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ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

८६ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय ३

८६ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय ३
रूपं पश्यति श्रोत्रभूतेन शृणोति | देखता है, श्रोत्ररूपसे श्रवण करता है,
घ्राणभूतेन जिघ्रति वाग्भूतेन | घ्राणरूपसे सूंघता है, वागिन्द्रिय-
वदति जिह्वाभूतेन रसयति | रूपसे बोलता है, जिह्बारूपसे चखता
स्वेनैव विकल्पानारूपेण मनसा | है, स्वयं सङ्कल्प-विकल्परूप मनसे
विकल्‍पयति हृदयरूपेणाध्यव- | सङ्कल्प करता है और हृदयरूपसे
स्यति । तस्मात्सर्वकरणविषय- | निश्चय करता है । अतः उपलब्ध-
व्यापारकमेकमिदं करणं सर्वोप- | की समस्त उपलब्धियोंके लिये
लब्ध्यर्थमुपलब्धुः । | इन्द्रियसम्बन्धी सारे व्यापारोंको
करनेवाला यही एक साधन है ।
तथा च कौषीतकीनां "प्रज्ञ- | इसी प्रकार कौषीतकी उपनिषद्-
या वाचं समारुह्य वाचा सर्वाणि | में भी कहा है—"प्रज्ञाद्वारा वाणी-
नामान्याप्नोति । प्रज्ञया चक्षुः | पर आरूढ होकर वाणीसे सम्पूर्ण
समारुह्य चक्षुषा सर्वाणि रूपा- | नामोंको प्राप्त ( ग्रहण ) करता है,
ण्याप्नोति" (३ । ६) इत्यादि । | प्रज्ञाद्वारा चक्षु इन्द्रियपर आरूढ
वाजसनेयके च—"मनसा | होकर चक्षुसे सारे रूपोंको
ह्येव पश्यति मनसा शृणोति | प्राप्त करता है" इत्यादि । तथा
हृदयेन हि रूपाणि जानाति" | बृहदारण्यकमें कहा है—"मनसे ही
( बृ० उ० १ । ५ । ३ ) | देखता है, मनसे ही सुनता है,
इत्यादि । तस्माद्धृदयमनोवाच्य- | हृदयसे ही रूपोंका ज्ञान प्राप्त करता
स्य सर्वोपलब्धिकरणत्वं प्रसिद्धम् । | है" इत्यादि । अतः हृदय और मनः-
तदात्मकश्च प्राणो "यो वै | शब्दवाच्य अन्तःकरणका ही सब
प्राणः सा प्रज्ञा या वै प्रज्ञा स | प्रकारकी उपलब्धिमें साधनत्व
प्राणः" (कौषी० ३।३) इति | प्रसिद्ध है । प्राण भी तद्रूप ही है ।
हि ब्राह्मणम् । | "जो प्राण है वही प्रज्ञा है और
जो प्रज्ञा है वही प्राण है" ऐसा
ब्राह्मणवाक्य है ।

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८७
करणसंहतिरूपश्च प्राण इत्य- 'प्राण इन्द्रियोंका संघातस्वरूप
वोचाम प्राणसंवादादौ । तस्मा- है' यह बात हम प्राणसंवाद
द्यत्पद्भ्यां प्रापद्यत तद्ब्रह्म तदु- आदि प्रकरणोंमें कह चुके हैं ।
पलब्धुरुपलब्धिकरणत्वेन गुण- अतः जिसने चरणोंकी ओरसे प्रवेश
भूतत्वान्नैव तद्वस्तु ब्रह्मोपास्या- किया था वह ब्रह्म उपलब्धामे
त्मा भवितुमर्हति । पारिशेष्या- उपलब्धिका साधन होनेके कारण
द्यस्योपलब्धुरुपलब्ध्यर्था एतस्य गौण होनेसे मुख्य ब्रह्म अर्थात्
हृदयस्य मनोरूपस्य करणस्य उपास्य आत्मा नहीं हो सकता ।
वृत्तयो वक्ष्यमाणाः । स उपल- अतः पारिशेष्यनियमानुसार* जिस
ब्धोपास्य आत्मा नोऽस्माकं भवि- उपलब्धाकी उपलब्धिका/उपलब्धिके
तुमर्हतीति निश्चयं कृतवन्तः । हृदय एवं मनोरूप अन्तःकरणकी
तदन्तःकरणोपाधिस्थस्योप- आगे बतलायी जानेवाली वृत्तियाँ
लब्धुः प्रज्ञारूपस्य ब्रह्मण उप- होती हैं वह उपलब्धा ही हमारा
लब्ध्यर्था या अन्तःकरणवृत्तयो उपासनीय आत्मा है–ऐसा उन्होंने
बाह्यान्तर्वर्तिविषयविषयास्ता इमा निश्चय किया ।
उच्यन्ते । संज्ञानं संज्ञप्तिश्चेतन- उस अन्तःकरणरूप उपाधिमें
भावः, आज्ञानमाज्ञप्तिरीश्वरभावः, स्थित प्रज्ञानरूप उपलब्धा ब्रह्मकी
विज्ञानं कलादिपरिज्ञानम्, प्रज्ञानं उपलब्धिके लिये जो बाह्य और
आन्तरिक विषयोंसे सम्बन्ध रखने-
वाली अन्तःकरणकी वृत्तियाँ हैं वे ये
बतलायी जाती हैं–'संज्ञान–संज्ञप्ति
अर्थात् चेतनभाव, आज्ञान–आज्ञा
करना अर्थात् ईश्वरभाव (प्रभुता),
विज्ञान–कलादिका ज्ञान, प्रज्ञान–

  • जहाँ आपाततः अनेकोंमेंसे किसी एक धर्म या गुणकी सम्भावना प्रतीत
    होनेपर भी और सबका प्रतिषेध करके बचे हुए किसी एक ही पदार्थमें उसका
    निर्णय किया जाता है वहाँ 'पारिशेष्यनियम' माना जाता है ।