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सर्वकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 68, कुल 800 में से

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पृष्ठ 68

७० • बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
द्रेष्काणे भ्रातृजं सौख्यं तुर्यांशे भाग्यचिन्तनम्।
पुत्रपौत्रादिकानां वै चिन्तनं सप्तमांशके ॥२॥
द्रेष्काण से भाई का, चतुर्थांश से भाग्य का, सप्तमांश से पुत्र-पौत्रादि
का।॥२॥
नवमांशे कलत्राणां दशमांशे महत्फलम्।
द्वादशांशे तथा पित्रोश्चिन्तनं षोडशांशके ॥३॥
नवमांश से स्त्री का, दशमांश से बड़े कार्यों का (राजसम्बन्धी),
द्वादशांश से माता पिता का, षोडशांश से वाहन के सुख-दुःख का॥३॥
सुखासुखस्य विज्ञानं वाहनानां तथैव च।
उपासनायां विज्ञानं साध्यं विंशतिभागके ॥४॥
विंशांश से उपासना के विज्ञान का विचार करना चाहिए॥४॥
विद्याया वेदवाह्वंशे भांशे चैव बलाऽबलम्।
विंशाशके रिष्टफलं खवेदांशे शुभाशुभम् ॥५॥
चतुर्विंशांश से विद्या का, सप्तविंशांश से बलाबल का, त्रिंशांश
से अरिष्ट का, खवेदांश से शुभ-अशुभ का॥५॥
अक्षवेदांशभागे च षष्ट्यंशेऽखिलमीक्षयेत्।
यत्र कुत्रापि सम्प्राप्तः क्रूरषष्ट्यंशकाधिपः॥६॥
अक्षवेदांश और षष्ट्यंश से सभी वस्तुओं का विचार करना चाहिए।
जहाँ पर (जिस भाव में) क्रूरग्रह षष्ट्यंशपति होता है॥६॥
तत्र नाशो न सन्देहो प्राचीनानां वचो यथा।
यत्र कुत्रापि सम्प्राप्तः कालांशाधिपतिः शुभः ॥७॥
तत्र वृद्धिश्च पुष्टिश्च प्राचीनानां वचो यथा।
इति षोडशवर्गाणां भेदास्ते प्रतिपादिताः॥८॥
उस भाव के फलों की हानि होती है। जिस किसी भाव में शुभग्रह
षष्ठ्यंशपति होता है वहाँ उस भाव संबंधी फलों की वृद्धि होती है।
इस प्रकार सोलह ग्रहों के भेद को मैंने कहा॥७-८॥
अथ विंशोपकबलमाह-
उदयादिषु भावेषु खेटस्य भवनेषु वा।
वर्गविश्वाबलं वीक्ष्य ब्रूयात्तेषां शुभाशुभम् ॥९॥