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सर्वकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 71, कुल 535 में से

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पृष्ठ 71

22 अपराजितपृच्छा
रखे गए हों। इनके नाम हैं- (1.) अतल, (2.) वितल, (3.) सुतल, (4.)
नितल, (5.) तलातल (6. पाताल) और 7. रसातल।
पातालाः सप्तधा ख्याताः पात्रे पात्रमिवापरम्।
अविरचित विना शास्त्रे सृष्टिकालसमुद्भवाः ॥ 14 ॥
इस प्रकार सप्त पाताल एक दूसरे पर रखे गए पात्रों परिपात्रों के अनुसार विख्यात
हुए और ये सृष्टिकाल के समय ही बिना किसी शास्त्रीय आधार के निर्मित हुए हैं।
आदिपीठोद्भवं मानं द्वि ? सहस्त्रैर्लक्षयोजनैः ।
तलसङ्ख्यान्तरे विद्यात् पाताले सप्तधोच्छ्रिते ॥ 15 ॥
ततो द्विगुणविस्तीर्णाः क्रमेणापि सुसंस्थिताः ।
ब्रह्मसृष्ट्युद्भवांशे तु पातालतलमेव च ॥ 16 ॥
सबसे आदि में जो पीठ बनी, वह दो सहस्र लाख योजनों की थी। उसके ऊपर
एक-एक तल संख्या के अन्तर पर सात पाताल बनते गए। इससे भी दोगुनी विस्तार
वाली क्रमवार सुसंस्थित ब्रह्मा की सृष्टि में बने हुए पातालों के तल हैं।
तदूर्ध्वं सागरा द्वीपाः ¹शैलैश्चापि भूसंस्थिता ।
जम्बूद्वीपादिमानेन सप्तद्वीपा वसुन्धरा ॥ 17 ॥
तथा सप्तसमुद्राश्च प्रमाणेन प्रकीर्तिताः ।
इन सबके ऊपर सागर और द्वीप तथा पहाड़ों की भूमि पर स्थिति बनी हुई है।
इस भूमि पर यहाँ जम्बू द्वीपादि के मान से सात महाद्वीप इस वसुन्धरा पर बने हुए
हैं तथा सात समुद्र भी इनके ही प्रमाणानुसार बने हुए हैं।
अथ द्वीपनामवर्णनञ्च —
जम्बूः प्लक्षः कुशक्रौञ्चौ शाल्मलिश्च तथैव च ॥ 18 ॥
शाकस्तथा समाख्यातः पुष्कराख्यश्च सप्तमः ।
द्वीपाः सप्त समाख्याता अकृता शम्भुना हि ते ॥ 19 ॥
(उक्त द्वीपों के नाम हैं-) (1.) जम्बू, (2.) प्लक्ष, (3.) कुश, (4.)
क्रौञ्च, (5.) शाल्मलि, (6.) शाक और सातवाँ (7.) पुष्कर। ये सातों विख्यात
द्वीप शम्भु के द्वारा निर्मित हैं।
जम्बूद्वीपो लक्षमेकं योजनानां तु सङ्ख्यया ।
तत्परमर्णवा जाताः सप्तसृष्टिविरजिताः ॥ 20 ॥

  1. 'शनैश्चापि भू (त?) संस्थिता' प्रकाशित पाठः।