अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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इनके नाम हैं— (1.) मेरु, (2.) मन्दर, (3.) गन्धमादन, (4.) हिमालय,
(5.) हेमकूट, (6.) निषध, (7.) नील, (8.) श्वेत, (9.) शृङ्गवान एवं (10.)
कुलाचल।
तदाश्रित्य वना ख्याता वनोपवनकाननाः ॥ 28 ॥
माहेन्द्रो मलयश्चैव सह्यो विन्ध्यस्तथैव च।
हेमन्तः पारिजातश्च श्रीशैलश्च तथाऽर्बुदः ॥ 29 ॥
उदयाद्रिस्त्रिकूटश्च द्वीपशैलो विन्ध्याजलः।
मैनाको भूपरीषश्च कङ्कः प्रान्तकोद्भवः ॥ 30 ॥
इन पहाड़ों के आश्रित जो वन, उपवन व कानन हैं, उनके नाम हैं — (1.)
माहेन्द्र, (2.) मलय, (3.) सह्य, (4.) विन्ध्य, (5.) हेमन्त, (6.) पारिजात, (7.)
श्रीशैल, (8.) आबू, (9.) उदियाद्रि, (10.) त्रिकूट, (11.) द्वीपशैल व (12.)
विन्ध्याजल। मैनाक इस भूभाग पर परिखा की भाँति कङ्क से प्रान्त तक रचित है।
एते शम्भूद्भवाः सृष्ट्यां कुलशैलाश्च चलाः स्थिराः।
विष्णुऽरचिता ह्येते संस्थिताः कुलशैलकाः ॥ 31 ॥
क्वचित्पर्वतरम्या च क्वचित्सागरशोभिता।
क्वचित्सरिद्द्रुमै रम्या तडागैः शोभिता क्वचित् ॥ 32 ॥
ये सब शम्भु के द्वारा रचित सृष्टि के कुलपर्वत, अचल व चल शैल है। विष्णु
के द्वारा रचित शैलादि भी इतने ही हैं। (इस सृष्टि में) कहीं सुन्दर रम्य पर्वत हैं तो
कहीं सुन्दर रम्य सागर हैं। कहीं सरिताओं के किनारे रम्य द्रुमों की पङ्क्तियाँ हैं तो
कहीं सुन्दर तड़ागों की शोभा हो रही है।
एवं मही महारम्या शम्या शस्यैः संशोभिता क्वचित्।
मुख्यैः काञ्चनपुष्पैश्च रम्यासुरनरोरगैः ॥ 33 ॥
इस प्रकार यह पृथ्वी बहुत ही रमणीय सौन्दर्य से युक्त है जिसमें शम्या
शान्तिदायक सभी प्रकार के धान्य कहीं-कहीं सुशोभित हो रहे हैं। यहाँ कहीं पर
कई मुख्य-मुख्य प्रकार के काञ्चन के समान सुन्दर पुष्प पाए जाते हैं जो सुर, नर
और नागों को भी बड़े सुन्दर और प्यारे लगते हैं।
रचिता विरचिताख्या योजनैः कलितोन्नतिः।
यथोक्तेन प्रमाणेन द्वीपशैलार्णवादिकम् ॥ 34 ॥
इस प्रकार की योजनों तक के विस्तार में रचित कलित विरचित यथोक्त
प्रमाणानुसार बनी द्वीप, शैल, अर्णव-सागरादिक यहाँ हैं।