अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
सातवाँ प्रकरण (शान्त-स्थिति / आत्मविश्रांति)
सातवाँ प्रकरण ।
—:०:—
मूलम् ।
मय्यनन्तमहाम्भोधौ विश्वपोत इतस्ततः ।
भ्रमति स्वान्तवातेन न ममास्त्यसहिष्णुता ॥ १ ॥
पदच्छेदः ।
मयि, अनन्तमहाम्भोधौ, विश्वपोतः, इतः, भ्रमति, स्वान्तवातेन, न, मम, अस्ति, असहिष्णुता ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| मयि अनन्त-महाम्भोधौ = | मुझ अनन्त महासमुद्र में | भ्रमति = | भ्रमती है |
| + परन्तु = | परन्तु | ||
| विश्वपोतः = | विश्व-रूपी नौका | मम = | मुझको |
| स्वान्तवातेन = | मन-रूपी पवन करके | असहिष्णुता = | असहनशीलता |
| इतः ततः = | इधर-उधर से | न अस्ति = | नहीं है ॥ |
भावार्थ ।
**प्रश्न—**यदि लय चिंतन नहीं होगा, तो सांसारिक विक्षेप भी बने रहेंगे और वे कदापि दूर नहीं होंगे ?
**उत्तर—**वे बने रहें, मेरी क्या हानि है । अनन्त महान् समुद्र-रूपी मुझ आत्मा में यह विश्व-रूपी नौका मन-रूपी पवन करके इधर-उधर भ्रमती है, उसका भ्रमण करना मेरे को असहन नहीं है । जैसे समुद्र में पवन करके इधर-उधर
११६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
भ्रमती हुई नौका समुद्र को क्षुब्ध नहीं कर सकती है, वैसे
मन-रूपी पवन करके इधर-उधर भ्रमती हुई विश्व-रूपी
नौका भी समुद्र-रूपी आत्मा को क्षुब्ध नहीं कर सकती
है ॥ १ ॥
मूलम् ।
मय्यनन्तमहाम्भोधौ जगद्वीचिः स्वभावतः ।
उदेतु वास्तमायातु न मे वृद्धिर्न च क्षतिः ॥ २ ॥
पदच्छेदः ।
मयि, अनन्तमहाम्भोधौ, जगद्वीचिः, स्वभावतः, उदेतु,
वा, अस्तम्, आयातु, न, मे, वृद्धिः, न, च, क्षतिः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| $\left.\begin{aligned} &मयि अनन्त- \ &महाम्भोधौ = \end{aligned}\right}$ | $\left{\begin{aligned} &मुझ अनन्त \ &महासमुद्र में \end{aligned}\right.$ | आयातु = प्राप्त हो | |
| जगद्वीचिः = जगत्-रूपी कल्लोल | मे = मेरी | ||
| स्वभावतः = स्वभाव से | न = न | ||
| उदेतु = उदय हों | वृद्धिः = वृद्धि है | ||
| वा = और चाहे | च = और | ||
| अस्तम् = लय को | न = न | ||
| क्षति = हानि है ॥ |
भावार्थ ।
पूर्ववाले वाक्य करके जगत् के व्यवहार को अनिष्टता
का अभाव कहा । अब इस वाक्य करके जगत् की उत्पत्ति
आदिकों को भी अनिष्टता का अभाव कथन करते हैं ।
सातवाँ प्रकरण ११७
जनकजी कहते हैं कि विनाश से रहित व्यापक आत्मा-
रूप समुद्र में जगत्-रूपी अनेक लहरें उदय होती हैं, और
फिर अस्त हो जाती हैं। उनके उदय होने से आत्मा की वृद्धि
नहीं होती है और उनके अस्त होने से आत्मा की कोई हानि
नहीं होती है। जैसे समुद्र की लहरों के उदय और अस्त होने
से समुद्र की कुछ भी हानि नहीं है ॥ २ ॥
मूलम् ।
मय्यनन्तमहाम्भोधौ विश्वं नाम विकल्पना ।
अतिशान्तो निराकार एतदेवाहमास्थितः ॥ ३ ॥
पदच्छेदः ।
मयि, अनन्तमहाम्भोधौ, विश्वम्, नाम, विकल्पना,
अतिशान्तः, निराकारः, एतत्, एव, अहम्, आस्थितः ।
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| मयि= | मुझ | अहम्= | मैं |
| अनन्त- महाम्भोधौ= | अनन्त महा- समुद्र में | अतिशान्तः= | अत्यन्त शान्त हूँ |
| निराकारः= | निराकार हूँ | ||
| नाम= | निश्चय करके | च= | और |
| विश्वम्= | संसार | एतत् एव= | इसी आत्मा के |
| विकल्पना= | कल्पना मात्र हैं | आस्थितः= | आश्रय हूँ ॥ |
समुद्र और लहर के दृष्टान्त से किसी को ऐसा भ्रम न
हो जावे कि आत्मा का विकार जगत् है, इस भ्रम के दूर
करने के लिये जनकजी दूसरी रीति से कहते हैं।
११८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
भावार्थ ।
मुझ महान् समुद्र-रूपी आत्मा में जो जगत् की कल्पना है, सो भ्रम-मात्र ही है । वास्तव में नहीं है, क्योंकि मेरा अनन्तस्वरूप निराकार है । निराकार से साकार की उत्पत्ति नहीं बनती है । जब कि आत्मा में जगत् की वास्तव में उत्पत्ति नहीं बनती है, तो मैं प्रपंच से रहित शान्त-रूप होकर स्थित हूँ । एवं लय योगादिक भी मेरे को करना उचित नहीं हैं ॥ ३ ॥
मूलम् ।
नात्मा भावेषु नो भावस्तत्रानन्ते निरञ्जने ।
इत्यसक्तोऽस्पृहः शान्त एतदेवाहमास्थितः ॥ ४ ॥
पदच्छेदः ।
न, आत्मा, भावेषु, नो, भावः, तत्र, अनन्ते, निरञ्जने, इति, असक्तः, अस्पृहः, शान्त, एतत्, एव, अहम्, आस्थितः ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| आत्मा = आत्मा | नो = नहीं है |
| भावेषु = देह आदि में | इति = इस प्रकार |
| न = नहीं | असक्तः = संग-रहित |
| + च = और | शान्तः = शान्त हुआ |
| भवः = देहादि | अहम् = मैं |
| तत्र = उस | एतत् एव = इसी आत्मा के |
| अनन्ते = अनन्त | आस्थितः = आश्रित हूँ ॥ |
| निरञ्जने = निर्द्वन्द्व आत्मा में |
भावार्थ ।
आत्मा देहादिभावों में आधेय अर्थात् आश्रित-रूप करके
सातवाँ प्रकरण । ११९
नहीं है, क्योंकि आत्मा व्यापक है, देहादिक सब परिच्छिन्न हैं। व्यापक, परिच्छिन्न के आश्रित नहीं होता। और आत्मा निराकार होने से देहादिकों की उपाधि भी नहीं हो सकता है, क्योंकि आत्मा सत्य है, देहादिक सब मिथ्या है। सत्य वस्तु मिथ्या वस्तु की उपाधि नहीं हो सकती है। और देह इन्द्रियादिक आत्मा की उपाधि भी नहीं हो सकते हैं, क्योंकि आत्मा अनन्त और निरञ्जन है और देहादिक अन्तवान् और नाशवान् हैं, इसी कारण आत्मा सम्बन्ध से रहित है और इच्छा आदिकों से भी रहित है एवं आत्मा शान्त स्वरूप है ॥ ४ ॥
मूलम् ।
अहो चिन्मात्रमेवाहमिन्द्रजालोपमं जगत् ।
अतो मम कथं कुत्र हेयोपादेयकल्पना ॥ ५ ॥
पदच्छेदः ।
अहो, चिन्मात्रम्, एव, अहम्, इन्द्रजालोपमम्, जगत्, अतः, मम, कथम्, कुत्र, हेयोपादेयकल्पना ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| अहो | = आश्चर्य है कि | मम | = मेरी |
| अहम् | = मैं | हेयोपादेय-कल्पना | = हेय और उपादेय की कल्पना |
| चिन्मात्रम् | = चैतन्य-मात्र हूँ | ||
| जगत् | = संसार | कथम् | = क्योंकर |
| इन्द्रजालोपमम् | = इन्द्रजाल की तरह है | च | = और |
| अतः | = इसलिये | कुत्र | = किसमें हो ॥ |
१२० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
भावार्थ ।
विद्वान् में इच्छा आदिक भी स्वतः नहीं होते हैं, इसमें जो कारण है उसको कहते हैं—
जनकजी कहते हैं कि मैं चैतन्य-स्वरूप हूँ और संपूर्ण जगत् इन्द्रजाल के तुल्य मेरी सत्ता के बल और अपनी सत्ता से रहित प्रतीत होता है। चूँकि जगत् की अपनी सत्ता कुछ भी नहीं है इस वास्ते मेरे को किसी पदार्थ में भी किसी प्रकार करके त्याग और ग्रहण की बुद्धि नहीं होती है। जो पुरुष जगत् के पदार्थों को सत्य मानता है, उसी की उनमें ग्रहण और त्यागबुद्धि होती है ॥ ५ ॥
इति श्रीअष्टावक्रगीतायां सप्तमं प्रकरणं समाप्तम् ॥ ७ ॥
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