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सर्वकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 123, कुल 800 में से

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कारकांशफलमाह १२५
होता है। आत्मकारक से न्यून अंशवाला अमात्यकारक होता है।।८२।।
अमात्यात् द्वादशे राशौ पापर्क्षे पापसंयुते।
तदापि क्षुद्रदेवस्य भक्तिर्भवति निश्चितम्।।८३।।
अमात्य से बारहवें भाव में पापग्रह की राशि पापयुत हो तो
भी क्षुद्रदेवता का उपासक होता है।।८३।।
विशेषफलमाह-
अंशात्त्रिकोणे पापे द्वे तान्त्रिको जायते नरः।
पापदृष्टे क्षुद्रदेवः शुभेन शुभसेवकः।।८४।।
आत्मकारक से ९वें, ५वें भाव में दो पापग्रह हों तो जातक तांत्रिक होता
है। पापग्रह देखता हो तो क्षुद्रदेवता का और शुभग्रह देखता हो तो शुभ
देवता का उपासक होता है।।८४।।
पापैर्निरीक्षिते तत्र तन्त्रविग्राहको भवेत्।
शुभैर्निरीक्षिते वापि तन्त्रानुग्रहकारकः।।८५।।
यदि पापग्रह देखते हों तो निग्राहक और शुभग्रह देखते हों तो
अनुग्राहक होता है।।८५।।
कारकांशेन्दुशुकौ च शुभग्रहनिरीक्षितौ।
रसवादी भवेद्बालो धातूनां भस्मकारकः।।८६।।
कारकांश में चन्द्रमा और शुक्र हों तथा शुभग्रह से देखे जाते हों
तो रस बनाने वाला वैद्य होता है।।८६।।
शुक्रेन्दू बुधसन्दृष्टौ सद्द्वैद्यो हि नरो भवेत्।
पीयूषपाणिः कुशलः सर्वरोगहरो द्विज।।८७।।
शुक्र-चन्द्रमा को बुध देखता हो तो सद्धैद्य, कुशल और सभी रोगों को
हरने वाला होता है।।८७।।
अंशाच्चतुर्थगे चन्द्रे दैत्याचार्यनिरीक्षिते।
श्वेतकुष्ठी भवेन्नूनं निर्विशङ्कं द्विजोत्तम।।८८।।
कारक से चौथे स्थान में चन्द्रमा हो और शुक्र से देखा जाता हो तो
श्वेतकुष्ठी होता है।।८८।।
अंशाच्चतुर्थगे चन्द्रे धरापुत्रेण वीक्षिते।
राजरोगो भवेत्तस्य रक्तपित्तार्तिको भवेत्।।८९।।