अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-६
देवानामाङ्गिराणां च मातृणां च तथापरम्।
दैत्यादिषु च सर्वेषु पूजिताश्च तदन्वये ॥ 12 ॥
देवों में अङ्गिरागणों में एवं उनके बाद मातृगणों में, दैत्यों आदि के भी सभी
वंश पूज्य है।
असुरो दानवो दैत्यः शुक्नो राहुश्च पञ्चमः।
गन्धर्व्याश्चैव चत्वारस्तौर्यत्रिकप्रकाशकाः ॥ 13 ॥
असुर, दानव, दैत्य तथा शुक्र और पाँचवाँ राहु गन्धर्वों के चार-चार त्रिक्
प्रकाशकों के हैं।
कुबेरः कङ्कतो यक्षो यक्ष्या जातास्त्रयः₃ किल।
समस्ता दैत्यपालानां दैत्या भक्तवशानुगाः ॥ 14 ॥
तुम्बुरुर्नारदश्चैव नटेशः कात्यकोद्भवः।
आसुर्याश्च समुत्पन्नाः पञ्चैते₅ सुरसम्भ्रमाः ॥ 15 ॥
कुबेर, कङ्कत, यक्ष ये तीनों सभी यक्ष्या से उत्पन्न हुए तथा सभी दैत्यपालगण
दैत्या के भक्त व अनुचर हैं। तुम्बरु, नारद और नटेश कात्यका से उत्पन्न हुए।
आसुर्या से ये पाँचों देवों को भ्रमित करने वाले उत्पन्न हुए।
मन्मथः पौरुषं लोभो मोहः क्रोधश्च पञ्चमः।
विद्याधरीसमुत्पन्नाः पञ्चैते वीरविक्रमाः ॥ 16 ॥
भैरवः क्षेत्रपालश्च गणो वै दूतसम्भवः।
वैदेवीजाश्च चत्वारः सदा पूज्याश्च मानुषैः ॥ 17 ॥
मन्मथ या कामदेव, पौरुष-कटुवचन, लोभ, मोह और पाँचवाँ क्रोध तथा
विद्याधरी से पाँच वीर विक्रम उत्पन्न हुए। भैरव, क्षेत्रपाल व गण दूत से उत्पन्न हुए
और वैदेवी से उत्पन्न होने वाले चारों सदा मनुष्यों के द्वारा पूज्य माने जाते हैं।
उत्पन्ना नागराजेन्द्रया वासुक्याद्या उरङ्गमाः( विहङ्गाः पन्नगास्तथा ) ।
वासुकी पन्नगः प्रोक्तो विहङ्गा विनतात्मजाः ॥ 18 ॥
नागराजेन्द्री से वासुकी आदि सर्प और पक्षिगण और नाग उत्पन्न हुए। वासुकी
नाग को गरुड़ादि पक्षियों को विनता से उत्पन्न कहा गया है।
नरेन्द्रीभ्यः समुत्पन्ना विख्याता वै नरोत्तमाः।
तदनुक्रमयुक्ती च कथयामि समासतः ॥ 19 ॥
अब नरेन्द्री से उत्पन्न होने वाले विख्यात नरोत्तमों के बारे में समास रूप से
अनुक्रमपूर्वक कहता हूँ।