अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें30 अपराजितपृच्छा
अथाष्टशक्तिनामावलिः —
दित्यासूर्यौ च गन्धर्वी यक्षी विद्याधरी तथा।
नरेन्द्री नागराजेन्द्री ह्यदितिश्चाष्टमी मता ॥ 5 ॥
इन आठों के नाम क्रमशः (1.) दिति, (2.) आसूर्या, (3.) गन्धर्वी, (4.)
यक्षी, (5.) विद्याधरी, (6.) नरेन्द्री, (7.) नागराजेन्द्री और (8.) अदिति है।
तस्यवंशाः —
दित्या दैत्याश्च सम्भूता आसुर्या असुरास्तथा।
गन्धर्व्याश्चैव गन्धर्वा यक्ष्या यक्षास्तथा स्मृताः ॥ 6 ॥
विद्याधर्या विद्याधरास्तथाऽऽदित्याश्च देवताः।
जाता नागाश्च नागेन्द्रा नागेन्द्रो वासुकी मतः ॥ 7 ॥
( नागेन्द्राश्च विहङ्गाश्च नागराजेन्द्रिकोद्भवाः )
दिति से दैत्य उत्पन्न हुए, आसुर्या से असुर, गान्धर्वी से गान्धर्व, यक्ष्या से यक्ष,
विद्याधरी से विद्याधर, अदिति से देवता, नागेन्द्री से नाग एवं नागेन्द्रवासुकी नागेन्द्र
और विहङ्ग पक्षीगण नागराजेन्द्री से उत्पन्न हुए।
नरेन्द्याश्च नरा जाता विप्रशूद्रानुमर्तिः।
अष्टादश₁₈ प्रकृतीनां कुलीनानामनेकंशः ॥ 8 ॥
नरेन्द्री से समस्त नर उत्पन्न हुए जो विप्र से लेकर शूद्र के मार्गानुसार हुए। इन
अठारह प्रकृतियों के अनेकों कुलीन नाम है।
दैत्यानां नवभेदाः₉ स्युः पञ्च₅ भेदास्तथासुराः।
चतुर्भेदाश्च₄ गन्धर्वांस्त्रिभेदा₃ यक्षकाः स्मृताः ॥ 9 ॥
विद्याधराः पञ्चभेदा₅ वैदेवीं च गुरोत्तमा ?।
दैत्यों के नौ भेद है तथा असुरों के पाँच भेद है। गन्धर्वों के चार, यक्षों के तीन
और विद्याधरों के पाँच भेद कहे गए हैं।
द्विधाश्च नागराजेन्द्रा नरेन्द्राणामनेकधा ?( नरेन्द्रास्तु ह्यनेकधा ) ॥ 10 ॥
शशाङ्कश्च तथा सूर्यस्ताभ्यां नृपकुलोदयः।
विश्वेदेवाश्च वस्वाद्याः सन्ति विश्वासमुद्भवाः ॥ 11 ॥
इसी प्रकार नागराजेन्द्रों के दो भेद है और नरेन्द्रों के अनेकों प्रकार के भेद हैं।
शशाङ्क-चन्द्रमा से और सूर्य से कई नृपकुलों (चन्द्र और सूर्यवंश) का उदय हुआ।
विश्वा से वसु आदि विश्वेदेवा उत्पन्न हुए।