ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
३६ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १
३६ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १
सर्वसंसारदुःखोपशमनाय वेदि- | दुःखोंकी शान्तिके लिये जानना
तव्यः । तस्मात् “एष पन्था | चाहिये । अतः “मोक्षप्राप्तिका और
एतत्कर्मैतद्ब्रह्मैतत् सत्यम्” (ऐ० | कोई मार्ग नहीं है” इस श्रुतिके
उ० २ । १ । १) यदेतत्पर- | अनुसार यह जो परब्रह्मका आत्म-
ब्रह्मात्मज्ञानम् “नान्यः पन्था | स्वरूपसे ज्ञान है “यही मार्ग है, यही
विद्यतेऽयनाय” (श्वे० उ० ३ । | कर्म है, यही ब्रह्म है और यही
८, ६ । १५) इति मन्त्रवर्णात् । | सत्य है।”
तं स्थानकरणदेवतोत्पत्ति- | स्थान (इन्द्रियगोलक), इन्द्रिय
बीजभूतं पुरुषं प्रथमोत्पादितं | और इन्द्रियाभिमानी देवताओंकी
पिण्डमात्मानमशनायापिपासाभ्या- | उत्पत्तिके बीजभूत पुरुषरूपसे
मन्ववार्जयदनुगमितवान्संयोजित- | प्रथम उत्पन्न किये हुए उस पिण्ड
वानित्यर्थः। तस्य कारणभूतस्या- | अर्थात् आत्माको उसने क्षुधा और
शनायादिदोषवत्त्वात्तत्कार्यभूता- | पिपासासे अन्ववार्जयत्-अनुगमित
नामपि देवतानामशनायादि- | अर्थात् संयुक्त किया । उस कारण-
मत्त्वम् । तास्ततोऽशनायापि- | भूत पिण्डके क्षुधा आदि दोषोंसे
पासाभ्यां पीड्यमाना एनं पिता- | युक्त होनेके कारण उसके कार्यभूत
महं स्रष्टारमब्रुवन्नुक्तवत्यः— | देवता आदि भी क्षुधा आदिसे युक्त
आयतनमधिष्ठानं नोऽस्मभ्यं प्र- | हुए । तब क्षुधा-पिपासासे पीड़ित
जानीहि विधत्स्व । यस्मिन्नायतने | होकर उन्होंने उस जगद्रचयिता
प्रतिष्ठिताः समर्थाः सत्योऽन्न- | पितामहसे कहा—‘हमारे लिये
मदाम भक्षयाम इति ॥ १ ॥ | आयतन-आश्रयस्थानकी व्यवस्था
| करो, जिस आयतनमें प्रतिष्ठित होकर
| हम सामर्थ्यवान् हो अन्न भक्षण कर
| सकें’ ॥ १ ॥
गो और अश्वशरीरकी उत्पत्ति तथा देवताओंद्वारा
उनकी अस्वीकृति
एवमुक्त ईश्वरः— | ऐसा कहे जानेपर ईश्वर—