आत्मबोध व तत्त्वबोध (आदि शङ्कराचार्य - हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmabodha & Tattvabodha with Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: कैलाश आश्रम ऋषिकेश · कैलाश आश्रम ऋषिकेश (उद्गम)
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लक्षणा से उपाधि और औपाधिक धर्मों को छोड़ने पर शुद्ध-चिन्मात्र
का बोध होता है ।।३५।।
एवं वेदान्तवाक्यैः सद्गुरूपदेशेन सर्वेष्वपि भूतेषु येषां
ब्रह्मबुद्धिरुत्पन्ना ते जीवन्मुक्ता इत्युच्यन्ते ।।३६।।
इस प्रकार वेदान्त वाक्यों और सद्गुरू के उपदेश से सभी
भूतों में जिनकी ब्रह्म बुद्धि उत्पन्न हो गई है; वे जीवन्मुक्त कहे
जाते हैं ।।३६।।
ननु जीवन्मुक्तः कः? यथा देहोऽहं पुरुषोऽहं ब्राह्मणोऽहं
क्षत्रियोऽहं वैश्योऽहं शूद्रोऽहमस्मीति दृढनिश्चयस्तथा नाहं
ब्राह्मणो न क्षत्रियो न वैश्यो न शूद्रो न पुरुषः, किन्त्वसङ्गः
सच्चिदानन्दस्वरूपः स्वप्रकाशरूपः सर्वान्तर्यामी चिदाका-
शरूपोऽहमस्मीति दृढनिश्चयरूपापरोक्षज्ञानवान् ।३७।।
शङ्का- जीवन्मुक्त कौन है ?
समाधान- जैसे मैं देह हूँ, पुरुष हूँ, ब्राह्मण हूँ, क्षत्रिय हूँ, वैश्य हूँ
और शूद्र हूँ; ऐसा दृढ़ निश्चय है। ठीक वैसे ही मैं ब्राह्मण, क्षत्रिय,
वैश्य और शूद्र नहीं हूँ, पुरुष नहीं हूँ किन्तु असङ्ग सच्चिदानन्दस्वरूप,
स्वप्रकाशरूप, सर्वान्तर्यामी, चिदाकाशस्वरूप हूँ; ऐसा दृढ़निश्चयरूप
अपरोक्ष ज्ञानी जीवन्मुक्त है ।।३७।।
ब्रह्मैवाहमस्मीत्यपरोक्षज्ञानेन निखिलकर्मबन्धविनिर्मुक्तो
जीवन्मुक्तः । कर्माणि कतिविधानि? आगामिसञ्चितप्रार-
ब्धभेदेन त्रिविधानि सन्ति ।३८।।
'मैं ब्रह्म ही हूँ' ऐसे अपरोक्षज्ञान द्वारा सम्पूर्ण कर्म बन्धनों
से वह ज्ञानी सर्वथा मुक्त हो जाता है। कर्म कितने प्रकार के होते
हैं ? आगामी, सञ्चित और प्रारब्ध भेद से तीन प्रकार के कर्म होते