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सर्वकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 72, कुल 800 में से

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पृष्ठ 72

७४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
सूर्य के समान ही राशि-अंशादि हो तो शून्य फल देता है और इसके
मध्य में हो तो अनुपात से फल समझना चाहिए। ग्रहों के उदय-अस्त
का भी विचार कर लेना चाहिए ।।२९।।
वर्गविश्वसमं ज्ञेयं फलमस्य द्विजर्षभ।
यत्र यत्र फलं बद्ध्वा तत्फलं परिकीर्त्तितम् ।।३०।।
हे द्विजश्रेष्ठ ! वर्गविंशोपक के अनुसार जो ग्रह जैसा फल देता हो
उसके अनुसार ही उसके फल की कल्पना करें ।।३०।।
वर्गविश्वाफलं चादावुदयास्तमः परम्।
पूर्ण पूर्णेति पूर्वं स्यात् सर्वं दैवं विचिन्तयेत् ।।३१।।
पूर्ण, मध्यम हीन और अल्प में दो-दो भेद हैं। श्लोक २६-२७ के
अनुसार प्रत्येक पूर्ण आदि फलों में ५ का भेद है। अतः १५ से
१७।। तक पूर्ण १७।। से २० तक अतिपूर्ण, १० से १२ तक मध्यम, १२।।
से १५ तक अति मध्यम ।।३१।।
हीनं हीनेऽतिहीनं स्यात्स्वल्पाल्पेऽत्यल्पकं स्मृतम्।
मध्यं मध्येऽतिमध्यं स्याद्यावत्तस्य दशास्थितिः।।३२।।
३।। से ५ तक हीन, ० से २।। तक अतिहीन, ७।। से १० तक
स्वल्प और ५ से ७।। तक अतिस्वल्प होता है। इस प्रकार विंशोपक
बल के अनुसार ग्रहों की दशा का फल समझना चाहिए ।।३२।।
अथ भावानां केन्द्रादिसंज्ञामाह-
अथान्यदपि वक्ष्यामि मैत्रेय ! शृणु सुव्रत !
लग्नतुर्यास्तवियतां केन्द्रसंज्ञा विशेषतः ।।३३।।
हे मैत्रेय ! सुव्रत ! लग्न, चतुर्थ, सप्तम और दशम भावों की केन्द्र संज्ञा
है ।।३३।।
द्विपञ्चरन्ध्रलाभाख्यं ज्ञेयं पणफराभिधम्।
त्रिषड्भाग्यव्ययादीनामापोक्लिममिति द्विज ।।३४।।
दूसरे, पाँचवें, आठवें और ग्यारहवें भाव की पणफर संज्ञा है। तीसरे,
छठें, नवें और बारहवें भाव की आपोक्लिम संज्ञा है ।।३४।।
लग्नात्पञ्चमभाग्यस्य कोणसंज्ञा विधीयते।
षष्ठाष्टव्ययभावानां दुःसंज्ञास्त्रिकसंज्ञकाः ।।३५।।
लग्न, पंचम और नवम भाव को कोण कहते हैं। छठें, आठवें और
बारहवें भाव को दुष्ट स्थान और त्रिक कहते हैं ।।३५।।