आत्मबोध व तत्त्वबोध (आदि शङ्कराचार्य - हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmabodha & Tattvabodha with Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: कैलाश आश्रम ऋषिकेश · कैलाश आश्रम ऋषिकेश (उद्गम)
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हैं ॥३८॥
आगामि कर्म किम् ? ज्ञानोत्पत्त्यनन्तरं ज्ञानिदेहकृतं
पुण्यपापरूपं कर्म यदस्ति, तदागामि कर्मेत्यभिधीयते।
आगामी कर्म क्या है? ज्ञान उत्पत्ति के बाद ज्ञानी के
शरीरादि से किये गये पुण्य पाप कर्म जो है; उसे आगामी कर्म
कहते हैं॥३६॥
सञ्चितं कर्म किम् ? अनन्तकोटिजन्मनां बीजभूतं सद्यत्
कर्मजातं पूर्वोपार्जितं तिष्ठति, तत् सञ्चितं ज्ञेयम्॥४०॥
सञ्चित कर्म क्या है? अनन्त कोटि जन्मों के बीजभूत
होते हुए पूर्व उपार्जित जो कर्म समुदाय है, उसे सञ्चित कर्म
समझना चाहिए॥४०॥
प्रारब्धं कर्म किम् ? इदं शरीरमुत्पाद्येहलोक एव
सुखदुःखादिप्रदं यत्कर्म तत्प्रारब्धं, भोगेन नष्टं भवति।
प्रारब्धकर्मणां भोगादेव क्षय इति न्यायात्॥४१॥
प्रारब्ध कर्म क्या है? इस शरीर को उत्पन्न कर इस लोक
में ही सुख-दुःखादि को देने वाले जो कर्म है; वे प्रारब्ध कर्म है, जो
भोग से नष्ट होते हैं। "प्रारब्ध कर्मों का नाश भोग से ही होता
है" ऐसा शास्त्रवचन है। 'सुखदुःखादि' यहाँ 'आदि' पद से सुख-दुःख
साधन का ग्रहण होता है ॥४१॥
सञ्चितं कर्म ब्रह्मैवाहमिति निश्चयात्मकज्ञानेन नश्यति।
‘ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात् कुरुतेऽर्जुन' इति
भगवद्वचनात्। किञ्चागामिकर्मणो नलिनीदलगतजलवत्
ज्ञानिनां सम्बन्धो नास्ति।४२।।
'मैं ब्रह्म ही हूँ' ऐसे निश्चयात्मक ज्ञान द्वारा सञ्चित कर्म