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बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

३५० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
जिस राशि में १५ रेखाएँ हों उस मास में राजभय की संभावना होती
है। इसकी शान्ति के लिए हाथी का दान करना चाहिए। जिस राशि
में १६ रेखा हों उस मास में कष्ट होता है। इसकी शान्ति के लिए कल्पतरु
की प्रतिमा का दान करे।।७५।।
ऋषिचन्द्रैर्व्याधिभयं गुडधेनुं निवेदयेत्।
कलाहोऽष्टेन्दुभिर्दद्याद्रत्नगोभूहिरण्‍यकम् ।।७६।।
जिस राशि में १७ रेखा हों उस मास में व्याधि का भय होता है। उसके
शान्त्यर्थ गुड़ के धेनु का दान करें। जिस राशि में १८ रेखा हों उस मास
में कलह होने का भय होता है। उसकी शान्ति के लिए गौ, भूमि,
रत्न और सुवर्ण का दान करना चाहिए।।७६।।
देशत्यागोऽङ्कचन्द्रैः स्याच्छान्तिं कुर्याद्विधानतः।
विंशत्या बुद्धिनाशः स्यात्कुर्याल्लक्षमितं जपम्।।७७।।
जिस राशि में १९ रेखा हों उस मांस में देश के त्यागने का भय
होता है। इसकी शान्ति के लिए विधिपूर्वक शान्ति करनी चाहिए।
जिस राशि में २० रेखा हों उस मास में बुद्धि का नाश होता है। इसकी
शान्ति के लिए १ लक्ष जप करना चाहिए।।७७।।
भूमिपक्षै रोगपीडा दद्यात् धान्यस्य पर्वतम्।
यमाश्विभिर्बन्धुपीडा दद्यादादर्शकं बुधः।।७८।।
जिस राशि में २१ रेखा हों उस मास के रवि में रोग और पीड़ा होती
है। उसकी शान्ति के लिए धान्य का पर्वत देना चाहिए। जिस राशि में
२२ रेखा हों उस राशि के सूर्य में बन्धुओं को पीडा होती है। उसकी
शान्ति के लिए आदर्श (ऐनक) का दान करना चाहिए।।७८।।
रामपक्षयुते मासे नानाक्लेशान्प्रपद्यते।
सौवर्णीं प्रतिमां दद्याद्रवेः सप्तपलैः क्रमात्।।७९।।
जिस राशि में २३ रेखा हों उस राशि के रवि में अनेक प्रकार के
कष्ट होते हैं। उसकी शान्ति के लिए सूर्य की सोने की सात तोले की
प्रतिमा देनी चाहिए।।७९।।
वेदाश्विभिर्बन्धुहीनो दद्याद्गोदानकं दश।
सर्वरोगादिनाशार्थं जपहोमादि कारयेत्।।८०।।
जिस राशि में २४ रेखा हों उस राशि के सूर्य में बन्धुओं का नाश
होता है। उसके शान्त्यर्थ १० गोदान करना चाहिए और सभी रोगों
के शान्त्यर्थ जप-होम आदि करना चाहिए।।८०।।

अथाष्टकवर्गफलाध्यायः ३५१
शराश्विभिस्तथा विद्वन्प्रज्ञा मन्दोऽभिजायते ।
ऋतुपक्षैर्बुद्धिहीनः पूज्या वागीश्वरी तथा।
धनक्षयः स्यान्नक्षत्रैः श्रीसूक्तं तत्र संजपेत् ।।८१।।
जिस राशि में २५ या २६ रेखा हों उस राशि के सूर्य में बुद्धि मंद होती
है। इसके शान्त्यर्थ वागीश्वरी देवी की उपासना करनी चाहिए। जिस राशि
में २७ रेखा हों उस राशि के सूर्य में धन की हानि होती है। उसकी शान्ति
के लिए श्रीसूक्त का जप करना चाहिए।।८१।।
वसुपक्षयुते मासे न लाभो हानि खेचरैः।
सूर्यहोमश्च विधिना कर्त्तव्यः शुभकांक्षिभिः ।।८२।।
जिस राशि में २८ रेखा हों उस राशि के सूर्य में किसी प्रकार का लाभ
नहीं होता है। इसके शान्त्यर्थ विधिवत् सूर्य का हवन कराना
चाहिए।।८२।।
एकोनत्रिंशता चापि चिन्ता व्याकुलितो भवेत् ।
घृतवस्त्रसुवर्णानि तत्र दद्याद्विचक्षणः।।८३।।
जिस राशि में २९ रेखा हों उस राशि के सूर्य में मनुष्य चिन्ता से
व्याकुल होता है। उसके शान्त्यर्थ घी, वस्त्र-सुवर्ण का दान करना
चाहिए।।८३।।
त्रिंशता धनधान्याप्तिरिति जातकनिर्णयः ।
भूवह्निभिर्महोद्योगः पुत्रसम्पद्गुणाग्निभिः ।।८४।।
जिस राशि में ३० रेखा हों उस राशि के सूर्य में धन-धान्य का लाभ
होता है। जिस राशि में ३१ रेखा हों उस मास में बड़े उद्योग की तथा
पुत्र और सम्पत्ति का लाभ होता है।।८४।।
सहेमवस्त्रलाभश्च चतुस्त्रिंशत्समन्विते ।
पञ्चरामैर्भवेद्धीमान्षट्त्रिंशत्सुतवित्तदा ।।८५।।
जिस राशि में ३४ रेखा होती है उस मास में सुवर्ण, वस्त्र आदि का
लाभ होता है। जिस राशि में ३५ रेखा हों उस मास में बुद्धि में प्रखरता
और जिसमें ३६ रेखा हों उस राशि में पुत्र-धन का लाभ होता है।।८५।।
सप्तत्रिंशद्धनस्याप्तिरष्टत्रिंशत्सुखार्थदा ।
द्रव्यरत्नाप्तिरेकोनचत्वारिंशाच्च विद्यते ।।८६।।

३५२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
जिस राशि में ३७ रेखा हों उस मास में धन का लाभ होता है। जिस
राशि में ३८ रेखा हों उस मास में धनसुख होता है। जिस राशि
में ३९ रेखा हों उसमें द्रव्य-रत्न का लाभ होता है।।८६।।
धनवान्कीर्तिमांश्चैव चत्वारिंशति वर्धते।
अत ऊर्ध्वं यशोऽर्थाप्तिः पुण्यश्रीरुपचीयते।।८७।।
जिस राशि में ४० रेखा हों उस मास में धन-कीर्ति में वृद्धि होती
है। इसके बाद जितनी ही अधिक रेखा होती है उतना ही अधिक
यश-धन का लाभ उत्तरोत्तर होता है।।८७।।
अथ शुभाशुभफलमाह-
शुभखचरफलैक्यं प्राप्तवर्षे नितान्तं
धनतनयसुखानां भाजनं स्यान्मनुष्यः।
धरणितनयवर्गे बिन्दुसंज्ञांतयोगे
तनुलयमिह वर्षे पापगे मृत्युभीतिः।।८८।।
शुभग्रह की रेखाओं के योगतुल्य वर्ष में धन, पुत्र, सुख को भोगने वाला
मनुष्य होता है। भौमाष्टक वर्ग में भौम से लग्नांत फलों के योगतुल्य
वर्ष और लग्न से भौमांत रेखाओं के योगतुल्य वर्ष में पापग्रह का योग होने
से कष्ट होता है।।८८।।
इति बृहत्पाराशरहोरायाम् अष्टकवर्गफलाध्यायः।
अथ पूर्वजन्मशापद्योतकाध्यायः
पार्वत्युवाच-
देवदेव जगन्नाथ शूलपाणे वृषध्वज।
केन योगेन मर्त्यानां जायते शिशुनाशनम् ।।१।।
पार्वतीजी ने कहा- हे देवों के देव, जगत् के स्वामी, शूलपाणि,
वृषध्वज! किस दुर्योंग के कारण मनुष्यों की सन्तानों का नाश होता
है।।१।।
तत्सर्वमत्र योगेन ब्रूहि मे शशिशेखर।
शापमोक्षं च कृपया प्राणिनामल्पमेधसाम् ।।२।।
और हे शशिशेखर ! उन सभी योगों को मुझे बताइये और उस शाप
से कैसे मनुष्य मुक्त हो सकता है इसे भी बताने की कृपा करें।।२।।

अथ पूर्वजन्मशापद्योतकाध्यायः ३५३
शङ्कर उवाच-
साधु पृष्टं त्वया देवि कथयामि सविस्तरात् ।
शृणुष्वैकमना भूत्वा बलाबलवशादपि ॥३॥
शंकरजी ने कहा- तुमने बड़ा ही अच्छा प्रश्न किया है। हे देवि ! मैं
उसे विस्तार से कहूँगा, तुम एकाग्रचित्त से सुनो ॥३॥
ज्ञेयं सुनिश्चितं सर्वं राशिचक्रे विशेषतः।
मेषादि मीनपर्यन्तं मूर्त्यादिद्वादशक्रमात् ॥४॥
यह सब राशिचक्र में निश्चित है ॥४॥
भावं च भावजं ज्ञात्वा फलं ब्रूयाद्विचक्षणः।
तनुर्वित्तं बन्धुमातृपुत्रशत्रुस्मरो मृतिः ॥५॥
मेषादि राशियों के बारह भाव तनु, धन, सहज, सुख, सुत, रिपु, जाया,
मृत्यु ॥५॥
पितृकर्म च लाभं च व्ययान्ता भावसंज्ञकाः।
गुरुलग्नेशदारेशपुत्रस्थानाधिपेषु च ॥६॥
धर्म, कर्म, आय और व्यय होते हैं। इसमें गुरु, लग्नेश, दारेश और
पंचमेश ॥६॥
सर्वेषु बलहीनेषु वक्तव्या त्वनपत्यता।
रव्यारराहुशनयः पुत्रस्था बलसंयुताः।
कारकाख्यात्क्षीणबलादनपत्यत्वमादिशेत् ॥७॥
ये सभी निर्बल हों तो अनपत्य योग होता है। सूर्य, भौम, राहु, शनि
पुत्रस्थान में हों और बली हों तथा पुत्रकारक (गुरु) निर्बल हो तो अनपत्य
(निःसन्तान) योग होता है ॥७॥
अथ शापज्ञानमाह-
पुत्रस्थानगते राहौ कुजेनापि निरीक्षिते।
कुजक्षेत्रगते वापि सर्पशापात्सुतक्षयः ॥८॥
यदि पाँचवें भाव में राहु हो तथा भौम से देखा जाता हो अथवा भौम
की राशि में हो तो सर्प के शाप से संतान की हानि होती है॥८॥
पुत्रेशे राहुसंयुक्ते पुत्रस्थे भानुनन्दने।
चन्द्रदृष्टे युते वापि सर्पशापात्सुतक्षयः ॥९॥

३५४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्

पंचमेश राहु से युक्त हो, पंचम में शनि हो और चन्द्रमा से युत वा दृष्ट
हो तो सर्प के शाप से संतान नष्ट होते हैं ॥९॥
कारके राहुसंयुक्ते पुत्रेशे बलवर्जिते।
विलग्नेशे भौमयुते सर्पशापात्सुतक्षयः ॥१०॥
कारक (गुरु) राहु से युक्त हो, पंचमेश बलहीन से लग्नेश भौम से युत
हो तो सर्प के शाप से संतान नष्ट होते हैं ॥१०॥
कारके भौमसंयुक्ते लग्ने च राहुसंयुते।
पुत्रस्थानेश्वरे दुःस्थे सर्पशापात्सुतक्षयः ॥११॥
कारक (गुरु) भौम से युक्त हो, लग्न में राहु हो और पंचमेश ६।८।१२
भाव में हो तो सर्प के शाप से संतान की हानि होती है ॥११॥
भौमांशे भौमसंयुक्ते पुत्रेशे सोमनन्दने।
राहुमान्दियुते लग्ने सर्पशापात्सुतक्षयः ॥१२॥
भौम के अंश में भौम से युक्त पंचमेश बुध हो और लग्न, राहु, मान्दि
(गुलिक) हो तो सर्ग के शाप से संतान की हानि होती है ॥१२॥
पुत्रस्थाने कुजक्षेत्रे पुत्रे राहुसमन्विते।
सौम्यदृष्टे युते वापि सर्पशापात्सुतक्षयः ॥१३॥
यदि पंचम भाव मंगल की राशि (७, ८) हो और पंचम में राहु युत हो,
बुध से युत वा दृष्ट हो तो सर्प के शाप से संतान की हानि होती है ॥१३॥
पुत्रस्था भानुमन्दाराः स्वर्भानुः शशिजोऽङ्गिराः।
निर्बलौ पुत्रलग्नेशौ सर्पशापात्सुतक्षयः ॥१४॥
पंचम भाव में सूर्य, शनि, मंगल, राहु, बुध, गुरु हों और पंचमेश, लग्नेश
निर्बल हों तो सर्प के शाप से संतान की हानि होती है ॥१४॥
लग्नेशे राहुसंयुक्ते पुत्रेशे भौमसंयुते।
कारके राहुसन्दृष्टे सर्पशापात्सुतक्षयः ॥१५॥
लग्नेश राहु से युत हो, पंचमेश मंगल से युत हो, कारक (गुरु) राहु
से युत हों तो सर्प के शाप से सन्तान की हानि होती है।।
अथ शान्तिमाह—
ग्रहयोगवशादेवं योगं ज्ञात्वा सुधीमता।
तद्दोषपरिहारार्थं नागपूजां समारभेत् ॥१६॥

अथ पूर्वजन्मशापद्योतकाध्यायः ३५५
इस प्रकार ग्रहयोगवश शाप को जानकर उस दोष के शान्त्यर्थ
नाग की पूजा करे।।१६।।
स्वगृह्योक्तविधानेन प्रतिष्ठां कारयेत्सुधीः।
नागमूर्तिं सुवर्णेन कृत्वा पूजां समाचरेत् ।।१७।।
अपने वेदोक्त गृह्यसूत्र के अनुसार विधानपूर्वक सुवर्ण की नांगमूर्त्ति
बनाकर उसकी प्रतिष्ठा करे और उसका यथोक्त रीति से पूजन करे।।१७।।
गोभूतिलहिरण्यादि दद्याद्वित्तानुसारतः।
एवं कृते तु नागेन्द्रप्रसादाद्वर्धते कुलम् ।।१८।।
गौ, भूमि, तिल, सुवर्णादि का दान अपनी शक्ति के अनुसार करे।
ऐसा करने से नागदेव प्रसन्न होकर कुल की वृद्धि करते हैं।।१८।।
अथ पितृशापात्सुतक्षययोगम्—
पुत्रस्थानगते भानौ नीचे मन्दाशकस्थिते।
पार्श्वयोः क्रूरसम्बन्धे पितृशापात्सुतक्षयः ।।२०।।
पंचम स्थान में सूर्य अपनी नीच राशि में शनि के अंश में हों और उसके
आगे तथा पीछे पापग्रह हों तो पिता के शाप से संतान की हानि होती
है।।१९।।
पुत्रस्थानाधिपे भानौ त्रिकोणे पापसंयुते।
क्रूरेऽन्तरे पापद्रष्टे पितृशापात्सुतक्षयः ।।२०।।
पुत्रस्थानेश सूर्य हो, क्रूरग्रहों के मध्य में त्रिकोण में पापग्रह हों, पापग्रह
से देखे जाते हों तो पिता के शाप से वंश की क्षति होती है।।२०।।
भानुराशिस्थिते जीवे पुत्रेषु भानसंयुते।
पुत्रे लग्ने पापयुते पितृशापात्सुतक्षयः ।।२१।।
सूर्य की राशि में गुरु हो और पंचमेश सूर्य से युत हो तथा पंचम
और लग्न में पापग्रह हों तो पिता के शाप से सन्तान की हानि होती
है।।२१।।
लग्नेशे दुर्बले पुत्रे पुत्रेशे भानुसंयुते।
पुत्रे लग्ने पापयुते पितृशापात्सुतक्षयः ।।२२।।
लग्नेश दुर्बल होकर पंचम भाव में हो और पंचमेश सूर्य से युतः हों तथा
पंचम और लग्न में पापग्रह हों तो पिता के शाप से संतान की हानि होती
है।।२२।।

३५६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
पितृस्थानाधिपे पुत्रे पुत्रेशे वा तथा स्थिते।
लग्ने पुत्रे पापयुते पितृशापात्सुतक्षयः॥२३॥
पितृस्थानेश (१०वें भाव का स्वामी) पाँचवें भाव में हो और पंचमेश
१०वें भाव में हो तथा लग्न और पाँचवें भाव में पापग्रह हों तो
पिता के शाप से संतान की हानि होती है॥२३॥
पितुःस्थानाधिपो भौमः पुत्रेशेन समन्वितः।
लग्ने पुत्रे पितृस्थाने पापात्सन्ततिनाशनम् ॥२४॥
पितृस्थान (१०) का स्वामी होकर भौम पंचमेश से युत हो और
लग्न, पंचम तथा दशम में पापग्रह हों तो पिता के शाप से संतान की
हानि होती है॥२४॥
पितृस्थानाधिपे दुःस्थे कारके पापराशिगे।
सपापे पुत्रलग्नेशे पितृशापात्सुतक्षयः॥२५॥
पितृस्थान (१०) का स्वामी ६, ८, १२ भाव में हो तथा कारक (गुरु)
पापग्रह की राशि में हो और पंचमेश तथा लग्नेश पापयुत हों तो पिता
के शाप से संतान की हानि होती है॥२५॥
लग्नपञ्चमभावस्था भानुभौमशनैश्चराः।
रन्ध्रे रिःफे राहुजीवौ पितृशापात्सुतक्षयः॥२६॥
लग्न तथा पंचम भाव में सूर्य, भौम, शनि हों और ८, १२ स्थान में राहु
तथा गुरु हों तथा लग्न में पापग्रह हों तो पिता के शाप से संतान की हानि
होती है॥२६॥
लग्नाष्टमगे भानौ पुत्रस्थे भानुनन्दने।
पुत्रेशे राहुसंयुक्ते लग्ने पापे सुतक्षयः॥२७॥
बारहवें लग्न से आठवें में सूर्य हों, पाँचवें भाव में शनि हो, पंचमेश राहु
से युत हो और लग्न में पापग्रह हों तो पितृशाप से संतान की हानि होती
है॥२७॥
व्ययेशे लग्नभावस्थे रन्ध्रेशे पुत्रराशिगे।
पितृस्थानाधिपे रन्ध्रे पितृशापात्सुतक्षयः॥२८॥
व्यय भाव के स्वामी लग्न में हो और अष्टमेश पाँचवें भाव में हो तथा
पितृस्थानेश आठवें भाव में हो तो पिता के शाप से संतानहीन होता
है॥२८॥

अथ पूर्वजन्मशापद्योतकाध्यायः ३५७
रोगेशे पुत्रभावस्थे पितृस्थानाधिपे तथा।
कारके राहुसंयुक्ते पितृशापात्सुतक्षयः॥२९॥
रोगेश पंचम भाव में पितृभावेश के साथ हो और कारक (गुरु) राहु
से युत हो तो पिता के साप से संतान की हानि होती है॥२९॥
तद्दोषपरिहारार्थं गयाश्राद्धं च कारयेत्।
ब्राह्मणाम् भोजयेत्तत्र अयुतं वां सहस्त्रकम्॥३०॥
कन्यादानं ततः कृत्वा गां च दद्यात्सवत्सकाम्।
एवं कृते पितुः शापान्मुच्यते नात्र संशयः॥३१॥
इस दोष के शान्त्यर्थ गयाश्राद्ध करे और एक हजार वा दस हजार
ब्राह्मणों को भोजन करावे। इसके बाद कन्यादान और सवत्सा गौ
का दान करे। इतना करने से पिता प्रसन्न होकर।॥३१॥
वर्धते च कुलं तस्य पुत्रपौत्रादिभिस्तदा।
दृष्टियोगपदैः सर्वं फलं ब्रूयाद्विचक्षणः॥३२॥
उसे पुत्र-पौत्र से संपन्न कर कुल की वृद्धि करते हैं। इस प्रकार दृष्टि
तथा योगवश पंडित लोग फल का विचार करें॥३२॥
अथ मातृशापात्सुतक्षययोगः-
पुत्रस्थानाधिपे चन्द्रे नीचे वा पापमध्यगे।
हिबुके पञ्चमे वापि मातृशापात्सुतक्षयः॥३३॥
पंचमेश चन्द्रमा अपनी नीच राशि में वा पापग्रह के मध्य में हो और
४, ५ भाव में पापग्रह हों तो माता के शाप से संतान की हानि होती है॥३३॥
लाभे मन्दसमायोगे मातृस्थाने शुभेतरे।
नीचे पञ्चमगे चन्द्रे मातृशापात्सुतक्षयः॥३४॥
एकादश स्थान में शनि हो और चौथे भाव में पापग्रह हो तथा अपने
नीच में चन्द्रमा पाँचवें भाव में हो तो माता के शाप से संतान की हानि
होती है॥३४॥
पुत्रस्थानाधिपे दुःस्थे लग्नेशे नीचराशिगे।
चन्द्रपापसमायोगे मातृशापात्सुतक्षयः॥३५॥
पंचमेश ६, ८, १२ भाव में हो, लग्नेश अपनी नीच राशि में हो तथा
चन्द्रमा पाप से युत हो तो माता के शाप से संतान की हानि होती है॥३५॥

३५८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
पुत्रस्थानाधिपे दुःस्थे चन्द्रे पापांशसंयुते।
लग्ने पुत्रे पापयुते मातृशापात्सुतक्षयः ।।३६।।
पंचमेश ६, ८, १२ भाव में हो, चन्द्रमा पापांश में हो, लग्न और पंचम
में पापग्रह हों तो माता के शाप से संतान की हानि होती है।।३६।।
पुत्रस्थानाधिपे चन्द्रे मन्दराह्वारसंयुते ।
भाग्ये वा पुत्रराशौ वा कारके पुत्रनाशनम् ।।३७ ।।
पंचमेश चन्द्रमा शनि, राहु, भौम से युत हो, कारक (गुरु) भाग्य वा
पाँचवें भाव में हो तो संतान की हानि होती है।।३७।।
मातृस्थानाधिपे भौमे शनिराहुसमन्विते ।
भानुचन्द्रयुते पुत्रे लग्ने सन्ततिनाशनम् ।। ३८ ।।
चौथे भाव का स्वामी भौम, शनि, राहु से युत हो, संतान भाव और लग्न
सूर्य-चन्द्र से युत हों तो संतान की हानि होती है।। ३८।।
लग्नात्मजेशौ शत्रुस्थौ रन्ध्रे मात्राधिपे स्थितौ।
पितृनाशाधिपौ लग्ने मातृशापात्सुतक्षयः ।।३९।।
लग्नेश, पंचमेश छठे भाव में, आठवें भाव में मातृभावेश हों और दशम,
अष्टम भाव के स्वामी लग्न में हों तो माता के शाप से संतान की हानि
होती है।।३९।।
षष्ठाष्टमेशौ लग्नस्थौ व्यये मात्राधिपे सुते।
चन्द्रे जीवे पापयुते मातृशापात्सुतक्षयः ।।४०।।
६, ८ भाव के स्वामी लग्न में, १२वें भाव में सुखेश और चन्द्रमा-गुरु
पाप से युक्त होकर पाँचवें भाव में हों तो माता के शाप से संतान की हानि
होती है।।४०।।
पापमध्यगते लग्ने क्षीणे चन्द्रे च सप्तमे ।
मातृपुत्रे राहुमन्दौ मातृशापात्सुतक्षयः ।। ४१ ।।
लग्न पापग्रहों के मध्य में हो, क्षीण चन्द्रमा सातवें भाव में हो, ४,
५ भाव में राहु-शनि हों तो माता के शाप से सन्तान की हानि होती
है।।४१।।
नाशस्थानाधिपे पुत्रे पुत्रेशे नाशराशिभे ।
चन्द्रमातृपतौ दुःस्थे मातृशापात्सुतक्षयः ।।४२।।

अथ पूर्वजन्मशापद्योतकाध्यायः ३५९
अष्टमेश पाँचवें भाव में और पंचमेश आठवें भाव में हो और चन्द्रमा
तथा सुखेश ६, ८, १२ भाव में हो तो माता के शाप से संतान की हानि
होती है।।४२।।
चन्द्रक्षेत्रे यदा लग्ने कुजराहुसमन्विते।
चन्द्रमन्दौ पुत्रसंस्थौ मातृशापात्सुतक्षयः।।४३।।
यदि कर्क राशि लग्न में हो तथा भौम-राहु से युत हो; चन्द्र-शनि पाँचवें
भाव में हों तो माता के शाप से संतान की हानि होती है।।४३।।
लग्ने पुत्रे रन्ध्ररिःफे आरराहुर्विः शनिः।
मातृलग्नाधिपौ दुःस्थौ मातृशापात्सुतक्षयः।।४४।।
लग्न, पंचम, आठवें, बारहवें भाव में भौम, राहु, रवि और शनि हों
तथा मातृभावेश ६, ८, १२ में हो तो माता के शाप से संतान की हानि
होती है।।४४।।
नाशस्थानं गते जीवे कुजराहुसमन्विते।
पुत्रस्थाने मन्दचन्द्रौ मातृशापात्सुतक्षयः।।४५।।
आठवें भाव में भौम-राहु से युक्त गुरु हो और पाँचवें भाव में शनि-
चन्द्र हों तो माता के शाप से संतान की हानि होती है।।४५।।
ग्रहयोगपदैः सर्वं फलं ब्रूयाद्विचक्षणः।
शुभे सौख्यं विनिर्दिष्टं मिश्रे मिश्रं प्रकीर्त्तितम् ।।४६।।
ग्रहयोगवश सभी फलों को करे। शुभयोग से शुभ फल, पापयोग से
पापफल तथा मिश्रयोग से मिश्रित फल कहना चाहिए।।४६।।
अथास्य शान्तिमाह—
सेतुस्नानं प्रकुर्वीत गायत्री लक्षसंज्ञके।
ग्रहदानं च कर्त्तव्यं रौप्यपात्रे पयःस्थितिः।।४७।।
एक लक्ष गायत्री का जप कराके वा करके सेतुस्नान करे। ग्रहदान
और चाँदी के पात्र में दूध का दान करे।।४७।।
ब्राह्मणान् भोजयेत्तद्वदश्वत्थस्य प्रदक्षिणम्।
कर्तव्यं भक्तियुक्तेन चाष्टविंशसहस्रकम् ।।४८।।
ब्राह्मणों को भोजन करावे और भक्ति से युक्त होकर २८ हजार पीपल
की प्रदक्षिणा करे।।४८।।

३६० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
एवं कृते तदा देवि शापान्मोक्षो भविष्यति ।
सत्पुत्रं लभते पश्चाद्वृद्धिः स्यात्तस्य सन्ततेः ॥४९॥
ऐसा करने से शाप से मुक्ति मिल जाती है और अच्छे पुत्र का लाभ
होता है तथा संतान की वृद्धि होती है॥४९॥
अथ भ्रातृशापात्सुतक्षययोगः-
भ्रातृस्थानाधिपे पुत्रे कुजराहुसमन्विते ।
पुत्रलग्नेश्वरौ रन्ध्रे भ्रातृशापात्सुतक्षयः ॥५०॥
भ्रातृस्थान (३) के स्वामी भौम-राहु से युत होकर पाँचवें भाव में
हों और पंचमेश, लग्नेश आठवें भाव में हों तो भाई के शाप से संतान
की हानि होती है॥५०॥
लग्ने सुते कुजे मन्दे भ्रातृपे भाग्यराशिगे ।
कारके नाशराशिस्थे भ्रातृशापात्सुतक्षयः ॥५१॥
लग्न पंचम भाव में भौम-शनि हों, भ्रातृभावेश भाग्य भाव में हो तथा
कारक (भौम) आठवें भाव में हों तो भाई के शाप से संतान की हानि
होती है॥५१॥
भ्रातृस्थाने गुरौ नीचे मन्दः पञ्चमगो यदि ।
नाशस्थौ तु चन्द्रारौ भ्रातृशापात्सुतक्षयः ॥५२॥
भ्रातृस्थान (३) में नीच राशि में गुरु हो और शनि पाँचवें भाव में
हो और आठवें भाव में चन्द्र-शनि हों तो भाई के शाप से संतान की हानि
होती है॥५२॥
मूर्त्तिस्थानाधिपे रिःफे भौमः पञ्चमगो यदि ।
पुत्रेशे रन्ध्रभावस्थे भ्रातृशापात्सुतक्षयः ॥५३॥
लग्नेश बारहवें भाव में, पंचम भाव में भौम हो और पंचमेश आठवें
भाव में हो तो भाई के शाप से संतान की हानि होती है॥५३॥
पापमध्यगते लग्ने सुतभे पापमध्यगे ।
नाथौ च कारकौ दुःस्थौ भ्रातृशापात्सुतक्षयः ॥५४॥
पापग्रह के मध्य में लग्न हो और पंचम भाव भी पापग्रह के मध्य में
हो, दोनों के स्वामी और कारक ६, ८, १२ भाव में हो तो भाई के
शाप से संतान की हानि होती है॥५४॥

अथ पूर्वजन्मशापद्योतकाध्यायः ३६१
कर्मेशे भ्रातृभादत्थे पापयुक्ते तथा शुभे ।
पुत्रे च कुजसंयुक्ते भ्रातृशापात्सुतक्षयः ।।५५।।
कर्मेश पापग्रह से युत होकर भ्रातृस्थान में हो और पाँचवें भाव में भौम
युत हो तो भाई के शाप से संतान की हानि होती है।।५५।।
पुत्रस्थाने बुधक्षेत्रे शनिराहुसमन्विते ।
रिःफे विदारौ वर्त्तेते भ्रातृशापात्सुतक्षयः ।।५६।।
पंचम भाव में बुध की राशि (३।६) हो और उसमें शनि-राहु युक्त हों
तथा बारहवें भाव में बुध-भौम हों तो भाई के शाप से संतान की हानि
होती है।।५६।।
लग्नेशे भ्रातृराशिस्थे भ्रातृस्थानाधिपे सुते ।
लग्नभ्रातृसुते पापे भ्रातृशापात्सुतक्षयः ।।५७।।
लग्नेश भ्रातृभाव में, भ्रातृभावेश पाँचवें भाव में हो तथा लग्न
भ्रातृ पाँचवें भाव में पापग्रह हो तो भाई के शाप से संतान की हानि होती
है।।५७।।
भ्रात्रीशे नाशराशिस्थे पुत्रस्थे कारके तथा ।
राहुमान्दियुते दृष्टे भ्रातृशापात्सुतक्षयः ।।५८।।
तृतीय भाव का स्वामी ८वें भाव में और पाँचवें भाव में कारक राहु-
मांदि (गुलिक) से युत वा दृष्ट हो तो भाई के शाप से संतान को कष्ट
होता है।।५८।।
नाशस्थानाधिपे पुत्रे भ्रातृनाथेन संयुते ।
रन्ध्रे आरार्किसंयुक्ते भ्रातृशापात्सुतक्षयः ।।५९।।
अष्टमेश पाँचवें भाव में तृतीयेश से युक्त हो, आठवें भाव में भौम-शनि
हों तो भाई के शाप से संतान की हानि होती है।।५९।।
अस्य शान्तिमाह—
भ्रातृशापविमोक्षार्थं श्रवणं विष्णुकीर्त्तनम् ।
चान्द्रायणं चरेत्पश्चात्कावेर्य्यां विष्णुसन्निधौ ।।६०।।
भाई के शाप की शान्त्यर्थ विष्णु का कीर्त्तन सुनना चाहिए। चान्द्रायण
व्रत करे। बाद में कावेरी नदी के किनारे विष्णु के सन्निकट ।।६०।।
अस्वत्थस्थापनं कार्यं दशधेनूः प्रदापयेत् ।
प्राजापत्यं चरेत्तत्र भूमिं दद्यात्फलान्विताम् ।
एवं यः कुरुते भक्त्या पुत्रवृद्धिः प्रजायते ।।६१।।

३६२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
पीपल के वृक्ष की स्थापना कर दस गौ का दान करे, इसके बाद
प्राजापत्य करके भूमि का दान करे। इस प्रकार भक्तिपूर्वक करने से पुत्र
की वृद्धि होती है॥६१॥
अथ मातुलात्सुतक्षययोगः-
पुत्रस्थाने बुधे जीवे कुजराहुसमन्विते।
लग्ने मन्दसमायोगे मातुलात्सुतनाशनम् ॥६२॥
यदि पाँचवें भाव में बुध, गुरु, भौम, राहु हों, लग्न में शनि हो तो मामा
के शाप से सन्तान की हानि होती है॥६२॥
लग्नपुत्रेश्वरौ पुत्रे शनिभौमबुधान्विते ।
ज्ञेयो मातुलशापत्त्वात्पुत्रसन्ततिनाशनम् ॥६३॥
लग्नेश और पंचमेश शनि, भौम, बुध के साथ एकत्र हों तो मामा के
शाप से संतान की हानि होती है॥६३॥
लुप्ते पुत्राधिपे लग्ने सप्तमे भानुनन्दने।
लग्नेशे बुधसंयुक्ते तस्य सन्ततिनाशनम् ॥६४॥
लग्नेश अस्त होकर लग्न में हो और सातवें भाव में शनि हो और
लग्नेश बुध के साथ हो तो मामा के शाप से संतान की हानि होती
है॥६४॥
ज्ञातिस्थानाधिपे लग्ने व्ययेशेन समन्विते।
शशिसौम्यकुजे पुत्रे तस्य सन्ततिनाशनम् ॥६५॥
व्ययेश से युत होकर सुखेश लग्न में हो और चन्द्रमा, बुध, भौम संतान
भाव में हों तो मामा के शाप से संतान की हानि होती है॥६५॥
अस्य शान्तिमाह-
तद्दोषपरिहारार्थं विष्णुस्थापनमुच्यते।
वापीकूपतडागादेर्निर्माणं सेतुबन्धनम् ॥६६॥
उपर्युक्त दोष की शान्ति के लिए विष्णु की स्थापना करे। बावली, कूआँ,
तालाब को बनवाये॥६६॥
पुत्रवृद्धिर्भवेत्तस्य सम्पद्वृद्धिः प्रजायते।
एवं योगग्रहेणैव फलं ब्रूयाद्विचक्षणैः ॥६७॥
पुल का निर्माण करावे तो पुत्र की वृद्धि, संपत्ति की भी वृद्धि होती
है। इस प्रकार ग्रहयोगवश पंडित लोग फल का विचार करें॥६७॥

अथ पूर्वजन्मशापद्योतकाध्यायः ३६३
ब्रह्मशापात्सुतक्षययोगः—
गुरुक्षेत्रे यदा राहुः पुत्रे जीववारभानुजाः।
धर्मस्थानाधिपे नाशे ब्रह्मशापात्सुतक्षयः।।६८।।
यदि गुरु की राशि (९, १२) में राहु हो, पाँचवें भाव में गुरु, भौम,
शनि हों और धर्मेश आठवें भाव में हो तो ब्रह्म (ब्राह्मण) के
शाप से संतान का अभाव होता है।।६८।।
विद्याबलेन यो मर्त्यो ब्राह्मणानवमन्यते।
तद्दोषाद्ब्रह्मशापाच्च तस्य सन्ततिनाशनम्।।६९।।
विद्या वा बलप्रयोग से जो कोई ब्राह्मण का अपमान करता है,
उसके दोष और ब्राह्मण के शाप से वह संतानहीन होता है।।६९।।
धर्मेशे पुत्रभावस्थे पुत्रेशे नाशराशिगे।
जीववारराहुमृत्युस्थे ब्रह्मशापात्सुतक्षयः।।७०।।
धर्मेश पाँचवें भाव में हो और पंचमेश धर्म भाव में हो तथा गुरु,
भौम, राहु आठवें भाव में हों तो ब्रह्मशाप से संतान का अभाव होता
है।।७०।।
धर्माधिपे नीचगते व्ययेशे पुत्रराशिगे।
राहुयुक्तेक्षिते वापि ब्रह्मशापात्सुतक्षयः।।७१।।
धर्मेश अपनी नीचराशि में हो और व्ययेश पंचम भाव में हो, राहु से
युत वा दृष्ट हो तो ब्रह्मशाप से संतान का अभाव होता है।।७१।।
जीवे नीचगते राहुर्लग्ने वा पुत्रराशिगे।
पुत्रस्थानाधिपे दुःस्थे ब्रह्मशापात्सुतक्षयः।।७२।।
गुरु नीचराशि में हो, राहु लग्न वा पंचम भाव में हो और पंचमेश ६,
८, १२ भाव में हो तो ब्रह्मशाप से संतान का अभाव होता है।।७२।।
पुत्रस्थानाधिपे जीवे रन्ध्रे पापसमन्विते।
पुत्रेशावार्कचन्द्रौ वा ब्रह्मशापात्सुतक्षयः।।७३।।
पंचमेश गुरु आठवें भाव में पापग्रह से युक्त हो अथवा पंचमेश रवि-
चन्द्र हों तो भी ब्रह्मशाप से संतान का अभाव होता है।।७३।।
मन्दांशे मन्दसंयुक्ते जीवे भौमसमन्विते।
पुत्रेशे व्ययराशिस्थे ब्रह्मशापात्सुतक्षयः।।७४।।

३६४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
शनि के अंश में शनि-भौम संयुक्त गुरु हो, पंचमेश बारहवें भाव में हो
तो ब्रह्मशाप से संतान का अभाव होता है॥७४॥
लग्ने गुरुयुते मन्दे भाग्ये राहुसमन्विते।
व्यये गुरुसमायुक्ते ब्रह्मशापात्सुतक्षयः॥७५॥
लग्न में गुरु हो, शनि-राहु से युक्त हो, भाग्यभाव में और गुरु व्यय भाव
में हो तो ब्रह्मशाप से संतान का अभाव होता है॥७५॥
अस्य शान्तिमाह-
तस्य दोषस्य शान्त्यर्थं कुर्याच्चान्द्रायणं नरः।
ब्रह्मकूर्चत्रयं कृत्वा धेनुर्दद्यात्सदक्षिणाम्॥७६॥
उस दोष की शान्ति के लिए चान्द्रायण एवं ब्रह्मकूर्च व्रत (प्रायश्चित्त)
करके दक्षिणा सहित गोदान॥७६॥
पञ्चरत्नानि देयानि सुवर्णेन समन्वितम्।
अन्नदानं ततः कुर्यादयुतं च सहस्रकम्॥७७॥
और पंचरत्न सोने के साथ दान करके दस हजार वा एक हजार
का अन्नदान करें॥७७॥
एवं कृते तु सत्पुत्रं लभते नात्र संशयः।
मुक्तशापो विशुद्धात्मा स पुत्रसुखमेधते॥७८॥
ऐसा करने से मनुष्य शाप से मुक्त होकर पुत्र को प्राप्त करता है और
शापमुक्त होकर शुद्धात्मा होकर सुख को भोगता है॥७८॥
पत्नीशापात्सुतक्षययोगः-
दारेशे पुत्रभावस्थे दारेशस्थांशपे शनौ।
पुत्रेशे नाशराशिस्थे पत्नीशापात्सुतक्षयः॥७९॥
सप्तमेश पंचम भाव में हो तथा सप्तमेश के नवांश का स्वामी
शनि हो, पंचमेश आठवें भाव में हो तो स्त्री के शाप से संतान की हानि
होती है॥७९॥
कलत्रेशे नाशसंस्थे रिःफेशे पुत्रराशिगे।
कारके पापसंयुक्ते पत्नीशापात्सुतक्षयः॥८०॥
सप्तमेश आठवें भाव में और व्ययेश पाँचवें भाव में हो, कारक (शुक्र)
पापयुक्त हो तो स्त्री के शाप से संतान का अभाव होता है॥८०॥

अथ पूर्वजन्मशापद्योतकाध्यायः ३६५
पुत्रस्थानगते शुक्रे कामपे रन्ध्रमाश्रिते।
कारके पापसंयुक्ते पत्नीशापात्सुतक्षयः॥८१॥
पंचम स्थान में शुक्र हो, सप्तमेश आठवें भाव में हो तथा कारक
पापयुक्त हो तो स्त्रीशाप से संतान का अभाव होता है॥८१॥
कुटुम्बे पापसम्बन्धे कामेशे नाशराशिगे।
पुत्रे पापग्रहैर्युक्ते पत्नीशापात्सुतक्षयः॥८२॥
दूसरे भाव में पापग्रह हो, सप्तमेश आठवें भाव में हो और पाँचवें
भाव में पापग्रह युत हों तो स्त्री के शाप से संतान का अभाव होता
है॥८२॥
भाग्यस्थानगते शुक्रे दारेशे नाशराशिगे।
लग्ने पापे सुते पापे पत्नीशापात्सुतक्षयः॥८३॥
नवम भाव में शुक्र, पंचमेश आठवें भाव में तथा लग्न और पाँचवें में
पापग्रह हों तो स्त्री के शाप से संतान का अभाव होता है॥८३॥
भाग्यस्थानाधिपे शुक्रे पुत्रेशे शत्रुराशिगे।
गुरुलग्नेशदारेशा दुःस्थाः सन्ततिनाशनम्॥८४॥
भाग्येश शुक्र हो, पंचमेश छठे स्थान में हो और गुरु, लग्नेश,
दारेश ६, ८, १२ भावों में हों तो स्त्रीशाप से संतान का अभाव होता
है॥८४॥
पुत्रस्थाने भृगुक्षेत्रे राहुचन्द्रसमन्विते।
व्यये लग्ने धने पापे स्त्रीशापात्सुतक्षयः॥८५॥
पंचम भाव में शुक्र की राशि (२,७) राहु-चन्द्र से युक्त हो और १२,
१, २ भावों में पापग्रह हों तो स्त्रीशाप से संतान का अभाव होता
है॥८५॥
सप्तमे मन्दशुक्रौ च रन्ध्रेशे पुत्रभे रवौ।
लग्ने राहुसमायोगे पत्नीशापात्सुतक्षयः॥८६॥
सातवें भाव में शनि-शुक्र हों, अष्टमेश पाँचवें भाव में हो, रवि
राहु लग्न में हों तो स्त्रीशाप से संतान का अभाव होता है॥८६॥
धने कुजे व्यये जीवे पुत्रस्थे भृगुनन्दने।
राहुयुक्तेक्षिते वापि पत्नीशापात्सुतक्षयः॥८७॥

३६६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
दूसरे भाव में भौम, बारहवें भाव में गुरु, पाँचवें भाव में शुक्र हों, दाहयुक्त
वा दृष्ट हों तो स्त्रीशाप से पुत्र का अभाव होता है।।८७।।
नाशस्थौ वित्तदारेशौ पुत्रलग्ने कुजे शनौ।
कारके पापसंयुक्ते पत्नीशापात्सुतक्षयः ।।८८।।
आठवें भाव में धनेश, सप्तमेश हों, पाँचवें और लग्न में भौम-शनि
हों तथा कारक पापयुक्त हो तो स्त्रीशाप से संतान का अभाव होता
है।।८८।।
लग्नपञ्चमभाग्यस्था राहुमन्दकुजाः क्रमात्।
रन्ध्रस्थौ पुत्रदारेशौ पत्नीशापात्सुतक्षयः ।।८९।।
लग्न पंचम, नवम में राहु, शनि, भौम हों और आठवें भाव में पंचमेश,
सप्तमेश हों तो स्त्री के शाप से संतान का अभाव होता है।।८९।।
अस्य शान्तिमाह-
तस्य दोषस्य शान्त्यर्थं कन्यादानं समाचरेत्।
लक्ष्मीनारायणं देयं सर्वाभरणभूषितम् ।।९०।।
इस दोष के शान्त्यर्थ कन्यादान करे। लक्ष्मीनारायण की मूर्त्ति सभी
आभरणों से युक्त।।९०।।
मूर्त्तिदानं च कर्त्तव्यं दशधेनूः प्रदापयेत्।
शय्यां च भूषणं चैव दम्पत्योर्दापयेत्सुधीः।
पुत्रं प्रसूयते तस्य भाग्यवृद्धिश्च जायते ।।९१।।
दान करे, दश धेनु का दान करें, शय्या-आभूषण सपत्नीक ब्राह्मण
को दे। ऐसा करने से पुत्र होता है तथा भाग्यवृद्धि भी होती है।।९१।।
प्रेतशापात्सुतक्षययोगः-
मन्त्रशापमिदं मर्त्यः पिशाचं बाध्यते सदा।
कर्मलोपं पितृभ्यश्च तच्छापाद्वंशनाशनम् ।।९२।।
जब पितरों के कर्म का लोप होता है अर्थात् उनके श्राद्धादि ठीक से
नहीं होते हैं तो पिशाच (प्रेत) हो जाते हैं तथा वे वंशवृद्धि को नहीं होने
देते।।९२।।
पुत्रस्थितौ मन्दसूर्यौ क्षीणचन्द्रस्तु संप्तमे।
लग्ने व्यये राहुजीवौ प्रेतशापात्सुतक्षयः ।।९३।।

अथ पूर्वजन्मशापद्योतकाध्यायः ३६७
पाँचवें भाव में शनि-सूर्य हों और सातवें भाव में क्षीण चन्द्र हो तथा
लग्न और बारहवें भाव में राहु तथा गुरु हों तो प्रेतशाप से वंश का अभाव
होता है।।९३।।
पुत्रस्थानाधिपे मन्दे नाशस्थे लग्नगे कुजे।
कारके नाशराशिस्थे प्रेतशापात्सुतक्षयः।।९४।।
पंचमेश शनि आठवें भाव में, लग्न में भौम और कारक आठवें भाव
में हो तो प्रेतशाप से वंश का अभाव होता है।।९४।।
लग्ने पापे व्यये भानौ सुते चारार्किसोमजाः।
पुत्रेशे रन्ध्रभावस्थे प्रेतशापात्सुतक्षयः।।९५।।
लग्न में पापग्रह हों तथा बारहवें भाव में सूर्य हो और पाँचवें भाव में
भौम, शनि, बुध हों और पंचमेश आठवें भाव में हो तो प्रेतशाप से संतान
का अभाव होता है।।९५।।
लग्ने राहुसमायोगे पुत्रस्थे भानुनन्दने।
कारके नाशराशिस्थे प्रेतशापात्सुतक्षयः।।९६।।
लग्न में राहु, पाँचवें भाव में शनि और कारक आठवें भाव में हों तो
प्रेतशाप से वंश का अभाव होता है।।९६।।
लग्ने राहौ च शुक्रेज्ये चन्द्रे मन्दयुते तथा।
लग्नेशे मृत्युराशिस्थे प्रेतशापात्सुतक्षयः।।९७।।
लग्न में राहु, शुक्र, गुरु हों, चन्द्रमा शनि से युत हो, लग्नेश आठवें
भाव में हो तो प्रेतशाप से पुत्र का अभाव होता है।।९७।।
लग्ने राहुसमायोगे पुत्रस्थे भानुनन्दने।
कुजदृष्टे युते वापि प्रेतशापात्सुतक्षयः।।९८।।
लग्न में राहु तथा पाँचवें भाव में शनि हो, भौम से युत वा दृष्ट हो तो
प्रेतशाप से पुत्र का अभाव होता है।।९८।।
कारके नीचराशिस्थे पुत्रस्थानाधिपे तथा।
नीचदृष्टे नीचयुते प्रेतशापात्सुतक्षयः।।९९।।
कारक नीचराशि में हो और पंचमेश भी अपने नीच में हो तथा
नीचराशिस्थ ग्रह से युत वा दृष्ट हो तो प्रेतशाप से वंश का अभाव होता
है।।९९।।
लग्ने मन्दे सुते राहौ रन्ध्रे भानुसमन्विते।
व्यये भौमसमायोगे प्रेतशापात्सुतक्षयः।।१००।।

३६८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
लग्न में शनि, पाँचवें भाव में राहु, आठवें भाव में सूर्य युक्त हो और
बारहवें भाव में भौम हो तो प्रेतशाप से वंश का अभाव होता
है॥१००॥
कामस्थानाधिपे दुःस्थे पुत्रे चन्द्रसमन्विते।
मन्दमान्दियुते लग्ने प्रेतशापात्सुतक्षयः॥१०१॥
सप्तमेश ६, ८, १२ भाव में भौम हो, पाँचवें भाव में चन्द्रमा हो, लग्न
में शनि और गुलिक हो तो प्रेतशाप से संतान का अभाव होता
है॥१०१॥
बाधास्थानाधिपे पुत्रे शनिशुक्रसमन्विते।
कारके नाशशशिस्थे प्रेतशापात्सुतक्षयः॥१०२॥
अष्टमेश शनि-शुक्र से युत होकर पाँचवें भाव में हो और कारक आठवें
भाव में हो तो प्रेतशाप से संतान का अभाव होता है॥१०२॥
अस्य शान्तिमाह-
तद्दोषस्य शान्त्यर्थं विष्णुश्राद्धं समाचरेत्।
रुद्राभिषेकं कुर्वीत ब्रह्ममूर्तिं प्रदापयेत्॥१०३॥
उपर्युक्त प्रेतशाप के निवृत्त्यर्थ विष्णुपद (गया) में श्राद्ध करना
चाहिए और रुद्राभिषेक करके ब्रह्म की मूर्ति का दान॥१०३॥
धेनुं रजतपात्रं च नीलं चैव प्रदापयेत्।
एतत्कर्मकृते तत्र शापमोक्षः प्रजायते॥१०४॥
तथा धेनु तथा चाँदी के पात्र और नीलमणि का दान करना चाहिए।
इतने कर्मों के करने से मुक्ति हो जाती है और कुलवृद्धि होती है॥१०४॥
अथ बहुपुत्रयोगः-
पुत्रे राहुरविः सौम्याः कारके शुभसंयुते।
शुभेन वीक्षिते वापि बहुपुत्रं समादिशेत्॥१०५॥
पंचम भाव में राहु, सूर्य, बुध हों, कारक (गुरु) शुभग्रह से युत हो
और शुभग्रह से देखा जाता हो तो बहुत-से पुत्र होते हैं॥१०५॥
पुत्रेशे शुभराशिस्थे शुभदृष्टिसमन्विते।
कारके केन्द्रभावस्थे बहुपुत्रं समादिशेत्॥१०६॥
पंचमेश शुभग्रह की राशि में शुभग्रह की दृष्टि से युक्त हो, कारक केन्द्र
में हो तो बहुत पुत्र होते हैं॥१०६॥

अथ पूर्वजन्मशापद्योतकाध्यायः ३६९
लग्नेशे पुत्रराशिस्थे पुत्रेशे लग्नमाश्रिते।
केन्द्रत्रिकोणगे जीवे बहुपुत्रं समादिशेत् ।।१०७।।
लग्नेश पाँचवें भाव में, पंचमेश लग्न में, केन्द्र (१,४,७,१०), त्रिकोण
(९,५) भाव में गुरु हो तो अनेक पुत्र होते हैं।।१०७।।
पुत्रस्थानगते राहौ मन्दांशकविवर्जिते।
बहुपुत्रं नरं विद्याच्छुभग्रहनिरीक्षिते ।।१०८।।
पाँचवें भाव में राहु शनि के नवांश में न हो, यदि शुभग्रह देखता हो तो
अनेक पुत्र होते हैं।।१०८।।
पुत्रस्थानाधिपे स्वोच्चे लग्नेशे शुभसंयुते।
कारके शुभसंयुक्ते बहुपुत्रं समादिशेत् ।।१०९।।
पंचमेश अपने उच्च में हो, लग्नेश शुभग्रह से युत हो और कारक
शुभग्रह हो तो अनेक पुत्र होते हैं।।१०९।।
पुत्रस्थानं तदीशे वा गुरौ वा शुभवीक्षिते।
शुभेन सहिते वापि बहुपुत्रं समादिशेत् ।।११०।।
पंचम स्थान में पंचमेश वा गुरु हो, शुभग्रह से दृष्ट हो या शुभग्रह से
युक्त हो तो अनेक पुत्र होते हैं।।११०।।
परिपूर्णबले जीवे लग्नेशे पुत्रराशिगे।
पुत्रेशे बलसंयुक्ते बहुपुत्रं समादिशेत् ।।१११।।
गुरु पूर्ण बली हो तथा लग्नेश पाँचवें भाव में हो और पंचमेश बली
हो तो अनेक पुत्र होते हैं।।१११।।
पुत्रस्थानगते जीवे परिपूर्णबलान्विते।
लग्नेशे बलयुक्ते पुत्रयोगा इमे स्मृताः ।।११२।।
पाँचवें पूर्ण बली गुरु हो, लग्नेश बली हो तो अनेक पुत्र होते हैं।।११२।।
वर्गोत्तमांशगे जीवे लग्नेशस्यांशपे शुभे।
पुत्रेशेन युते दृष्टे पुत्रयोगा इमे स्मृताः ।।११२।।
गुरु वर्गोत्तम नवांश में हो, लग्नेश के नवांश में शुभग्रह हो, पंचमेश से
युत वा दृष्ट हो तो बहुत पुत्र होते हैं।।११३।।
वित्तेशे पुत्रभावस्थे परिपूर्णबलान्विते।
वैशेषिकांशके जीवे पुत्रयोगा इमे स्मृताः ।।११४।।