बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
१०८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
यदि ग्रहों के अंश तुल्य हों तो दोनों ही एक कारक होते हैं ।।१९।।
तत्कारको लुप्यति चेदन्यन्नैवास्ति कारकम् ।
कारकाणां स्थिराणां च मध्ये सञ्चितयेद्विज ।।२०।।
वहाँ दोनों का नाश हो जाता है, फिर स्थिरकारक से ही फल
को देखना चाहिए ।।२०।।
अथ योगकारकमाह-
अधुना सम्प्रवक्ष्यामि खेटान् कारकसंज्ञकान् ।
यस्य जन्मनि भावानां यथास्थाने च वै द्विज ।।२१।।
अब मैं योग करने वाले कारक ग्रहों को कह रहा हूँ ।।२१।।
स्वक्षे तुङ्गे च मित्रर्क्षे कण्टके संस्थिता ग्रहाः ।
अन्योन्यकारका विप्र कर्मगास्तु विशेषतः ।।२२।।
जन्म समय ग्रह अपनी उच्चराशि, अपनी राशि वा अपने मित्र की
राशि में होकर परस्पर केन्द्र में हों तो परस्पर कारक (भाग्योदय)
करने वाले होते हैं। इसमें भी दशम स्थान में विशेष योगकारक होते
हैं ।।२२।।
लग्ने सुखे तथा कामे ग्रहभाववशेन च ।
भवन्ति कारका विप्र विशेषेण च खेगताः ।।२३।।
लग्न चतुर्थ, सप्तम, दशम में कारक होते हैं, विशेषतः दशम
में कारक होता है ।।२३।।
स्वमित्रर्क्षोच्चगो हेतुरन्योन्यं यदि केन्द्रगः ।
ससुहृद्गणसम्पन्नः सोऽपि कारक एव वै ।।२४।।
यदि ग्रह अपने मित्र, राशि, उच्च में होकर परस्पर केन्द्र में हों तो
वे भी परस्पर कारक होते हैं ।।२४।।
नीचान्वये यस्य जन्म बभूव द्विजसत्तम ।
पतन्ति कारका लग्ने प्रधानत्वं च स आप्नुयात् ।।२५।।
नीच वंश में उत्पन्न हो और योगकारक ग्रहों से योग होता हो तो वह
अपने कुल में प्रधान होता है ।।२५।।
राज्ञां कुले समुत्पन्नो राजा भवति निश्चितम् ।
एवं कुलानुसारेण कारकाणां फलं भवेत् ।।२६।।
अथ कारकाध्यायः ६९
और राजकुल में उत्पन्न हो और योग होता हो तो अवश्य राजा होता
है। इस प्रकार कुल के अनुसार कारकों का फल होता है॥२६॥
अथ स्थिरकारकमाह—
अधुना सम्प्रवक्ष्यामि कारकाणि स्थिराणि च।
सूर्यादीनां ग्रहाणां च वीर्यवान् कारको भवेत्॥२७॥
अब मैं स्थिर कारकों को कह रहा हूँ। सूर्य आदि ग्रहों के बलाबल
के अनुसार ये कारक होते हैं॥२७॥
बलवान् जायते विप्र जन्मनि रविशुक्रयोः।
स पितृकारको ज्ञेयो निर्विशङ्कं द्विजोत्तम॥२८॥
जन्मकाल में रवि और शुक्र में जो बलवान् हो वह पितृकारक होता
है॥२८॥
चन्द्रारयोश्च बलवान् मातृकारक उच्यते।
भौमतस्तु विशेषेण भगिनीदारभ्रातृकौ॥२९॥
चंद्रमा और भौम में जो बलवान् हो वह भावकारक होता है॥ विशेषतः
भौम से बहिन और साला (स्त्री के भाई) का विचार होता है॥२९॥
बुधान्मातुलमाख्यातो मातृतुल्यानपि द्विज।
गुरुणा चात्र विज्ञेया पुत्रस्वामिपितामहाः॥३०॥
बुध से मामा और मातृसदृश (मौसी) आदि का विचार होता है॥ गुरु
से पुत्र और पितामह आदि का विचार होता है॥३०॥
स्वभार्यामातृपितरौ तथा मातामही द्विज।
भृगुद्वारा विजानीयादेतेषां शुक्रकारकाः॥३१॥
सास-ससुर और नानी का विचार शुक्र से होता है॥ यही उनका कारक
होता है॥३१॥
सूर्याच्च पुण्यभे तात इन्दोर्माता चतुर्थतः।
कुजात्तृतीयतो भ्राता मातुलो रिपुभाद्बुधात्॥३२॥
सूर्य से ९वें स्थान में पिता का, चन्द्रमा से चतुर्थ स्थान पर माता
का, भौम से तीसरे भाई का, बुध से छठे मामा का॥३२॥
देवेज्यात्पञ्चमे पुत्रो दैत्येज्याद्यूनभे स्त्रियः।
मन्दादष्टमतो मृत्युस्तातादीनां विचिन्तयेत्॥३३॥
११० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
गुरु से पाँचवें पुत्र का, शुक्र से सातवें स्त्री का और शनि से आठवें
भाव में आयु का विचार करना चाहिए।। ३३ ।।
अथ भावकारकमाह-
अधुना सम्प्रवक्ष्यामि विशेषं भावकारकम् ।
जनुर्लग्नं च विद्याद्धै आत्मकारकमेव च ।। ३४ ।।
अब विशेषकर भावकारक को कह रहा हूँ। जन्मलग्न आत्मकारक ।। ३४ ।।
धनभावं विजानीयाद्दारकारकमेव च ।
एकादशे ज्येष्ठभ्रातुस्तृतीये च कनिष्ठकाः ।। ३५ ।।
धनभाव स्त्रीकारक, ग्यारहवाँ ज्येष्ठ भाई का और तीसरा कनिष्ठ ।। ३५ ।।
सुते सुतं विजानीयाद्दारं सप्तमभावतः ।
सुतस्थाने ग्रहस्तिष्ठेत्सोऽपि कारक उच्यते ।। ३६ ।।
पंचम भाव पुत्र का और सातवाँ स्त्री का कारक होता है। पाँचवें भाव
में यदि कोई ग्रह हो तो वह भी उस भाव का कारक होता है ।। ३६ ।।
सूर्यो गुरुः कुजः सोमो गुरुर्भौमः सितः शनिः ।। ३७ ।।
गुरुश्चन्द्रसुतो जीवो मन्दश्च भावकारकः ।। ३७ ।।
क्रम से सूर्य, गुरु, भौम, बुध, गुरु, भौम, शुक्र, शनि, गुरु, बुध,
गुरु और शनि ये लग्नादि भावों के कारक होते हैं ।। ३७ ।।
पुनस्तन्वादयो भावाः स्थाप्यास्तेषां शुभाऽशुभम् ।
लाभं तृतीयं रन्ध्रं च शत्रुभावव्ययं तथा ।
एषां योगेन यो भावस्तन्नाशं प्राप्नुयाद्ध्रुवम् ।। ३८ ।।
फिर भी लग्न आदि भावों के शुभ-अशुभ को लिखकर उनके शुभाशुभ
का निर्णय करना चाहिए। एकादश, तृतीय, आठवाँ, छठवाँ और बारहवाँ
भाव- इनके साथ जिस भाव का सम्बन्ध होता है उस भाव के फल का
नाश हो जाता है अर्थात् इन भावों के स्पष्ट दृश्यादि का योग करने से
जो भाव बने वह नष्ट हो जाता है ।। ३८ ।।
चत्वारो राशयो भद्राः केन्द्रकोणशुभावहाः ।
तेषां संयोगमात्रेण अशुभोऽपि शुभो भवेत् ।। ३९ ।।
केन्द्र और कोण ये चार भाव शुभद हैं। इनके संयोग से जो भाव हो
वह भी शुभद होता है।। ३९ ।।
सूर्यादिग्रहाणां कारकत्वमाह १११
अथ सूर्यादिग्रहाणां कारकत्वमाह
राज्यविद्दुमरक्तवस्त्रमाणिक्यराजवन-
पर्वतक्षेत्रपितृकारको रविः॥१॥
राज्य, मूँगा, रक्तवस्त्र, मानिक, राज, वन, पर्वत, क्षेत्र और पिता का
कारक सूर्य होता है॥१॥
मातृमनःपुष्टिगन्धरसेक्षुगोधूमक्षारक-
द्विजशक्तिकार्यसस्यरजतादिकारकश्चन्द्रः॥२॥
माता, मन, शरीरपुष्टि, गंधद्रव्य, रस, ऊख, गेहूँ, क्षारपदार्थ, ब्राह्मण,
शक्तिकार्य, धान्य और चाँदी आदि का कारक चन्द्रमा है॥२॥
सत्त्वसद्मभूमिपुत्रशीलचौर्यरोगब्रह्मभ्रातृ-
पराक्रमाग्निसाहसराजशत्रुकारकः कुजः॥३॥
ओज, भूमि, पुत्र, शील, चोर, रोग, ब्रह्म, भाई, पराक्रम, अग्नि, साहस
और राजशत्रु के कारक भौम हैं॥३॥
ज्योतिर्विद्यामातुलगणितकार्यनर्तनवैद्य-
हास्यभीश्रीशिल्पविद्यादिकारको बुधः॥४॥
ज्योतिष विद्या, मामा, गणित विद्या, नृत्य, वैद्यक, हास्य, भय,
लक्ष्मी, शिल्पविद्या का कारक बुध है॥४॥
स्वकर्मयजनदेवब्राह्मणधनगृहकाञ्चन-
वस्त्रपुत्रमित्रान्दोलनादिकारको गुरुः॥५॥
अपने कार्य, यज्ञ, देवता, ब्राह्मण, धन, गृह, सुवर्ण, वस्त्र, पुत्र, मित्र,
आंदोलन आदि के कारक गुरु हैं॥५॥
कलत्रकार्मुकसुखगीतशास्त्र-
काव्यपुष्पसुकुमारयौवनाभरणरजत-
यानस्वर्गलोकमौक्तिक-
विभवकवितारसादिकारको भृगुः॥६॥
स्त्री, धनुष, सुख, गीतशास्त्र, काव्यशास्त्र, पुष्प, यौवन, आभूषण,
चाँदी, सवारी, स्वर्गलोक, मोती, वैभव, कविता, रस आदि के कारक शुक्र
हैं॥६॥
२२२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
महिषह्वगजतैलवस्त्रशृङ्गार-
प्रयाणसर्वराज्यसर्वायुधगृहयुद्ध-
सञ्चारशूद्रनीलमणिविघ्नकेशशल्य-
शूलरोगदासदासीजनायुष्यकारकः शनिः॥७॥
भैंस, घोड़ा, हाथी, तेल, वस्त्र, शृंगार, यात्रा, सभी प्रकार के राज्य, सभी
प्रकार के आयुध, गृह, युद्ध संचार, शूद्र, नीलममणि, विघ्न, केश, हड्डी,
शूलरोग, नौकर, नौकरानी, आयुष्य के कारक शनि है॥७॥
प्रयाणसमयसर्परात्रिसकलसुप्तार्थद्यूतकारको राहुः॥८॥
यात्राकाल, सर्प, रात्रि, सम्पूर्ण खोये हुए द्रव्य, जूआ का कारक राहु
है॥८॥
व्रणरोगचर्मातिशूलस्फुटक्षुधार्तिकारकः केतुः॥९॥
फोड़ा आदि रोग, चर्मरोग, अत्यंत शूल, भूख से कष्ट आदि का कारक
केतु है॥९॥
इति कारकाध्यायः।
अथ कारकांशफलमाह
अधुना सम्प्रवक्ष्यामि कारकांशाधिकान् ग्रहान्।
योगसम्बन्धमात्रेण यथावत् फलदा ग्रहाः॥१॥
अब मैं कारकांश के स्वामी ग्रहों के फल को कह रहा हूँ, जिसके संबंध
मात्र से योग का फल प्राप्त होता है॥१॥
स्वांशकारककुण्डल्यां नवमांशाधिपोऽथवा।
यस्मिन् राशौ स्थितो विप्र तद्राशिफलमुच्यते॥२॥
आत्मकारकांश कुंडली में नवांश के अधिपति जिस राशि में
हों उसके अनुसार फल होता है॥२॥
मेषादिमीनपर्यन्तं सर्वेषां फलमादिशेत्।
यथावद्भाषितं पूर्व शूलिना रुद्रयामले॥३॥
मेष से मीन पर्यन्त सभी राशियों का फल इस प्रकार है॥३॥
अस्वांशकारकांशेषु तिष्ठन्ति च यदा ग्रहाः।
तदा मूषकमार्जारौ दुःखदौ भयकारकौ॥४॥
कारकांशफलमाह ११३
यदि आत्मकारक मेष राशि के नवांश में हो तो मूसा, बिलार दुःख देते
हैं।।४।।
सुयोगे च यदा विप्र मार्जारादि सुखप्रदौ।
वृषे च कारकांशे तु भयार्ती च चतुष्पदात् ।।५।।
शुभग्रह के योग से मूसा, बिलार आदि सुख देते हैं। वृष का नवांश
हो तो चौपाये जानवरों से भय होता है।।५।।
शुभे चतुष्पदात्सिद्धिरीति तत्त्वं द्विजोत्तम।
मिथुने कारकांशे च कण्ड्वादिरोगसम्भवः।।६।।
शुभग्रह का योग हो तो चौपायों से सुख होता है। मिथुन के नवांश में
कारक हो तो खुजली आदि रोगों की संभावना होती है।।६।।
कर्कांशे च जलाद्दुःखं जलभीतिर्न संशयः।
कुष्ठादिरोगसम्भूतिः शुभे फलविपर्ययः।।७।।
कर्क के नवांश में कारक हो तो जल से कष्ट वा जल का भय और
कुष्ठ आदि रोग की संभावना होती है।।७।।
सिंहांशे कारके खेटे तिष्ठत्येवं द्विजोत्तम।
शुनकादि भयं दद्याच्छुभे सिद्धिप्रदायकः।।८।।
सिंह के नवांश में हो तो खाज आदि से भय होता है। शुभग्रह का योग
हो तो शुभ फल होता है।।८।।
उदाहरण— पृष्ठ २५ के दिये हुए स्पष्ट ग्रहों के अनुसार चरकारक इस
प्रकार है –
चरकारकाः
| आत्म-कारक | अनात्म-कारक | भ्रातृ-कारक | मातृ-कारक | पुत्र-कारक | जाति-कारक | दारा-कारक |
|---|---|---|---|---|---|---|
| भौम | चंद्रमा | सूर्य | गुरु | बुध | शुक्र | शनि |
११४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
कारकांशचक्रम्
+---------------------------------------+
| \ बु. २ / \ १२ / |
| \ / च. \ / |
| ३ \ / १ म. \ / ११ |
| \ / \ / |
|---------+----------------------+----------|
| / \ / \ |
| श. ४ वृ. \ / १० |
| \ \ / / |
| ५ \ ७ \ / / सू. ९ |
| \ / \ / |
| \ / ६ \ / |
| +-----------+ |
| | शु. ८ | |
+---------------------------------------+
(टिप्पणी: १ म. = चन्द्र, २ = बुध, ४ वृ. = शनि, ८ = शुक्र, ९ = सूर्य)
कन्यायां कारकांशे चेत्तिष्ठत्येवं फलं भवेत्।
युग्मवत्कण्डुरोगात्तिर्वह्निदोषेण दुःखभाक् ।। ९ ।।
कन्यांश में आत्मकारक हो तो मिथुनांश के समान ही कंडू (खुजली)
आदि रोग से कष्ट होता है॥९॥
तुलाख्यं कारकांशे च व्यापारेषु रतोऽधिकः।
क्रयविक्रयकर्त्ता च यदि जातो नृपालये ॥१०॥
तुला कारकांश हो तो वह व्यापार में अधिक संलग्न, खरीद-बिक्री
करने में पटु होता है॥१०॥
वृश्चिके कारकांशे च सर्पादिभयकारकः।
मातुः पयोधरे पीडा जायते द्विजसत्तम ॥११॥
वृश्चिकांश में कारक हो तो सर्प आदि से भय और माता के स्तन
में पीड़ा होती है॥११॥
चापस्थे कारकांशे च वाहनाद्भयमादिशेत्।
उच्चात्पतनं वापि कोपी वस्तुसमन्वितः॥१२॥
नक्रकारकांशे विप्र सिद्धिर्जंलचरादयः।
शङ्खमुक्ताप्रवालादिमत्स्यंखेचरदेवताः॥१३॥
धन. कारकांश हो तो वाहन से गिरने का भय वा ऊँचे से गिरने का
भय, कोपी और वस्तुसंग्रही होता है॥१२॥ मकर के अंश में कारक के
होने से मूँगा आदि, मछली एवं पक्षियों से लाभ होता है॥१३॥
कुम्भाख्यकारकांशे च तडागादीनि कारयेत्।
कीर्त्तिमान्धर्मवान्सोऽपि जायते द्विजसत्तम ॥१४॥
.कारकांशफलमाह ११५
कुम्भांश में कारक हो तो तालाब आदि का रचयिता, यशस्वी और
धार्मिक होता है॥१४॥
मीने च कारकांशे वै सायुज्यमुक्तिभाग्भवेत्।
शुभयोगे शुभं ब्रूयात्रशुभं विपरीतके॥१५॥
मीनांश में कारक हो तो साक्षात् मोक्ष पाता है। शुभग्रह के योग से
शुभ फल और पापग्रह के योग से अशुभ फल होता है॥१५॥
शुभांशे शुभराशौ वा कारके धनवान् भवेत्।
लग्नांशे चेच्छुभो वा स्याद्राजा भवति निश्चितम्॥१६॥
यदि आत्मकारक शुभग्रह के अंश में वा शुभग्रह की राशि में हो
तो जातक धनी होता है। एवं आत्मकारकांश में अथवा लग्नांश
में शुभग्रह हो तो निश्चय ही राजा होता है॥१६॥
उपग्रहे शुभांशे चेत्स्वोच्चस्वर्क्षे शुभर्क्षभे।
पापदृग्योगरहिते चान्त्ये कैवल्यं विनिर्दिशेत्॥१७॥
यदि उपग्रह शुभग्रह के अंश में हो अथवा अपनी उच्चराशि या
अपनी राशि के शुभग्रह की राशि में हो, पापग्रह के दृष्टि और योग
से रहित हो तो अन्त में मोक्ष की प्राप्ति होती है॥१७॥
चन्द्रभृग्वारवर्गस्थे कारके पारदारिकः।
मिश्रे मिश्रं विजानीयाद्विपरीते विपर्ययम्॥१८॥
यदि आत्मकारक चन्द्र, शुक्र या भौम के षड्वर्ग में हो तो परस्त्री का
सुख भोगने वाला होता है। उपर्युक्त फलों में मिश्रित ग्रह (शुभ और पाप
दोनों) का संबंध हो तो मिश्रित फल और विपरीत हो तो विपरीत फल कहना
चाहिए॥१८॥
कारकांशस्थितग्रहाणां फलम्-
अथैकः कारकांशेषु रव्यादिस्तिष्ठति ग्रहः।
तेषां फलं प्रवक्ष्यामि शृणु त्वं द्विजसत्तम॥१९॥
अब सूर्यादि ग्रहों का फल आत्मकारकांश के अनुसार कह रहा हूँ॥१९॥
कारकांशे यदा सूर्यस्तिष्ठति द्विजवीर्ययुक्।
आदावन्ते पुमान् सोऽपि राजकार्येषु तत्परः॥२०॥
यदि आत्मकारकांश में बलवान् सूर्य हो तो जातक अवस्था के आदि
और अंत मे राजकर्मचारी होता है॥२०॥
११६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
कारकांशे तु पूर्णेन्दुर्दैत्याचार्येण वीक्षितः।
शतभोगी भवेत्सोऽथ विद्याजीवी च जायते ।।२१।।
यदि कारकांश में पूर्णचन्द्रमा हो और शुक्र से देखा जाता हो तो १००
वर्ष की आयु होती है और विद्या द्वारा जीविका होती है।।२१।।
कारकांशे यदा भौमे बलाढ्येन युतेक्षिते।
रसवादी कुन्तधारी वह्निकृज्जीवनं भवेत् ।।२२।।
यदि कारकांश में भौम हो और किसी बली ग्रह से युत वा दृष्ट हो
तो रस बनाने वाला, कुंत (माला) धारण करने वाला और अग्नि
द्वारा जीविका प्राप्त करने वाला होता है।।२२।।
कारकांशे यदा सौम्यः तिष्ठत्येव बलाढ्यकः।
शिल्पको व्यवहारी च वणिक्कृत्यकसे द्विज ।।२३।।
यदि कारकांश में बुध हो तो और बली हो तो शिल्पी, व्यवहारी
और बनिए का कार्य करने वाला होता है।।२३।।
कारकांशे गुरौ विप्र कर्मनिष्ठापरो भवेत्।
सर्वशास्त्राधिकारी च विख्यातः क्षितिमण्डले ।।२४।।
यदि कारकांश में गुरु हो तो कर्म करने वाला, सभी शास्त्रों का
अधिकारी और पृथ्वी पर प्रसिद्ध होता है।।२४।।
कारकांशे यदा शुक्रो राजमान्यः सदा भवेत्।
सदिन्द्रियः शतायुश्च कथनीयं द्विजोत्तम ।।२५।।
यदि कारकांश में शुक्र हो तो राजा से सम्मान प्राप्त करता है, सुन्दर
और १०० वर्ष की आयु वाला होता है।।२५।।
कारकांशे यदा सौरिर्मृत्युलोके प्रसिद्धियुक्।
महतां कर्मणां वृत्तिः क्षितिपालेन पूजितः।।२६।।
कारकांश में शनि हो तो संसार में प्रसिद्ध, बड़े कार्यों को करने वाला
और राजा से पूजित होता है।।२६।।
कारकांशे यदा राहुर्धनुर्धारी प्रजायते।
जाङ्गल्यलौहयन्त्रादिकारकश्चौरसङ्गमी ।।२७।।
कारकांश में राहु हो तो धनुष धारण करने वाला, जंगली, लोह के
यंत्रों को बनाने वाला, चोर और संयमी होता है।।२७।।
कारकांशफलमाह ११७
कारकांशे यदा केतुस्तिष्ठति द्विजसत्तम।
व्यवहारी गजादीनामुशन्ति परद्रव्यके ॥१२८॥
कारकांश में केतु हो तो हाथी आदि का व्यवहार दूसरे के द्रव्य से करने
वाला होता है॥१२८॥
कारकांशे यदा विप्र संस्थितौ रविसैंहिकौ।
सर्पाद्भीतिर्भवेन्मृत्युः शुभदृष्ट्या निवर्तते ॥१२९॥
यदि कारकांश में सूर्य और राहु हों तो सर्प से भय या मृत्यु होती है,
शुभग्रह की दृष्टि हो तो निवृत्ति हो जाती है॥१२९॥
कारकांशे भानुतमौ शुभषड्वर्गसंयुतौ।
विषवैद्यो भवेन्नूनं विषहर्ता विचक्षण॥१३०॥
कारकांश में सूर्य और राहु हों और शुभ ग्रह के षड्वर्ग में हों तो विषवैद्य
या विष का हरण करने वाला होता है॥१३०॥
भौमेक्षिते कारकांशे भानुस्वर्भानुसंयुते।
अन्यग्रहा न पश्यन्ति स्ववेश्मपरदाहकः॥१३१॥
कारकांश में सूर्य और राहु हों, उसे भौम देखता हो शेष ग्रह न
देखते हो तो अपना और दूसरे का घर जलाने वाला होता है॥१३१॥
सगुलिके कारकांशे पूर्णेन्दुवीक्षिते द्विज।
सति चौरैर्णीतधनः स्वयं चौरोऽथवा भवेत्॥१३२॥
कारकांश में गुलिक हो और पूर्ण चन्द्र से देखा जाता हो तो चोरों से
धन अपहृत होता है अथवा स्वयं चोर होता है॥१३२॥
सगुलिके कारकांशे अन्यग्रहयुतेक्षिते।
बुधदृष्टियुते वापि अण्डवृद्धिः प्रजायते॥१३३॥
कारकांश में गुलिक हो और अन्य ग्रहों से देखा जाता हो अथवा बुध
से दृष्ट वा युत हो तो अंडवृद्धि होती है॥१३३॥
कारकांशे केतुयुक्ते पापग्रहनिरीक्षिते।
श्रोत्रच्छेदं भवेन्नूनं कर्णरोगार्तिना द्विज॥१३४॥
कारकांश में केतु हो और पापग्रह से देखा जाता हो तो कर्णरोग से पीड़ित
होने से कान काटा जाता है॥१३४।
कारकांशे स्थिते केतौ भृगुणा च समीक्षिते।
युते वा जायते विप्र क्रियाकर्मसमन्वितः॥१३५॥
११८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
कारकांश में केतु हो और शुक्र से दृष्ट वा युत हो तो क्रिया-कर्म
से युक्त होता है।।३५।।
कारकांशे स्थिते केतौ शनिसौम्यनिरीक्षिते।
बलवीर्येण रहितो जायते सोऽपि मानवः।।३६।।
कारकांश में केतु हो, शनि-बुध से देखा जाता हो तो मनुष्य बलवीर्य
से हीन होता है।।३६।।
सकेतौ कारकांशे च बुधशुक्रनिरीक्षिते।
जायते पौनःपुनिको दासीपुत्रोऽथवा भवेत् ।।३७।।
कारकांश में केतु हो और बुध-शुक्र से देखा जाता हो तो रुक-रुक कर
बोलने वाला या दासीपुत्र होता है।।३७।।
सकेतौ कारकांशे च अन्यग्रहनिरीक्षिते।
शनिदृष्टिविहीने च सत्याच्च रहितो भवेत् ।।३८।।
कारकांश में केतु हो, शनि को छोड़कर शेष ग्रह देखते हों तो असत्य
बोलने वाला होता है।।३८।।
कारकांशे यदा विप्र भृगुभास्करवीक्षिते।
राजप्रेष्यो भवेद्बालो जायते नात्र संशयः ।।३९।।
यदि कारकांश को शुक्र-सूर्य देखते हों तो जातक राजा का नौकर होता
है।।३९।।
कारकांशाद्धनभावफलम्—
अंशात्कुटुम्बे भृग्वारवर्गे स्यात्पारदारिकः।
तयोर्दृग्योगकाभ्यां च भवेदामरणं किल ।।४०।।
कारकांश से धन भाव में शुक्र-भौम का षड्वर्ग हो तो परस्त्रीगामी
होता है। यदि शुक्र-भौम देखते हों तो आमरण परस्त्रीगामी होता है।।४०।।
केतुना प्रतिबन्धः स्याद्गुरुणा स्त्रैण एव च।
राहुणा चार्थनिवृत्तिः स्याद्धने एवं फलं भवेत् ।।४१।।
केतु देखता हो तो नहीं होता है, गुरु देखता हो तो स्त्री के वश में
होता है, राहु देखता हो तो परस्त्री के लिए द्रव्य खर्च करता है।।४१।।
कारकांशफलमाह १११ .
कारकांशात्तृतीये च पापखेटयुतेक्षिते।
सशूरो जायते बालो वीर्यवान्बहुविक्रमी ।।४२।।
कारकांश से तीसरे भोव में पापग्रह युत हो वा देखते हों तो
बालक शूरवीर एवं पराक्रमी होता है ।।४२।।
कारकांशात्तृतीये च शुभखेटयुतेक्षिते।
जायते तत्त्वहृदयः कातरोऽपि विशेषतः ।।४३।।
कारकांश से तीसरे भाव में शुभग्रह हों वा देखते हों तो बालक शुद्ध
हृदय का और विशेषकर कातर होता है ।।४३।।
कारकांशात्तृतीये च षष्ठे पापयुतेक्षिते।
कृषिकर्मरतो नित्यं जायते नात्र संशयः ।।४४।।
कारकांश से तीसरे व छठे भाव में पापग्रह हों या देखते हों तो बालक
कृषिकर्म को करने वाला होता है ।।४४।।
कारकांशाच्चतुर्थभावफलम्-
पाताले कारकांशाच्च शशिशुक्रयुतेक्षिते।
प्रासादवान् भवेद्बालो विचित्रगृहवांन्भवेत् ।।४५।।
कारकांश से चतुर्थ स्थान में चन्द्रमा, शुक्र युत हों वा देखते हों तो
विचित्र प्रासाद (किला) या गृह वाला होता है ।।४५।।
कारकांशाच्च पाताले तुङ्गर्क्षे कोऽपि खेचरः।
हर्म्यमन्दिरसंयुक्तो ह्यंत्युच्चो बहुदीप्तिमान् ।।४६।।
चौथे में यदि कोई ग्रह अपनी उच्चराशि का हो तो बहुत ऊँचा, खूबसूरत
एवं प्रकाशमान् गृह होता है ।।४६।।
कारकांशाच्च पाताले शनिराहुयुतेक्षिते।
विप्रेच्छाटनपट्टीयुग्जायते मन्दिरं द्विज ।।४७।।
कारकांश से चौथे भाव में शनि-राहु हों या देखते हों तो पत्थर
का गृह होता है ।।४७।।
कारकांशाच्च पाताले कुजकेतुशनीक्षिते।
ऐष्टिकं मन्दिरं तस्य जायते नात्र संशयः ।।४८।।
कारकांश से चौथे भाव में भौम, केतु एवं शनि हों वा देखते हों तो ईंटे
का मकान होता है ।।४८।।
१२० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
कारकांशाच्च पाताले गुरुयुक्तनिरीक्षिते ।
दारवं मन्दिरं तस्य जायते नात्र संशयः ॥४९॥
कारकांश से चौथे भाव में गुरु युक्त हो वा देखता हो तो लकड़ी का
गृह होता है॥४९॥
कारकांशाच्च पाताले रवियुक्तनिरीक्षिते ।
तृणावेष्टितगृहं तस्य जायते नात्र संशयः॥५०॥
कारकांश से चौथे भाव में सूर्य युत हो वा देखता हो तो फूस
का गृह होता है॥५०॥
कारकांशात्पञ्चमभावफलम्—
स्वांशे तत्सुते वापि गुरुचन्द्राभ्यां च ग्रन्थकृत्।
भृगुणा किञ्चिदूनोऽसौ तस्मान्न्यूनो बुधेन च ॥५१॥
आत्मकारकांश में अथवा उससे पाँचवें स्थान में चन्द्रमा-गुरु हों तो ग्रंथ
बनाने वाला होता है।
यदि शुक्र हों तो कुछ न्यून होता है और बुध हो तों और भी न्यून होता
है॥५१॥
सुराचार्येण सर्वज्ञः ग्रन्थकर्त्ता तथैव च।
वेदवेदान्तविच्चापि न वाग्मी शाब्दिकेऽपि च ॥५२॥
केवल गुरु हो तो सर्वज्ञ और ग्रन्थकर्त्ता होता है तथा वेद-वेदान्त को
जानने वाला वैयाकरणी होते हुए भी वाग्मी नहीं होता है॥५२॥
न्यायज्ञः धरणीजेन बुधे मीमांसकस्तथा।
सभामूकस्तु शनिना गीतज्ञो रविणा तथा ॥५३॥
यदि भौम हो तो नैयायिक, बुध हो तो मीमांसक, शनि हो तो सभा में
मूक रहने हाला और सूर्य हो तो गानविद्या में पंडित ॥५३॥
शशिना सांख्ययोगज्ञः काव्यज्ञश्च तथा द्विज।
केतुना गणितज्ञश्च जायते नात्र संशयः॥५४॥
चन्द्रमा हो तो सांख्यशास्त्र और काव्य का पंडित और केतु हो तो
गणित का पंडित होता है॥५४॥
उक्तफलानां साफल्यं गुरुसम्बन्धमात्रतः।
कारकांशाद्धने केचित्फलमेवं ब्रुवन्ति हि॥५५॥
कारकांशफलमाह १२१
जो योग ऊपर कहे गये हैं सभी में गुरु का योग और दृष्टि हो तो योग
का फल अवश्य होता है। किसी-किसी का मत है कि कारकांश से
दूसरे स्थान में भी इसी प्रकार विचार करना चाहिए।।५५।।
कारकांशात्षष्ठभावफलम्-
स्वांशात्तृतीये षष्ठे च पापस्तिष्ठेच्चे द् द्विज ।
कर्षको जायते बालः नात्र कार्या विचारणा ।।५६।।
आत्मकारक से तीसरे, छठे स्थान में पापग्रह हों तो जातक किसान होता
है।।५६।।
कारकांशात्सप्तमभावफलम्-
कारकांशाच्च द्यूने चेद्गुरुचन्द्रयुते द्विज।
सुन्दरी गृहिणी तस्य पतिभक्तिपरायणा ।।५७।।
आत्मकारक से सातवें भाव में गुरु-चन्द्रमा हों तो जातक की स्त्री
सुन्दरी और पतिव्रता होती है।।५७।।
राहुणा विधवा भार्या जायते नात्र संशयः।
शनिना च वयोधिक्या रोगिणी वा तपस्विनी ।।५८।।
यदि सातवें राहु हो तो विधवा स्त्री का संयोग होता है। यदि शनि हो
तो अवस्था में अधिक, रोगिणी या तपस्विनी होती है।।५८।।
भौमेन विकलाङ्गी च तथा कान्ताद्यलक्षणा।
रविणा स्वकुले गुप्ता आसक्ता परवेश्मनी ।।५९।।
भौम हो तो अंग से हीन, सूर्य हो तो अपने कुल में गुप्तरिति से रहती
हुई दूसरे के वश में रहती है।।५९।।
बुधे कलावती ज्ञेया कलाभिज्ञा प्रजायते।
शुक्रेण तद्विज्ञेया निर्विशङ्कं द्विजोत्तम ।।६०।।
बुध हो तो कला को जानने वाली स्वयं कलाविद् होती है। इसी प्रकार
शुक्र से भी जानना चाहिए।।६०।।
कारकांशादष्टमभावफलम्-
कारकांशाल्लये चन्द्रे कुजराहुनिरीक्षिते ।
क्षयरोगो भवेत्तस्य श्वासकासादिरोगयुक् ।।६१।।
कारकांश से आठवें भाव में चन्द्रमा हो और भौम-राहु से देखा जाता
हो तो जातक क्षयरोग और श्वास-कास रोग से युक्त होता है।।६१।।
१२२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
कारकांशत्रवमभावफलम्—
कारकांशाच्च नवमे शुभखेटयुतेक्षिते।
सत्यवादी गुरोर्भक्तः स्वधर्मनिरतो भवेत्।।६२।।
कारकांश से नवम स्थान शुभग्रह से युत-दृष्ट हो तो जातक
सत्यवादी, गुरुभक्त, अपने धर्म में आसक्त होता है।।६२।।
कारकांशाच्च नवमे पापग्रहयुतेक्षिते।
स्वधर्मनिरतो बालो मिथ्यावादी भवेद्द्विज।।६३।।
कारकांश से नवम स्थान पापग्रह से युत-दृष्ट हो तो अपने धर्म
से रहित और असत्यवादी होता है।।६३।।
कारकांशाच्च नवमे शनिराहुयुतेक्षिते।
गुरुद्रोही भवेद्विप्र शास्त्रेषु विमुखो नरः।।६४।।
कारकांश से नवम भाव शनि-राहु से दृष्ट-युत हों तो गुरु से द्रोह करने
वाला और मूर्ख होता है।।६४।।
कारकांशाच्च नवमे गुरुभानुयुतेक्षिते।
तदापि गुरुद्रोही स्याद्गुरुवाक्यं न मन्यते।।६५।।
कारकांश से नवम भाव गुरु-सूर्य से युत-दृष्ट हों तो भी गुरुद्रोही
और गुरु के वचन को न माननेवाला होता है।।६५।।
कारकांशाच्च नवमे भृगुभौमयुतेक्षिते।
षड्वर्गाधिकयोगे च मरणं पारदारिकः।।६६।।
कारकांश से नवम भाव शुक्र-भौम से युत-दृष्ट हों तो और इन्हीं का
षड्वर्ग अधिक हो तो परस्त्री के द्वारा मरण होता है।।६६।।
कारकांशाच्च नवमे बुधयुक्तेक्षिते द्विज।
परस्त्रीसङ्गमाद्बालो बन्धको जायते ध्रुवम्।।६७।।
कारकांश से नवम भाव बुध से युत-दृष्ट हो तो परस्त्रीसंगम से दुष्ट
प्रकृति का होता है।।६७।।
कारकांशाच्च नवमे गुरुयुक्तेक्षिते यदा।
स्त्रीलोलुपो भवेद्बालो विषयी नैव जायते।।६८।।
कारकांश से नवम भाव गुरु से युत-दृष्ट हो तो स्त्रीलोलुप होता है, किंन्तु
विषयी नहीं होता है।।६८।।
कारकांशफलमाह १२३
कारकांशाद्दशमभावफलम्-
दशमे कारकांशाच्च बुधेन समवीक्षिते।
व्यापारे बहुलाभश्च महत्कर्मविचक्षणः ।।६९।।
कारकांश से दशम भाव बुध से देखा जाता हो तो व्यापार में
बहुत लाभ और बड़े-बड़े काम होते हैं।।६९।।
कारकांशाच्च दशमे रविणा संयुतो यदि।
गुरुदृष्टे तदा विप्र जायते योगकारकः ।।७०।।
कारकांश से दशम में रवि हो और गुरु से देखा जाता हो तो
राजयोग होता है।।७०।।
कारकांशाच्च दशमे शुभखेटनिरीक्षिते।
स्थिरचित्तो भवेद्बालो गम्भीरो बहुवीर्यवान् ।।७१।।
कारकांश से दशम भाव को शुभग्रह देखता हो तो बालक स्थिरचित्त,
गंभीर और बलवान् होता है।।७१।।
कारकांशद्व्ययभावफलम्-
कारकांशाद्व्ययस्थाने उच्चस्थे च शुभग्रहे।
सङ्गतिर्जायते तस्य शुभलोकमवाप्नुयात् ।।७२।।
कारकांश से बारहवें भाव में अपनी उच्चराशि में कोई शुभग्रह हो तो
उस जातक को सद्गति और शुभ लोक की प्राप्ति होती है।।७२।।
कारकांशाद्व्यये केतौ शुभखेटैर्युतेक्षिते।
तदापि जायते मुक्तिः सायुज्यपदमाप्नुयात् ।।७३।।
कारकांश से बारहवें भाव में केतु हो, शुभग्रह से देखा जाता हो वा
दृष्ट हो तो भी मुक्ति होती है और स्वर्ग की प्राप्ति होती है।।७३।।
मेषेऽथ वापि कोदण्डे कारकांशात् व्यये शिखी।
शुभग्रहेण सन्दृष्टे कैवल्यपदमाप्नुयात् ।।७४।।
कारकांश से बारहवें भाव में मेष वा धन राशि मैं केतु हो, शुभग्रह
से दृष्ट हो तो मोक्षपद की प्राप्ति होती है।।७४।।
केवलेऽपि व्यये केतुः पापग्रहयुतेक्षिते।
न मुक्तिर्जायते तस्य शुभलोकं न पश्यति ।।७५।।
१२४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
रविणा संयुते केतौ कारकांशाद्व्ययस्थिते।
गौर्यां भक्तिर्भवेत्तस्य शाक्तिको जायते नरः।।७६।।
केवल बारहवें भाव में केतु हो और पापग्रह से युत-दृष्ट हो तो उसकी
मुक्ति नहीं होती है और मोक्ष भी नहीं होता है। कारकांश से बारहवें
भाव में केतु सूर्य से युत हो तो पार्वती की भक्ति करने वाला शाक्त होता
है।।७५-७६।।
रविभक्तिर्भवेत्तस्य निर्विशङ्कं द्विजोत्तम।
चन्द्रेण संयुते केतौ कारकांशात् व्ययस्थिते ।।७७।।
कारकांश से बारहवें केतु चन्द्रमा से युत हो तो सूर्य का उपासक होता
है।।७७।।
शुक्रेण संयुते केतौ कारकांशात् व्ययस्थिते।
समुद्रतनयाभक्तिर्जायतेऽसौ समृद्धिमान् ।।७८।।
कारकांश से बारहवें केतु शुक्र से युत हो तो लक्ष्मी का उपासक
और धनी होता है।।७८।।
कुजेन स्कन्दभक्तो वा जायते द्विजसत्तम।
वैष्णवो बुधसौरिभ्यां गुरुणा शिवभक्तिमान् ।।७९।।
भौम से युत हो तो स्कंद (स्वामिकार्तिक) की भक्ति, बुध-शनि से युत
हो तो विष्णु का उपासक, गुरु से युत हो तो शिव का उपासक।।७९।।
राहुणा तामसीं दुर्गां भूतप्रेतादिसेवकृत्।
हेरम्बभक्तः शिखिना स्कन्दभक्तोऽथवा भवेत् ।।८०।।
राहु हो तो तामसी दुर्गा का और भूतप्रेतादि का सेवक होता है। केतु
हो तो गणेश वा स्कंद का उपासक।।८०।।
कारकांशात् व्यये शौरिः पापराशौ यदा भवेत्।
तदैव क्षुद्रदेवस्य भक्तिस्तस्य न संशयः ।।८१।।
कारकांश से बारहवें शनि पापग्रह की राशि में हो तो क्षुद्रदेवता का
उपासक।।८१।।
पापर्क्षेऽपि व्यये शुक्रस्तदापि क्षुद्रसेवकः।
कारकान्यूनभागो हि अमात्यो जायते ग्रहः ।।८२।।
बारहवें भाव में पापग्रह की राशि में शुक्र हो तो भी क्षुद्रदेवता का सेवक
कारकांशफलमाह १२५
होता है। आत्मकारक से न्यून अंशवाला अमात्यकारक होता है।।८२।।
अमात्यात् द्वादशे राशौ पापर्क्षे पापसंयुते।
तदापि क्षुद्रदेवस्य भक्तिर्भवति निश्चितम्।।८३।।
अमात्य से बारहवें भाव में पापग्रह की राशि पापयुत हो तो
भी क्षुद्रदेवता का उपासक होता है।।८३।।
विशेषफलमाह-
अंशात्त्रिकोणे पापे द्वे तान्त्रिको जायते नरः।
पापदृष्टे क्षुद्रदेवः शुभेन शुभसेवकः।।८४।।
आत्मकारक से ९वें, ५वें भाव में दो पापग्रह हों तो जातक तांत्रिक होता
है। पापग्रह देखता हो तो क्षुद्रदेवता का और शुभग्रह देखता हो तो शुभ
देवता का उपासक होता है।।८४।।
पापैर्निरीक्षिते तत्र तन्त्रविग्राहको भवेत्।
शुभैर्निरीक्षिते वापि तन्त्रानुग्रहकारकः।।८५।।
यदि पापग्रह देखते हों तो निग्राहक और शुभग्रह देखते हों तो
अनुग्राहक होता है।।८५।।
कारकांशेन्दुशुकौ च शुभग्रहनिरीक्षितौ।
रसवादी भवेद्बालो धातूनां भस्मकारकः।।८६।।
कारकांश में चन्द्रमा और शुक्र हों तथा शुभग्रह से देखे जाते हों
तो रस बनाने वाला वैद्य होता है।।८६।।
शुक्रेन्दू बुधसन्दृष्टौ सद्द्वैद्यो हि नरो भवेत्।
पीयूषपाणिः कुशलः सर्वरोगहरो द्विज।।८७।।
शुक्र-चन्द्रमा को बुध देखता हो तो सद्धैद्य, कुशल और सभी रोगों को
हरने वाला होता है।।८७।।
अंशाच्चतुर्थगे चन्द्रे दैत्याचार्यनिरीक्षिते।
श्वेतकुष्ठी भवेन्नूनं निर्विशङ्कं द्विजोत्तम।।८८।।
कारक से चौथे स्थान में चन्द्रमा हो और शुक्र से देखा जाता हो तो
श्वेतकुष्ठी होता है।।८८।।
अंशाच्चतुर्थगे चन्द्रे धरापुत्रेण वीक्षिते।
राजरोगो भवेत्तस्य रक्तपित्तार्तिको भवेत्।।८९।।
१२६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
कारक से चौथे स्थान में चन्द्रमा को भौम देखता हो तो राजरोग
(यक्ष्मा) और रक्तपित्त से कष्ट होता है।।८९।।
अंशाच्चतुर्थगे चन्द्रे शिखिना वीक्षिते सति ।
नीलकुष्ठं भवेत्तस्य निर्विशङ्कं द्विजोत्तम ।।९०।।
केतु कारकांश से चौथे चन्द्रमा को देखता हो तो नीलकुष्ठ होता
है।।९०।।
चतुर्थे पञ्चमे वापि युतौ राहुकुजौ यदि।
क्षयरोगो भवेत्तस्य चन्द्रदृष्ट्या विशेषतः।।९१।।
कारकांश से चौथे या पाँचवें राहु-भौम हों तो क्षयरोग होता है। चन्द्रमा
देखता हो तो विशेषकर कुष्ठरोग होता है।।९१।।
स्वांशात्तूर्ये सुते वापि केवलः संस्थितः कुजः।
पिटकादि भवेत्तस्य निर्विशङ्कं द्विजोत्तम।।९२।।
कारकांश से चौथे या पाँचवें केवल भौम हो तो पिटक आदि क्षुद्र रोग
होते हैं।।९२।।
तत्र स्थिते च शिखिना ग्रहणीरोगपीडितः।
स्वर्भानुर्गुलिके तत्र विषवैद्यो विषात्तिकः।।९३।।
यदि उन्हीं भावों में केतु हो तो संग्रहणी रोग होता है। यदि उक्त भावों
में राहु और गुलिक हो तो विषवैद्य या विष से कष्ट पाने वाला होता
है।।९३।।
कारकांशाद्धने तुर्ये केवलं संस्थिते शनौ।
धनुर्विद्याधिको बालो जायते नात्र संशयः।।९४।।
कारकांश से दूसरे या चौथे भाव में शनि हो तो धनुष विद्या को जानने
वाला होता है।।९४।।
कारकांशात्सुखे वित्ते केवले संस्थिते शिखी।
घटिकायन्त्रवादी स्यादिष्टशोधनतत्परः।।९५।।
कारकांश से चौथे वा दूसरे भाव में यदि केतु हो तो घटिकायंत्र को
जानने वाला होता है।।९५।।
उक्तस्थाने स्थिते सौम्ये जातस्तु परमहंसकः।
तथा संन्यस्तकं ज्ञेयं निर्विशङ्को द्विजोत्तम।।९६।।
पूर्वोक्त स्थान में बुध हो तो परमहंस या संन्यासी दंडधारी।।९६।।
कारकांशफलमाह १२७
उक्तस्थानस्थिते राहौ लोहयन्त्रादिकारकः।
रविणा खड्गधारी च कुजेन कुन्तधारकः॥१९७॥
राहु हो तो लोह के यंत्रों को बनाने वाला, रवि हो तो खड्ग धारण करने
वाला और भौम हो तो कुंत (भाला) धारण करने वाला होता है॥१९७॥
चन्द्रेज्यौ कारकांशे च तथां तत्पञ्चमे स्थितौ।
ग्रन्थकर्त्ता भवेन्नूनं सर्वविद्याविशारदः॥१९८॥
चन्द्रमा और गुरु कारकांश में हो अथवा उससे पाँचवें भाव में हो तो
बालक सभी विद्याओं को जानने वाला और ग्रंथकार होता है॥१९८॥
उक्तस्थानंगते शुक्रे स्वल्पग्रन्थकरो द्विज।
उक्तस्थानगते सौम्ये किञ्चिद्ग्रन्थकरो ह्यसौ॥१९९॥
यदि उक्त स्थान में शुक्र हो तो अल्प ग्रंथकार होता है। यदि बुध
हो तो कुछ ग्रंथकार होता है॥१९९॥
शुक्रेण काव्यकर्ता च प्राकृतग्रन्थतत्परः।
गुरुणा सर्वग्रन्थानां कारको द्विजसत्तम॥२००॥
शुक्र हो तो काव्य करने वाला, गुरु हो तो सभी ग्रंथों को करने
वाला होता है॥२००॥
उक्तस्थानगतः शौरिः सभाजाड्यो भवेन्नरः।
मीमांसको भवेन्नूनमुक्तस्थानगते बुधः॥२०१॥
यदि शनि हो तो सभामूक होता है। उक्त स्थान में बुध हो तो
मीमांसक होता है॥२०१॥
कारकांशे धरासूनुर्लग्ने वा नवपञ्चमे।
नैयायिको भवेन्नूनं सुष्ठुकाव्यकरो नरः॥२०२॥
कारकांश लग्न में वा नवम-पंचम में हो तो नैयायिक और कविता करने
वाला होता है॥२०२॥
कारकांशे निशानाथे त्रिकोणे चाथ लग्नगे।
सांख्यशास्त्रज्ञनिपुणो जायते मतिमान्नरः॥२०३॥
कारकांश में वा त्रिकोण वा लग्न में यदि चन्द्रमा हो तो सांख्यशास्त्र
को जानने वाला होता है॥२०३॥