भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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ने पुस्तक के लेखक से उस समय अपना विश्वास प्रकट किया था
कि यह ज़ब्ती ठहर नहीं सकती।
जुलाई सन् १६३७ में कांग्रेस ने मंत्री पद स्वीकार किया।
१० अगस्त को लेखक ने युक्त प्रान्त की सरकार को ज़ब्ती की आज्ञा
उठा देने के लिए लिखा। १५ नवम्बर सन् १६३७ को युक्त प्रान्त
की सरकार ने २२ मार्च सन् १६२६ वाली ज़ब्ती की आज्ञा को
मनसूख़ किया। ८ फ़रवरी सन् १६३८ को लेखक के लिखने पर
मध्य प्रान्त की सरकार ने अपनी २८ मार्च सन् १६२६ की इसी
तरह की आज्ञा को मनसूख़ किया। २८ जनवरी सन् १६३८ को बम्बई
की सरकार ने लेखक के पत्र के उत्तर में सूचना दी कि चूंकि
असली पुस्तक युक्त प्रान्त से प्रकाशित हुई थी और एक प्रान्त की
ज़ब्ती की आज्ञा सारे ब्रिटिश भारत में आयद हो जाती है, इसलिए
अब युक्त प्रान्त से उस आज्ञा के मनसूख हो जाने पर बम्बई प्रान्त
में पुस्तक के खिलाफ़ कोई रोक टोक नहीं है।
युक्त प्रान्त की सरकार की ओर से ज़ब्ती की आज्ञा मनसूख़
हो जाने पर १०,००० प्रतियों का दूसरा संस्करण निकलवाने का
प्रबन्ध किया गया। लेखक इस दूसरे संस्करण के प्रकाशक
पं० त्रिवेणीनाथ वाजपेयी का आभारी है कि उन्होंने, बावजूद इस
बात के कि इस बार छपाई इत्यादि का ख़र्च और ख़ास कर ब्लाक
और चित्रों का ख़र्च पहले से बहुत बढ़ गया है, पुस्तक का
मूल्य पहले संस्करण के १६) के मुक़ाबले में केवल ७) रखा,
यानी जितनी सस्ती से सस्ती पुस्तक वे बेच सकते थे, बेचने का