आत्मबोध व तत्त्वबोध (आदि शङ्कराचार्य - हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmabodha & Tattvabodha with Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: कैलाश आश्रम ऋषिकेश · कैलाश आश्रम ऋषिकेश (उद्गम)
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आत्मा भिन्न है, ऐसा सिद्ध हो जाता है।
यहाँ पर यह युक्ति सूचित है कि जो मेरा है, वह मुझसे
भिन्न है। जैसे गृह, पुस्तक आदि मेरे हैं, अतः मुझसे भिन्न है।
इस प्रकार आचार्यपाद ने यहाँ एक साथ सरलतम युक्ति के द्वारा
सिद्ध कर दिया कि पाँचो कोश आत्मा से भिन्न और अनात्मा है।
अब यहाँ शंका होती है कि मेरे माता-पिता, भाई-बन्धु आदि सब
जीव है, अतः अनात्मा कैसे? तो इसका उत्तर है कि जैसे स्वप्न में
मुझसे भिन्न मित्र-शत्रु, भाई-बन्धु दिखते हैं पर वास्तव में वहाँ
कोई जीव नहीं। इसीलिये सिद्ध होता है कि आत्मा नहीं दिखता
भिन्न-भिन्न देह ही दिखाई पड़ता है। आत्मा में कोई भेद नहीं है।
साथ ही यह भी सूचित है कि जो भी दिखता है, वह सब स्वप्नदेह
के समान मिथ्या है ।।२४।।
तर्ह्यात्मा कः? सच्चिदानन्दस्वरूपः ।।२५।।
आत्मा क्या है? आत्मा सच्चिदानन्दस्वरूप है।।२५।।
सत् किम्? कालत्रयेऽपि यत्तिष्ठति, तत्सत्। चित् किम्?
साधनान्तरनैरपेक्ष्येण स्वयं प्रकाशमानतयेतरपदार्थावभासकं
यत्, तच्चित्। आनन्दः कः? सुखस्वरूपः। एवं सच्चिदा-
नन्दस्वरूपं स्वात्मानं विजानीयात्।।२६।।
सत् क्या है? तीनों काल में जो विद्यमान रहता हो,
वह सत् है। चित् क्या है? अन्य साधन के बिना स्वयं
प्रकाशमान होता हुआ जो अन्य सब पदार्थों का प्रकाशक हो,
वह चित् है। आनन्द क्या है? सुखस्वरूप आनन्द है। इस
प्रकार सच्चिदानन्दस्वरूप अपने आत्मा को जानें ।।२६।।