सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

18 अपराजितपृच्छा
ज्यों-ज्यों समय बीता, वह वृद्धि को प्राप्त होता रहा और महारूपवान् होता
चला गया। महोद्भव के साथ-साथ वह महावृद्धि को प्राप्त हुआ अर्थात् विशालकाय
होता चला गया।
क्रमसंवर्धनात्त्वेवं विकाशं प्राप्त सर्वथा।
वर्धते च महाभावर्ब्रह्माण्डं पृथुतां गतम् ॥ 19 ॥
वह क्रमशः बढ़ता हुआ, विकास को प्राप्त हुआ अपने महाभाव में ब्रह्माण्ड
तुल्य पृथुता की गति को पाने लगा।
अण्डव्यासपृथुमानं योजनैः शतकोटिभिः।
सुनिष्पन्नाण्डकं यातं विकाशं वै द्विधा स्थितम् ॥ 20 ॥¹
धीरे-धीरे उस अण्ड का व्यास और विस्तार का मान योजन से शतकोटि तक
होता चला गया। वह इससे भी दोहरे विकास को प्राप्त होता हुआ, अर्णव पर स्थित
था।
अर्धस्योर्ध्वं तथाकाशमर्धस्याधस्तु मेदिनी।
तन्मध्ये वै समस्तं च येषां शम्भुकोद्भवत् ? ॥ 21 ॥
उसी अण्ड के ऊपरी स्वरूप से आकाश और नीचे के स्वरूप से पृथ्वी की
रचना हुई। इसके बीच समस्त चराचर था जो कि शम्भू से उत्पन्न हुआ था।
स्वर्गलोकार्णवद्वीपाः शैलाः शम्भुसमुद्भवाः।
वनोपवनकाननं यथा रचितसम्भवम् ॥ 22 ॥
इसके साथ ही शिव ने स्वर्गलोक, समुद्र, द्वीप, पर्वत, वनोपवन, कानन आदि
की रचना की।
महामेरूद्भवमध्ये रचितं शम्भुकोद्भवम्।²
तस्योर्ध्वे तु परं देवं संसारसृष्टिकारणम् ॥ 23 ॥
इसी प्रकार पृथ्वी पर महामेरु की रचना हुई, यह शम्भू द्वारा रचित हुआ।
उसके ऊपर ही देव ने सांसारिक सृष्टि की।
एकविंशति₂₁ स्वर्गांश्च मेरुव्यङ्गसमुद्भवाः ?।
³शम्भूद्गवाः क्रमेणैव पात्रे पात्रमिवापरम् ॥ 24 ॥

  1. कस्याण्डकष्ट गमनं योजनै शतकोटिभिः। सुष्यैन्निश्नन्तऽकं जातं विकाशंवैद्विधास्थितमिति पाठः।
  2. महामेरूद्भवं मध्ये अपरचि सम्भूद्भवा इति पाठः।
  3. महामेरूद्भवं मध्ये योगे पात्रेपात्रभिवातपरमिति पाठः।

सूत्र- ३ 19
इसी प्रकार शिव ने इक्कीस स्वर्गों की रचना की और मेरु सहित अन्य अङ्गों
को उत्पन्न किया। ये लोक क्रमशः एक पात्र के ऊपर रखे अन्य पात्र की भाँति
स्थित हैं।
पातालं समधा₇ ख्यातं सप्तद्वीपा₇ वसुन्धरा।¹
सप्त₇लोकास्तथा चोर्ध्वं स्वर्गाणां त्वेकविंशतिः₂₁ ॥ २५ ॥
इसी तरह सात पाताल² और सात प्रसिद्ध द्वीपों³ वाली वसुन्धरा की रचना की।
इसमें सात लोक⁴ और ऊपर इक्कीस स्वर्गलोकों की रचना की।
ततः सरांसि प्रतिमा जलस्य तु यानिकाः।
पुष्पावाटी प्राकारो शाला द्विनयमुपवनं वेदिकान्त ध्वजा ? ॥ २६ ॥
इसके बाद, सरों, तालाबों, जलाशयों का स्वरूप (प्रतिमा) बना। साथ ही
उनमें तैरने वाले यानों (नौका, जहाजादि) की रचना हुई। इसी प्रकार पुष्पवाटिकाएँ
अपना आकार ग्रहण करने लगीं और, परकोटा, शालाएँ बनने लगीं। इसी प्रकार
विनय, उपवनयुक्त वेदिकाओं (चबूतरों) पर ध्वजाएँ फहराने लगीं।
शालकल्पद्रुमाणां ⁵परिवर्ति वनान्तदूर्प⁶हर्म्या ? ।
वली च पातालस्फटिकोपेतं वृसुरमुनिसुरा पीठिकार्गस्वर्गभूः ? ॥ २७ ॥
इसी प्रकार शाल जैसे विशाल कल्पद्रुमों के ऊपर की ओर हर्म्यावली अर्थात्
हवेलियों की पङ्क्तियुक्त भवनों की कतार जो अपने ऊपर तल से लेकर ऊपर तक
स्फटिक से ही निर्मित थी। यह वसुओं, मुनियों, सुरों, देवताओं की पीठिका आवास
रूपी स्वर्गभूमि जैसी प्रतीत होती थी।
इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां
ब्रह्माण्डोत्पत्त्यधिकारो नाम तृतीयं सूत्रम् ॥ ३ ॥
इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में ब्रह्माण्ड
की उत्पत्ति अधिकार नामक तृतीय सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ३ ॥

  1. पातालासप्तमाख्याता सप्तद्वीपा वसुन्धरा। सप्तलोकोर्द्धमाख्याता स्वर्गाणां चैकविंशति इति पाठः।
  2. अतलं वितलं चैव सुतलं च तलातलम्। महातलं च पातालं रसातलमधस्ततः ॥ (ब्रह्माण्डपुराण ब्रह्मखण्ड
    7, 13)
  3. जम्बू, शाल्मलि, क्रौञ्च, कुश, शाक, पुष्कर तथा प्लक्ष द्वीप।
  4. भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक, तपोलोक व सत्य या ब्रह्मलोक।
  5. 'परिवर्ति' प्रकाशित पाठः।
  6. 'हर्म्या' स्यात्।

20 अपराजितपृच्छा
पातालद्वीपार्णवसूत्रणं (सूचनं) चतुर्थ सूत्रम् ॥ 4 ॥
अपराजित उवाच -
काचिच्छम्भूद्भवा सृष्टिः काचिद्देवांशसम्भवा ।
काचित्सृष्टिसमुद्भूता काचित्तद्वरदानतः ॥ 1 ॥
केचिच्छम्भूद्भवा वर्णा वनादीनां क्व चोदयः ।
निशासृष्ट्युद्भवाः केचिद् वनोपवनकाननम् ॥ 2 ॥
अपराजित बोले— हे प्रभु! यह बताइएगा कि कौनसी सृष्टि शम्भु के द्वारा और
कौनसी देवांश द्वारा सम्भूत हुई है? कौनसी सृष्टि स्वयं हुई और कौनसी सृष्टि
वरदान से हुई? इसी प्रकार शम्भु से कितने वर्ण उत्पन्न हुए और वनादिकों की
उत्पत्ति कैसे हुई तथा कोई वन, उपवन और कानन निशाचरों, राक्षसों व पिशाचों
द्वारा भी कैसे उत्पन्न किए गए हैं?
अथ पातालद्वीपार्णवसूत्राणं विश्वकर्मोवाच —
शम्भुजा भूधरा लोकाः पातालतलवासिनः ।
तथै (त्रै) सागरद्वीपाः शम्भुना रचिताः पुरा ॥ 3 ॥
पातालः सप्तधा त्वेवं ब्रह्मभागव्यवस्थितः ।
सप्तद्वीपाः समुद्राश्च आख्याता विष्णुसम्भवाः ॥ 4 ॥
विश्वकर्मा बोले— इस लोक में समस्त भूधर अर्थात् पहाड़ शम्भु द्वारा ही
उत्पन्न हुए हैं। इसी प्रकार समस्त पाताल तल के निवासी और समस्त सागरों के
द्वीप भी शम्भु द्वारा ही पूर्वकाल में रचित है। पहले के समय में पातालों के सात
भाग स्वयं ब्रह्मा द्वारा व्यवस्थित किए गए थे और सातों समुद्रों के सातों विख्यात
द्वीपों की रचना भगवान विष्णु द्वारा की गई।
रुद्रभागोद्भवालोकादीनां —
सप्तोर्ध्वलोकाश्च, ख्याता रुद्रभागसमुद्भवाः ।
स्वर्गश्च मर्त्यपातालौ स्वर्गाणां त्वेकविंशतिः₂₁ ॥ 5 ॥
इसी प्रकार सात ऊर्ध्वलोक जो विख्यात हैं, उनको स्वयं भगवान रुद्र ने ही
उत्पन्न किया। इस प्रकार से देखने पर हम पाते हैं कि स्वर्गलोक, मृत्युलोक और
पाताल लोकादि स्वर्गों की संख्या इक्कीस है।
पातालः स्वर्ग आख्यातो मर्त्यो द्वीपार्णवात्मकः ।
स्वर्गश्च लोक आख्यातस्त्रैलोक्यं नाम प्रोच्यते ॥ 6 ॥

सूत्र-४ 21
महोमेर्वादयः ख्याताः शम्भुना रचिताः किल।
अब मैं पाताल स्वर्ग कहलाने वाले, मृत्युलोक के द्वीपार्णव तथा स्वर्गलोक
नाम से कहे जाने वाले तीनों ही लोकों के नाम कहता हूँ। महामेरु आदि नाम से
विख्यात सभी पहाड़ भगवान शम्भु द्वारा रचित है।
अथ पृथ्वीविस्तारवर्णनं —
तेषामनुक्रमश्चात्र कथ्यते त्वपराजित ॥ ७॥
ब्रह्माण्डान्ते तु या पृथ्वी योजनैः शत ₁₀₀ कोटिभिः।
विनसन्त्यन्तरे लोका भुवनानि निवासिनाम् ॥ ८ ॥
हे अपराजित ! मैं उन सभी को अनुक्रम से तुम्हें यहाँ कहता हूँ। यह पृथ्वी
ब्रह्माण्ड के अन्त तक सौ करोड़ योजन तक फैली हुई है। इनके अनन्तर में अनेकों
भुवनों में निवास करने वाले लोक बसते हैं।
सरितश्च समुद्राश्च शैलाश्चैवं प्रकीर्तिताः।
तडागा विविधास्तत्र तीर्थश्च धर्मकीर्तनः ॥ ९ ॥
उन सभी में विविध प्रकार की सरिताएँ, समुद्र, शैल-पहाड़ जो ख्याति प्राप्त हैं
तथा विविध तड़ाग, तीर्थ आदि धर्मकीर्ति के स्थान पाए जाते हैं।
पातालान्ते च या पृथ्वी योजनैर्दशकोटिभिः।
तस्या अग्रं सहस्त्राणामेकोनविंशति स्तथा ॥ १० ॥
देवाग्निगुरुपूजा च धर्मतीर्थमहोत्सवः।
नदीसमुद्रदेवाश्च तीर्थादिपुण्यनिर्मलाः ? ॥ ११ ॥
अब देखिए कि पाताल के अन्त तक भी इस पृथ्वी की सीमा दस करोड़
योजनों की हैं। उससे भी आगे उन्नीस हजार देवाग्निपूजा, गुरुपूजा व धर्म तीर्थ के
महोत्सव के स्थान तथा नदी और समुद्र देवताओं के निर्मल पुण्य तीर्थ हैं।
तथा च पातालवर्णनं —
पातालभूधरा लोकास्तीर्थाणि पुण्यसागराः।
संस्थिताः कर्मयोगेन पात्रे पात्रमिवापरम् ॥ १२ ॥
अतलो वितलश्चैव सुतलो नितलस्तथा।
तलातलश्च विज्ञेयः ? (पातालः ) सप्तमोऽथ रसातलःः ॥ १३ ॥
ये सभी पाताल के पहाड़ों के लोक, तीर्थों के लोक पुण्य सागरों के लोक
कर्मयोग के द्वारा एक दूसरे पर इसी प्रकार बने हुए हैं जिस प्रकार घड़ों पर घड़े

22 अपराजितपृच्छा
रखे गए हों। इनके नाम हैं- (1.) अतल, (2.) वितल, (3.) सुतल, (4.)
नितल, (5.) तलातल (6. पाताल) और 7. रसातल।
पातालाः सप्तधा ख्याताः पात्रे पात्रमिवापरम्।
अविरचित विना शास्त्रे सृष्टिकालसमुद्भवाः ॥ 14 ॥
इस प्रकार सप्त पाताल एक दूसरे पर रखे गए पात्रों परिपात्रों के अनुसार विख्यात
हुए और ये सृष्टिकाल के समय ही बिना किसी शास्त्रीय आधार के निर्मित हुए हैं।
आदिपीठोद्भवं मानं द्वि ? सहस्त्रैर्लक्षयोजनैः ।
तलसङ्ख्यान्तरे विद्यात् पाताले सप्तधोच्छ्रिते ॥ 15 ॥
ततो द्विगुणविस्तीर्णाः क्रमेणापि सुसंस्थिताः ।
ब्रह्मसृष्ट्युद्भवांशे तु पातालतलमेव च ॥ 16 ॥
सबसे आदि में जो पीठ बनी, वह दो सहस्र लाख योजनों की थी। उसके ऊपर
एक-एक तल संख्या के अन्तर पर सात पाताल बनते गए। इससे भी दोगुनी विस्तार
वाली क्रमवार सुसंस्थित ब्रह्मा की सृष्टि में बने हुए पातालों के तल हैं।
तदूर्ध्वं सागरा द्वीपाः ¹शैलैश्चापि भूसंस्थिता ।
जम्बूद्वीपादिमानेन सप्तद्वीपा वसुन्धरा ॥ 17 ॥
तथा सप्तसमुद्राश्च प्रमाणेन प्रकीर्तिताः ।
इन सबके ऊपर सागर और द्वीप तथा पहाड़ों की भूमि पर स्थिति बनी हुई है।
इस भूमि पर यहाँ जम्बू द्वीपादि के मान से सात महाद्वीप इस वसुन्धरा पर बने हुए
हैं तथा सात समुद्र भी इनके ही प्रमाणानुसार बने हुए हैं।
अथ द्वीपनामवर्णनञ्च —
जम्बूः प्लक्षः कुशक्रौञ्चौ शाल्मलिश्च तथैव च ॥ 18 ॥
शाकस्तथा समाख्यातः पुष्कराख्यश्च सप्तमः ।
द्वीपाः सप्त समाख्याता अकृता शम्भुना हि ते ॥ 19 ॥
(उक्त द्वीपों के नाम हैं-) (1.) जम्बू, (2.) प्लक्ष, (3.) कुश, (4.)
क्रौञ्च, (5.) शाल्मलि, (6.) शाक और सातवाँ (7.) पुष्कर। ये सातों विख्यात
द्वीप शम्भु के द्वारा निर्मित हैं।
जम्बूद्वीपो लक्षमेकं योजनानां तु सङ्ख्यया ।
तत्परमर्णवा जाताः सप्तसृष्टिविरजिताः ॥ 20 ॥

  1. 'शनैश्चापि भू (त?) संस्थिता' प्रकाशित पाठः।

सूत्र-४ 23
सातश्च ? सप्तमां यान्ति क्रमेणापि सुसंस्थिताः ।
क्षारार्णवक्रमेणैव संस्थिताः सप्त सागराः ॥ २१ ॥
यह जम्बूद्वीप एक लाख योजन का है। इसके बाद ये सात सृष्टियों में बने
समुद्र आते हैं। ये सातों ही समुद्र सातवें तक क्रमवार सुसंस्थित है और क्षारार्णव
(लवणसागर) के क्रम से ये सातों सागर संस्थित है।
सागरान्ते भवेद् द्वीपो द्वीपान्ते चैव सागरः ।
समुद्राः संस्थिताः सर्वे नगरान्तेषु च विश्रुताः ॥ २३ ॥
अयुतायुतयोजनाः पृथगेकैकसागराः ।
विपुलागाधगम्भीरा आवर्तबहुलाकुलाः ॥ २४ ॥
इन सागरों के अन्त में अन्य द्वीप होते हैं और उन द्वीपों के अन्त में अन्य सागर
होते हैं। ये समुद्र इसी प्रकार एक दूसरे के बाद स्थित है जैसे किसीनगर के बाद
दूसरा नगर स्थित होता है। पृथक्-पृथक् ये सागर अयुतायुत योजनों अर्थात् अरबों
योजन के विस्तार में विस्तृत हैं और एक दूसरे से अलग-अलग भी हैं। ये सभी
सागर बहुत बड़े, बहुत गहरे, बहुत गम्भीर और बहुत ही भ्रमरियों युक्त उत्ताल
लहरों से आकुल-व्याकुल रहते हैं।
सागरनामानि —
क्षारः क्षीरोदधिः सर्पिमधुरिक्षुरसोदकः ।
समुद्राः सप्तधेत्युक्ताः सन्ति विष्णुसमुद्भवाः ॥ २५ ॥
(इन सागरों के नाम हैं—) (1.) क्षार, (2.) क्षीरोद, (3.) दधि, (4.)
सर्पि, (5.) मधु, (6.) इक्षु, (7.) रसोदक। ये सातों ही समुद्र भगवान् विष्णु द्वारा
रचित है।
कुलादीनां शैलनामानि —
नैकशैला कुलारम्या पृथ्वी च द्वीपसागराः ।
पृथुमानाः स्थिराः सर्वे शम्भोश्चाऽथ समुद्भवः ? ॥ २६ ॥
इस पृथ्वी पर अनेकों प्रकार के रम्य पहाड़ों के कुल समूह, द्वीप, सागर
विशाल प्रमाणयुक्त और स्थित है। ये सभी शम्भु की रचना हैं।
मेरुश्च मन्दरश्चैव तृतीयो गन्धमादनः ।
हिमवान् हेमकूटश्च निषधो नील एव च ॥ २७ ॥
श्वेतश्च शृङ्गवांश्चैव जाता अन्ये कुलाचलाः ।

24 अपराजितपृच्छा
इनके नाम हैं— (1.) मेरु, (2.) मन्दर, (3.) गन्धमादन, (4.) हिमालय,
(5.) हेमकूट, (6.) निषध, (7.) नील, (8.) श्वेत, (9.) शृङ्गवान एवं (10.)
कुलाचल।
तदाश्रित्य वना ख्याता वनोपवनकाननाः ॥ 28 ॥
माहेन्द्रो मलयश्चैव सह्यो विन्ध्यस्तथैव च।
हेमन्तः पारिजातश्च श्रीशैलश्च तथाऽर्बुदः ॥ 29 ॥
उदयाद्रिस्त्रिकूटश्च द्वीपशैलो विन्ध्याजलः।
मैनाको भूपरीषश्च कङ्कः प्रान्तकोद्भवः ॥ 30 ॥
इन पहाड़ों के आश्रित जो वन, उपवन व कानन हैं, उनके नाम हैं — (1.)
माहेन्द्र, (2.) मलय, (3.) सह्य, (4.) विन्ध्य, (5.) हेमन्त, (6.) पारिजात, (7.)
श्रीशैल, (8.) आबू, (9.) उदियाद्रि, (10.) त्रिकूट, (11.) द्वीपशैल व (12.)
विन्ध्याजल। मैनाक इस भूभाग पर परिखा की भाँति कङ्क से प्रान्त तक रचित है।
एते शम्भूद्भवाः सृष्ट्यां कुलशैलाश्च चलाः स्थिराः।
विष्णुऽरचिता ह्येते संस्थिताः कुलशैलकाः ॥ 31 ॥
क्वचित्पर्वतरम्या च क्वचित्सागरशोभिता।
क्वचित्सरिद्द्रुमै रम्या तडागैः शोभिता क्वचित् ॥ 32 ॥
ये सब शम्भु के द्वारा रचित सृष्टि के कुलपर्वत, अचल व चल शैल है। विष्णु
के द्वारा रचित शैलादि भी इतने ही हैं। (इस सृष्टि में) कहीं सुन्दर रम्य पर्वत हैं तो
कहीं सुन्दर रम्य सागर हैं। कहीं सरिताओं के किनारे रम्य द्रुमों की पङ्क्तियाँ हैं तो
कहीं सुन्दर तड़ागों की शोभा हो रही है।
एवं मही महारम्या शम्या शस्यैः संशोभिता क्वचित्।
मुख्यैः काञ्चनपुष्पैश्च रम्यासुरनरोरगैः ॥ 33 ॥
इस प्रकार यह पृथ्वी बहुत ही रमणीय सौन्दर्य से युक्त है जिसमें शम्या
शान्तिदायक सभी प्रकार के धान्य कहीं-कहीं सुशोभित हो रहे हैं। यहाँ कहीं पर
कई मुख्य-मुख्य प्रकार के काञ्चन के समान सुन्दर पुष्प पाए जाते हैं जो सुर, नर
और नागों को भी बड़े सुन्दर और प्यारे लगते हैं।
रचिता विरचिताख्या योजनैः कलितोन्नतिः।
यथोक्तेन प्रमाणेन द्वीपशैलार्णवादिकम् ॥ 34 ॥
इस प्रकार की योजनों तक के विस्तार में रचित कलित विरचित यथोक्त
प्रमाणानुसार बनी द्वीप, शैल, अर्णव-सागरादिक यहाँ हैं।

सूत्र-५ 25
अथाङ्गुलात्योजनप्रमाणम् —
वेदयुग्माङ्गुलैर्हस्तो दण्डो वेदकरैर्मतः।
द्विसहस्रदण्डैः क्रोशो योजनं वेदक्रोशकैः ॥ ३५ ॥
(वेदयुग्माङ्गुलैर्हस्तो अर्थात्) चौबीस अङ्गुल के गज से और चार गज के दण्ड
के नाप से बने दो हजार दण्डों से एक क्रोश बनता है और ऐसे चार क्रोश से एक
योजन होता है। यह सब अङ्गुल से क्रमानुसार योजन तक का प्रमाण जानना
चाहिए।
इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां पातालद्वीपार्णव
सूत्रणा (संचरा)धिकारो नाम चतुर्थ सूत्रम् ॥ ४ ॥
इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में
पातालद्वीपार्णव सूत्र (संचर) अधिकार नामक चतुर्थ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ४ ॥
सप्तोर्ध्वलोको नाम पञ्चमं सूत्रम् ॥ ५॥
अपराजित उवाच —
पातालमर्त्यलोकौ च कथितौ हि प्रमाणतः।
स्वर्गान्कथत मे तात प्रसादं कुरु मे प्रभो ॥ १ ॥
अपराजित बोले— पाताल, मर्त्यलोक और स्वर्गों के बारे में हे प्रभु! आप
प्रमाणतः बताने की कृपा करें और मुझ पर अनुग्रह करें।
अथ सप्तोर्ध्वलोकवर्णनं विश्वकर्मोवाच —
जम्बू त ऊर्ध्वमाख्याता स्वर्गलोकाश्च सप्तधा।
सप्तैते कथिताः स्वर्गा देवानामालयाः स्मृताः ॥ २ ॥
विश्वकर्मा बोले— जम्बूद्वीप से ऊपर की ओर सात प्रकार के स्वर्गलोक
विख्यात हैं। ये सातों ही कहे गए स्वर्गदेवताओं के रहने के आवास माने जाते हैं।
संस्थिताः क्रमयोगेन पात्रे पात्रमिवापरम्।
सृष्टिः शम्भूद्भवा स्वर्गः कथ्यते तव साम्प्रतम् ॥ ३ ॥
ये सभी एक पात्र के ऊपर रखे हुए पात्र के उपरोपर रखे समान स्थित हैं।
अब मैं इन सृष्टि में उद्भूत स्वर्गों के विषय में कहता हूँ।
भुवर्लोकश्च स्वर्लोको महोलोकश्च तत्परम्।
तुरीयो जनलोकश्च तपोलोकश्च पञ्चमः ॥ ४ ॥

26 अपराजितपृच्छा
सत्यलोकः सत्यगामी ज्ञानलोकोऽत्र सप्तमः ॥
विना विरचिताः शश्त्रै ? र्लोका वै शम्भुसम्भवाः ॥ ५ ॥
इनमें से पहला भुवर्लोक है, फिर स्वर्लोक, तीसरा महर्लोक उससे भी ऊपर
है। चौथा जनलोक और पाँचवाँ तपःलोक है। छठवाँ सत्यलोक है जहाँ सत्यानुगामी
पहुँचते हैं। सातवाँ ज्ञानलोक है। ये सब बिना ही विरचित सातों ही लोक शम्भू या
स्वयम्भू सम्भव हुए हैं।
तदूर्ध्वं मेरुराख्यात एकविंशदिवाधिपः₂₁।
ब्रह्माण्डमध्ये मेरुर्वै त्रैलोक्यस्तम्भकः स्मृतः ॥ ६ ॥
निर्गन्थाः कल्पदेव्यः परिचिता देवतात्मकाः ।
प्रद्योतकं समस्तं तज्जगदाल्हादकारकम् ॥ ७ ॥
उसके ऊपर इक्कीस स्वर्गों का अधिपति मेरु विख्यात है जो एक प्रकाश के
ब्रह्माण्ड का मध्य स्तम्भ मेरु होकर तीनों ही लोकों का स्तम्भ माना जाता है। वह
निर्गन्था कल्पदेव परिचित देवात्मा होकर प्रभविष्णुमय है और समस्त जगत को
आनन्द देने वाला है।
स्वर्गे चाग्रिः ? ( चाग्र ) स्थिता देवास्तेषां पृथ्व्युद्भवाः ।
सप्त चिन्तात्मका लोकाः संसारहितकाम्यया ॥ ८ ॥
स्वर्ग में आगे जो देव हैं, उनमें जो देव पृथ्वी पर उत्पन्न हुए हैं, उनके सात
चिन्तात्मक लोक हैं जो संसार के हित की कामना करने के लिए हैं।
स्वर्गतो यो भवेद्वातस्तदूर्ध्वं सप्तमालिकाः ।
एकैकास्तेजोरूपाढ्याः स्वर्ग ? ( सूर्य ) कोटिसमुद्भवाः ( समप्रभाः ) ॥ ९ ॥
इन स्वर्गों के ऊपर भी सात मालिकाएँ हैं जिनमें एक से एक बढ़कर तेजोमय
हैं और करोड़ों सूर्यों की प्रभा से युक्त हैं।
प्रथमा काञ्चनसमा ह्यान्या स्फटिकनिर्मला ।
तृतीया त्विन्द्रनीला च वैडूर्य्या च चतुर्थिका ॥ १० ॥
पञ्चमी पद्मरागा च षष्ठी वै वज्रका मता।
सप्तमी सर्वरत्नाढ्या ब्रह्मातेजस्तदूर्ध्वके ॥ ११ ॥
इनमें पहली मालिका स्वर्ग की-सी चमक से युक्त है। दूसरी स्फटिक जैसी
निर्मल है। तीसरी इन्द्रनीलमणि के समान कान्तिवाली है। चौथी वैदूर्यमणि के
समान, पाँचवीं पद्मरागमणि के समान, छठी हीरे के समान और सातवीं समस्त रत्नों
की चमक से युक्त है। इनसे ऊपर ब्रह्मतेज है।

सूत्र-५ 27 .
तेजसोऽम्भोभवो ज्योतिः संसारसृष्टिकारणम् ?।
तदुद्भवं समं चेदं जगत्स्थापरजङ्गमम् ॥ 12 ॥
तेज-अग्नि से ही जल हुआ। इस प्रकार यह ज्योतिष्मय तेज ही संसार की सृष्टि
का कारण हुआ जिससे यह सारा स्थावर-जङ्गम जगत् हुआ।
त्रैलोक्यप्रभवं ज्योतिर्जगदाल्हादकारकम्।
धर्मार्थकाममोक्षाणां सम्भवा ज्योतिषस्तथा ॥ 13 ॥
तीनों लोकों को बनाने वाली यह ज्योति जगत को आनन्द प्रदान करने वाली है
और इसी ज्योति से धर्म-अर्थ-काम और मोक्ष के चारों पदार्थ उत्पन्न हुए हैं।
तेजो ज्ञानोद्भवं ज्योतिः कोटिसूर्यसमप्रभम्।
तदुद्भवं महारूपं संसारमोक्षसौख्यदम् ॥ 14 ॥
तेज से ही ज्ञान रूप ज्योति उत्पन्न हुई जो करोड़ों सूर्यों की प्रभा के समान
प्रकाशमान हैं। इस ज्योति से ही यह महारूप विशाल संसार उत्पन्न हुआ जो मोक्ष-
सुख का देने वाला है।
कालागिरवि सम्भूतं रुद्ररूपं महाभयम् ? ।
रुद्रत्वं ? कलते काल महाकालो मुहुर्मुहुः ॥ 15 ॥
इसी से कालाग्नि के समान महाभय कारक रुद्ररूप उत्पन्न हुआ। यही रुद्रतत्त्व
क्षण-क्षण करके काल की रचना करते हुए महाकाल सिद्ध हुआ।
ज्योतीरूपं भवेद् व्योम्नि कल्पाग्निज्योतिसद्भवम् (रुद्भवम ? )।
व्योम्नि सद्योजातमूर्तिः शक्तिः स्याज्ज्योतिसद्भवा ॥ 16 ॥
व्योम आकाश में यह ज्योति स्वरूप ही कल्पाग्नि ज्योति को भी उत्पन्न करता
है जिससे ही सद्योजात मूर्ति शिव-शक्ति आकाश में उत्पन्न हुई है।
शिवशक्तिसमायुक्तमुद्भवैद्रुद्ररूपकम्।
शाम्भो रुद्रोद्भवः प्रोक्तो ब्रह्मविष्णु तदुद्भवौ ॥ 17 ॥
इसी शिव-शक्ति से मिलकर शिव का रुद्र रूप समुद्भव हुआ। इस प्रकार शाम्भू
रुद्र से उत्पन्न हुए और कहा जाता है कि ब्रह्मा व विष्णु भी इसी रुद्र से हुए।
ततः शाम्भूद्भवा सृष्टिर्जगत् स्थावरजङ्गमम्।
देवासुरमनुष्याश्च पशुपक्षिशरीरिणः ॥ 18 ॥
इनसे यह सारी स्थावर, जङ्गम सृष्टि उत्पन्न हुई जिनमें देव, असुर, मनुष्य,
पशु-पक्षी आदि शरीरधारी हुए।

28 अपराजितपृच्छा
शम्भोर्मनोभवा रम्या परब्रह्मात्मचेतसः ।
तदुद्भवा ततः सृष्टिः पञ्चतत्त्वयुता परम् ॥ 19 ॥
शम्भू की मानसी सुन्दर रचना में परब्रह्मचित्त उत्पन्न हुआ। उससे ही यह परम
पञ्चतत्त्वों से युक्त सृष्टि उत्पन्न हुई।
हरचित्तोद्भवाद् भव्यो ? नाम ? ( भव्यस्तथा ) विश्वाधिपो हरिः ।
ततस्तदुद्भवा सृष्टिस्त्रैलोक्ये सचराचरे ॥ 20 ॥
हर-शिव के चित्त से ही विश्व के स्वामी हरि-विष्णु उत्पन्न हुए। इसके ही
पश्चात् इनसे ही चराचरयुक्त यह त्रैलोक्य सृष्टि हुई।
तदुद्भवं रजः सत्त्वं तमश्चापि तृतीयकम् ।
तत्र सृष्टिरनेकाऽभूज्जनसन्तानकारिणी ॥ 21 ॥
इससे ही सतोगुणी, रजोगुणी, तमोगुणी रचना हुई जिससे अनेक जीवों की
सन्तानकारिणी अनेकों सृष्टियाँ उत्पन्न हुईं।
रजो ब्रह्मा तमो विष्णुः सत्त्वं चैव महेश्वरः ।
ते चक्रयोद्भवं सत्त्वं सृष्टिसंसारसम्भवम् ॥ 22 ॥
रजोगुण से ब्रह्मा, तमोगुण से विष्णु और सतोगुण से महेश्वर उत्पन्न हुए। इन
तीनों के चक्र से ही सत्व रूपा यह सांसारिक सृष्टि सम्भव हुई है।
रजसो रचना ख्यातिः संसारसृष्टिकोद्भवा ।
चतुरशीतिलक्षाणि जीवयोनिरनेकंशः ॥ 23 ॥
रजोगुण से रचना विख्यात है जिससे यह संसार रूपी सृष्टि हुई। इसमें चौरासी
लाख संख्या में विविध योनियों के जीवों की सृष्टि अनेकों प्रकार की हुई।
तमसस्तामसी शक्तिस्तमसा तेजोवर्द्धिनी ।
माया मोहमयी कामं वैष्णवी मोहनाशिनी ॥ 24 ॥
तमोगुण से तामसी शक्ति उत्पन्न हुई और तमस से तेज को बढ़ाने वाली
मोहमयी माया उत्पन्न हुई जिससे कामनाएँ बढ़ती हैं और तेज तमस से ही वैष्णवी
शक्ति उत्पन्न होती है जो मोह का नाश करने में सक्षम है।
सत्त्वशान्तिकशक्तिश्च सत्यज्ञानाद्ब्रह्मात्मजा ।
संसारपापमुक्तानां मोक्षार्थ सत्त्वशान्तिकी ॥ 25 ॥
सत्वगुण से शान्तगुण वाली शक्ति का उद्भव हुआ और सत्व की ज्ञान और
ब्रह्म को उत्पन्न करने व संसार के पापों से मुक्त हुए जीवों को मोक्ष प्राप्ति के लिए

सूत्र-६ 29
शान्ति प्रदान करने वाली शक्ति होती है।
इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्त श्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां
सप्तोर्ध्वलोकाधिकारो नाम पञ्चमं सूत्रम् ॥ ५ ॥
इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में सप्त
ऊर्ध्वलोक अधिकार नामक पाँचवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ५ ॥
अष्टशक्त्युद्भवो नाम षष्ठं सूत्रम् ॥ ६ ॥
अपराजित उवाच -
उत्पत्ति कथ्यतां सर्वा देवानां च नृणां तथा।
दैत्यरक्षोऽसुराणां च पशुपक्षिशरीरिणाम् ॥ १ ॥
के ते ब्रह्मसमुद्भूताः के ते विष्णुसमुद्भवाः।
कस्माद्देवाच्च के जाताः संसारे रूपधारिणः ॥ २ ॥
अपराजित बोले – आपने सभी देवों, मनुष्यों तथा दैत्यों, राक्षसों और असुरों
और पशु-पक्षी देहधारी जीवों के विषय में उनकी उत्पत्ति का वर्णन तो किया,
परन्तु कितने जीव ब्रह्मा से उत्पन्न हुए, कितने जीव विष्णु से उत्पन्न हुए तथा किस
प्रकार किस देव से कौन-कौन उत्पन्न हुए और इस संसार में रूप धारण कर सके ?
विश्वकर्मोवाच –
ब्रह्मणो हृदयाज्जातः काश्यपो मुनिपुङ्गवः ।
कश्यपप्रभवा सृष्टिस्त्रैलोक्योदयशालिनी ॥ ३ ॥
कश्यपस्य परा ह्यष्टावादित्याद्याश्च शक्तयः ।
जनन्यो जगतस्ताभ्यः संसारसृष्टिकोद्भवः ॥ ४ ॥
विश्वकर्मा बोले – ब्रह्मा के हृदय से मुनिपुङ्ग, मुनियों में राजा काश्यप मुनि
उत्पन्न हुए। इन कश्यप से ही तीनों लोकों को बढ़ाने वाली सृष्टि का प्रादुर्भाव हुआ।
कश्यप की पत्नी अदिति से निरन्तर आठ पराशक्तियाँ ही इस जगत की जननियाँ हैं
और इनसे ही संसार की समस्त सृष्टि उद्भूत हुई है।¹

  1. विष्णुपुराण में दक्ष कन्याओं, कश्यप की स्त्रियों के नाम क्रमशः अदिति, दिति, दनु, अरिष्टा, सुरसा,
    खसा, सुरभि, विनता, ताम्रा, क्रोधवशा, इरा, कद्रु और मुनि आए हैं— कश्यपस्य तु भार्या यास्तासां
    नामानि मे शृणु। अदितिर्दितिर्दनुश्चैवारिष्टा च सुरसा खसा॥ सुरभिर्विनता चैव ताम्रा क्रोधवशा इरा।
    कद्रुर्मुनिश्छ धर्मज्ञ तदपत्यानि मे शृणु॥ (विष्णु. 1, 15, 124-125) इसी पुराण के पहले अंश के 21वें
    अध्याय में इनकी सन्तानों का भी वर्णन उपलब्ध होता है।

30 अपराजितपृच्छा
अथाष्टशक्तिनामावलिः —
दित्यासूर्यौ च गन्धर्वी यक्षी विद्याधरी तथा।
नरेन्द्री नागराजेन्द्री ह्यदितिश्चाष्टमी मता ॥ 5 ॥
इन आठों के नाम क्रमशः (1.) दिति, (2.) आसूर्या, (3.) गन्धर्वी, (4.)
यक्षी, (5.) विद्याधरी, (6.) नरेन्द्री, (7.) नागराजेन्द्री और (8.) अदिति है।
तस्यवंशाः —
दित्या दैत्याश्च सम्भूता आसुर्या असुरास्तथा।
गन्धर्व्याश्चैव गन्धर्वा यक्ष्या यक्षास्तथा स्मृताः ॥ 6 ॥
विद्याधर्या विद्याधरास्तथाऽऽदित्याश्च देवताः।
जाता नागाश्च नागेन्द्रा नागेन्द्रो वासुकी मतः ॥ 7 ॥
( नागेन्द्राश्च विहङ्गाश्च नागराजेन्द्रिकोद्भवाः )
दिति से दैत्य उत्पन्न हुए, आसुर्या से असुर, गान्धर्वी से गान्धर्व, यक्ष्या से यक्ष,
विद्याधरी से विद्याधर, अदिति से देवता, नागेन्द्री से नाग एवं नागेन्द्रवासुकी नागेन्द्र
और विहङ्ग पक्षीगण नागराजेन्द्री से उत्पन्न हुए।
नरेन्द्याश्च नरा जाता विप्रशूद्रानुमर्तिः।
अष्टादश₁₈ प्रकृतीनां कुलीनानामनेकंशः ॥ 8 ॥
नरेन्द्री से समस्त नर उत्पन्न हुए जो विप्र से लेकर शूद्र के मार्गानुसार हुए। इन
अठारह प्रकृतियों के अनेकों कुलीन नाम है।
दैत्यानां नवभेदाः₉ स्युः पञ्च₅ भेदास्तथासुराः।
चतुर्भेदाश्च₄ गन्धर्वांस्त्रिभेदा₃ यक्षकाः स्मृताः ॥ 9 ॥
विद्याधराः पञ्चभेदा₅ वैदेवीं च गुरोत्तमा ?।
दैत्यों के नौ भेद है तथा असुरों के पाँच भेद है। गन्धर्वों के चार, यक्षों के तीन
और विद्याधरों के पाँच भेद कहे गए हैं।
द्विधाश्च नागराजेन्द्रा नरेन्द्राणामनेकधा ?( नरेन्द्रास्तु ह्यनेकधा ) ॥ 10 ॥
शशाङ्कश्च तथा सूर्यस्ताभ्यां नृपकुलोदयः।
विश्वेदेवाश्च वस्वाद्याः सन्ति विश्वासमुद्भवाः ॥ 11 ॥
इसी प्रकार नागराजेन्द्रों के दो भेद है और नरेन्द्रों के अनेकों प्रकार के भेद हैं।
शशाङ्क-चन्द्रमा से और सूर्य से कई नृपकुलों (चन्द्र और सूर्यवंश) का उदय हुआ।
विश्वा से वसु आदि विश्वेदेवा उत्पन्न हुए।

सूत्र-६
देवानामाङ्गिराणां च मातृणां च तथापरम्।
दैत्यादिषु च सर्वेषु पूजिताश्च तदन्वये ॥ 12 ॥
देवों में अङ्गिरागणों में एवं उनके बाद मातृगणों में, दैत्यों आदि के भी सभी
वंश पूज्य है।
असुरो दानवो दैत्यः शुक्नो राहुश्च पञ्चमः।
गन्धर्व्याश्चैव चत्वारस्तौर्यत्रिकप्रकाशकाः ॥ 13 ॥
असुर, दानव, दैत्य तथा शुक्र और पाँचवाँ राहु गन्धर्वों के चार-चार त्रिक्
प्रकाशकों के हैं।
कुबेरः कङ्कतो यक्षो यक्ष्या जातास्त्रयः₃ किल।
समस्ता दैत्यपालानां दैत्या भक्तवशानुगाः ॥ 14 ॥
तुम्बुरुर्नारदश्चैव नटेशः कात्यकोद्भवः।
आसुर्याश्च समुत्पन्नाः पञ्चैते₅ सुरसम्भ्रमाः ॥ 15 ॥
कुबेर, कङ्कत, यक्ष ये तीनों सभी यक्ष्या से उत्पन्न हुए तथा सभी दैत्यपालगण
दैत्या के भक्त व अनुचर हैं। तुम्बरु, नारद और नटेश कात्यका से उत्पन्न हुए।
आसुर्या से ये पाँचों देवों को भ्रमित करने वाले उत्पन्न हुए।
मन्मथः पौरुषं लोभो मोहः क्रोधश्च पञ्चमः।
विद्याधरीसमुत्पन्नाः पञ्चैते वीरविक्रमाः ॥ 16 ॥
भैरवः क्षेत्रपालश्च गणो वै दूतसम्भवः।
वैदेवीजाश्च चत्वारः सदा पूज्याश्च मानुषैः ॥ 17 ॥
मन्मथ या कामदेव, पौरुष-कटुवचन, लोभ, मोह और पाँचवाँ क्रोध तथा
विद्याधरी से पाँच वीर विक्रम उत्पन्न हुए। भैरव, क्षेत्रपाल व गण दूत से उत्पन्न हुए
और वैदेवी से उत्पन्न होने वाले चारों सदा मनुष्यों के द्वारा पूज्य माने जाते हैं।
उत्पन्ना नागराजेन्द्रया वासुक्याद्या उरङ्गमाः( विहङ्गाः पन्नगास्तथा ) ।
वासुकी पन्नगः प्रोक्तो विहङ्गा विनतात्मजाः ॥ 18 ॥
नागराजेन्द्री से वासुकी आदि सर्प और पक्षिगण और नाग उत्पन्न हुए। वासुकी
नाग को गरुड़ादि पक्षियों को विनता से उत्पन्न कहा गया है।
नरेन्द्रीभ्यः समुत्पन्ना विख्याता वै नरोत्तमाः।
तदनुक्रमयुक्ती च कथयामि समासतः ॥ 19 ॥
अब नरेन्द्री से उत्पन्न होने वाले विख्यात नरोत्तमों के बारे में समास रूप से
अनुक्रमपूर्वक कहता हूँ।

32 अपराजितपृच्छा
विप्रक्षत्रियवैश्यशूद्राणां गोत्रसंख्याः -
प्रथमो ब्राह्मणो जातः क्षत्रियस्तु द्वितीयकः ।
वैश्यो जातस्तृतीयो वै शूद्रश्चैव चतुर्थकः ॥ 20 ॥
अष्टाशीति सहस्राणि विप्रगोत्राणि वै विदुः ।
षट्त्रिंशच्च क्षत्रियाणां कुलीनानां तथैव च ॥ 21 ॥
चतुर्विंशति वैश्यानां शूद्राणां नैकधा तथा।
पहले ब्राह्मण, दूसरे क्षत्रिय, तीसरे वैश्य और चौथे शूद्र उत्पन्न हुए। विद्वानों ने
अस्सी हजार गोत्र ब्राह्मणों के माने हैं। क्षत्रियों के छत्तीस हजार और वैसे ही
कुलीनों के कहे गए हैं। वैश्यों के चौबीस हजार और शूद्रों के तो अनेक प्रकार के
गोत्र माने गए हैं।
एते वंशाः समाख्याता यथाकल्पं भवन्ति ते ॥ 22 ॥
कल्पान्ते च विशीर्यन्ते ?( विनश्यन्ति ) सर्वे रूपसमुद्भवाः ।
समुद्भवन्ति ते सर्वे कल्पादौ च पुनः पुनः ॥ 23 ॥
इस तरह ये इतने अपने-अपने कर्म के अनुसार कल्पित वंश हुए जो विख्यात
हैं। ये सभी कल्प के अन्त में नाश को प्राप्त होंगे और सभी नाम रूप मिट जाएँगे।
इसी प्रकार ये सब कल्प के आरम्भावसर पर बारम्बार उद्भव को प्राप्त होते रहते हैं।
इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छा-
यामष्टशक्त्युद्भवाधिकारो नाम षष्ठं सूत्रम् ॥ 6 ॥
इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में अष्ट शक्ति
उद्भव अधिकार नामक छठवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 6 ॥
सृष्टिसंसारावतारणं सप्तमं सूत्रम् ॥ 7 ॥
अपराजित उवाच -
मूर्धजास्तृणधान्यानि वृक्षाश्चैवमनेकधाः ।
तदुत्पत्तिः कथं नाम( थ ) पशुपक्षिशरीरिणाम् ॥ 1 ॥
कृमिकीटपतङ्गाश्च ये च जीवानुरूपकाः ।
कथयस्व प्रसादेन संसारे सृष्टिसम्भवः ॥ 2 ॥
अपराजित ने पूछा- तृण और धान्यों में मुख्य-मुख्य तथा वृक्षों के भी अनेक
प्रकार और पशु-पक्षी शरीरधारी जीवों की उत्पत्ति कैसे हुई? हे नाथ! यह कहें।

सूत्र-७ 33
इसी तरह कृमि, कीट-पतङ्गादि जो ये जीव अनुरूप संसार की सृष्टि में उत्पन्न हुए
हैं, उनके बारे में भी आप कृपा करके अवश्य कहें।
विश्वकर्मोवाच -
काश्यपस्य हृदुत्पन्ना मानस्यः पञ्च कन्यकाः ।
तदुत्पन्ना च या सृष्टिः कथये तां च साम्प्रतम् ॥ ३॥
अश्वी गजी नखी चैव शृङ्गी शुकी तु पञ्चमी ।
पृथगेकैकसम्भूतिं कथयामि यथाश्रुतम् ॥ ४॥
विश्वकर्मा बोले - कश्यप मुनि के हृदय से पाँच मानसी कन्याएँ उत्पन्न हुईं
जिनके द्वारा जो सृष्टि उत्पन्न हुई, उसके बारे में अब मैं तुम्हें कहता हूँ। इनमें अश्वी,
गजी, नखी, शृङ्गी तथा शुकी पाँचवीं कन्या है। इसमें से प्रत्येक के पृथक-पृथक
जीव जैसे उत्पन्न हुए, उनके विषय में जैसा मैंने सुना, उन्हें यथावत कहता हूँ।
वृक्षा श्चैवाम्बुकी जाता आम्बुकाः पञ्चमूर्धजाः ।
अम्बो जम्बूस्तथाऽश्वत्थो वटश्चोदुम्बरस्तथा ॥ ५॥
इसी प्रकार आम्बुकी से वृक्षों में पाँच मुख्य-मुख्य अम्बुक उत्पन्न हुए जो इस
प्रकार हैं- (1.) आम, (3.) जामुन, (3.) अश्वत्थ, (4.) वट और (5.) उदुम्बर।
आम्बकात् सरलोजास्तस्तस्यैव सप्तपुत्रिकाः ।
ताली चैव तदुद्भूताः तमालतालवृक्षकाः ॥ ६॥
धान्यकी च तृणी चैव व्याख्याताः सप्तपुत्रिकाः ।
शाली च व्यन्तरी चैव लता चैवौषधिस्तथा ॥ ७॥
आम्बका से सरल उत्पन्न हुआ जिसके सात पुत्रियाँ हुईं। ताली और उससे
उत्पन्न हुए तमाल और ताल वृक्ष, धान्यकी, तृणी, शाली, व्यन्तरी, लता और

  • औषधि।
    व्यन्तार्याश्च समुद्भूता व्यन्तराश्चैव "मूर्धजाः"?।
    लताश्चैव लतोद्भूताः शैलाद्यं भूतले यथा ॥ ८॥
    औषध्यश्चौषधीजाता लक्षाणि वै समुद्भवाः ।
    धान्यकी धान्यसम्भूतिः सङ्ख्याताष्टादशात्मिका₁₈ ॥ ९॥
    व्यन्तरी से मुख्य-मुख्य व्यन्तरा वृक्ष उत्पन्न हुए। इसी तरह लता से भी भूतल
    पर लता से उत्पन्न होने वाले शैलाद्य उत्पन्न हुए। औषधि से उत्पन्न लाखों औषधियाँ
    पैदा हुईं। धान्यकी से भी अठारह प्रकार की संख्या के धान्य उत्पन्न हुए।

34 अपराजितपृच्छा
तृण्यास्तृणानिजातानि चतुरशीतिः सङ्ख्यया ।
तृणानां दूर्विकादीनां समस्तानां ततो भवः ॥ 10 ॥
तृणी से चौरासी की संख्या के तृण उत्पन्न हुए। उन तृणों में समस्त प्रकार की
दूर्विका-दूब उनसे उत्पन्न हुई।
शृङ्गयाश्चैव प्रवक्ष्यामि मानसीः सप्तपुत्रिकाः ।
वृषी महिषी मेषी च ह्यजा मृगी च शम्बरी ॥ 11 ॥
गण्डकी सप्तमी जाता गण्डक्याश्चैकशृङ्गकाः ।
शम्बर्याः शम्बरा जाता मृग्या श्चैवं मृगा मताः ॥ 12 ॥
मेष्या मेषाः समुत्पन्नास्तथाजाया अजोद्भवः ।
वृष्या वृषाश्च सञ्जाता महिष्या महिषोद्भवः ॥ 13 ॥
शृङ्गी के भी सात मानसी पुत्रियाँ हुई जिनके विषय में अब कहता हूँ। उनमें
( 1.) वृषी, ( 2.) महिषी, ( 3.) मेषी, ( 4.) अजा, ( 5.) मृगी, ( 6.) शम्बरी और
( 7.) गण्डकी। गण्डकी से उत्पन्न होने वाले एक सींग वाले गेण्डे तथा शम्बरी से
शम्बर उत्पन्न हुए और मृगी से मृग उत्पन्न माने गए। मेषी से मेष-भेड़ें उत्पन्न हुईं
और अजा से बकरी उत्पन्न हुई। वृष्या से वृष-बैल उत्पन्न हुए और महिषी से
महिष-भैंसे हुए।
पुत्रिकाश्चैव शुक्यास्तु शतान्यष्टौ₁₀₈ द्विधाश्च₂ ताः ।
विहङ्गाश्च समस्तास्तु ह्यण्डजाः पक्षिणस्तथा ॥ 14 ॥
इसी प्रकार शुकी के एक सौ आठ पुत्रिकाएँ हुईं जो दो प्रकार की हैं। उनसे ही
सभी विहङ्ग और अण्डों से उत्पन्न होने वाले पक्षी उत्पन्न हुए।
एकैव च नखीजाता द्वात्रिंशच्च₃₂ तदात्मजाः ।
ग्रामारण्यव्योमचराः सङ्ख्याताश्च समस्तकाः ॥ 15 ॥
एक मात्र नखी के बत्तीस सन्तान हुईं उनमें ग्रामवासी, अरण्यवासी,
आकाशचारी आदि की समस्त संख्या आ जाती है।
गजा वराहाश्चैवं च एकान्वयसमुद्भवाः ।
कथिता चान्वयोद्भूतिरश्वीनां तु ह्यतः परम् ॥ 16 ॥
गज और वराह आदि दन्ति एक ही वंश से समुद्भूत हुए हैं। आगे मैं अश्वी के
एक ही वंश में उत्पन्न होने वाले जीवों के बारे में कहता हूँ।
अश्वः खरश्च पौराश्च गैरा म ( क )र्कटकादयः ।
अन्ये च श्वापदाः सर्वे ह्यश्वव्युत्पत्तिः प्रकीर्तिता ॥ 17 ॥

सूत्र-७ 35
अश्व, खर, पौर, गैर (गवय), मर्कट आदि अन्य श्वापद सभी अश्व से ही हुई
उत्पत्ति में कहे गए हैं।
तिस्रः पुत्र्यः समुत्पन्ना मानस्यः कश्यपस्य तु।
पद्मा चाम्भोभवी क्रौञ्चा तिस्रश्चैवं प्रकीर्तिताः ॥ 18 ॥
कश्यप से तिस्र पुत्रियों से उत्पन्न होने वाले मानस्य और पानी से पैदा होने
वाले पद्म, क्रौञ्च ये तिस्र ही कहे गए हैं।
अम्भोभव्या जलचराः पद्मायाः पद्मसम्भवः।
क्रौञ्चात्मजाश्च शैवालास्त्रिधा चैवं समुद्भवम् ॥ 19 ॥
अम्भोभव्या- पानी में उत्पन्न होने वाले सभी जलचर और पद्म-कमल तथा
कमल से उत्पन्न होने वाले, क्रौञ्च-सारस और तीन प्रकार के शैवाल जो पानी में
उत्पन्न होते हैं।
चतुर्वर्णाः प्रकृतयो ह्यन्त्यजा नीचकोद्भवाः।
भौमाः कीटपतङ्गाश्चोष्मजा उरगव्यन्तराः ॥ 20 ॥
भूम्युदकेषु सम्भूता विख्याता बीजतस्तथा।
भूमौ समुद्भवं चैवं सम्योगे वारिणां खलु ॥ 21 ॥
चारों वर्णों की प्रकृति प्रजा व निम्न योनि में जन्म लेने वाले अन्त्यज, भूमि में
पैदा होने वाले कीट-पतङ्ग जो गर्मी से उत्पन्न होते हैं तथा उरग-सर्पादि व्यन्तर
जीव, भूमि और पानी से उत्पन्न होने वाले विख्यात बीज जो भूमि में पानी के संयोग
से सभी उत्पन्न होते हैं।
उदके सर्वबीजानां सम्भूतिः सर्वतः स्मृता।
केचिदाकाश उत्पन्नाः केचित्पातालसम्भवाः ॥ 22 ॥
केचिद्द्भूम्युद्बवाश्चैव त्रिविधः₃ सृष्टिसम्भवः।
वर्षाकाले समुत्पत्तिर्हेमन्ते तु प्रवर्तनम् ॥ 23 ॥
प्रलयो ग्रीष्मसम्प्राप्तौ अजीर्णे ? पुनराव्रजेत्।
चतुरशीति₈₄ लक्षाणि जीवयोनिरनेकधा ॥ 24 ॥
जल से ही समस्त बीजों की उपज-निपज होती है, ऐसा सभी को ज्ञान है।
कितनी ही आकाश में उत्पन्न होने वाली तथा कितनी ही पाताल में उत्पन्न होने
वाली, कितनी ही भूमि में उत्पन्न होने वाली ऐसी तीन प्रकार की सृष्टि सम्भव होती
है जो वर्षाकाल में उत्पन्न होकर हेमन्त ऋतु में प्रवर्तित होती है जबकि ग्रीष्मकाल
के आने पर सूख जाती है परन्तु नष्टभूत नहीं होती और पुनः उत्पन्न हो सकती है।

36 अपराजितपृच्छा
इस प्रकार चौरासी लाख योनियाँ¹ हैं जो नाना प्रकार की होती है।
इति सूत्रसन्तागुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां-
सृष्टिसंसारावतारणाधिकारो नाम सप्तमं सूत्रम् ॥ 7 ॥
इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में सृष्टि
संसार अवतारण अधिकार नामक सातवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 7 ॥
सप्तपातालराज्योद्भवो नामाष्टमं सूत्रम् ॥ 8 ॥
अपराजित उवाच -
के च स्वर्गे कृता देवा के च पातालसम्भवाः ।
मर्त्यलोके च भूतानि कथयस्व परेश्वर ॥ 1 ॥
अपराजित बोले - स्वर्ग के कौन-कौन देवता है और पाताल में होने वाले
देव कौन-कौन हैं, इसी प्रकार हे परमेश्वर ! आप मुझे मर्त्यलोक में होने वाले
प्राणियों के बारे में भी उपदेश कीजिए।
विश्वकर्मोवाच -
तलो वितलस्सुतलो नितलश्च तलातलः ।
रसातलश्च पाताल उरगेशाश्च सप्त च ॥ 2 ॥
उरगोद्भवपाताले सप्तपातालविक्रमम् ।
पृथगेवं समुद्दिष्टा ? नवनागकुलानि च ॥ 3 ॥
विश्वकर्मा बोले - तल, वितल, सुतल, नितल, तलातल, रसातल व पाताल-
ये सात सर्पराजाओं के, उरगेशों के लोक हैं। इन उरगों-सर्पों के पातालों में सातों
पाताल बड़े ऐश्वर्यवाले है। इनसे अलग नौ नागकुलों को बताया गया है।
नवकुलनागराजनामावली -
पद्मः कर्कोटकश्चैव पुण्डरीकोऽथ तक्षकः ।

  1. गरुडपुराण में आया है- चतुरशीतिलक्षाणि चतुर्भेदाश्च जन्तवः । अण्डजाः स्वेदजाश्चैव उद्भिजाश्च
    जरायुजाः ॥ एकविंशति लक्षाणि ह्यण्डजाः परिकीर्तिताः । स्वेदजाश्च तथैवोक्ता उद्भिजास्तत् प्रमाणतः ॥
    जरायुजाश्च तावन्तो मनुष्याद्याश्च जन्तवः । सर्वेषामेव जन्तूनां मनुषत्वं सुदुर्लभम्। (प्रेतकल्पोक्त धर्मप्रकटन
    नामक द्वितीय अध्याय)
    बृहद्विष्णुपुराणे - जलजा नवलक्षाणि स्थावरा लक्षविंशतिः । कृमयो रुद्रसङ्ख्याकाः पक्षिणां दशलक्षकम् ॥
    त्रिंशल्लक्षाणि पशवश्चतुर्लक्षाणि मानुषां । सर्वयोनिं परित्यज्य ब्रह्मयोनिं ततोऽभ्यगात् ॥ (शब्दकल्पद्रुम चतुर्थ

सूत्र-८ 37
अनन्तः शङ्खचूडश्च वासुकिः सप्तमो मतः ॥ ४ ॥
सप्तपाताललोकेशो महावीर्या मदोत्कटाः ।
रौद्राश्च विद्रुताः सर्वे ह्यमात्या वीरविक्रमाः ॥ ५ ॥
ये नौकुली नाग हैं- (1.) पद्म, (2.) कर्कोटक, (3.) पुण्डरीक, (4.)
तक्षक, (5.) अनन्त, (6.) शङ्खचूड़, (7.) वासुकी। ये सभी सप्त पातालों के बड़े
बलवान, मदोन्मत्त अधिपति, लोकेश हैं। ये बड़े भयङ्कर रौद्ररूप व शीघ्रगामी तथा
सभी आमात्य वीर और पराक्रमी होते हैं।
तलेषु पद्मकॊ राजा वितले च कर्कोटकः ।
सुतले पुण्डरीकाक्षो नितले चैव तक्षकः ॥ ६ ॥
तलातले त्वनन्तश्च शङ्खचूडो रसातल ।
वासुकिर्नागराजेन्द्रः पाताले सर्वतोऽधिपः ॥ ७ ॥
इनमें से तल नामक पाताल के राजा पद्मक हैं, वितल के कर्कोटक, सुतल के
पुण्डरीकाक्ष और नितल के राजा तक्षक है। तलातल के राजा अनन्त, रसातल के
शङ्खचूड़ और इन सब पर वासुकी नागराजेन्द्र समस्त पातालों के महाराजा है।
कुलानि नव₉ प्रत्येकं त्रिषष्टि₆₃ कुलपन्नगाः ।
सप्त₇ पाताललोकेशोः संस्थिताः क्रमयोगतः ॥ ८ ॥
इन सातों में प्रत्येक के नौ-नौ कुल है और इस प्रकार ये सभी सात गुणा नौ
मिलाकर कुल तिरसठ प्रकार के नाग उक्त सातों पातालों के लोकेश के रूप में
क्रमशः संस्थित हैं।
पद्मेशराज्यवासिनामाह —
यत्पद्मेशस्य वै राज्यमाद्यपातालसञ्जितम् ।
तत्रामर्त्यनिवासाश्च चन्द्रकान्तिसमा भुवः ॥ ९ ॥
दिव्यरूपधराः सर्वे दिव्याभरणभूषिताः ।
स्वेच्छारूपं स्त्रीनराणां स्वेच्छागम्यास्तदात्मजाः ॥ १० ॥
जो पद्मेश नाग का राज्य है, उसे आदिपाताल नाम से कहा गया है। वहाँ के
रहने वाले मर्त्य लोग चन्द्रकान्ति वाले अर्थात् गौरवर्ण होते हैं। वे सभी दिव्य कान्ति
वाले रूपयुक्त और दिव्य वस्त्राभरणों को धारण किए सुशोभित होते हैं। इन सब की
यह विशेषता भी है कि ये सब नर-नारी अपनी इच्छा के अनुसार रूप धारण करने
वाले (इच्छाधारी) होते हैं और उनकी सन्तानें भी मनैच्छित ढंग से, स्वच्छन्द रूप
से कहीं भी आ-जा सकती हैं अर्थात निरङ्कुश हैं।