बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३५६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
पितृस्थानाधिपे पुत्रे पुत्रेशे वा तथा स्थिते।
लग्ने पुत्रे पापयुते पितृशापात्सुतक्षयः॥२३॥
पितृस्थानेश (१०वें भाव का स्वामी) पाँचवें भाव में हो और पंचमेश
१०वें भाव में हो तथा लग्न और पाँचवें भाव में पापग्रह हों तो
पिता के शाप से संतान की हानि होती है॥२३॥
पितुःस्थानाधिपो भौमः पुत्रेशेन समन्वितः।
लग्ने पुत्रे पितृस्थाने पापात्सन्ततिनाशनम् ॥२४॥
पितृस्थान (१०) का स्वामी होकर भौम पंचमेश से युत हो और
लग्न, पंचम तथा दशम में पापग्रह हों तो पिता के शाप से संतान की
हानि होती है॥२४॥
पितृस्थानाधिपे दुःस्थे कारके पापराशिगे।
सपापे पुत्रलग्नेशे पितृशापात्सुतक्षयः॥२५॥
पितृस्थान (१०) का स्वामी ६, ८, १२ भाव में हो तथा कारक (गुरु)
पापग्रह की राशि में हो और पंचमेश तथा लग्नेश पापयुत हों तो पिता
के शाप से संतान की हानि होती है॥२५॥
लग्नपञ्चमभावस्था भानुभौमशनैश्चराः।
रन्ध्रे रिःफे राहुजीवौ पितृशापात्सुतक्षयः॥२६॥
लग्न तथा पंचम भाव में सूर्य, भौम, शनि हों और ८, १२ स्थान में राहु
तथा गुरु हों तथा लग्न में पापग्रह हों तो पिता के शाप से संतान की हानि
होती है॥२६॥
लग्नाष्टमगे भानौ पुत्रस्थे भानुनन्दने।
पुत्रेशे राहुसंयुक्ते लग्ने पापे सुतक्षयः॥२७॥
बारहवें लग्न से आठवें में सूर्य हों, पाँचवें भाव में शनि हो, पंचमेश राहु
से युत हो और लग्न में पापग्रह हों तो पितृशाप से संतान की हानि होती
है॥२७॥
व्ययेशे लग्नभावस्थे रन्ध्रेशे पुत्रराशिगे।
पितृस्थानाधिपे रन्ध्रे पितृशापात्सुतक्षयः॥२८॥
व्यय भाव के स्वामी लग्न में हो और अष्टमेश पाँचवें भाव में हो तथा
पितृस्थानेश आठवें भाव में हो तो पिता के शाप से संतानहीन होता
है॥२८॥