अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
पृष्ठ 70, कुल 535 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-४ 21
महोमेर्वादयः ख्याताः शम्भुना रचिताः किल।
अब मैं पाताल स्वर्ग कहलाने वाले, मृत्युलोक के द्वीपार्णव तथा स्वर्गलोक
नाम से कहे जाने वाले तीनों ही लोकों के नाम कहता हूँ। महामेरु आदि नाम से
विख्यात सभी पहाड़ भगवान शम्भु द्वारा रचित है।
अथ पृथ्वीविस्तारवर्णनं —
तेषामनुक्रमश्चात्र कथ्यते त्वपराजित ॥ ७॥
ब्रह्माण्डान्ते तु या पृथ्वी योजनैः शत ₁₀₀ कोटिभिः।
विनसन्त्यन्तरे लोका भुवनानि निवासिनाम् ॥ ८ ॥
हे अपराजित ! मैं उन सभी को अनुक्रम से तुम्हें यहाँ कहता हूँ। यह पृथ्वी
ब्रह्माण्ड के अन्त तक सौ करोड़ योजन तक फैली हुई है। इनके अनन्तर में अनेकों
भुवनों में निवास करने वाले लोक बसते हैं।
सरितश्च समुद्राश्च शैलाश्चैवं प्रकीर्तिताः।
तडागा विविधास्तत्र तीर्थश्च धर्मकीर्तनः ॥ ९ ॥
उन सभी में विविध प्रकार की सरिताएँ, समुद्र, शैल-पहाड़ जो ख्याति प्राप्त हैं
तथा विविध तड़ाग, तीर्थ आदि धर्मकीर्ति के स्थान पाए जाते हैं।
पातालान्ते च या पृथ्वी योजनैर्दशकोटिभिः।
तस्या अग्रं सहस्त्राणामेकोनविंशति स्तथा ॥ १० ॥
देवाग्निगुरुपूजा च धर्मतीर्थमहोत्सवः।
नदीसमुद्रदेवाश्च तीर्थादिपुण्यनिर्मलाः ? ॥ ११ ॥
अब देखिए कि पाताल के अन्त तक भी इस पृथ्वी की सीमा दस करोड़
योजनों की हैं। उससे भी आगे उन्नीस हजार देवाग्निपूजा, गुरुपूजा व धर्म तीर्थ के
महोत्सव के स्थान तथा नदी और समुद्र देवताओं के निर्मल पुण्य तीर्थ हैं।
तथा च पातालवर्णनं —
पातालभूधरा लोकास्तीर्थाणि पुण्यसागराः।
संस्थिताः कर्मयोगेन पात्रे पात्रमिवापरम् ॥ १२ ॥
अतलो वितलश्चैव सुतलो नितलस्तथा।
तलातलश्च विज्ञेयः ? (पातालः ) सप्तमोऽथ रसातलःः ॥ १३ ॥
ये सभी पाताल के पहाड़ों के लोक, तीर्थों के लोक पुण्य सागरों के लोक
कर्मयोग के द्वारा एक दूसरे पर इसी प्रकार बने हुए हैं जिस प्रकार घड़ों पर घड़े