अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-५ 27 .
तेजसोऽम्भोभवो ज्योतिः संसारसृष्टिकारणम् ?।
तदुद्भवं समं चेदं जगत्स्थापरजङ्गमम् ॥ 12 ॥
तेज-अग्नि से ही जल हुआ। इस प्रकार यह ज्योतिष्मय तेज ही संसार की सृष्टि
का कारण हुआ जिससे यह सारा स्थावर-जङ्गम जगत् हुआ।
त्रैलोक्यप्रभवं ज्योतिर्जगदाल्हादकारकम्।
धर्मार्थकाममोक्षाणां सम्भवा ज्योतिषस्तथा ॥ 13 ॥
तीनों लोकों को बनाने वाली यह ज्योति जगत को आनन्द प्रदान करने वाली है
और इसी ज्योति से धर्म-अर्थ-काम और मोक्ष के चारों पदार्थ उत्पन्न हुए हैं।
तेजो ज्ञानोद्भवं ज्योतिः कोटिसूर्यसमप्रभम्।
तदुद्भवं महारूपं संसारमोक्षसौख्यदम् ॥ 14 ॥
तेज से ही ज्ञान रूप ज्योति उत्पन्न हुई जो करोड़ों सूर्यों की प्रभा के समान
प्रकाशमान हैं। इस ज्योति से ही यह महारूप विशाल संसार उत्पन्न हुआ जो मोक्ष-
सुख का देने वाला है।
कालागिरवि सम्भूतं रुद्ररूपं महाभयम् ? ।
रुद्रत्वं ? कलते काल महाकालो मुहुर्मुहुः ॥ 15 ॥
इसी से कालाग्नि के समान महाभय कारक रुद्ररूप उत्पन्न हुआ। यही रुद्रतत्त्व
क्षण-क्षण करके काल की रचना करते हुए महाकाल सिद्ध हुआ।
ज्योतीरूपं भवेद् व्योम्नि कल्पाग्निज्योतिसद्भवम् (रुद्भवम ? )।
व्योम्नि सद्योजातमूर्तिः शक्तिः स्याज्ज्योतिसद्भवा ॥ 16 ॥
व्योम आकाश में यह ज्योति स्वरूप ही कल्पाग्नि ज्योति को भी उत्पन्न करता
है जिससे ही सद्योजात मूर्ति शिव-शक्ति आकाश में उत्पन्न हुई है।
शिवशक्तिसमायुक्तमुद्भवैद्रुद्ररूपकम्।
शाम्भो रुद्रोद्भवः प्रोक्तो ब्रह्मविष्णु तदुद्भवौ ॥ 17 ॥
इसी शिव-शक्ति से मिलकर शिव का रुद्र रूप समुद्भव हुआ। इस प्रकार शाम्भू
रुद्र से उत्पन्न हुए और कहा जाता है कि ब्रह्मा व विष्णु भी इसी रुद्र से हुए।
ततः शाम्भूद्भवा सृष्टिर्जगत् स्थावरजङ्गमम्।
देवासुरमनुष्याश्च पशुपक्षिशरीरिणः ॥ 18 ॥
इनसे यह सारी स्थावर, जङ्गम सृष्टि उत्पन्न हुई जिनमें देव, असुर, मनुष्य,
पशु-पक्षी आदि शरीरधारी हुए।