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आत्मबोध व तत्त्वबोध (आदि शङ्कराचार्य - हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmabodha & Tattvabodha with Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: कैलाश आश्रम ऋषिकेश · कैलाश आश्रम ऋषिकेश (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished51 पृष्ठ

प्रारंभिक पृष्ठ व विषय-सूची

शङ्कर
शंकरं शङ्कराचार्यं केशवं बादरायणम् ।
सूत्रभाष्यकृतौ वन्दे भगवन्तौ पुनः पुनः ॥
ॐ नमो ब्रह्मादिभ्यो ब्रह्मविद्यासम्प्रदायकर्तृभ्यो
नमो ऋषिभ्यो ॐ गुरुभ्यो नमः ॥
Brahma श्रीभगवत्पादशङ्कराचार्यविरचित Kartribhiyo
तत्त्वबोध
एवं
आत्मबोध
भाषानुवादक एवं व्याख्याकार-
आचार्य महामण्डलेश्वर श्रीमत्स्वामी दिव्यानन्द
सरस्वती जी महाराज
सम्पादक
आचार्य स्वामी विजयानन्द पुरी जी

प्रकाशक :
कैलास विद्या प्रकाशन
श्री कैलास आश्रम, मुनि की रेती,
ऋषिकेश (टिहरी) 249137
सर्वाधिकारः प्रकाशकाधीनः
प्रथमावृत्ति १०००
कार्तिक
वि०सम्वत् २०७०
पुस्तक प्राप्ति स्थान-
-श्री कैलास आश्रम, मुनि की रेती (टि.ग.) ऋषिकेश-249137
-श्री दशनाम संन्यास आश्रम, भूपतवाला हरिद्वार-249401
-श्री कैलास आश्रम, उजेली, उत्तरकाशी-249193
-श्री रामआश्रम, समानामण्डी, पटियाला-147101
-कैलास धाम, नई झूसी, प्रयागराज-221506
-श्री कैलास आश्रम, सुभाषनगर, माडल टाउन, रोहतक-124001
-शङ्कर ब्रह्मविद्या कुटीर, 83-ए द्वारकापुरी, मुजफ्फरनगर-251001
-कैलास विद्यातीर्थ, गिरियक मार्ग, राजगिर (नालन्दा) - 803116
-कैलास विद्यातीर्थ, 6, भाई वीर सिंह मार्ग, नई दिल्ली-110001
-कैलास विद्याधाम, रूपनगर (चिनोर), जम्मू तवी- 180001
मुद्रक : सेमवाल प्रिन्टिग प्रेस, ऋषिकेश-249201
समरीतिर्महातेजाः परब्रह्म सनातनः
जयताज्जानकीनाथो वेदवेद्यो
महामतिः॥

ॐ
।। श्रीमदभिनवचन्द्रेश्वरो विजयतेतराम् ।।
श्रीशङ्करभगवत्पादाचार्यप्रणीतः
तत्त्वबोधः
(पूर्वार्धम्)
भाषानुवादक एवं व्याख्याकार-
आचार्य महामण्डलेश्वर श्रीमत्स्वामी दिव्यानन्द
सरस्वती जी महाराज
सम्पादक
आचार्य स्वामी विजयानन्द पुरी जी
वासुदेवेन्द्रयोगीन्द्रं नत्वा ज्ञानप्रदं गुरुम्।
मुमुक्षूणां हितार्थाय तत्त्वबोधोऽभिधीयते।।
वासुदेव रूप परमात्मा से अभिन्न ज्ञानप्रद गुरुदेव श्री
गोविन्द योगीन्द्र भगवत्पाद को प्रणाम कर मुमुक्षुओं के हित
मोक्षसाधन ज्ञान प्राप्ति के लिये तत्त्वबोध का उपदेश किया कहा जा
जाता है। तत्त्वज्ञान-प्रतिपादक होने से ग्रन्थ का नाम
तत्त्वबोध है।
जगद्गुरु श्री शङ्करभगवत्पाद ने वैदिक सिद्धान्त के

सभी (उत्तम, मध्यम, व अधम) साधकों के लिये अनेक प्रकरण

२
स्पष्टीकरण के लिये प्रस्थानत्रयी (श्रीमद्भगवद्गीता, उपनिषद्
और ब्रह्मसूत्र) के भाष्य की रचना की। गम्भीर भाष्यार्थ का सम्यग्
बोध तथा वेदान्त राजमार्ग पर निःसंदिग्ध अग्रसर होने के लिये
सभी (उत्तम, मध्यम, व अधम) साधकों के लिये अनेक प्रकरण
ग्रन्थों का उपदेश किया। यह प्रस्तुत तत्त्वबोध नामक प्रकरण ग्रन्थ
अतिसंक्षिप्त है। किन्तु यह सारे प्रकरण ग्रन्थों का सारगर्भ होने से
मुमुक्षुओ का अत्यन्त उपकारक है। जिज्ञासु साधक इस ग्रन्थ को
कण्ठस्थ कर अर्थ के साथ हमेशा हृदय में धारण करें।
ग्रन्थ के प्रारम्भ में मङ्गलाचरण, स्मृति शिष्टाचार प्रमाणसिद्ध
है। इसका पालन करते हुए तथा शिष्यों को शिक्षा प्रदान करने के
लिये और ग्रन्थ श्रवण करने वालों को निर्विघ्न बोध उत्पादन के
लिये आचार्य पाद ने प्रारम्भ में मङ्गलाचरण किया। इसके द्वारा
ईश्वर और गुरुदेव की कृपा से ज्ञान-प्राप्ति होती है, यह अर्थ से
सूचित किया। 'वासुदेवेन्द्र' पद से ईश्वर और गुरु का अभेद भी
बताया। मुमुक्षुओं का हितकर मोक्षसाधन ज्ञान ही है। इससे ग्रन्थ
का प्रयोजन, तत्त्वबोध के द्वारा मोक्ष-प्राप्ति यह भी सूचित हुआ
और ग्रन्थ का अधिकारी मुमुक्षु है, यह भी कथन हुआ। ग्रन्थ का
प्रतिपाद्य विषय जीव-ब्रह्म की एकता, जिसका ज्ञान मोक्षसाधन है
यह भी सूचित हुआ।
आचार्यपाद के गुरुजी थे गोविन्दयोगीन्द्रपाद। उनका
पर्यायवाची 'वासुदेवेन्द्र' नाम लेकर ईश्वर और गुरुदेव का अभेद
परामर्श करके प्रणाम किया।
जो सर्वत्र रहते हैं और सबका अधिष्ठान हो, वह
परमात्मा ही वासुदेव है। विष्णुपुराण में कहा गया है:-

३
"सर्वत्रासौ समस्तं च वसत्यत्रेति वै यतः।
ततोऽसौ वासुदेवेति विद्वद्भिः परिगीयते॥"
'वस निवासे' धातु से बाहुलकाद् उण् प्रत्यय करने से वासु
शब्द निष्पन्न होता है। वसति, वासयति सर्वमिति वासुः। वासु ही
देव परमात्मा ॥१॥
अब मङ्गलाचरण से सूचित अनुबन्धों का कथन
करते हैं-
साधनचतुष्टयसम्पन्नाधिकारिणां मोक्षसाधनाङ्गभूतं तत्त्ववि-
वेकप्रकारं वक्ष्यामः॥२॥
साधनचतुष्टयसम्पन्न अधिकारियों के लिए मोक्ष के साध-
ान ज्ञान के अङ्गस्वरूप तत्त्वविवेक प्रकार को हम कहेगें ॥२॥
साधनचतुष्टयं किम्? नित्यानित्यवस्तुविवेकः, इहामुत्रा-
र्थफलभोगविरागः, शमादिषट्कसम्पत्तिः, मुमुक्षुत्वं चेति॥३॥
साधनचतुष्टय क्या है? नित्यानित्यवस्तुविवेक, इस लोक
और परलोक के समस्त भोग्य पदार्थ तथा सुखभोग के प्रति
वैराग्य, शमदमादि षट्सम्पत्ति तथा मुमुक्षुता, यही चार साधन हैं
जिनसे साधक वेदान्त-श्रवण का अधिकारी होता है ॥३॥
नित्यानित्यवस्तुविवेकः कः? नित्यं वस्त्वेकं ब्रह्म, तद्व्य-
तिरिक्तं सर्वमनित्यमयमेव नित्यानित्यवस्तुविवेकः।
नित्यानित्यवस्तुतविवेक क्या है? एक ब्रह्म नित्य वस्तु है, उससे
भिन्न सम्पूर्ण विश्व अनित्य है, यही नित्यानित्यवस्तुविवेक है ॥४॥
इहामुत्रार्थफलभोगविरागः कः? इह स्रक्चन्दन वनितादिषु
अमुत्र स्वर्गभोगेष्विच्छाराहित्यमेव।
इहामुत्रार्थफलभोगविराग क्या है? इस लोग में माला,

४
चन्दन, वनिता आदि समस्त भोग्य पदार्थों में तथा पारलौकिक
स्वर्गभोग में इच्छाराहित्य ही वैराग्य है ॥५॥
शमादिषट्कसम्पत्तिः का?
शमो दम उपरतिस्तितिक्षा श्रद्धा समाधानं चेति।
शमादिषट्कसम्पत्ति क्या है ? शम, दम, उपरति, तितिक्षा,
श्रद्धा और समाधान ॥६॥
शमः कः? अन्तरिन्द्रियनिग्रहः।
दमः कः? बाह्येन्द्रियनिग्रहः।
उपरतिः का? प्रपञ्चेभ्य उपरमणम्।
तितिक्षा का? शीतोष्णादिद्वन्द्वसहिष्णुत्वम्।
श्रद्धा का? गुरुवेदान्तवाक्येषु विश्वासः।
समाधानं किम्? चित्तैकाग्रता।।७।।
शम क्या है ? अन्तरिन्द्रिय (मन) का निग्रह शम कहा
जाता है। दम क्या है? चक्षुरादि बाह्य इन्द्रियों का निग्रह। उपरति
क्या है ? प्रपञ्चों से उपराम होना। कुछ विद्वानों का मत है कि
अपने आश्रम धर्मों का अनुष्ठान ही उपरति है। तितिक्षा क्या है?
शीत-उष्ण, सुख-दुःख आदि द्वन्द्वों की सहनशीलता। श्रद्धा क्या
है? गुरु तथा वेदान्त-वाक्यों में दृढ़ विश्वास श्रद्धा है। समाधान
क्या है ? चित्त की एकाग्रता को समाधान कहते हैं ।।७।।
मुमुक्षुत्वं किम्? मोक्षो मे भूयादिति दृढेच्छा।।८।।
मुमुक्षा (मुमुक्षुत्व) क्या है ? मुझे मोक्ष प्राप्त हो, ऐसी दृढ़
इच्छा को मुमुक्षा कहते हैं। इच्छा में दृढ़ता का अर्थ है अन्य
इच्छाओं का अभाव ।।८।।

एतत्साधनचतुष्टयसम्पन्नास्तत्त्वविवेकस्याधिकारिणो भवन्ति।

५
एतत्साधनचतुष्टयसम्पन्नास्तत्त्वविवेकस्याधिकारिणो भवन्ति।
तत्त्वविवेकःकः? आत्मा सत्यस्तदन्यत् सर्वं मिथ्येति ज्ञानमेव।।६।।
उक्त साधनचतुष्टय से युक्त होने से ही तत्त्वविवेक के
अधिकारी होते हैं। वह तत्त्वविवेक है क्या ? आत्मा सत्य है और
उससे भिन्न सम्पूर्ण विश्व मिथ्या है, इसी ज्ञान को तत्त्वविवेक कहते
हैं ।।६।।
आत्मा कः? स्थूलसूक्ष्मकारणशरीराद्व्यतिरिक्तोऽवस्थात्रयसाक्षी
पञ्चकोशातीतः सच्चिदानन्दस्वरूपो यस्तिष्ठति, स आत्मा।।१०।।
आत्मा क्या है ? स्थूल, सूक्ष्म तथा कारण शरीर से भिन्न,
अवस्थात्रय का साक्षी पञ्चकोशातीत जो सत्, चित्, आनन्द स्वरूप
है, वही आत्मा है ।।१०।।
स्थूलशरीरं किम्? पञ्चीकृतपञ्चमहाभूतैः कृतं सत् कर्मजन्यं
सुखदुःखभोगायतनमस्ति, जायते, वर्धते, विपरिणमतेऽपक्षीयते,
विनश्यतीति षड्भावविकारैर्युक्तं यत्; तत् स्थूलशरीरम्।।११।।
स्थूलशरीर क्या है? पञ्चीकृतपञ्चमहाभूतों से बना
हुआ कर्मजन्य सुख-दुःखादि भोगों के आयतन को स्थूल
शरीर कहते हैं। अस्ति (व्यवहार योग्य होना), उत्पन्न होता
है, बढ़ता है, रूपान्तर को प्राप्त होता है, घटता है और नष्ट
हो जाता है, ऐसे छः विकारों से युक्त स्थूल शरीर है ।।११।।
सूक्ष्मशरीरं किम्? अपञ्चीकृतपञ्चमहाभूतैः कृतं सत्,
कर्मजन्यसुखादिभोगसाधनं ज्ञानेन्द्रियाणि पञ्च, कर्मेन्द्रियाणि
पञ्च, प्राणादयः पञ्च, मनश्चैकं बुद्धिरेका; एवं
सप्तदशकलाभिः सह तिष्ठति यत्,
तत् सूक्ष्मशरीरम्।।१२।।

६
सूक्ष्म शरीर क्या है ? अपञ्चीकृत पञ्चमहाभूतों से बना
हुआ कर्मजन्य सुख-दुःखादि भोगों के साधन पञ्च ज्ञानेन्द्रियाँ, पञ्च
कर्मेन्द्रियाँ, पञ्च प्राण, एक मन और एक बुद्धि, ऐसे सत्रह कलाओं
के सहित जो रहता है, वह सूक्ष्म शरीर है ॥१२॥
पञ्चज्ञानेन्द्रियाणि कानि? श्रोत्रं, त्वक्, चक्षुः, रसना,
घ्राणमिति पञ्चज्ञानेन्द्रियाणि। श्रोत्रस्य दिग्देवता, त्वचो
वायुः, चक्षुषः सूर्यः, रसनाया वरुणः, घ्राणस्याश्विनाविति
ज्ञानेन्द्रियदेवताः। श्रोत्रस्य विषयः शब्दग्रहणम्, त्वचो विषयः
स्पर्शग्रहणम्, चक्षुषो विषयो रूपग्रहणम्, रसनाया विषयो
रसग्रहणम्, घ्राणस्य विषयो गन्धग्रहणमिति ।। १३ ।।
श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, रसना और घ्राण, ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ
हैं। श्रोत्र का देवता दिशा है, त्वचा का वायु, नेत्र का सूर्य, रसना
का वरुण, घ्राण का अश्विनीकुमार, ये ज्ञानेन्द्रियों के देवता हैं।
श्रोत्र का विषय शब्दग्रहण, त्वचा का विषय स्पर्शग्रहण, नेत्र का
विषय रूपग्रहण, जिह्वा का विषय रसग्रहण तथा नासिका का विषय
गन्धग्रहण है। यहाँ इन्द्रियों के कार्य को विषय शब्द से कहा गया
है ।। १३ ।।
कर्मेन्द्रियाणि कानि? वाक्पाणिपादपायूपस्थानीति
पञ्चकर्मेन्द्रियाणि । वाचो देवता वह्निः, हस्तयोरिन्द्रः,
पादयोर्विष्णुः, पायोर्मृत्युः, उपस्थस्य प्रजापतिरिति
पञ्चकर्मेन्द्रियदेवताः। वाचो विषयो भाषणम्, पाण्योर्विषयो
वस्तुग्रहणम्, पादयोर्विषयो गमनम्, पायोर्विषयो मलत्यागः,
उपस्थस्य विषय आनन्द इति ।। १४ ।।
वाणी, हस्त, पाद, उपस्थ तथा गुदा, यह पाँच कर्मेन्द्रियाँ

७
हैं। वाणी का देवता अग्नि, हाथ का देवता इन्द्र, पैर का देवता
विष्णु, उपस्थ का देवता प्रजापति, गुदा का देवता मृत्यु है। वाणी
का विषय भाषण, हाथ का विषय वस्तुग्रहण, पैर का विषय गमन,
उपस्थ का विषय आनन्द तथा गुदा का विषय मलत्याग है।।१४।।
कारणशरीरं किम्? अनिर्वाच्यानाद्यविद्यारूपं, शरीरद्वयस्य
कारणभूतं सत् स्वस्वरूपाज्ञानं यदस्ति; तत्
कारणशरीरम्।।१५।।
कारण शरीर क्या है? अनिर्वचनीय-अनादिअविद्यारूप,
दोनों शरीरों का कारण होता हुआ स्वरूप का अज्ञान जो है, वह
कारण शरीर हैं। वह अज्ञान अनादि भावरूप और ज्ञाननिवर्त्य है।
भावशब्द भी अभाव विलक्षण अर्थवाला है। अतः अज्ञान अभाव
विलक्षण है ।।१५।।
अवस्थात्रयं किम्? जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तयस्तिस्रोऽवस्थाः।
जाग्रदवस्था का? श्रोत्रादिज्ञानेन्द्रियैः शब्दादिविषयो ज्ञायते
इति यत्; तत् जाग्रदवस्था। स्थूलशरीरैतदवस्थाभिमान्यात्मा
विश्व इत्युच्यते।।१६।।
तीन अवस्थाएँ क्या है? जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति, यह
तीन अवस्थाएँ है। श्रोत्रादि ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा शब्दादि विषय जो
जाने जाते हैं, वही जाग्रत् अवस्था है। इस जाग्रत् अवस्था और
स्थूलशरीर का अभिमानी आत्मा 'विश्व' कहा जाता है ।।१६।।
स्वप्नावस्था का? जाग्रदवस्थायां यद्दृष्टं यच्छ्रतं, तज्जनित-
वासनया निद्रासमये या प्रपञ्चप्रतीतिः; सा स्वप्नावस्था।
सूक्ष्मशरीरस्वप्नावस्थाभिमान्यात्मा तैजस इत्युच्यते।।१७।।

८
स्वप्न अवस्था क्या है ? जाग्रत् अवस्था में जो देखे गये
और सुने गये, तज्जनित वासना से निन्द्रा के समय जो प्रपञ्च की
प्रतीति होती है, वही स्वप्नावस्था है। सूक्ष्म शरीर और स्वप्नावस्था
का अभिमानी आत्मा 'तैजस' कहा जाता है ।।१७।।
सुषुप्त्यवस्था का ? अहं किमपि न जानामि सुखेन मया
निद्रानुभूयते इति यत्, तत् सुषुप्त्यवस्था । एतदवस्थाकारण-
शरीराभिमान्यात्मा प्राज्ञ इत्युच्यते ।।१८।।
सुषुप्ति अवस्था क्या है ? 'मैं कुछ नहीं जानता हूँ'
'सुखपूर्वक निद्रा का अनुभव मुझे होता है' ऐसा जिसका परामर्श होता
है, वही 'सुषुप्ति अवस्था' है। इस सुषुप्ति अवस्था और कारण शरीर
के अभिमानी आत्मा को 'प्राज्ञ' कहा जाता है ।।१८।।
पञ्चकोशाः के ? अन्नमयः प्राणमयो मनोमयो विज्ञानमय
आनन्दमयश्चेति ।। १६ ।।
पञ्च कोश क्या है ? अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय
तथा आनन्दमय, ये पञ्च कोश हैं ।। १६ ।।
अन्नमयः कः ? अन्नरसेनेव भूत्वाऽन्नरसेनैवाभिवृद्धिं
सम्प्राप्यान्नरूपपृथिव्यां यद्विलीयते, सोऽन्नमयः कोशः ।।२०।।
अन्नमय कोश क्या है ? अन्न के रस से ही उत्पन्न होकर
अन्नरस से ही वृद्धि को प्राप्त होकर जो अन्नरूप पृथ्वी में विलीन
होता है, वह स्थूलशरीर अन्नमय कोश है ।।२०।।
प्राणमयः कः ? प्राणादिपञ्चवायवो वागादीन्द्रियपञ्चकं च
मिलित्वा प्राणमयः कोशः ।।२१।।
प्राणमय कोश क्या है ? प्राण, अपान, समान, उदान और
व्यान; ये पञ्चप्राण और वागादि पञ्चकर्मेन्द्रियाँ इन को मिलाकर

६
प्राणमयकोश कहा गया है ॥२१॥
मनोमयः कः? मनश्च ज्ञानेन्द्रियपञ्चकं च मिलित्वा
मनोमयः कोशः।।२२।।
मनोमय कोश क्या है? पञ्चज्ञानेन्द्रियों के सहित
संकल्प-विकल्पात्मक मन, मनोमय कोश है ।।२२।।
विज्ञानमयः कः? बुद्धिर्ज्ञानेन्द्रियपञ्चकं च मिलित्वा विज्ञानमयः
कोशः।।२३।।
विज्ञानमय कोश क्या है? अन्तःकरण की निश्चयात्मिका
वृत्तिरूप बुद्धि और पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, दोनों मिलकर विज्ञानमय कोश
है ।।२३।।
आनन्दमयः कोशः कः? प्रियमोदादिवृत्तिमत् स्वस्वरूपाज्ञानं
यदस्ति, तदानन्दमयः कोशः। एतत्कोशपञ्चकं च मदीयं शरीरं,
मदीयाः प्राणाः, मदीयं मनो मदीया बुद्धिर्मदीयमज्ञानमिति
मदीयत्वेनैव ज्ञायते। तद्यथा मदीयत्वेन ज्ञातं कुण्डल कटकगृ-
हादिकं स्वस्माद्भिन्नं, तथा मदोयत्वेन ज्ञातमात्मा न
भवति ।।२४।।
आनन्दमय कोश क्या है? कारणशरीर भूत अविद्या में
स्थित प्रिय, मोद तथा प्रमोद वृत्ति सहित मलिन सत्त्व को
आनन्दमय कोश कहते हैं। ये पाँचों कोश-अन्नमय कोश स्थूल
शरीर मेरा है, प्राण मेरे हैं, मन मेरा है, बुद्धि मेरी है और अज्ञान
मेरा है, इस प्रकार आत्मीय रूप से जाने जाते हैं। जैसे कटककुण्डल
आदि मेरे हैं, इस प्रकार मुझसे भिन्न हैं। वैसे ही पञ्चकोश मेरे हैं,
इस रूप में जाना जाता है। इसलिए पञ्चकोश भिन्न है और

१०

आत्मा भिन्न है, ऐसा सिद्ध हो जाता है।
यहाँ पर यह युक्ति सूचित है कि जो मेरा है, वह मुझसे
भिन्न है। जैसे गृह, पुस्तक आदि मेरे हैं, अतः मुझसे भिन्न है।
इस प्रकार आचार्यपाद ने यहाँ एक साथ सरलतम युक्ति के द्वारा
सिद्ध कर दिया कि पाँचो कोश आत्मा से भिन्न और अनात्मा है।
अब यहाँ शंका होती है कि मेरे माता-पिता, भाई-बन्धु आदि सब
जीव है, अतः अनात्मा कैसे? तो इसका उत्तर है कि जैसे स्वप्न में
मुझसे भिन्न मित्र-शत्रु, भाई-बन्धु दिखते हैं पर वास्तव में वहाँ
कोई जीव नहीं। इसीलिये सिद्ध होता है कि आत्मा नहीं दिखता
भिन्न-भिन्न देह ही दिखाई पड़ता है। आत्मा में कोई भेद नहीं है।
साथ ही यह भी सूचित है कि जो भी दिखता है, वह सब स्वप्नदेह
के समान मिथ्या है ।।२४।।
तर्ह्यात्मा कः? सच्चिदानन्दस्वरूपः ।।२५।।
आत्मा क्या है? आत्मा सच्चिदानन्दस्वरूप है।।२५।।
सत् किम्? कालत्रयेऽपि यत्तिष्ठति, तत्सत्। चित् किम्?
साधनान्तरनैरपेक्ष्येण स्वयं प्रकाशमानतयेतरपदार्थावभासकं
यत्, तच्चित्। आनन्दः कः? सुखस्वरूपः। एवं सच्चिदा-
नन्दस्वरूपं स्वात्मानं विजानीयात्।।२६।।
सत् क्या है? तीनों काल में जो विद्यमान रहता हो,
वह सत् है। चित् क्या है? अन्य साधन के बिना स्वयं
प्रकाशमान होता हुआ जो अन्य सब पदार्थों का प्रकाशक हो,
वह चित् है। आनन्द क्या है? सुखस्वरूप आनन्द है। इस
प्रकार सच्चिदानन्दस्वरूप अपने आत्मा को जानें ।।२६।।

११
(पूर्वार्धं समाप्तम्)
(उत्तरार्धम्)
अथ चतुर्विंशतितत्त्वोत्पत्तिप्रकारं वक्ष्यामः ॥२७॥
अब २४ तत्त्वों की उत्पत्ति का प्रकार हम कहेगें ॥२७॥
ब्रह्मणस्तमोगुणप्रधानमायोपहितादाकाशः सम्भूतः आकाशा-
द्वायुर्वायोस्तेजस्तेजस आपोऽद्भ्यः पृथिवी॥२८॥
तम प्रधान माया से उपहित ब्रह्म से आकाश उत्पन्न हुआ
आकाशभावापन्न ब्रह्म से वायु की उत्पत्ति हुई। इसी प्रकार
वायुभावापन्न ब्रह्म से अग्नि, अग्निभावापन्न ब्रह्म से जल और
जलभावापन्न ब्रह्म से पृथ्‍वी की उत्पत्ति हुई। इस प्रकार सारे
भूत-भौतिक पदार्थों की उत्पत्ति ब्रह्म से सिद्ध होती है ॥२८॥
तेषां पञ्चतत्त्वानां मध्य आकाशस्य सात्त्विकांशाच्छ्रोत्रेन्द्रियं
सम्भूतम्। वायोः सात्त्विकांशात् त्वगिन्द्रियं सम्भूतम्। अग्नेः
सात्त्विकांशाच्चक्षुरिन्द्रियं सम्भूतम्। जलस्य सात्त्विकांशा-
द्रसनेन्द्रियं सम्भूतम्। पृथिव्याः सात्त्विकांशात् घ्राणेन्द्रियं
सम्भूतम्। एतेषां पञ्चतत्त्वानां समष्टिसात्त्विकांशादन्तःकरणं
सम्भूतम्, तच्च वृत्तिभेदान्मनोबुद्ध्यहङ्कारचित्तानीति
चतुर्धा॥२६॥
इन पाँच तत्त्वों में से आकाश के सात्त्विक अंश से
श्रोत्रेन्द्रिय उत्पन्न हुई। वायु के सात्त्विक अंश से त्वगिन्द्रिय उत्पन्न
हुई। अग्नि के सात्त्विक अंश से चक्षुरिन्द्रिय उत्पन्न हुई। जल के
सात्त्विक अंश से रसनेन्द्रिय उत्पन्न हुई। पृथ्‍वी के सात्त्विक अंश से

१२
घ्राणेन्द्रिय उत्पन्न हुई। इन अपञ्चीकृत पञ्च तत्त्वों के समष्टि
सात्त्विकांश से मन, बुद्धि, अहंकार तथा चित्तरूप चतुर्विध अन्तःकरण
उत्पन्न हुआ ॥२६॥
संकल्पविकल्पात्मकं मनः निश्चयात्मिका बुद्धिः अहंकर्ता
अहंकारः चिन्तनकर्तृ चित्तम्। मनसो देवता चन्द्रमा बुद्धेर्ब्रह्मा
अहंकारस्य रुद्रः चित्तस्य वासुदेवः।
संकल्प-विकल्पात्मक वृत्ति का नाम मन; निश्चयात्मिका
वृत्ति का नाम बुद्धि, अभिमान करने वाली वृत्ति का नाम अहंकार
तथा चिन्तन करने वाली वृत्ति का नाम चित्त है। मन के देवता
चन्द्रमा, बुद्धि के देवता ब्रह्मा, अहंकार के देवता रुद्र और चित्त के
देवता वासुदेव है।
एतेषां पञ्चतत्त्वानां मध्य आकाशस्य राजसांशाद्वागिन्द्रियं
सम्भूतं, वायो राजसांशात् पाणीन्द्रियं सम्भूतं, वह्नेः
राजसांशात्पादेन्द्रियं सम्भूतं, जलस्य राजसांशात् उपस्थेन्द्रियं
सम्भूतं, पृथिवीराजसांशात्पाय्विन्द्रियं सम्भूतम् ।।३०।।
इन पञ्च तत्त्वों मे से आकाश के रजो अंश से वाक्
इन्द्रिय उत्पन्न हुई, वायु के रजो अंश से हस्त इन्द्रिय उत्पन्न हुई,
अग्नि के रजो अंश से पाद इन्द्रिय उत्पन्न हुई, जल के रजो अंश
से उपस्थ इन्द्रिय उत्पन्न हुई और पृथ्वी के रजो अंश से गुदा
इन्द्रिय उत्पन्न हुई ।।३०।।
एतेषां पञ्चतत्त्वानां समष्टिराजसांशात्
प्राणपञ्चकं सम्भूतम् ।।३१।।
इन अपञ्चीकृत पञ्च तत्त्वों के समष्टि रजो अंश से पञ्च
प्राण उत्पन्न हुए हैं ।।३१।।

१३
एतेषां पञ्चतत्त्वानां तमोगुणप्रधानानां पञ्चीकरणेन पञ्चमहाभूतानि
भवन्ति।
इन तमोगुण प्रधान पञ्च तत्त्वों के पञ्चीकरण के द्वारा
पञ्च महाभूतों की उत्पत्ति होती है
पञ्चीकरणं कथम् ? एतेषु भूतेष्वेकमेकं भूतं द्विधा समं
विभज्यैकमेकमर्द्धं तूष्णीं व्यवस्थाप्यापरमपरमर्द्धं चतुर्द्धा
समं विभज्य स्वार्द्धभिन्नेष्वर्द्धेषु स्वभागचतुष्टयसंयोजनं
पञ्चीकरणं भवति।
एतेभ्यः पञ्चीकृतपञ्चमहाभूतेभ्यश्चतुर्विधस्थूलशरीरं,
ब्रह्माण्डं, ब्रह्माण्डमध्ये चतुर्दशभुवनानि सम्भूतानि।।३२।।
प्रश्न- पञ्चीकरण किस प्रकार होता है ?
उत्तर- एक-एक भूत के दो-दो समान विभाग कर एक-एक
अर्धभाग को पृथक् सुरक्षित रखकर दूसरे-दूसरे आधे भाग को
चार भागों में विभक्त कर अपने से भिन्न अर्ध भागों में अपने चार
भागों को मिलाना पञ्चीकरण होता हैं।
इन्हीं पञ्चीकृत पञ्च-महाभूतों से चतुर्विध स्थूल शरीर
(जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज), ब्रह्माण्ड और ब्रह्माण्ड के
अन्तर्गत चतुर्दश भुवन का भेद-प्रभेद उत्पन्न होता हैं। चतुर्दश
भुवनों में से भूः, भुवः, स्व, महः, जनः, तपः और सत्यं- ये उपर
के सात लोक हैं तथा अतल, वितल, सुतलं, तलातल, रसातल,
महातल, और पाताल-ये नीचे के सात लोक (भुवन) हैं ।।३२।।
स्थूलशरीराभिमानि जीवनामकं ब्रह्मप्रतिबिम्बं भवति। स
एव जीव आत्मन्येव प्रकृत्या जीवेश्वरभेददृष्टिं कल्पयति।
कथमिति चेत्? अविद्योपाधिः सन्नात्मा जीव इत्युच्यते।।३३।।

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स्थूल शरीर में अभिमान करने वाला ब्रह्मप्रतिबिम्ब जीव
नामवाला होता है। वही जीव अविद्या के कारण अपने में ही
जीव-ईश्वर भेददृष्टि का आरोप करता है। कैसे ? तो इसका उत्तर
है- अविद्या उपाधि वाला आत्मा जीव नाम से कहा जाता
है।।३३।।
मायोपाधिः सन्नात्मा ईश्वर इत्युच्यते। एवमुपाधिभेदाज्जी-
वेश्वरभेददृष्टिर्यावत्पर्यन्तं तिष्ठति, तावत्पर्यन्तं जन्म-
मरणादिरूपसंसारो न् निवर्तते। तस्मात् कारणाज्जीव एव
ईश्वर ईश्वर एव जीव इतीतराभेददृष्टिं जानीयात् ।।३४।।
माया उपाधि वाले चेतन को ईश्वर कहा गया है। इस
प्रकार उपाधिभेद से जीव-ईश्वर में भेददृष्टि जब तक रहती है,
जब तक जन्म मरणरूपी संसार निवृत्त नहीं होता। इसीलिए
जीव-ईश्वर में 'जीव ही ईश्वर' 'ईश्वर ही जीव' इस प्रकार अभेद
दृष्टि करनी चाहिए ।।३४।।
ननु साहङ्कारस्य किञ्चिज्ज्ञस्य जीवस्य निरहङ्कारस्य सर्वज्ञ-
स्येश्वरस्य च कथमभेदबुद्धिः स्यादुभयोर्विरुद्धधर्माक्रा-
न्तत्वादिति चेत् ? न। स्थूलसूक्ष्मशरीराभिमानी
त्वम्पदवाच्योऽर्थः, उपाधिविनिर्मुक्तं समाधिदशासम्पन्नं
शुद्धचैतन्यं च त्वंपदल- क्ष्योऽर्थः । एवं सर्वज्ञत्वादिविशिष्ट
ईश्वरस्तत्पदवाच्यः, उपाधिशून्यं शुद्धचैतन्यं च तत्पदलक्ष्यम्।
एवं च लक्ष्यार्थमादाय जीवेश्वरयोरभेदे बाधकाभावः ।।३५।।
अहंकारयुक्त अल्पज्ञ जीव और अहंकार रहित सर्वज्ञ
ईश्वर का तत्त्वमसि इस महावाक्य से अभेदज्ञान कैसे हो सकेगा,
क्योंकि ये जीव और ईश्वर दोनों विरुद्ध धर्म से आक्रान्त है ?

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यह कथन ठीक नहीं है क्योंकि स्थूल सूक्ष्म शरीर अभिमानी
चेतन त्वंपद का वाच्यार्थ है। उपाधि से सर्वथा मुक्त
समाधिदशासम्पन्न शुद्ध चैतन्य त्वंपद का लक्ष्यार्थ है। इसी प्रकार
सर्वज्ञत्वादि धर्म से विशिष्ट ईश्वर तत्पद का वाच्यार्थ है और
उपाधिशून्य शुद्ध चैतन्य तत्पद का लक्ष्यार्थ है। इस प्रकार चैतन्यरूप
लक्ष्यार्थ को लेकर जीव और ईश्वर का अभेद होने से कोई बाधक
नहीं है।
लोक में भी मुख्यार्थ को लेने पर यदि विरोध उपस्थित
होता है तो लक्षणा की जाती है। लक्षणा का बीज, तात्पर्य की
अनुपपत्ति को माना गया है (तात्पर्य का संभव नहीं हो पाना ही
तात्पर्य-अनुपपत्ति है।)
लक्षणा ३ प्रकार की होती है, जहल्लक्षणा, अजहल्लक्षणा
और जहदजहल्लक्षणा (भाग-त्याग लक्षणा)। जिसमें वाच्यार्थ को
छोड़कर लक्ष्यार्थ को लिया जाता है, उसे जहल्लक्षणा कहते हैं। जैसे
'गंगायां घोषः' (गंगा में अहीरों की बस्ती) यहाँ गंगा का अर्थ
'प्रवाह' न लेकर लक्ष्यार्थ तीर लिया जाता है। जिसमें वाच्यार्थ को
न छोड़ते हुए लक्ष्यार्थ को भी लिया जाता है, उसे अजहल्लक्षणा
कहते हैं। जैसे 'छत्रिणो यान्ति' कहने पर छाताधारी पुरुषों के साथ
छातारहित पुरुषों का भी ग्रहण किया जाता है। जिसमें विरुद्ध
अंशों को छोड़कर अविरुद्ध अंश मात्र का ग्रहण किया जाता है, उसे
जहदजहल्लक्षणा या भाग-त्याग लक्षणा कहते हैं। जैसे-
'सोऽयं' देवदत्तः' में विरुद्ध-अंश तद्देश-एतद्देश, तत्काल-एतत्काल
आदि को छोड़कर अविरुद्ध अंश व्यक्ति मात्र को लेकर वाक्यार्थ-
बोध होता है। इसी प्रकार 'तत्त्वमसि' आदि महावाक्यों में भाग-त्याग

इस प्रकार वेदान्त वाक्यों और सद्गुरू के उपदेश से सभी

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लक्षणा से उपाधि और औपाधिक धर्मों को छोड़ने पर शुद्ध-चिन्मात्र
का बोध होता है ।।३५।।
एवं वेदान्तवाक्यैः सद्गुरूपदेशेन सर्वेष्वपि भूतेषु येषां
ब्रह्मबुद्धिरुत्पन्ना ते जीवन्मुक्ता इत्युच्यन्ते ।।३६।।
इस प्रकार वेदान्त वाक्यों और सद्गुरू के उपदेश से सभी
भूतों में जिनकी ब्रह्म बुद्धि उत्पन्न हो गई है; वे जीवन्मुक्त कहे
जाते हैं ।।३६।।
ननु जीवन्मुक्तः कः? यथा देहोऽहं पुरुषोऽहं ब्राह्मणोऽहं
क्षत्रियोऽहं वैश्योऽहं शूद्रोऽहमस्मीति दृढनिश्चयस्तथा नाहं
ब्राह्मणो न क्षत्रियो न वैश्यो न शूद्रो न पुरुषः, किन्त्वसङ्गः
सच्चिदानन्दस्वरूपः स्वप्रकाशरूपः सर्वान्तर्यामी चिदाका-
शरूपोऽहमस्मीति दृढनिश्चयरूपापरोक्षज्ञानवान् ।३७।।
शङ्का- जीवन्मुक्त कौन है ?
समाधान- जैसे मैं देह हूँ, पुरुष हूँ, ब्राह्मण हूँ, क्षत्रिय हूँ, वैश्य हूँ
और शूद्र हूँ; ऐसा दृढ़ निश्चय है। ठीक वैसे ही मैं ब्राह्मण, क्षत्रिय,
वैश्य और शूद्र नहीं हूँ, पुरुष नहीं हूँ किन्तु असङ्ग सच्चिदानन्दस्वरूप,
स्वप्रकाशरूप, सर्वान्तर्यामी, चिदाकाशस्वरूप हूँ; ऐसा दृढ़निश्चयरूप
अपरोक्ष ज्ञानी जीवन्मुक्त है ।।३७।।
ब्रह्मैवाहमस्मीत्यपरोक्षज्ञानेन निखिलकर्मबन्धविनिर्मुक्तो
जीवन्मुक्तः । कर्माणि कतिविधानि? आगामिसञ्चितप्रार-
ब्धभेदेन त्रिविधानि सन्ति ।३८।।
'मैं ब्रह्म ही हूँ' ऐसे अपरोक्षज्ञान द्वारा सम्पूर्ण कर्म बन्धनों
से वह ज्ञानी सर्वथा मुक्त हो जाता है। कर्म कितने प्रकार के होते
हैं ? आगामी, सञ्चित और प्रारब्ध भेद से तीन प्रकार के कर्म होते

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हैं ॥३८॥
आगामि कर्म किम् ? ज्ञानोत्पत्त्यनन्तरं ज्ञानिदेहकृतं
पुण्यपापरूपं कर्म यदस्ति, तदागामि कर्मेत्यभिधीयते।
आगामी कर्म क्या है? ज्ञान उत्पत्ति के बाद ज्ञानी के
शरीरादि से किये गये पुण्य पाप कर्म जो है; उसे आगामी कर्म
कहते हैं॥३६॥
सञ्चितं कर्म किम् ? अनन्तकोटिजन्मनां बीजभूतं सद्यत्
कर्मजातं पूर्वोपार्जितं तिष्ठति, तत् सञ्चितं ज्ञेयम्॥४०॥
सञ्चित कर्म क्या है? अनन्त कोटि जन्मों के बीजभूत
होते हुए पूर्व उपार्जित जो कर्म समुदाय है, उसे सञ्चित कर्म
समझना चाहिए॥४०॥
प्रारब्धं कर्म किम् ? इदं शरीरमुत्पाद्येहलोक एव
सुखदुःखादिप्रदं यत्कर्म तत्प्रारब्धं, भोगेन नष्टं भवति।
प्रारब्धकर्मणां भोगादेव क्षय इति न्यायात्॥४१॥
प्रारब्ध कर्म क्या है? इस शरीर को उत्पन्न कर इस लोक
में ही सुख-दुःखादि को देने वाले जो कर्म है; वे प्रारब्ध कर्म है, जो
भोग से नष्ट होते हैं। "प्रारब्ध कर्मों का नाश भोग से ही होता
है" ऐसा शास्त्रवचन है। 'सुखदुःखादि' यहाँ 'आदि' पद से सुख-दुःख
साधन का ग्रहण होता है ॥४१॥
सञ्चितं कर्म ब्रह्मैवाहमिति निश्चयात्मकज्ञानेन नश्यति।
‘ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात् कुरुतेऽर्जुन' इति
भगवद्वचनात्। किञ्चागामिकर्मणो नलिनीदलगतजलवत्
ज्ञानिनां सम्बन्धो नास्ति।४२।।
'मैं ब्रह्म ही हूँ' ऐसे निश्चयात्मक ज्ञान द्वारा सञ्चित कर्म

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नष्ट हो जाते हैं। कमलपत्र पर निर्लिप्त जल की भाँति ज्ञानियों का
आगामी कर्म के साथ सम्बन्ध नहीं होता ।।४२।।
किञ्च ये ज्ञानिनं स्तुवन्ति भजन्त्यर्चयन्ति च, तान प्रति
ज्ञानिकृतागामिपुण्यं गच्छति । ये च ज्ञानिनं निन्दन्ति
द्विषन्ति दुःखप्रदानं कुर्वन्ति, तान्प्रति ज्ञानिकृतं
सर्वमागामिक्रियमाणपदवाच्यं कर्म पापात्मकं गच्छति। तथा
च श्रुतिः “सुहृदः पुण्यकृत्यां द्विषन्तः पापकृत्यां गृहणन्तीति”।
तथा चात्मवित् संसारं तीर्त्वा ब्रह्मानन्दमिहैव प्राप्नोति।
“तरति शोकमात्मविदि”त्यादिश्रुतेः।
तनुं त्यजतु वा काश्यां श्वपचस्य गृहेऽथवा।
ज्ञानसम्प्राप्तिसमये मुक्तोऽसौ विगताशयः॥ इति
स्मृतेश्च।४३।।
इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविन्दभगवत्पूज्य-
पादशिष्यस्य श्रीशङ्करभगवतः कृतौ तत्त्वबोधः समाप्तः।।
जो ज्ञानी की स्तुति करते हैं, सेवा करते हैं तथा पूजा
करते हैं; ज्ञानियों का किया हुआ आगामी पुण्य कर्म उन्हीं के पास
चला जाता है और जो ज्ञानी की निन्दा करते हैं, द्वेष करते हैं तथा
दुःख देते हैं, उनके प्रति ज्ञानियों का किया हुआ सम्पूर्ण आगामी
क्रियमाणपदवाच्य पापरूप कर्म चला जाता है। 'ज्ञानी के पुण्य कर्मों
को सुहृद् ग्रहण करते हैं और पाप कर्मों को द्वेषी (द्वेष करने वाले)
ग्रहण करते हैं” ऐसी ही श्रुति है। पुण्य-पाप जाने का अभिप्राय
उनको ज्ञानीकृत पुण्य अथवा पापों के अनुरूप फल प्राप्त होता है।
तथा आत्मज्ञानी संसार को पार कर यहाँ पर ही ब्रह्मानन्द को प्राप्त