अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें34 अपराजितपृच्छा
तृण्यास्तृणानिजातानि चतुरशीतिः सङ्ख्यया ।
तृणानां दूर्विकादीनां समस्तानां ततो भवः ॥ 10 ॥
तृणी से चौरासी की संख्या के तृण उत्पन्न हुए। उन तृणों में समस्त प्रकार की
दूर्विका-दूब उनसे उत्पन्न हुई।
शृङ्गयाश्चैव प्रवक्ष्यामि मानसीः सप्तपुत्रिकाः ।
वृषी महिषी मेषी च ह्यजा मृगी च शम्बरी ॥ 11 ॥
गण्डकी सप्तमी जाता गण्डक्याश्चैकशृङ्गकाः ।
शम्बर्याः शम्बरा जाता मृग्या श्चैवं मृगा मताः ॥ 12 ॥
मेष्या मेषाः समुत्पन्नास्तथाजाया अजोद्भवः ।
वृष्या वृषाश्च सञ्जाता महिष्या महिषोद्भवः ॥ 13 ॥
शृङ्गी के भी सात मानसी पुत्रियाँ हुई जिनके विषय में अब कहता हूँ। उनमें
( 1.) वृषी, ( 2.) महिषी, ( 3.) मेषी, ( 4.) अजा, ( 5.) मृगी, ( 6.) शम्बरी और
( 7.) गण्डकी। गण्डकी से उत्पन्न होने वाले एक सींग वाले गेण्डे तथा शम्बरी से
शम्बर उत्पन्न हुए और मृगी से मृग उत्पन्न माने गए। मेषी से मेष-भेड़ें उत्पन्न हुईं
और अजा से बकरी उत्पन्न हुई। वृष्या से वृष-बैल उत्पन्न हुए और महिषी से
महिष-भैंसे हुए।
पुत्रिकाश्चैव शुक्यास्तु शतान्यष्टौ₁₀₈ द्विधाश्च₂ ताः ।
विहङ्गाश्च समस्तास्तु ह्यण्डजाः पक्षिणस्तथा ॥ 14 ॥
इसी प्रकार शुकी के एक सौ आठ पुत्रिकाएँ हुईं जो दो प्रकार की हैं। उनसे ही
सभी विहङ्ग और अण्डों से उत्पन्न होने वाले पक्षी उत्पन्न हुए।
एकैव च नखीजाता द्वात्रिंशच्च₃₂ तदात्मजाः ।
ग्रामारण्यव्योमचराः सङ्ख्याताश्च समस्तकाः ॥ 15 ॥
एक मात्र नखी के बत्तीस सन्तान हुईं उनमें ग्रामवासी, अरण्यवासी,
आकाशचारी आदि की समस्त संख्या आ जाती है।
गजा वराहाश्चैवं च एकान्वयसमुद्भवाः ।
कथिता चान्वयोद्भूतिरश्वीनां तु ह्यतः परम् ॥ 16 ॥
गज और वराह आदि दन्ति एक ही वंश से समुद्भूत हुए हैं। आगे मैं अश्वी के
एक ही वंश में उत्पन्न होने वाले जीवों के बारे में कहता हूँ।
अश्वः खरश्च पौराश्च गैरा म ( क )र्कटकादयः ।
अन्ये च श्वापदाः सर्वे ह्यश्वव्युत्पत्तिः प्रकीर्तिता ॥ 17 ॥