बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषोडशवर्गविवेकाध्यायः ७१
अथातः सम्प्रवक्ष्यामि वर्गविश्वाबलं द्विज ।
यस्य विज्ञानमात्रेण विपाकं दृष्टिगोचरम् ।।१०।।
लग्न आदि भावों का और ग्रहों के राश्यादि से वर्गविश्वाबल को
देखकर उनके शुभ-अशुभ फलों को कहना चाहिए। अब मैं वर्ग
विश्वाबल कह रहा हूँ, जिसके ज्ञानमात्र से फल साक्षात् दिखाई देता है ।।९-
१०।।
गृहं विंशोपकं वीक्ष्य सूर्यादीनां खचारिणाम् ।
स्वगृहोच्चे बलं पूर्णं शून्यं तत्सप्तमस्थिते ।।११।।
भावों की राशियों का और सूर्य आदि ग्रहों के विंशोपक बल को
देखना चाहिए। अपने गृह उच्च में पूर्ण बल तथा नीच में शून्य बल तथा
मध्य में अनुपात से बल ले आना चाहिए ।।११।।
ग्रहस्थितिवशाज्ज्ञेयं द्विराश्याधिपतिस्तथा ।
मध्येऽनुपाततो ज्ञेया ओजयुग्मर्क्षभेदतः ।।१२।।
ग्रहों की स्थितिवश, दो राशियों के अधिपति तथा विषम समराशि के
स्थितिवश से बल ले आना चाहिए ।।१२।।
सूर्यः होराफलं दद्युर्जीवार्कवसुधात्मजाः ।
चन्द्रास्फुजिदर्कपुत्राश्चन्द्रहोराफलप्रदाः ।।१३।।
होरावर्ग केवल रवि-चन्द्रमा का ही होता है, अतः शेष ग्रहों के फल
विचार के लिए विशेष कह रहे हैं। गुरु, सूर्य, भौम ये सूर्य के होराफल
और चन्द्रमा, शुक्र, शनि ये चन्द्र के होरा का फल देते हैं ।।१३।।
फलद्वयं बुधो दद्यात्समे चान्द्रं तदन्यके ।
रवेः फलं स्वहोरादौ फलहीनं विरामके ।।१४।।
बुध दोनों के होरा का फल देता है। समराशि में चन्द्र के होरा का फल
और विषम राशि में सूर्य के होरा का फल होता है। रवि के होरा आदि
में पूर्ण फल, अन्त में शून्य फल होता है ।।१४।।
मध्येऽनुपातात्सर्वत्र द्रेष्काणेऽपि विचिन्तयेत् ।
गृहवत्तुर्यभागेऽपि नवांशादावपि स्वयम् ।।१५।।
मध्य में सर्वत्र अनुपात से फल लाना चाहिए। इसी प्रकार द्रेष्काण आदि
से भी फल लाना चाहिए। गृह के ही समान चतुर्थांश में तथा नवांश
आदि में भी फल समझना चाहिए ।।१५।।