बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३५८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
पुत्रस्थानाधिपे दुःस्थे चन्द्रे पापांशसंयुते।
लग्ने पुत्रे पापयुते मातृशापात्सुतक्षयः ।।३६।।
पंचमेश ६, ८, १२ भाव में हो, चन्द्रमा पापांश में हो, लग्न और पंचम
में पापग्रह हों तो माता के शाप से संतान की हानि होती है।।३६।।
पुत्रस्थानाधिपे चन्द्रे मन्दराह्वारसंयुते ।
भाग्ये वा पुत्रराशौ वा कारके पुत्रनाशनम् ।।३७ ।।
पंचमेश चन्द्रमा शनि, राहु, भौम से युत हो, कारक (गुरु) भाग्य वा
पाँचवें भाव में हो तो संतान की हानि होती है।।३७।।
मातृस्थानाधिपे भौमे शनिराहुसमन्विते ।
भानुचन्द्रयुते पुत्रे लग्ने सन्ततिनाशनम् ।। ३८ ।।
चौथे भाव का स्वामी भौम, शनि, राहु से युत हो, संतान भाव और लग्न
सूर्य-चन्द्र से युत हों तो संतान की हानि होती है।। ३८।।
लग्नात्मजेशौ शत्रुस्थौ रन्ध्रे मात्राधिपे स्थितौ।
पितृनाशाधिपौ लग्ने मातृशापात्सुतक्षयः ।।३९।।
लग्नेश, पंचमेश छठे भाव में, आठवें भाव में मातृभावेश हों और दशम,
अष्टम भाव के स्वामी लग्न में हों तो माता के शाप से संतान की हानि
होती है।।३९।।
षष्ठाष्टमेशौ लग्नस्थौ व्यये मात्राधिपे सुते।
चन्द्रे जीवे पापयुते मातृशापात्सुतक्षयः ।।४०।।
६, ८ भाव के स्वामी लग्न में, १२वें भाव में सुखेश और चन्द्रमा-गुरु
पाप से युक्त होकर पाँचवें भाव में हों तो माता के शाप से संतान की हानि
होती है।।४०।।
पापमध्यगते लग्ने क्षीणे चन्द्रे च सप्तमे ।
मातृपुत्रे राहुमन्दौ मातृशापात्सुतक्षयः ।। ४१ ।।
लग्न पापग्रहों के मध्य में हो, क्षीण चन्द्रमा सातवें भाव में हो, ४,
५ भाव में राहु-शनि हों तो माता के शाप से सन्तान की हानि होती
है।।४१।।
नाशस्थानाधिपे पुत्रे पुत्रेशे नाशराशिभे ।
चन्द्रमातृपतौ दुःस्थे मातृशापात्सुतक्षयः ।।४२।।