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सर्वकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 76, कुल 800 में से

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पृष्ठ 76

७८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
उभयस्थस्तु भान्वादिः पश्यन्त्युभयसंस्थितान् ।
निकटस्थं विना खेटा निरीक्ष्यन्ते द्विजोत्तम ।।१२।।
चर राशि पर बैठा हुआ ग्रह स्थिर राशि पर बैठे हुए ग्रह को, स्थिर
राशि पर बैठा हुआ ग्रह चर राशि पर बैठे हुए ग्रह को और द्विस्वभाव राशि
पर बैठा हुआ ग्रह द्विस्वभाव राशि पर बैठे हुए ग्रह को देखता है, किन्तु
निकटस्थ राशि को छोड़कर ।।११-१२।।
दृष्टिचक्रमाह-
चक्रन्यासमहं वक्ष्ये यथावद्ब्रह्मणोदितम् ।
यस्य विज्ञानमात्रेण दृष्टिभेदः प्रकाश्यते ।।१३।।
जैसा ब्रह्माजी ने कहा है वैसा ही मैं दृष्टिचक्र को कह रहा हूँ, जिसके
जान लेने से दृष्टिभेद समझ में आ जाता है।।१३।।
पूर्वे मेषवृषौ लेख्यौ कर्कसिंहौ च दक्षिणे ।
तुलालिवारुणे विप्र नक्रकुम्भे तथोत्तरे ।।१४।।
एक वर्गाकार चक्र बनाकर पूर्व आदि दिशाओं की कल्पना कर पूर्व
दिशा में मेष-वृष, दक्षिण में कर्क-सिंह को, तुला-वृश्चिक को पश्चिम
में, मकर-कुंभ को उत्तर में ।।१४।।
अग्निकोणे तु मिथुनं नैर्ऋत्यामङ्गनां द्विज ।
वायव्यां धनुषं लेख्यमीशान्यां च झषं लिखेद् ।।१५।।
मिथुन को अग्निकोण में, कन्या को नैऋत्य कोण में, वायव्य कोण
में धनु को और ईशान्य कोण में मीन को लिखे।।१५।।
चतुरस्रं च विन्यासं ज्ञायते द्विजसत्तम ।
वृत्ताकारं विशेषेण ब्रह्मणा चोदितं पुरा ।।१६।।
ब्रह्माजी ने विशेष कर इस चक्र को वृत्ताकार ही कहा है।।१६।।
विशेष- १६वें श्लोक के अनुसार स्पष्ट है कि राशियों की सव्यगणना
ही ब्रह्मोदिता है तथापि व्यवहार में ऐसा नहीं है, अतः व्यवहार के
अनुकूल मीनान्त से अपसव्य गणना ही चक्र में लिखा गया है। ऊपर के
१४-१५ श्लोक सव्य गणना के अनुसार ही है। शेष चक्र से स्पष्ट है।