सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

प्रारंभिक मंगलाचरण, भूमिका एवं ईस्ट इण्डिया कम्पनी का भारत आगमन

A-PDF Image To PDF Demo. Purchase from www.A-
भारत में अंगरेज़ी राज
पहली जिल्द
सुन्दरलाल
प्रकाशक
त्रिवेणी नाथ वाजपेयी
ओंकार प्रेस, इलाहाबाद
१९३८
दूसरा संस्करण १०,००० ] [ पूरी पुस्तक का मूल्य ७) रु०

पहला संस्करण सन् १९२६—२,०००
दूसरा संस्करण सन् १९३८—१०,०००
मुद्रक
विश्वम्भर नाथ वाजपेयी
ओँकार प्रेस, इलाहाबाद

कबीर साहब
[श्री बहादुर सिंह जी सिंघी, कलकत्ता, की कृपा द्वारा, एक प्राचीन चित्र से]

हिन्दू कहैं राम मोहि प्यारा,
तुरुुक कहैं रहिमाना ।
आपस में दोउ लरि लरि मूए,
मर्म न काहू जाना ॥
—कबीर

दूसरा संस्करण
इस किताब का पहला संस्करण २००० प्रतियों का १८ मार्च
सन् १९२९ को प्रकाशित हुआ था। २२ मार्च सन् १९२९ को युक्त
प्रान्त की सरकार ने किताब की ज़ब्ती की आज्ञा दे दी। किसी तरह
१७०० किताबें एक बार ग्राहकों के पास पहुँच गईं, और बाक़ी तीन
सौ के क़रीब सरकार ने रेल या डाकखाने ही में ज़ब्त करलीं। इन
१७०० के लिए ग्राहकों के पते लगा लगा कर हिन्दोस्तान भर में
सैकड़ों तलाशियां हुईं, जिनमें और अनेक पुस्तकें पुलीस के हाथ लग
गईं। इस ज़ब्ती और तलाशियों के ख़िलाफ़ देश भर के समाचार
पत्रों और प्रमुख सज्जनों ने अपनी आवाज़ उठाई। महात्मा गांधी ने
“यंग इंडिया” में इस ज़ब्ती को “दिन दहाड़े डाका” ( Day light
robbery ) बताया, और लोगों को सलाह दी कि वह तलाशी के
अपमान को सह लें किन्तु अपने पास की पुस्तक अपने हाथों से
पुलीस को उठाकर न दें। सेठ जमनालाल बजाज़ ने और अनेक
प्रान्तों के अन्दर अनेक देशभक्तों ने ऐसा ही किया। महात्मा गांधी

( २ )
ने पुस्तक के लेखक से उस समय अपना विश्वास प्रकट किया था
कि यह ज़ब्ती ठहर नहीं सकती।
जुलाई सन् १६३७ में कांग्रेस ने मंत्री पद स्वीकार किया।
१० अगस्त को लेखक ने युक्त प्रान्त की सरकार को ज़ब्ती की आज्ञा
उठा देने के लिए लिखा। १५ नवम्बर सन् १६३७ को युक्त प्रान्त
की सरकार ने २२ मार्च सन् १६२६ वाली ज़ब्ती की आज्ञा को
मनसूख़ किया। ८ फ़रवरी सन् १६३८ को लेखक के लिखने पर
मध्य प्रान्त की सरकार ने अपनी २८ मार्च सन् १६२६ की इसी
तरह की आज्ञा को मनसूख़ किया। २८ जनवरी सन् १६३८ को बम्बई
की सरकार ने लेखक के पत्र के उत्तर में सूचना दी कि चूंकि
असली पुस्तक युक्त प्रान्त से प्रकाशित हुई थी और एक प्रान्त की
ज़ब्ती की आज्ञा सारे ब्रिटिश भारत में आयद हो जाती है, इसलिए
अब युक्त प्रान्त से उस आज्ञा के मनसूख हो जाने पर बम्बई प्रान्त
में पुस्तक के खिलाफ़ कोई रोक टोक नहीं है।
युक्त प्रान्त की सरकार की ओर से ज़ब्ती की आज्ञा मनसूख़
हो जाने पर १०,००० प्रतियों का दूसरा संस्करण निकलवाने का
प्रबन्ध किया गया। लेखक इस दूसरे संस्करण के प्रकाशक
पं० त्रिवेणीनाथ वाजपेयी का आभारी है कि उन्होंने, बावजूद इस
बात के कि इस बार छपाई इत्यादि का ख़र्च और ख़ास कर ब्लाक
और चित्रों का ख़र्च पहले से बहुत बढ़ गया है, पुस्तक का
मूल्य पहले संस्करण के १६) के मुक़ाबले में केवल ७) रखा,
यानी जितनी सस्ती से सस्ती पुस्तक वे बेच सकते थे, बेचने का

( ३ )
प्रयत्न किया है। किन्तु पुस्तक छपकर तय्यार होने से पहले ही
१०,००० के स्थान पर १४,००० से ऊपर गाहकों के आर्डर आ
चुके हैं। इसलिए इस दूसरे संस्करण के निकलते ही शीघ्र से शीघ्र
तीसरे संस्करण का प्रबन्ध किया जा रहा है।
पहले संस्करण और दूसरे संस्करण में अन्तर केवल इतना ही
है जितना किसी भी पुस्तक के पुराने और नए संस्करणों में होता
है। केवल भाषा की दृष्टि से कोई कोई शब्द या वाक्य इधर उधर
बदल दिया गया है। 'प्रस्तावना' को इस बार 'पुस्तक प्रवेश' कहा
गया है। उसमें छोटी मोटी तब्दीलियों के कारण १२ पृष्ठ बढ़ गए
हैं। 'अनुक्रमणिका' को इस बार 'क्या कहाँ' कहा गया है। पहले
संस्करण में 'अनुक्रमणिका' की एक अलग छोटी सी जिल्द थी।
इस बार 'क्या कहाँ' को तीसरी जिल्द के अन्त में जोड़ दिया गया
है। पहले संस्करण में कुल चित्रों और नक़शों की संख्या ६१ थी।
इस बार ६५ से ऊपर है। नए चित्रों में अधिकांश तिरंगे और
चौरंगे हैं। कुछ पुराने चित्र बदल भी दिए गए हैं।
'क्या कहाँ' पं० विश्वम्भर नाथ जी की तय्यार की हुई है।
लेखक को विश्वास है कि वह पाठकों को उपयोगी साबित होगी।
कुछ प्रूफ़ दुरुस्त करने में श्री विजय वर्मा जी से और शेष प्रूफ़
दुरुस्त करने, पुस्तक को दोहराने, पुस्तक के लिए चित्र इकट्ठा करने
और 'क्या कहाँ' तय्यार करने में पं० विश्वम्भर नाथ जी से लेखक
को बहुत सहायता मिली है। नए चित्रों में से अधिकांश के लिए
लेखक श्री वासुदेवराव जी सूबेदार, सागर, श्री बहादुर सिंह जी

( ४ )
सिंधी, कलकत्ता, और विक्टोरिया मेमोरियल, कलकत्ता के
ट्रस्टियों और उसके सेक्रेटरी और क्यूरेटर मिस्टर परसी ब्राउन
का अनुगृहीत है।
इस दूसरे हिन्दी संस्करण के साथ साथ पुस्तक का गुजराती
अनुवाद श्री चतुर्भुज वि० जसानी गोंदिया (सी० पी०) की ओर
से श्री दक्षिणा मूर्ति प्रकाशन मन्दिर, भावनगर, काठियावाड़ से
प्रकाशित हो रहा है। उर्दू तरजुमा लेखक के मित्र डाक्टर सय्यद
मोहम्मद नज़ीर अली साहब ज़ैदी, इलाहाबाद, ने अत्यन्त परिश्रम
और लगन के साथ पूरा कर लिया है, जो छपने को दे दिया
गया है।
३०-६-३८= सुन्दरलाल

स्वीकृति
सन् १९२६ के शुरू में मैंने कई कारणों से यह निश्चय किया
था कि मैं कुछ दिनों तटस्थ बैठ कर देश की प्रधान समस्या,
हिन्दू-मुस्लिम प्रश्न, पर एकान्त में मनन करूँ । उसी समय
अकस्मात् मुझे मेजर वामनदास बसु की निम्नलिखित पुस्तकों
के पढ़ने का अवसर मिला—
( १ ) राइज़ ऑफ़ दी क्रिश्चियन पावर इन इण्डिया—५
जिल्द,
( २ ) कॉन्सॉलिडेशन ऑफ़ दी क्रिश्चियन पावर इन इण्डिया
( ३ ) रुइन ऑफ़ इण्डियन ट्रेड एण्ड इण्डस्ट्रीज़, और
( ४ ) एजुकेशन इन इण्डिया अण्डर दी ईस्ट इण्डिया कम्पनी
मैंने सोचा है कि अपने देश के सच्चे इतिहास से अपरिचित
होना भी हमारी भ्रान्तियों के कारणों में से एक कारण है। पूर्वोक्त
पुस्तकों में मुझे बहुत सी सामग्री ऐसी दिखाई दी जो इतिहास की
अन्य पुस्तकों में नहीं मिलती और जिसका ज्ञान अपनी अनेक भूलों
के दूर करने में हमारे लिए हितकर हो सकता है। मैंने अपने मुख्य
कार्य के साथ साथ इन पुस्तकों का सङ्कलन हिन्दी पढ़ने वालों की

( २ )
सेवा में उपस्थित करने का निश्चय किया । मैं मेजर बसु का अनु-
गृहीत हूँ कि उन्होंने न केवल सहर्ष इसकी इजाज़त ही दे दी, वरन्
मेरी इस पुस्तक के मसविदे को वे बराबर सुनते रहे और स्थान
स्थान पर अपनी अमूल्य सलाहों से मुझे सहायता देते रहे ।
पुस्तक के लिखने में स्वभावतः मुझे आशा से अधिक समय लग
गया । अन्य अनेक प्रामाणिक ऐतिहासिक पुस्तकों को भी मुझे
पढ़ना पड़ा और उनसे सहायता लेनी पड़ी । परिणाम रूप मीर
क़ासिम, वारन् हेस्टिंग्स, हैदरअली, टीपू सुलतान, सिन्ध पर
अंगरेज़ों का क़ब्ज़ा और सन् १८५७ के विप्लव के सातों अध्याय,
इन बारह अध्यायों की अधिकांश सामग्री मेजर बसु की पुस्तकों से
बाहर की है । शेष अध्यायों में भी स्थान स्थान पर अन्य पुस्तकों से
सहायता ली गई है ।
पुस्तक की प्रस्तावना में मैंने यह आवश्यक समझा कि भारत
पर अंगरेज़ों से पहले के अन्य आक्रमणों और विशेषकर अंगरेज़ों के
आने के समय की भारत की स्थिति को पाठकों के सामने रख दिया
जाय जिससे उन्हें अपने देश के ऊपर अंगरेज़ी राज के हितकर
अथवा अहितकर प्रभाव को ठीक ठीक समझने में सुगमता हो । इस
प्रस्तावना के भाग ४, ५, ७ और ८ की लगभग सम्पूर्ण सामग्री
श्रीयुत् ताराचन्द एम० ए०, डी० फ़िल के निबन्ध ‘दी इन्फ्लुएन्स
ऑफ़ इसलाम ऑन इण्डियन कलचर’ से ली गई है । मैं श्रीयुत्
ताराचन्द का ऋणी हूँ कि उन्होंने मुझे अपने अमूल्य और
अत्यन्त शिक्षाप्रद निबन्ध के इस प्रकार उपयोग की इजाज़त दी ।

( ३ )
हैदरअली और टीपू सुलतान के सम्बन्ध की जो अलभ्य और
अधिकतर नई सामग्री मुझे मैसूर विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार
श्रीयुत् बी० एम० श्रीकण्ठ्य एम० ए० बी० एल० के और मैसूर
के पुरातत्व विभाग के विद्वान डाइरेक्टर डॉक्टर आर० शामाशास्त्री
से प्राप्त हुई है उसके लिए मैं पूर्वोक्त दोनों सज्जनों का कृतज्ञ हूँ ।
इस पुस्तक के अन्दर नगरों इत्यादि के जितने नाम दिए गए हैं
उन्हें मैंने यथासम्भव स्थानीय उच्चारण के अनुसार देने का प्रयत्न
किया है। मैं डॉक्टर मेघनाथ बन्दोपाध्याय का मशकूर हूँ कि उन्हों
ने अपने विस्तीर्ण भौगोलिक ज्ञान से इस काम में मुझे सहायता दी।
इस विषय में अधिकतर वे ही मेरे प्रमाण हैं।
चित्रों आदिक के संग्रह में श्रीयुत् वासुदेवराव सूबेदार सागर,
श्रीयुत् बी० जी० जोशी चित्रशाला प्रेस पूना, डॉक्टर सर ए० सुहरा-
वर्दी कलकत्ता, टीपू सुलतान के पर-प्रपौत्र शहज़ादे हलीमुज्जमाँ,
श्रीयुत् बहादुरसिंह सिंघी कलकत्ता, ज्ञानी हीरासिंह जी सम्पादक
‘फुलवाड़ी’ अमृतसर, श्रीयुत् नरेन्द्रदेव आचार्य काशीविद्यापीठ,
पण्डित गोकुल चन्द दीक्षित सम्पादक ‘स्टेट गज़ट’ भरतपुर,
श्रीयुत् रामानन्द चट्टोपाध्याय सम्पादक ‘मॉडर्न रिव्यू”, डाक्टर
सीताराम क्यूरेटर सेन्ट्रल म्यूज़ियम लाहौर, मिस्टर एफ० हैरिङ्गटन
एफ़० आर० ए० एस० क्यूरेटर विक्टोरिया मेमोरियल कलकत्ता,
और श्रीयुत् अमूल्यचरण बिद्या भूषण मन्त्री बङ्गला साहित्य
परिषद् कलकत्ता ने जो मेरी सहायता की है उसके लिये मैं
इन सब सज्जनों का अत्यन्त आभारी हूँ। इनमें विशेषकर जिस

( ४ )
प्रेम और परिश्रम के साथ बाबू अमूल्यचरण विद्याभूषण ने मेरी
सहायता की उसके लिये कृतज्ञता प्रकट कर सकना मेरे लिये
असम्भव है। वयोवृद्ध मिस्टर एफ़ हैरिङ्गटन एफ़० आर० ए० एस०
का भी मैं विशेष कृतज्ञ हूँ कि उन्होंने विक्टोरिया मेमोरियल के
चित्रों के फ़ोटो लेने में मुझे हर तरह की सुविधा प्रदान की।
आशा है कि यह नम्र प्रयत्न कुछ देशवासियों को अपने देश की
शोचनीय स्थिति तथा उसके वास्तविक उपायों पर गम्भीरता के
साथ विचार करने में सहायक होगा।
इलाहाबाद }
फ़रवरी १९२१ } सुन्दरलाल

विषय सूची
पुस्तक प्रवेश
लेखक की कठिनाइयां
इतिहास कला—इतिहास लेखक की कठिनाइयां—सरकारी काग़ज़ों
में झूठ—इतिहास से झूठ की कुछ मिसालें—भारतीय नरेशों पर झूठे
कलंक—किराए के लेखक—हमारे इतिहास के भ्रम । पृष्ठ १-२३
वे और हम
१७वीं सदी का इंगलिस्तान—उस समय के भारत से तुलना—
इंगलिस्तान को सभ्य बनाने की कोशिशें—इंगलिस्तान और भारत की
टक्कर—अंगरेज़ी राज क़ायम होने के तरीक़े—स्पेन्सर के विचार—पुस्तक
का सार । पृष्ठ २३-४४
पुराने हमले
भारत पर अंगरेज़ों से पहले के हमले—आर्यों का हमला—भारत की
उत्तर पश्चिमी सीमा—सिकन्दर से पहले के हमले—सिकन्दर का हमला—
यूनानियों का भारत में बस जाना—शक और हूण क़ौमों के हमले—इन
क़ौमों का इस देश में बस जाना—इनके अन्य देशों पर हमले—यूरोप
पर एशियाई जातियों के हमले—इन हमलों से यूरोप की बरबादी ।
पृष्ठ ४४-६३

( २ )
इस्लाम और भारत
भारत पर मुसलमानों के हमले—मोहम्मद साहब—मुसलमानों की
हुकूमत—सन् ६३६ ईसवी की एक घटना—भारत पर पहला हमला—
सिन्ध पर मुसलिम हुकूमत—प्राचीन अरब और भारत का सम्बन्ध—
आठवीं सदी का भारत—भारत में इस्लाम धर्म—कालीकट के राजा का
मुसलमान होना—मुसलमान फ़क़ीर और प्रचारक—भारत में इस्लाम
का प्रचार । पृष्ठ ६३-८४
जिज्ञासु अरब
अरबों के अन्दर नई धार्मिक लहरें—बौद्ध और हिन्दू ग्रन्थ अरबी
में—इस्लाम में अद्वैतवाद—दक्षिण भारत में धर्म सुधार की लहरें—
इस्लाम का प्रभाव—शंकराचार्य—रामानुज—लिंगायत सम्प्रदाय—सिद्धर
सम्प्रदाय । पृष्ठ ८४-६५
मुसलमानों का यहां बस जाना
महमूद ग़ज़नवी—मोहम्मद ग़ोरी—विदेशी और स्वदेशी की
परिभाषा । पृष्ठ ६५-१००
मानव धर्म
रामानन्द—तुलसीदास—कबीर—नानक—अन्य हिन्दू सन्त—दादू—
मलूक दास—सत्तनामियों के बारह हुकुम—दाराशिकोह का गुरु बाबालाल
—प्राणनाथ—अन्य प्रयत्न—रामसनेही सम्प्रदाय—पलटूदास—सत्य पीर
की पूजा—चैतन्य—कर्ता बाबा—बौद्ध ग्रन्थों में मुसलमान—महाराष्ट्र
सन्त—नामादेव—खेचर—चोखमेला और बहिराम—शेख़ मोहम्मद—
तुकाराम । पृष्ठ १००-१३४

( ३ )
भारतीय कला और मुसलमान
निर्माण कला—दो कलाओं का आलिंगन—मुग़लों के समय में
भारतीय चित्रकला की उन्नति । पृष्ठ १३४-१३६
मुग़लों का समय
यूरोप पर मुग़लों के हमले—भारत पर मुग़लों के हमले—भारत
में एक केन्द्रीय सत्ता की ज़रूरत—मुग़लों द्वारा उसका निर्माण—
एक भाषा—एक शासन पद्धति—एक से सिक्के--इतिहास कला—दूसरे
देशों से सम्बन्ध—धार्मिक और सामाजिक एकता—ग्राम पंचायतें—
किसानों की अवस्था—मुग़लों की प्रजा पालकता—न्याय शासन—धार्मिक
उदारता—औरंगज़ेब के दस्तख़ती परवाने—शराब बन्दी—ग्राम पंचायतें—
उस समय का ईसाई यूरोप—भारत और यूरोप की तुलना—देशी भाषाओं
की उन्नति—साहित्य और विज्ञान की उन्नति—सम्राट अकबर—उस समय
की हिन्दू मुस्लिम संकीर्णता—दारा शिकोह और औरंगज़ेब—औरंगज़ेब
के बाद । पृष्ठ १३६-१८२
अंगरेज़ों का आना
उस समय के अंगरेज़ व्यापारी—उनकी सफलता के कारण—हमारी
पराजय के तीन कारण—दोनों के चरित्र में अन्तर—भारतवासियों के
चरित्र का नाश ! पृष्ठ १८४-१९८
हमारा कर्तव्य
भारतवासियों के लिये उपाय—अंगरेज़ी राज कब से—स्वाधीनता के
प्रयत्न—ब्रिटिश साम्राज्य की हालत—हमारे नैतिक आदर्श—एक मानव धर्म
की आवश्यकता—सत्याग्रह और असहयोग—हमारा भविष्य । पृष्ठ १९८-२०८

भारत में अंगरेज़ी राज
पहला अध्याय
भारत में यूरोपियन जातियों का प्रवेश
चार सौ साल पहले भारत और यूरोप का सम्बन्ध—उस समय का
भारत—भारत के जलमार्ग की खोज—भारत की खोज में कोलम्बस—
भारत में पुर्तगालियों का प्रवेश—पुर्तगालियों के अत्याचार—पुर्तगालियों
की सत्ता का अन्त—भारत में डच जाति—भारत में अंगरेज़ों का प्रवेश—
ईस्ट इण्डिया कम्पनी—जहाँगीर और अंगरेज़—शाहजहाँ और अंगरेज़—
अंगरेज़ व्यापारियों का चरित्र—औरंगज़ेब और अंगरेज़—फ़्रान्सीसियों का
प्रवेश—फ़्रान्सीसी और अंगरेज़—दक्खिन भारत में अंगरेज़ों और फ़्रान्सीसियों
के मोरचे—अंगरेज़ी राज की नींव। पृष्ठ १-३०
दूसरा अध्याय
सिराजुद्दौला
नवाब अलीवर्दी ख़ाँ—उस समय का बंगाल—सिराजुद्दौला को
अलीवर्दी की आख़िरी नसीहत—सिराजुद्दौला और बंगाल की मसनद—

( ५ )
सिराजुद्दौला के साथ अंगरेज़ों का व्यवहार—सिराजुद्दौला की अंगरेज़ों पर
चढ़ाई—विजयी सिराजुद्दौला का कलकत्ता प्रवेश—बंगाल से अंगरेज़ों
का निर्वासन—सिराजुद्दौला की उदारता—ब्लैक होल का क़िस्सा—
सिराजुद्दौला की कलकत्ते से वापसी—सिराजुद्दौला के साथ छल—सिराजु-
दौला की दयालुता—बंगाल में अंगरेज़ों का फिर से प्रवेश—साज़िशों का
जाल—कलकत्ते पर अंगरेज़ों का फिर से क़ब्ज़ा—हुगली की लूट और क़त्ले
आम—सिराजुद्दौला और अंगरेज़ों में पत्र व्यवहार—छल से सिराजुद्दौला
का कलकत्ते बुलाया जाना—विश्वासघात—अलीनगर की सन्धि—
अंगरेज़ों की ओर से सन्धि का उल्लंघन—सिराजुद्दौला और वाटसन में पत्र
व्यवहार—दिल्ली सम्राट और सिराजुद्दौला—विश्वासघात द्वारा चन्दरनगर
पर अंगरेज़ों का क़ब्ज़ा—सिराजुद्दौला को धमकी—अंगरेज़ी सेना के
अत्याचार—मीरजाफ़र के साथ गुप्त सन्धि—प्लासी की लड़ाई—मीरमदन
की वफ़ादारी—मीरजाफ़र का पाप—मुर्शिदाबाद की लूट—अमीचन्द के
साथ दग़ा—सिराजुद्दौला की हत्या—सिराजुद्दौला का चरित्र।
पृष्ठ ३१-१०४
——————
तीसरा अध्याय
मीर जाफ़र
हिन्दू मुसलिम पक्षपात का प्रारम्भ—पुराने घरानों के नाश की
योजना—बिहार के राजा रामनारायण पर हमला—उड़ीसा के राजा राम
र्मसिंह पर हमला—पूर्णिया के राजा युगलसिंह पर हमला—राजा दुर्लभ-

( ६ )
राम पर हमला—मीर जाफ़र से धन की वसूली—राजा रामनारायन से
समझौता—दिल्ली के शहज़ादे अलीगौहर की बिहार यात्रा—क्लाइव को
इनाम में जागीर—भारत में अंगरेज़ी राज क़ायम करने की क्लाइव की
योजना—मीरजाफ़र के पुत्र मीरन की दूरदर्शिता—सम्राट शाहआलम—
सम्राट के ख़िलाफ़ अंगरेज़ों की बग़ावत—शाहआलम की अनिश्चितता—
मीरन की हत्या—बंगाल की दर्दनाक हालत—कम्पनी की व्यापार सम्बन्धी
ज़्यादती—बंगाल में दूसरी बग़ावत की योजना—मीरजाफ़र से नई मांगे—
मीर क़ासिम के साथ गुप्त सन्धि—मीरजाफ़र का मसनद से हटाया जाना—
मीरजाफ़र पर इलज़ाम—कम्पनी को लाभ—कम्पनी की टकसाल ।
पृष्ठ १०६-१४६
चौथा अध्याय
मीर क़ासिम
बंगाल की हालत—कम्पनी के खोटे सिक्के—कम्पनी के अत्याचार—
महसूल की माफ़ी और उसका दुरुपयोग—व्यापार सम्बन्धी अत्याचार—
तिजारत के बहाने लूट—मीर क़ासिम की शिकायतें—नन्दकुमार का
देश प्रेम—मुग़लसाम्राज्य की निर्बलता—पानीपत की तीसरी लड़ाई
और भारत की स्वाधीनता—शाहआलम की बिहार पर चढ़ाई—राजा
रामनारायन से अंगरेज़ों का विश्वासघात—मीर क़ासिम का चरित्र और
शासन प्रबन्ध—मीर क़ासिम के सुधार—मीर क़ासिम के ख़िलाफ़
अंगरेज़ों की साज़िश—मीर क़ासिम पर झूठे इलज़ाम—अंगरेज़ों की लूट

( ७ )
खसोट—मुंगेर की सन्धि —मीर क़ासिम का चुंगी उठवा देना—बंगाल में
फिर से खुशहाली—दूसरा सूबेदार खड़ा करने की तजवीज़—मीर क़ासिम
से नई नई मांगें—मीर क़ासिम की प्रजा के साथ ज़ुल्म और ज़्यादतियां—
मीरजाफ़र के साथ दोबारा साज़िश—उदवानाला की लड़ाई—मीरक़ासिम
के ईसाई अफ़सरों की नमक हरामी—मीर क़ासिम की पराजय—मीर
क़ासिम के शासन का अन्त—मीर क़ासिम के शासन पर एक दृष्टि ।
पृष्ठ १४७-१६६
पाँचवाँ अध्याय
फिर मीर जाफ़र
मीर जाफ़र के साथ नई सन्धि—बंगाल की और बुरी हालत—मीर
जाफ़र की शिकायतें—मीर क़ासिम के अन्तिम प्रयत्न—अंग्रेज़ों के नाम
शुजाउद्दौला का प्रयत्न—शुजाउद्दौला और शाहआलम में फूट डालने की
कोशिश—शुजाउद्दौला की सेना में विश्वासघातक—बक्सर की लड़ाई—
मीर क़ासिम की मृत्यु—कम्पनी और शुजाउद्दौला में सन्धि—मीर जाफ़र
का करुणाजनक अन्त । पृष्ठ १६७-२१६
छठा अध्याय
मीर जाफ़र की मृत्यु के बाद
नवाब नजमुद्दौला के साथ कम्पनी की नई सन्धि—नन्दकुमार की
गिरफ़्तारी—क्लाइव का दोबारा भारत आना—क्लाइव की योजना—

( ८ )
क्लाइव का इलाहाबाद आना—शुजाउद्दौला के साथ नई सन्धि—कम्पनी
को दीवानी के अधिकार—नजमुद्दौला की हत्या—भयंकर लूट और दो
अमली—खुले डाके—नमक पर महसूल—क्लाइव का व्यक्तिगत चरित्र—दो
अमली द्वारा बंगाल का नाश—दरिद्रता, दुष्काल और महामारी—खून के
आंसू । पृष्ठ २१७-२३७
सातवाँ अध्याय
वारन हेस्टिंग्स
दो अमली का अन्त—निरपराध रईसों का संहार—महाराजा नन्द
कुमार को फाँसी—बनारस की लूट और बरबादी—अवध की बेगमों पर
अत्याचार—भारत से हेस्टिंग्स की कमाई—कम्पनी के कर्मचारियों द्वारा
देशव्यापी लूट—गोरखपुर के किसानों और ज़मीदारों पर जुल्म—लगान
का बढ़ाया जाना—वारन हेस्टिंग्स पर मुक़दमा—क्षमा और इनाम ।
पृष्ठ २३८-२६३
आठवाँ अध्याय
पहला मराठा युद्ध
मराठा साम्राज्य की पराकाष्ठा—मराठा मण्डल—मराठा साम्राज्य की
अवनति—दक्खिन में कम्पनी की नीति—साष्टी और बसईं पर अंगरेज़ों के
दांत—मराठों, हैदर और निज़ाम में फूट डालने के प्रयत्न—नाना फड़नवीस
की दूरदर्शिता—अंगरेज़ दूत मास्टिन की करतूतें—पेशवा नारायन राव