | वृ. | मि. | क. | सिं. | कं. | तु. | वृ. | ध. | म. | कुं. | मी. | स्वामी | अं. क. |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| २८ | क्षितीश्वर | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३ | दावाग्नि | १४।० |
| २९ | कमलाकर | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | काल | १४।३० |
| ३० | गुलिक | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | ५ | मृत्यु | १५।० |
| ३१ | मृत्यु | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | कुलिक | १५।३० |
| ३२ | काल | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | कमलाकर | १६।० |
| ३३ | दावाग्नि | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | क्षितीश्वर | १६।३० |
| ३४ | घोर | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | कलिनाश | १७।० |
| ३५ | यम | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | आर्द्र | १७।३० |
| ३६ | कण्टक | १२ | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | देव | १८।० |
| ३७ | सुधा | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | महेश्वर | १८।३० |
| ३८ | अमृत | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | विष्णु | १९।० |
| ३९ | पूर्णचन्द्र | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ब्रह्मा | १९।३० |
| ४० | विषदिग्ध | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३ | हेरम्ब | २०।० |
| ४१ | कुलनाश | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | कोमल | २०।३० |
| ४२ | वंशक्षय | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | ५ | मृदु | २१।० |
| ४३ | उत्पात | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | चन्द्र | २१।३० |
| ४४ | काल | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | अमृत | २२।० |
| ४५ | सौम्य | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | अहिभाग | २२।३० |
| ४६ | कोमल | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | काल | २३।० |
| ४७ | शीतल | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | मरुत्वान् | २३।३० |
| ४८ | दंष्ट्राकरा. | १२ | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | अपांपति | २४।० |
| ४९ | इन्दुमुख | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | पुरीष | २४।३० |
| ५० | प्रवीण | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | माया | २५।० |
| ५१ | कालाग्नि | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | अग्नि | २५।३० |
| ५२ | दण्डायुध | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३ | गरल | २६।० |
| ५३ | निर्मल | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | कुलघ्न | २६।३० |
| ५४ | सौम्य | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | ५ | भ्रष्ट | २७।० |
| ५५ | क्रूर | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | किन्नर | २७।३० |
| ५६ | अतिशी. | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | यक्ष | २८।० |
| ५७ | सुधा | ९ | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | कुबेर | २८।३० |
| ५८ | पयोधीश | १० | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | देव | २९।० |
| ५९ | भ्रमण | ११ | १२ | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | राक्षस | २९।३० |
| ६० | इन्दुरेखा | १२ | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | घोर | ३०।० |
वर्गभेदाध्यायः ६७
अथ वर्गभेदानाह-
वर्गभेदानहं वक्ष्ये मैत्रेय त्वं विधारय।
षड्वर्गाः सप्तवर्गाश्च दिग्वर्गा नृपवर्गाः॥४०॥
हे मैत्रेय ! मैं वर्गभेद को कहता हूँ, उसे तुम सुनो॥ षड्वर्ग, सप्तवर्ग,
दशवर्ग और षोडश वर्ग होते हैं॥४०॥
भवन्ति वर्गसंयोगे षड्वर्गे किंशुकादयः।
द्वाभ्यां किंशुकनामा च त्रिभिर्व्यञ्जनमुच्यते॥४१॥
षड्वर्ग में दो-तीन आदि वर्गों के संयोग से किंशुक आदि संज्ञाएँ होती
हैं। यथा दो वर्ग में ग्रह हो तो किंशुक, तीन के संयोग से व्यञ्जन॥४१॥
चतुर्भिश्चामराख्यं च छत्रं पञ्चभिरेव च।
षड्भिः कुण्डलयोगः स्यान्मुकुटाख्यं च सप्तभिः॥४२॥
चार के संयोग से चामर, पाँच के संयोग से छत्र और छः वर्गों के संयोग
से कुण्डल नाम होता है। सप्तवर्ग में छः वर्ग तक तो पूर्वोक्त ही होते
हैं, किन्तु सात वर्ग के संयोग से मुकुट होता है॥४२॥
सप्तवर्गेऽथ दिग्वर्गे पारिजातादिसंज्ञकाः।
पारिजातं भवेद्द्वाभ्यामुत्तमं त्रिभिरुच्यते॥४३॥
दशवर्ग में दो वर्ग के संयोग से पारिजात, तीन वर्ग के संयोग से
उत्तम॥४३॥
चतुर्भिर्गोपुराख्यं स्याच्छरैः सिंहासनं तथा।
पारावतं भवेत्षड्भिर्देवलोकं तु सप्तभिः॥४४॥
चार वर्ग के संयोग से गोपुर, पाँच वर्ग के संयोग से सिंहासन, छः वर्ग
के संयोग से पारावत, सात वर्ग के संयोग से देवलोक॥४४॥
वसुभिर्ब्रह्मलोकाख्यं नवभिः शक्रवाहनम्।
दिग्भिः श्रीधामयोगं स्यादथ षोडश वर्गके॥४५॥
आठ वर्ग के संयोग से ब्रह्मलोक, ९ वर्ग के संयोग से शक्रवाहन और
१० वर्ग के संयोग से श्रीधाम योग होता है॥४५॥
६८ वृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
भेदकं तु भवेद्द्वाभ्यां त्रिभिः स्यात्कुसुमाख्यकम्।
चतुर्भिर्नाकपुष्पं स्यात्पञ्चभिः कन्दुकाह्वयम्।।४६।।
षोडश वर्ग में २ वर्ग संयोग से भेदक, ३ वर्ग के संयोग से कुसुम,
चार वर्ग के संयोग से नागपुष्प, पाँच वर्ग के संयोग से कंदुक।।४६।।
केरलाख्यं भवेत्षड्भिः सप्तभिः कल्पवृक्षकम्।
अष्टभिश्चन्दनवनं नवभिः पूर्णचन्द्रकम्।।४७।।
६ वर्ग के संयोग से केरल, ७ वर्ग के संयोग से कल्पवृक्ष, आठ वर्ग
के संयोग से चन्द्रवन, ९ वर्ग के संयोग से पूर्णचन्द्र।।४७।।
दिग्भिरुच्चैःश्रवा नाम रुद्रैर्धन्वन्तरिर्भवेत्।
सूर्यकान्तं भवेत्सूर्यैर्विश्वैः स्याद्विद्रुमाह्वयम्।।४८।।
दश वर्ग के संयोग से उच्चैःश्रवा, ग्यारह वर्ग के संयोग से धन्वन्तरि,
बारह वर्ग के संयोग से सूर्यकान्त, तेरह वर्ग के संयोग से विद्रुम।।४८।।
शक्रसिंहासनं शक्रैर्गोलोकं तिथिभिर्भवेत्।
भूपैः श्रीवल्लभाख्यं स्याद्वर्गभेदैरुदाहृता।।४९।।
चौदह वर्ग के संयोग से सिंहासन, पंद्रह वर्ग के संयोग से गोलोक और
सोलह वर्ग के संयोग से श्रीवल्लभ नाम होता है।।४९।।
स्वोच्चमूलत्रिकोणस्वभवनाधिपतेः तथा।
स्वारूढात्केन्द्रनाथानां वर्गा ग्राह्या सुधीमता।।५०।।
जो ग्रह अपने उच्चराशि में, अपने मूलत्रिकोण राशि में, अपने राशि
में और आरूढ़ लग्न से केन्द्रपतियों का वर्ग लेना चाहिये।।५०।।
अस्तंगता ग्रहजिता नीचगा दुर्बलास्तथा।
शयनादिगतादुस्था उत्पन्ना योगनाशकाः।।५१।।
जो अस्त हों, युद्ध में पराजित हों, अपने नीचराशि में हों, दुर्बल
हों, शयनादि दुष्ट अवस्था में हों तो उनका वर्ग अशुभ होता है।।५१।।
विशेष- गृह, होरा, द्रेष्काण, नवमांश, द्वादशांश और त्रिंशांशक को
षड्वर्ग कहते हैं। इनके साथ सप्तमांश को मिला देने से सप्तवर्ग
होता है और इसमें दशमांश, षोडशांश, षष्ठांश को ले लेने से दशवर्ग होता
है, शेष षोडशवर्ग होते हैं।
षोडशवर्गविवेकाध्यायः ६९
किंशुकादि सप्तवर्गजसंज्ञाबोधकचक्रम्—
| २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ |
|---|---|---|---|---|---|
| किंशुक | व्यंजन | चामर | छत्र | कुंडल | मुकुट |
| पारिजातादि दशवर्गजसंज्ञाबोधकचक्रम्— | |||||
| २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ |
| :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: |
| पारिजात | उत्तमम् | गोपुरम् | सिंहासनम् | पारावतम् | देवलोक |
| षोडशवर्गजसंज्ञाबोधकचक्रम्। | |||||
| २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ |
| :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: |
| भेदकम् | कुसुमाख्यम् | नागपुष्पम् | कंदुकाख्यम् | केरलाख्यम् | कल्पवृक्षम् |
| उदाहरण— पूर्वोक्त उदाहरणों में लग्न सप्तवर्गों में २ वर्ग में है, अतः | |||||
| किंशुक संज्ञा हुई। दशवर्ग के अनुसार २ वर्ग में है, अतः पारिजात | |||||
| संज्ञा में है और षोडशवर्ग के अनुसार ४ वर्ग में है, अतः नागपुष्प संज्ञा | |||||
| हुई। इसी प्रकार प्रत्येक ग्रहों की संज्ञायें बनानी चाहिए। | |||||
| इति पाराशरहोरायां सुबोधिन्यां पञ्चमः। | |||||
| अथ षोडशवर्गविवेकाध्यायः | |||||
| अथ षोडशवर्गेषु चिन्ता लग्नं वदाम्यहम्। | |||||
| लग्नं देहस्य विज्ञानं होरायां सम्पदादिकम्॥१॥ | |||||
| अब मैं षोडश वर्गों से विचारणीय विषयों को कह रहा हूँ। लग्न | |||||
| से शरीर सम्बंधी शुभ-अशुभ का विचार करना चाहिए, होरा से द्रव्य | |||||
| का।।१।। |
७० • बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
द्रेष्काणे भ्रातृजं सौख्यं तुर्यांशे भाग्यचिन्तनम्।
पुत्रपौत्रादिकानां वै चिन्तनं सप्तमांशके ॥२॥
द्रेष्काण से भाई का, चतुर्थांश से भाग्य का, सप्तमांश से पुत्र-पौत्रादि
का।॥२॥
नवमांशे कलत्राणां दशमांशे महत्फलम्।
द्वादशांशे तथा पित्रोश्चिन्तनं षोडशांशके ॥३॥
नवमांश से स्त्री का, दशमांश से बड़े कार्यों का (राजसम्बन्धी),
द्वादशांश से माता पिता का, षोडशांश से वाहन के सुख-दुःख का॥३॥
सुखासुखस्य विज्ञानं वाहनानां तथैव च।
उपासनायां विज्ञानं साध्यं विंशतिभागके ॥४॥
विंशांश से उपासना के विज्ञान का विचार करना चाहिए॥४॥
विद्याया वेदवाह्वंशे भांशे चैव बलाऽबलम्।
विंशाशके रिष्टफलं खवेदांशे शुभाशुभम् ॥५॥
चतुर्विंशांश से विद्या का, सप्तविंशांश से बलाबल का, त्रिंशांश
से अरिष्ट का, खवेदांश से शुभ-अशुभ का॥५॥
अक्षवेदांशभागे च षष्ट्यंशेऽखिलमीक्षयेत्।
यत्र कुत्रापि सम्प्राप्तः क्रूरषष्ट्यंशकाधिपः॥६॥
अक्षवेदांश और षष्ट्यंश से सभी वस्तुओं का विचार करना चाहिए।
जहाँ पर (जिस भाव में) क्रूरग्रह षष्ट्यंशपति होता है॥६॥
तत्र नाशो न सन्देहो प्राचीनानां वचो यथा।
यत्र कुत्रापि सम्प्राप्तः कालांशाधिपतिः शुभः ॥७॥
तत्र वृद्धिश्च पुष्टिश्च प्राचीनानां वचो यथा।
इति षोडशवर्गाणां भेदास्ते प्रतिपादिताः॥८॥
उस भाव के फलों की हानि होती है। जिस किसी भाव में शुभग्रह
षष्ठ्यंशपति होता है वहाँ उस भाव संबंधी फलों की वृद्धि होती है।
इस प्रकार सोलह ग्रहों के भेद को मैंने कहा॥७-८॥
अथ विंशोपकबलमाह-
उदयादिषु भावेषु खेटस्य भवनेषु वा।
वर्गविश्वाबलं वीक्ष्य ब्रूयात्तेषां शुभाशुभम् ॥९॥
षोडशवर्गविवेकाध्यायः ७१
अथातः सम्प्रवक्ष्यामि वर्गविश्वाबलं द्विज ।
यस्य विज्ञानमात्रेण विपाकं दृष्टिगोचरम् ।।१०।।
लग्न आदि भावों का और ग्रहों के राश्यादि से वर्गविश्वाबल को
देखकर उनके शुभ-अशुभ फलों को कहना चाहिए। अब मैं वर्ग
विश्वाबल कह रहा हूँ, जिसके ज्ञानमात्र से फल साक्षात् दिखाई देता है ।।९-
१०।।
गृहं विंशोपकं वीक्ष्य सूर्यादीनां खचारिणाम् ।
स्वगृहोच्चे बलं पूर्णं शून्यं तत्सप्तमस्थिते ।।११।।
भावों की राशियों का और सूर्य आदि ग्रहों के विंशोपक बल को
देखना चाहिए। अपने गृह उच्च में पूर्ण बल तथा नीच में शून्य बल तथा
मध्य में अनुपात से बल ले आना चाहिए ।।११।।
ग्रहस्थितिवशाज्ज्ञेयं द्विराश्याधिपतिस्तथा ।
मध्येऽनुपाततो ज्ञेया ओजयुग्मर्क्षभेदतः ।।१२।।
ग्रहों की स्थितिवश, दो राशियों के अधिपति तथा विषम समराशि के
स्थितिवश से बल ले आना चाहिए ।।१२।।
सूर्यः होराफलं दद्युर्जीवार्कवसुधात्मजाः ।
चन्द्रास्फुजिदर्कपुत्राश्चन्द्रहोराफलप्रदाः ।।१३।।
होरावर्ग केवल रवि-चन्द्रमा का ही होता है, अतः शेष ग्रहों के फल
विचार के लिए विशेष कह रहे हैं। गुरु, सूर्य, भौम ये सूर्य के होराफल
और चन्द्रमा, शुक्र, शनि ये चन्द्र के होरा का फल देते हैं ।।१३।।
फलद्वयं बुधो दद्यात्समे चान्द्रं तदन्यके ।
रवेः फलं स्वहोरादौ फलहीनं विरामके ।।१४।।
बुध दोनों के होरा का फल देता है। समराशि में चन्द्र के होरा का फल
और विषम राशि में सूर्य के होरा का फल होता है। रवि के होरा आदि
में पूर्ण फल, अन्त में शून्य फल होता है ।।१४।।
मध्येऽनुपातात्सर्वत्र द्रेष्काणेऽपि विचिन्तयेत् ।
गृहवत्तुर्यभागेऽपि नवांशादावपि स्वयम् ।।१५।।
मध्य में सर्वत्र अनुपात से फल लाना चाहिए। इसी प्रकार द्रेष्काण आदि
से भी फल लाना चाहिए। गृह के ही समान चतुर्थांश में तथा नवांश
आदि में भी फल समझना चाहिए ।।१५।।
७२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
सूर्यः कुजफलं धत्ते भार्गवस्य निशापतिः।
त्रिंशांशके विचिन्त्येवमत्रापि गृहवत्स्मृतम् ।।१६ ।।
त्रिंशांश में सूर्य भौम का और चन्द्रमा शुक्र का फल देता है। इसमें गृह
के समान ही फल होता है।।१६।।
अथ षट्-सप्त-वर्गाणां विंशोपकमाह-
लग्नहोरादृकाणाङ्कभागाः सूर्यांशका इति।
त्रिंशांशकाश्च षड्वर्गास्तेषां विंशोपकाः क्रमात् ।।१७।।
लग्न (गृह), होरा, द्रेष्काण, नवमांश, द्वादशांश और त्रिंशांश ये ही
षड्वर्ग कहे जाते हैं।।१७।।
रसनेत्राब्धिपञ्चाश्विभूमयः सप्तवर्गके।
स्थूलं फलं च संस्थाप्य तत्सूक्ष्मं च ततस्ततः।।१८।।
इनका विंशोपक बल क्रम से ६, २, ४, ५, २, १ है। यह स्थूल है,
सूक्ष्म के लिए अनुपात करना चाहिए।।१८।।
ससप्तमांशकं तत्र विश्वङ्का पञ्चलोचनम्।
त्रयं सार्द्धद्वयं सार्धवेदं द्वौराशिनायकाः।।१९।।
ये ही सप्तमांश के साथ मिलकर सप्तवर्ग कहे जाते हैं। इसका विंशोपक
बल क्रम से ५, २, ३, २१/२, ४१/२, २, २, १ है।।१९।।
अथ दशवर्गाणां विंशोपकमाह-
दशवर्गादिगंशाख्या कलांशाः षष्ठिनायकाः।
त्रयं क्षेत्रस्य विज्ञेया पञ्च षष्ठ्यंशकस्य च।।२०।।
पूर्वोक्त सप्तवर्ग में दशमांश, षोडशांश, षष्ठ्यंश को मिला देने से
दशवर्ग होता है। इसमें गृह का ३, षष्ठ्यंशका ५ और शेष वर्गों का
डेढ़ (११/२) विंशोपक बल होता है।।२०।।
अथ षोडशवर्गाणां विंशोपकमाह-
सार्धैकभागाः शेषाणां विश्वङ्काः परिकीर्त्तिताः।
अथ वक्ष्ये विशेषेण विश्वङ्का मम सम्मतम्।।२१।।
अब मैं षोडश वर्गों का विशेषतः विश्वाबल को कह रहा हूँ।।२१।।
क्रमात् षोडश वर्गाणां क्षेत्रादीनां पृथक् पृथक्।
होरांशभागदृक्काणकुचन्द्रशशिनः क्रमात्।।२२।।
होरा का १, अंशभाग (त्रिंशांश) का १, द्रेष्काण का १।।२२।।
षोडशवर्गविवेकाध्यायः ७३
कलांशस्य द्वयं ज्ञेयं त्रयं नन्दांशकस्य च।
क्षेत्रे सार्धं च त्रितयं चतुः षष्ठ्यंशकस्य हि।।२३।।
षोडशांश का २, नवमांश का ३, गृह का १ १/२, षष्ठ्यंश का ४।।२३।।
अर्धमर्धं तु शेषाणां ह्येतत् स्वीयमुदाहृतम्।
पूर्णं विश्वाबलं विंशो धृतिः स्यादधिमित्रके।।२४।।
और शेष वर्गों का आधा आधा (१/२) विंशोपक बल होता है। यह
विंशोपक बल अपने वर्ग में पूर्ण २० होता है। अधिमित्र के वर्ग में
१८।।२४।।
मित्रे पञ्चदश प्रोक्तं समे दश प्रकीर्त्तितम्।
शत्रौ सप्ताधिशत्रौ च पञ्च विश्वाबलं भवेत्।।२५।।
मित्र के वर्ग में १५, सम के वर्ग में १०, शत्रु के वर्ग में ७ और अधिशत्रु
के वर्ग में ५ विंशोपक बल होता है।।२५।।
अथ विंशोपकबलस्य स्पष्टीकरणम्-
वर्गविश्वास्वविश्वघ्नाः पुनर्विंशतिभाजिताः।
विश्वफलोपयोगयं तत्पञ्चोनं फलदो न हि।।२६।।
वर्ग के विश्वा को उसी में गुणा कर उसमें २० का भाग देने से स्पष्ट
विंशोपक फल कहने योग्य होता है। वह ५ से कम हो तो फल कहने योग्य
नहीं होता है।।२६।।
तदूर्ध्वं स्वल्पफलदं दशोर्ध्वं मध्यमं स्मृतम्।
तिथ्यूर्ध्वं पूर्णफलदं बोध्यं सर्वं खचारिणाम्।।२७।।
इसके ऊपर १० तक अल्प फल देने वाला, दश के ऊपर १५ तक
मध्यम फल, इसके ऊपर २० तक पूर्ण फल देने वाला होता है। ऐसा
सभी ग्रहों का समझना चाहिए ।।२७।।
अथ फलकथने विशेषः-
अथान्यदपि वक्ष्येऽहं मैत्रेय ! त्वं विधारय।
खेटाः पूर्णफलं दद्युः सूर्यात्सप्तमके स्थिताः।।२८।।
हे मैत्रेय ! और भी प्रकारों को कहता हूँ, तुम सुनो ! सूर्य से सातवें भाव
में ग्रह हो तो पूर्ण फल देता है।।२८।।
फलाभावं विजानीयात्समे सूर्यनभश्चरे।
मध्येऽनुपातात्सर्वत्र ह्युदयास्तविंशोपकाः।।२९।।
७४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
सूर्य के समान ही राशि-अंशादि हो तो शून्य फल देता है और इसके
मध्य में हो तो अनुपात से फल समझना चाहिए। ग्रहों के उदय-अस्त
का भी विचार कर लेना चाहिए ।।२९।।
वर्गविश्वसमं ज्ञेयं फलमस्य द्विजर्षभ।
यत्र यत्र फलं बद्ध्वा तत्फलं परिकीर्त्तितम् ।।३०।।
हे द्विजश्रेष्ठ ! वर्गविंशोपक के अनुसार जो ग्रह जैसा फल देता हो
उसके अनुसार ही उसके फल की कल्पना करें ।।३०।।
वर्गविश्वाफलं चादावुदयास्तमः परम्।
पूर्ण पूर्णेति पूर्वं स्यात् सर्वं दैवं विचिन्तयेत् ।।३१।।
पूर्ण, मध्यम हीन और अल्प में दो-दो भेद हैं। श्लोक २६-२७ के
अनुसार प्रत्येक पूर्ण आदि फलों में ५ का भेद है। अतः १५ से
१७।। तक पूर्ण १७।। से २० तक अतिपूर्ण, १० से १२ तक मध्यम, १२।।
से १५ तक अति मध्यम ।।३१।।
हीनं हीनेऽतिहीनं स्यात्स्वल्पाल्पेऽत्यल्पकं स्मृतम्।
मध्यं मध्येऽतिमध्यं स्याद्यावत्तस्य दशास्थितिः।।३२।।
३।। से ५ तक हीन, ० से २।। तक अतिहीन, ७।। से १० तक
स्वल्प और ५ से ७।। तक अतिस्वल्प होता है। इस प्रकार विंशोपक
बल के अनुसार ग्रहों की दशा का फल समझना चाहिए ।।३२।।
अथ भावानां केन्द्रादिसंज्ञामाह-
अथान्यदपि वक्ष्यामि मैत्रेय ! शृणु सुव्रत !
लग्नतुर्यास्तवियतां केन्द्रसंज्ञा विशेषतः ।।३३।।
हे मैत्रेय ! सुव्रत ! लग्न, चतुर्थ, सप्तम और दशम भावों की केन्द्र संज्ञा
है ।।३३।।
द्विपञ्चरन्ध्रलाभाख्यं ज्ञेयं पणफराभिधम्।
त्रिषड्भाग्यव्ययादीनामापोक्लिममिति द्विज ।।३४।।
दूसरे, पाँचवें, आठवें और ग्यारहवें भाव की पणफर संज्ञा है। तीसरे,
छठें, नवें और बारहवें भाव की आपोक्लिम संज्ञा है ।।३४।।
लग्नात्पञ्चमभाग्यस्य कोणसंज्ञा विधीयते।
षष्ठाष्टव्ययभावानां दुःसंज्ञास्त्रिकसंज्ञकाः ।।३५।।
लग्न, पंचम और नवम भाव को कोण कहते हैं। छठें, आठवें और
बारहवें भाव को दुष्ट स्थान और त्रिक कहते हैं ।।३५।।
षोडशवर्गविवेकाध्यायः ७५
चतुरस्रं तुर्यरन्ध्रं कथयन्ति द्विजोत्तम।
स्वस्थादुपचयर्क्षाणि त्रिषडायां वराणि हि।।३६।।
चौथे और आठवें को चतुरस्र कहते हैं। अपने स्थान से तीसरे, छठें,
ग्यारहवें और दशम भाव को उपचय कहते हैं।।३६।।
अथ तन्वादिभावानां संज्ञामाह-
तनुर्धनं च सहजो बन्धुपुत्रालयस्तथा।
युवती रन्ध्रधर्माख्यं कर्मलाभव्ययाः क्रमात्।।३७।।
तनु, धन, सहज, बन्धु, पुत्र, अरि, युवती (जाया), रंध्र, धर्म, कर्म, लाभ
और व्यय ये क्रम से बारह भावों के नाम हैं।।३७।।
सङ्क्षेपेणैतदुदितमन्यद्बुद्ध्यानुसारतः।
किञ्चिद्विशेषं वक्ष्यामि यथा ब्रह्ममुखाच्छ्रुतम्।।३८।।
यह संक्षेप से कहा है, अन्य बुद्धि के अनुसार जानना। जैसा मैंने ब्रह्माजी
के मुख से सुना है उन विशेषों को कह रहा हूँ।।३८।।
नवमे च पितुर्ज्ञानं सूर्याच्च नवमेऽथवा।
यत्किञ्चिद्दशमे लाभे तत्सूर्याद्दशमे शिवे।।३९।।
लग्न से नवम स्थान में पिता का विचार किया जाता है। उसे सूर्य से
नवम में भी करना चाहिए। इसी प्रकार लग्न से १०वें और ग्यारहवें में
जो विचार किया जाता है वही सूर्य से १०।११ भावों में भी करना
चाहिए।।३९।।
तुर्ये तनौ धने लाभे भाग्ये यच्चिन्तनं च तत्।
चन्द्रात्तूर्ये तनौ लाभे भाग्ये तच्चिन्तयेद्ध्रुवम्।।४०।।
लग्न से चौथे, दूसरे, ग्यारहवें और भाग्य में जो फल विचार किये
जाते हैं वही चन्द्रमा से भी उन्हीं चौथे, दूसरे, ग्यारहवें और भाग्य भावों
में करने चाहिए।।४०।।
लग्नाद्दुश्चिक्यभवने तत्कुजाद्विक्रमे स्थितात्।
विचार्य षष्ठभावस्य बुधात्षष्ठे विचिन्तयेत्।।४१।।
लग्न से तीसरे भाव में जो विचार होता है उसे भौम से तीसरे भाव
में भी विचारना चाहिए। लग्न से छठें भाव में जो विचार होता है वही
बुध से छठें भाव में भी होता है।।४१।।
७६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् .
पञ्चमस्य गुरोः पुत्रे जायायाः सप्तमे भृगोः ।
अष्टमस्य व्ययस्यापि मन्दान्मृत्यौ व्यये तथा ॥४२॥
गुरु से पाँचवें भाव में पुत्र का और शुक्र से सातवें भाव में स्त्री का,
शनि से आठवें और बारहवें भाव में उन भावों का विचार करना
चाहिए ॥४२॥
यद्भावाद्यत्फलं चिन्त्यं तदीशात्तत्फलं विदुः ।
ज्ञेयं तस्य फलं तद्धि तत्तच्चिन्त्यं शुभाशुभम् ॥४३॥
जिन-जिन भावों का विचार करना हो वह उन-उन भावों के स्वामियों
से भी करना चाहिए ॥४३॥
इति बृहत्पाराशरहोरायाः पूर्वखण्डे सुबोधिन्यां राशिस्वभावषोडश-
वर्गादिकथनं तृतीयोऽध्यायः ॥३॥
अथ राशिदृष्टिभेदाध्यायः
मेषादीनां च राशीनां द्वादशानां पृथक् पृथक् ।
दृष्टिभेदं प्रवक्ष्यामि शृणु त्वं द्विजसत्तम ॥१॥
हे द्विजसत्तम ! मैं मेषादि १२ राशियों के दृष्टिभेद को पृथक्-पृथक्
कह रहा हूँ उसे सुनो ॥१॥
चरः स्थिरान्पश्यतिस्म स्थिरः पश्यति वै चरान् ।
उभयानुभयं विप्र पश्यतीत्ययमागमः ॥२॥
चर राशियाँ स्थिर राशियों को, स्थिर राशियाँ चर राशियों को और
द्विस्वभाव राशियों को देखती हैं, यह आगम है ॥२॥
समीपराशिं सन्त्यक्त्वा राशींस्त्रीननुपश्यति ।
सर्वोदाहरणं वक्ष्ये शृणु त्वं द्विजसप्तम ॥३॥
इनमें विशेषता यह है कि समीप की राशियों को छोड़कर तीन-
तीन राशियों को सभी राशियाँ देखती हैं। इनका उदाहरण मैं कह रहा
हूँ ॥३॥
मेषो वृषं परित्यज्य सिंहालिघटकं तथा ।
अनयैव क्रमेणैव पश्यतिस्म द्विजोत्तम ॥४॥
मेष राशि वृष राशि को छोड़कर सिंह, वृश्चिक, कुम्भ राशि को
देखती है। इसी प्रकार क्रम से आगे की राशियाँ भी देखती हैं ॥४॥
राशिदृष्टिभेदाध्यायः ७७
कर्कः सिंहं परित्यज्य वृश्चिकं च घटं वृषम्।
तुलापि वृश्चिकं त्यक्त्वा कुम्भं सिंहं तथा वृषम्।।५।।
कर्क राशि सिंह को छोड़कर वृश्चिक, कुंभ और वृष को; तुला राशि
वृश्चिक को छोड़कर कुंभ, सिंह और वृष को।।५।।
नक्रो घटं परित्यज्य मेषं कर्कं तुलां द्विज।
सिंहः कर्कं परित्यज्य नक्रं मेषं तुलां द्विज।।६।।
कर्क राशि सिंह को छोड़कर वृश्चिक, कुंभ, वृष को, मकर राशि
कुंभ राशि को छोड़कर मेष, कर्क, तुला को।।६।।
वृश्चिकस्तु तुलां त्यक्त्वा कर्कं मेषं मृगं तथा।
कुम्भश्च मकरं त्यक्त्वा मेषं कर्कं तुलां द्विज।।७।।
सिंह राशि कर्क राशि को छोड़कर मकर, मेष, तुला को; वृश्चिक
राशि तुला को छोड़कर कर्क, मेष, मकर को; कुंभ राशि मकर राशि
को छोड़कर मेष, कर्क, तुला को।।७।।
युग्मः कन्याधनुर्मीनान् पश्यतीति द्विजोत्तम।
कन्या धनुर्मीनयुग्मं पश्यत्येवं न संशयः।।८।।
मिथुन राशि कन्या, धन, मीन को; कन्या राशि धन, मीन, मिथुन
को।।८।।
धनुर्झषयुग्मकन्याः पश्यति द्विजसत्तम।
मीनो युग्माङ्गको दण्डान् पश्यति सुमते द्विज।।९।।
धन राशि मीन, मिथुन, कन्या को और मीन राशि मिथुन, कन्या और
धन राशि को देखती है।।९।।
सूर्यादयः क्रमेणैव पश्यन्ति च परस्परम्।
राशित्रयं त्रयं विप्र सर्वराशिगता ग्रहाः।।१०।।
हे विप्र ! इसी प्रकार सूर्य आदि ग्रह भी तीन-तीन राशियों के क्रम से
सभी राशियों को देखते हैं।।१०।।
चरेषु संस्थिताः खेटाः पश्यन्ति चरसंस्थितान्।
स्थिरेषु संस्थिताः खेटाः पश्यन्ति चरसंस्थितान्।।११।।
७८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
उभयस्थस्तु भान्वादिः पश्यन्त्युभयसंस्थितान् ।
निकटस्थं विना खेटा निरीक्ष्यन्ते द्विजोत्तम ।।१२।।
चर राशि पर बैठा हुआ ग्रह स्थिर राशि पर बैठे हुए ग्रह को, स्थिर
राशि पर बैठा हुआ ग्रह चर राशि पर बैठे हुए ग्रह को और द्विस्वभाव राशि
पर बैठा हुआ ग्रह द्विस्वभाव राशि पर बैठे हुए ग्रह को देखता है, किन्तु
निकटस्थ राशि को छोड़कर ।।११-१२।।
दृष्टिचक्रमाह-
चक्रन्यासमहं वक्ष्ये यथावद्ब्रह्मणोदितम् ।
यस्य विज्ञानमात्रेण दृष्टिभेदः प्रकाश्यते ।।१३।।
जैसा ब्रह्माजी ने कहा है वैसा ही मैं दृष्टिचक्र को कह रहा हूँ, जिसके
जान लेने से दृष्टिभेद समझ में आ जाता है।।१३।।
पूर्वे मेषवृषौ लेख्यौ कर्कसिंहौ च दक्षिणे ।
तुलालिवारुणे विप्र नक्रकुम्भे तथोत्तरे ।।१४।।
एक वर्गाकार चक्र बनाकर पूर्व आदि दिशाओं की कल्पना कर पूर्व
दिशा में मेष-वृष, दक्षिण में कर्क-सिंह को, तुला-वृश्चिक को पश्चिम
में, मकर-कुंभ को उत्तर में ।।१४।।
अग्निकोणे तु मिथुनं नैर्ऋत्यामङ्गनां द्विज ।
वायव्यां धनुषं लेख्यमीशान्यां च झषं लिखेद् ।।१५।।
मिथुन को अग्निकोण में, कन्या को नैऋत्य कोण में, वायव्य कोण
में धनु को और ईशान्य कोण में मीन को लिखे।।१५।।
चतुरस्रं च विन्यासं ज्ञायते द्विजसत्तम ।
वृत्ताकारं विशेषेण ब्रह्मणा चोदितं पुरा ।।१६।।
ब्रह्माजी ने विशेष कर इस चक्र को वृत्ताकार ही कहा है।।१६।।
विशेष- १६वें श्लोक के अनुसार स्पष्ट है कि राशियों की सव्यगणना
ही ब्रह्मोदिता है तथापि व्यवहार में ऐसा नहीं है, अतः व्यवहार के
अनुकूल मीनान्त से अपसव्य गणना ही चक्र में लिखा गया है। ऊपर के
१४-१५ श्लोक सव्य गणना के अनुसार ही है। शेष चक्र से स्पष्ट है।