आत्मबोध व तत्त्वबोध (आदि शङ्कराचार्य - हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmabodha & Tattvabodha with Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: कैलाश आश्रम ऋषिकेश · कैलाश आश्रम ऋषिकेश (उद्गम)
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घ्राणेन्द्रिय उत्पन्न हुई। इन अपञ्चीकृत पञ्च तत्त्वों के समष्टि
सात्त्विकांश से मन, बुद्धि, अहंकार तथा चित्तरूप चतुर्विध अन्तःकरण
उत्पन्न हुआ ॥२६॥
संकल्पविकल्पात्मकं मनः निश्चयात्मिका बुद्धिः अहंकर्ता
अहंकारः चिन्तनकर्तृ चित्तम्। मनसो देवता चन्द्रमा बुद्धेर्ब्रह्मा
अहंकारस्य रुद्रः चित्तस्य वासुदेवः।
संकल्प-विकल्पात्मक वृत्ति का नाम मन; निश्चयात्मिका
वृत्ति का नाम बुद्धि, अभिमान करने वाली वृत्ति का नाम अहंकार
तथा चिन्तन करने वाली वृत्ति का नाम चित्त है। मन के देवता
चन्द्रमा, बुद्धि के देवता ब्रह्मा, अहंकार के देवता रुद्र और चित्त के
देवता वासुदेव है।
एतेषां पञ्चतत्त्वानां मध्य आकाशस्य राजसांशाद्वागिन्द्रियं
सम्भूतं, वायो राजसांशात् पाणीन्द्रियं सम्भूतं, वह्नेः
राजसांशात्पादेन्द्रियं सम्भूतं, जलस्य राजसांशात् उपस्थेन्द्रियं
सम्भूतं, पृथिवीराजसांशात्पाय्विन्द्रियं सम्भूतम् ।।३०।।
इन पञ्च तत्त्वों मे से आकाश के रजो अंश से वाक्
इन्द्रिय उत्पन्न हुई, वायु के रजो अंश से हस्त इन्द्रिय उत्पन्न हुई,
अग्नि के रजो अंश से पाद इन्द्रिय उत्पन्न हुई, जल के रजो अंश
से उपस्थ इन्द्रिय उत्पन्न हुई और पृथ्वी के रजो अंश से गुदा
इन्द्रिय उत्पन्न हुई ।।३०।।
एतेषां पञ्चतत्त्वानां समष्टिराजसांशात्
प्राणपञ्चकं सम्भूतम् ।।३१।।
इन अपञ्चीकृत पञ्च तत्त्वों के समष्टि रजो अंश से पञ्च
प्राण उत्पन्न हुए हैं ।।३१।।